मेरठ: अपराध की दुनिया में उम्र का एक पड़ाव कानून की दिशा बदल देता है। मेरठ के सरधना थाना क्षेत्र को दहला देने वाले बहुचर्चित 'कपसाड़ कांड' (Kapsad Kand) में सोमवार को एक ऐसा ही निर्णायक मोड़ आया। जिस वारदात ने पूरे उत्तर प्रदेश की राजनीति और पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया था, उस मामले के मुख्य आरोपी को अदालत ने 'नाबालिग' (Juvenile) घोषित कर दिया है।READ ALSO:-लिव-इन का खौफनाक अंत: बॉयफ्रेंड बनाना चाहता था 'धंधे' का हिस्सा, मना करने पर बुराड़ी में घोंटा गला; यमुना में बहाने लाया था आगरा, नाली में मिली सोनाली
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मां की निर्मम हत्या और बेटी के अपहरण जैसे जघन्य अपराध के आरोपी पारस सोम की उम्र को लेकर विशेष अदालत में लंबी बहस चली। आखिरकार, दस्तावेजी साक्ष्यों के आधार पर कोर्ट ने माना कि वारदात के वक्त आरोपी की उम्र 18 साल पूरी नहीं थी। इसी के साथ, अब इस पूरे मुकदमे की फाइल एससी-एसटी कोर्ट (SC/ST Court) से जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड (JJ Board) को ट्रांसफर कर दी गई है।
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सोमवार को अदालत में क्या हुआ?
\r\n\r\nसोमवार को मेरठ की विशेष अदालत में गहमागहमी का माहौल था। मामला हाई-प्रोफाइल था, इसलिए सबकी निगाहें जज के फैसले पर टिकी थीं। यह सुनवाई विशेष न्यायाधीश (एससी-एसटी एक्ट) की अदालत में चल रही थी।
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मुद्दा सिर्फ एक था—क्या आरोपी पारस सोम बालिग है या नाबालिग? हत्या और अपहरण जैसे मामलों में यह तय होना सबसे महत्वपूर्ण होता है क्योंकि बालिग होने पर उम्रकैद या फांसी तक की सजा का प्रावधान है, जबकि नाबालिग होने पर अधिकतम 3 साल सुधार गृह (सुधारात्मक रवैया) का नियम है (हालांकि निर्भया एक्ट के बाद 16-18 साल के बीच जघन्य अपराधों के लिए कानून कड़े हुए हैं, जिनका जिक्र आगे किया गया है)।
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साक्ष्यों की कसौटी: आरोपी पारस सोम की तरफ से पैरवी करने के लिए तीन वरिष्ठ वकीलों का पैनल खड़ा था। आरोपी के अधिवक्ता विजय शर्मा और बलराम सोम ने कोर्ट के सामने तर्क दिया कि पुलिस ने भले ही उसे मुख्य आरोपी बनाया हो, लेकिन दस्तावेजों के अनुसार वह बच्चा है।
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बचाव पक्ष ने कोर्ट में निम्नलिखित साक्ष्य पेश किए:
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- \r\n हाईस्कूल की मार्कशीट: जिसमें जन्मतिथि 11 मई 2008 दर्ज थी।\r\n \r\n
- \r\n स्कूल के अन्य सर्टिफिकेट: पढ़ाई से जुड़े प्रमाण पत्र।\r\n \r\n
- \r\n कक्षा 5 का सर्टिफिकेट: जो वादी पक्ष की मांग पर बाद में पेश किया गया।\r\n \r\n
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अदालत ने इन सभी दस्तावेजों का गहनता से परीक्षण किया। वादी पक्ष (पीड़ित परिवार) की ओर से भी कोशिश की गई कि आरोपी को बालिग साबित किया जाए, लेकिन वे कोई ठोस दस्तावेजी सबूत (जैसे नगर निगम का जन्म प्रमाण पत्र या अस्पताल का रिकॉर्ड जो स्कूल के रिकॉर्ड को काट सके) पेश नहीं कर सके।
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गणित उम्र का—17 साल, 7 महीने और 25 दिन
\r\n\r\nअदालत ने जब तारीखों का मिलान किया, तो तस्वीर शीशे की तरह साफ हो गई। आरोपी की जन्मतिथि: 11-05-2008 वारदात की तारीख: 08-01-2026 (घटना के अनुसार)
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एडवोकेट संजीव राणा ने बताया कि जब कोर्ट ने कैलकुलेशन किया, तो वारदात के दिन आरोपी पारस सोम की सटीक उम्र 17 साल, 7 महीने और 25 दिन निकली। भारतीय कानून के मुताबिक, 18 साल से एक दिन भी कम उम्र होने पर आरोपी को 'किशोर' (Juvenile) माना जाता है।
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सुप्रीम कोर्ट की रूलिंग का हवाला: आरोपी के वकील बलराम सोम ने बहस के दौरान सुप्रीम कोर्ट की कई रुलिंग्स (नजीरों) का हवाला दिया। उन्होंने तर्क दिया कि 'जुवेनाइल जस्टिस एक्ट' के तहत स्कूल का मैट्रिकुलेशन सर्टिफिकेट (हाईस्कूल की मार्कशीट) उम्र का सबसे पुख्ता सबूत माना जाता है। जब तक कि यह साबित न हो जाए कि सर्टिफिकेट फर्जी है, कोर्ट को उसे ही आधार मानना होगा।
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वादी पक्ष की दलीलें और कोर्ट का धैर्य
\r\n\r\nयह फैसला एक दिन में नहीं आया। इसकी पृष्ठभूमि पिछले महीने से तैयार हो रही थी।
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- \r\n 14 जनवरी: कोर्ट ने आरोपी की जन्मतिथि से जुड़ी याचिका स्वीकार की थी।\r\n \r\n
- \r\n 22 जनवरी: कोर्ट ने वादी पक्ष को नोटिस जारी कर जवाब मांगा था।\r\n \r\n
- \r\n 31 जनवरी: वादी पक्ष ने समय मांगा। उन्होंने कहा कि वे 'बेसिक शिक्षा विभाग' से जुड़े कुछ नियम और सर्टिफिकेट की रूलिंग लाएंगे जो यह साबित करेंगे कि स्कूल रिकॉर्ड गलत हो सकता है। कोर्ट ने उन्हें समय दिया।\r\n \r\n
- \r\n 4 फरवरी: वादी पक्ष ने कक्षा 5 का सर्टिफिकेट पेश किया। लेकिन, दांव उल्टा पड़ गया। कक्षा 5 के सर्टिफिकेट में भी जन्मतिथि वही निकली जो हाईस्कूल की मार्कशीट में थी—11 मई 2008।\r\n \r\n
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इसके बाद, विशेष न्यायाधीश के पास मामले को जेजे बोर्ड भेजने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। अब इस केस की चार्जशीट, गवाहों के बयान और सारे सबूत जेजे बोर्ड की अदालत में ट्रांसफर होंगे।
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वो काली तारीख—8 जनवरी का कपसाड़ कांड
\r\n\r\nकानूनी दांव-पेच से इतर, इस फैसले ने एक बार फिर उस खौफनाक मंजर की याद ताजा कर दी है जो 8 जनवरी को कपसाड़ गांव में घटा था।
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मेरठ का सरधना क्षेत्र, जो अपनी राजनीतिक सरगर्मियों के लिए जाना जाता है, उस दिन गोलियों और चीखों से गूंज उठा था। आरोप है कि पारस सोम और उसके साथियों ने एक घर को निशाना बनाया। उनका मकसद एक युवती का अपहरण करना था।
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जब युवती की मां सुनीता ने अपनी बेटी को बचाने की कोशिश की, तो दरिंदों ने उन पर रहम नहीं खाया। सुनीता की निर्मम हत्या कर दी गई। हत्या के बाद आरोपी युवती को अगवा कर अपने साथ ले गए।
\r\n\r\nपूरा गांव बना था छावनी: इस घटना ने कानून-व्यवस्था की धज्जियां उड़ा दी थीं।
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- \r\n विपक्ष का हल्ला बोल: घटना के बाद समाजवादी पार्टी और कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दलों ने इसे बड़ा मुद्दा बनाया था। नेताओं का तांता गांव में लग गया था।\r\n \r\n
- \r\n पुलिस पर सवाल: दिनदहाड़े हत्या और अपहरण ने पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया था। आक्रोशित ग्रामीणों ने हंगामा किया, जिसके बाद कई दिनों तक पूरा कपसाड़ गांव पुलिस छावनी (Cantonment) में तब्दील रहा। पीएसी (PAC) और कई थानों की फोर्स वहां तैनात करनी पड़ी थी।\r\n \r\n
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पुलिस पर भारी दबाव था। कई दिनों की छापेमारी के बाद पुलिस ने आरोपी पारस सोम को गिरफ्तार किया और अपहृत युवती को बरामद किया। लेकिन अब, गिरफ्तारी के बाद कानूनी लड़ाई का स्वरूप बदल गया है।
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अब आगे क्या? जेजे बोर्ड की भूमिका
\r\n\r\nअब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या आरोपी को 'बच्चा' मानकर नरमी बरती जाएगी? चूंकि आरोपी की उम्र 16 से 18 वर्ष के बीच (17 साल 7 महीने) है और अपराध 'जघन्य' (Heinous - हत्या और अपहरण) की श्रेणी में आता है, इसलिए यहां जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की धारा 15 लागू हो सकती है।
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कानूनी प्रक्रिया क्या होगी?
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- \r\n प्रारंभिक मूल्यांकन (Preliminary Assessment): जेजे बोर्ड यह जांच करेगा कि क्या आरोपी में अपराध को समझने की मानसिक क्षमता थी? क्या उसे अपने कृत्य के परिणामों का पता था? क्या यह अपराध 'बच्चों वाली गलती' थी या 'शातिर अपराधी' जैसी योजना?\r\n \r\n
- \r\n साइकोलॉजिकल रिपोर्ट: इसके लिए मनोवैज्ञानिकों की मदद ली जा सकती है।\r\n \r\n
- \r\n बालिग की तरह ट्रायल? अगर जेजे बोर्ड को लगता है कि आरोपी की मानसिकता वयस्कों (Adults) वाली थी और अपराध बेहद क्रूर था, तो बोर्ड केस को वापस सेशंस कोर्ट (बच्चों की अदालत) में भेज सकता है ताकि उस पर बालिग की तरह मुकदमा चलाया जा सके।\r\n \r\n
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हालांकि, फिलहाल के लिए आरोपी को बाल सुधार गृह में ही रखा जाएगा और जमानत समेत अन्य याचिकाओं पर सुनवाई जेजे बोर्ड ही करेगा।
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समाज और पीड़ित परिवार के लिए इसके मायने
\r\n\r\nपीड़ित परिवार के लिए यह खबर किसी झटके से कम नहीं है। मां को खोने और बहन के अपहरण का दंश झेल रहे परिवार को उम्मीद थी कि हत्यारे को जल्द से जल्द फांसी या उम्रकैद की सजा होगी। लेकिन 'नाबालिग' घोषित होने से न्यायिक प्रक्रिया लंबी खिंच सकती है।
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विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूल के दस्तावेजों में उम्र कम लिखवाना ग्रामीण भारत में एक आम चलन है, लेकिन कानून भावनाओं से नहीं, सबूतों से चलता है। वादी पक्ष के पास अब विकल्प सीमित हैं, वे जेजे बोर्ड के फैसले का इंतजार कर सकते हैं या इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।
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न्याय की नई डगर
\r\n\r\nमेरठ का कपसाड़ कांड अब एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। पुलिस की जांच खत्म हो चुकी है, आरोपी सलाखों के पीछे है, लेकिन उसकी 'उम्र' ने उसे एक ढाल दे दी है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जेजे बोर्ड इस मामले में क्या रुख अपनाता है—क्या पारस सोम को एक 'भटका हुआ बच्चा' माना जाएगा, या एक 'शातिर कातिल'?
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मेरठ की जनता और पीड़ित परिवार की निगाहें अब किशोर न्याय बोर्ड (JJ Board) के दरवाजे पर टिकी हैं।
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महत्वपूर्ण तिथियां (Timeline):
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- \r\n 08 जनवरी: कपसाड़ में हत्या और अपहरण की वारदात।\r\n \r\n
- \r\n जनवरी (मध्य): आरोपी पारस सोम गिरफ्तार, लड़की बरामद।\r\n \r\n
- \r\n 14 जनवरी: कोर्ट में जन्मतिथि याचिका दायर।\r\n \r\n
- \r\n 22 जनवरी: वादी पक्ष को नोटिस जारी।\r\n \r\n
- \r\n 04 फरवरी: वादी पक्ष ने कक्षा 5 का सर्टिफिकेट पेश किया।\r\n \r\n
- \r\n फरवरी (दूसरा सप्ताह): कोर्ट ने आरोपी को नाबालिग घोषित कर केस जेजे बोर्ड भेजा।\r\n \r\n
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(नोट: यह रिपोर्ट न्यायालय की कार्यवाही और उपलब्ध मीडिया इनपुट्स पर आधारित है। मामले में अंतिम निर्णय न्यायपालिका के अधीन है।)
Sabse pehle comment karne wale banein.