मेरठ (Meerut): भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में 9 अगस्त का दिन एक ऐसा ऐतिहासिक और स्वर्णिम पृष्ठ है, जिसे 'अगस्त क्रांति' (August Kranti) के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1942 में इसी दिन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी ने ब्रिटिश साम्राज्य की जड़ें उखाड़ फेंकने के लिए 'भारत छोड़ो' (Quit India) का शंखनाद किया था। उस महासंग्राम में 'करो या मरो' के नारे ने पूरे देश में एक नई ऊर्जा का संचार कर दिया था। उसी गौरवशाली इतिहास और अमर शहीदों के बलिदान को याद करते हुए, रविवार को क्रांतिधरा मेरठ के प्रतिष्ठित पंडित प्यारेलाल शर्मा स्मारक भवन में 'भारत छोड़ो आंदोलन' की 84वीं वर्षगांठ पूरी भव्यता, गरिमा और देशभक्ति की भावना के साथ मनाई गई।READ ALSO:-गाजियाबाद में दुस्साहस: पार्श्वनाथ बिल्डिंग में सिक्योरिटी गार्ड की गोली से 18 वर्षीय युवक की मौत; चोरी के शक में चली लाइसेंसी बंदूक, इलाके में हड़कंप
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इस विशेष और ऐतिहासिक समारोह का सफल आयोजन 'जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद्, मेरठ' के तत्वावधान में किया गया। कार्यक्रम में शहर के गणमान्य नागरिकों, समाजसेवियों, और युवाओं ने भारी संख्या में भाग लिया, जिससे पूरा सभागार देशभक्ति के नारों और भारत माता की जयघोष से गूंज उठा।
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महापौर हरिकांत अहलूवालिया ने युवाओं को किया प्रेरित
\r\n\r\nकार्यक्रम में मेरठ महानगर के प्रथम नागरिक यानी महापौर श्री हरिकांत अहलूवालिया जी ने मुख्य अतिथि के रूप में शिरकत की। उनके आगमन पर परिषद् के सदस्यों ने पुष्पगुच्छ भेंट कर और माल्यार्पण कर उनका भव्य स्वागत किया।
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अपने संबोधन में महापौर श्री हरिकांत अहलूवालिया ने अगस्त क्रांति के महत्व पर गहराई से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा, "मेरठ की मिट्टी में क्रांति की महक है। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से लेकर 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन तक, मेरठ के वीरों ने हमेशा देश के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने में अग्रणी भूमिका निभाई है।" उन्होंने आज की युवा पीढ़ी का आह्वान करते हुए कहा कि हमें उन स्वतंत्रता सेनानियों के आदर्शों, उनके त्याग और उनके विजन को समझना होगा। आज हमें उसी 'करो या मरो' की भावना के साथ देश के विकास, स्वच्छता और सामाजिक समरसता के लिए काम करने की आवश्यकता है।
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\r\n\r\nपरिषद् के कार्यों और ऐतिहासिक योगदान पर चर्चा
\r\n\r\nइस गरिमापूर्ण कार्यक्रम की अध्यक्षता शहर के वरिष्ठ पदाधिकारी एवं प्रतिष्ठित नागरिक श्री राजीव कुमार गर्ग जी द्वारा की गई। उन्होंने अपने अध्यक्षीय भाषण में स्वतंत्रता संग्राम में मेरठ के अद्वितीय और ऐतिहासिक योगदान को विस्तार से श्रोताओं के सामने रखा।
\r\n\r\n\r\n\r\nश्री राजीव कुमार गर्ग ने कहा, "भारत छोड़ो आंदोलन केवल एक राजनीतिक आंदोलन नहीं था, बल्कि यह आम जनमानस की आजादी की वह तड़प थी, जिसने ब्रिटिश हुकूमत को यह अहसास करा दिया था कि अब भारत पर राज करना असंभव है।" इसके साथ ही उन्होंने 'जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद्' द्वारा स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों के कल्याण और उनके सम्मान में किए जा रहे विभिन्न सामाजिक एवं सांस्कृतिक कार्यों का भी उल्लेख किया।
\r\n\r\n\r\n\r\nआयोजक मंडल की सराहनीय भूमिका और अथक प्रयास
\r\n\r\nइस भव्य और सफल आयोजन को मूर्त रूप देने के पीछे 'जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद्, मेरठ' की पूरी कार्यकारिणी का सराहनीय और अथक प्रयास रहा। कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने से लेकर इसके सफल क्रियान्वयन तक, परिषद् के पदाधिकारियों ने दिन-रात मेहनत की।
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कार्यक्रम का कुशल और सुचारू संचालन परिषद् के निम्नलिखित प्रमुख पदाधिकारियों द्वारा किया गया:
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- \r\n महामंत्री: के० पी० सिंह जी (जिन्होंने कार्यक्रम की रूपरेखा और अतिथियों के समन्वय का जिम्मा संभाला)\r\n \r\n
- \r\n उपाध्यक्ष: श्रीमती अलका रानी जी (जिन्होंने महिला सशक्तिकरण और देशभक्ति गीतों के माध्यम से माहौल को ऊर्जामय बनाया)\r\n \r\n
- \r\n कोषाध्यक्ष: श्री राम रतन रस्तोगी जी (कार्यक्रम के सफल प्रबंधन में महत्वपूर्ण भूमिका)\r\n \r\n
- \r\n मीडिया प्रभारी: श्री रमेश चंद्र जी (जिन्होंने इस ऐतिहासिक कार्यक्रम को आम जनमानस तक पहुंचाने का कार्य किया)\r\n \r\n
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शहर के प्रबुद्ध समाजसेवियों और गणमान्य नागरिकों की रही प्रभावशाली उपस्थिति
\r\n\r\nइस देशभक्तिपूर्ण कार्यक्रम की गरिमा बढ़ाने के लिए शहर के कई जाने-माने समाजसेवी, डॉक्टर, शिक्षाविद और गणमान्य नागरिक भी उपस्थित रहे। इन सभी ने एक स्वर में देश की आजादी में अपने प्राणों की आहुति देने वाले ज्ञात और अज्ञात शहीदों को नमन किया।
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प्रमुख रूप से उपस्थित रहे गणमान्य व्यक्तियों में शामिल थे:
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- \r\n डॉ० किरन जी\r\n \r\n
- \r\n डॉ० कम्रेन्द्र सिंह जी\r\n \r\n
- \r\n कैप्टन चन्द्र पाल सिंह यादव जी\r\n \r\n
- \r\n ईश्वर चन्द्र गम्भीर जी\r\n \r\n
- \r\n सुमनेश सुमन जी\r\n \r\n
- \r\n सौरभ दिवाकर जी\r\n \r\n
- \r\n श्री पुनीत शर्मा जी\r\n \r\n
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इन सभी प्रबुद्धजनों ने आपस में विचार-विमर्श करते हुए इस बात पर जोर दिया कि ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन समय-समय पर स्कूलों और कॉलेजों में भी होना चाहिए, ताकि नई पीढ़ी अपने इतिहास से कट न जाए।
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क्यों खास है क्रांतिधरा मेरठ और अगस्त क्रांति का यह मेल?
\r\n\r\nमेरठ को यूं ही 'क्रांतिधरा' (क्रांति की भूमि) नहीं कहा जाता है। 10 मई 1857 को जब औपनिवेशिक शासन के खिलाफ पहली चिंगारी फूटी थी, तो उसका केंद्र मेरठ का औघड़नाथ मंदिर और छावनी क्षेत्र ही था। उस प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद, जब 8 अगस्त 1942 को बंबई (अब मुंबई) के ग्वालिया टैंक मैदान से महात्मा गांधी ने 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' का प्रस्ताव पारित किया, तो 9 अगस्त की सुबह तक कांग्रेस के सभी बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया था।
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नेतृत्व विहीन होने के बावजूद, मेरठ समेत पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश के युवाओं, किसानों और मजदूरों ने स्वतः ही इस आंदोलन की बागडोर अपने हाथों में ले ली थी। मेरठ के चप्पे-चप्पे पर ब्रिटिश शासन का विरोध हुआ, सरकारी इमारतों पर तिरंगा फहराने की होड़ लग गई और कई युवाओं ने हंसते-हंसते गोलियां खाईं। आज के इस 84वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम ने उसी गौरवशाली अतीत की यादों को एक बार फिर से जीवंत कर दिया। यह कार्यक्रम इस बात का भी प्रतीक था कि मेरठ की जनता आज भी अपने नायकों को भूली नहीं है।
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राष्ट्रगान के साथ हुआ कार्यक्रम का समापन
\r\n\r\nकार्यक्रम के अंतिम चरण में देशभक्ति के गीतों और कविताओं का भी पाठ किया गया, जिसने उपस्थित सभी लोगों की आंखें नम कर दीं। अंत में सभी अतिथियों, आयोजकों और उपस्थित नागरिकों ने एक साथ खड़े होकर पूरे सम्मान के साथ राष्ट्रगान (जन-गण-मन) का गान किया।
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कार्यक्रम का समापन "भारत माता की जय", "वंदे मातरम" और "अमर शहीद अमर रहें" के गगनभेदी उद्घोष के साथ हुआ। सभागार में उपस्थित हर एक नागरिक ने देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को बनाए रखने का दृढ़ संकल्प लिया। यह आयोजन एक बार फिर यह साबित कर गया कि मेरठ के रग-रग में आज भी देशभक्ति का वही पुराना जज्बा दौड़ रहा है, जो 1942 के दौर में था।



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