खबरीलाल डेस्क
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पोस्टरों के जरिए हमले और पलटवार का इतिहास काफी पुराना है, लेकिन बुधवार को मेरठ जिले के परतापुर इलाके में एक नई राजनीतिक चिंगारी तब भड़क उठी जब समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के खिलाफ एक बेहद आपत्तिजनक होर्डिंग रातों-रात लगा दिया गया। इस पोस्टर में न केवल अखिलेश यादव की तस्वीर का इस्तेमाल किया गया था, बल्कि उनके और उनकी पार्टी के खिलाफ बेहद तीखी, विवादित और जातिगत टिप्पणियां भी लिखी गई थीं। जैसे ही सुबह-सुबह लोगों और स्थानीय नेताओं की नजर इस पोस्टर पर पड़ी, इलाके का सियासी पारा अचानक चढ़ गया। शहर के शांतिपूर्ण माहौल में इस पोस्टर ने एक राजनीतिक भूचाल ला दिया और देखते ही देखते बड़ी संख्या में समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ता और पदाधिकारी घटनास्थल पर जुटने लगे।READ ALSO:-रक्षाबंधन पर NCRTC का 'महा-तोहफा': नमो भारत लगाएगी 47 एक्स्ट्रा फेरे, अब न ट्रैफिक का झंझट, न स्टेशन पर इंतजार!
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घटनाक्रम: परतापुर में विवादित पोस्टर और कार्यकर्ताओं का आक्रोश

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परतापुर, जो कि मेरठ का एक व्यस्त और महत्वपूर्ण इलाका है, वहां मुख्य मार्ग पर एक ऊंचे पिलर पर यह विवादित पोस्टर लगाया गया था। स्थानीय निवासियों के अनुसार, यह होर्डिंग संभवतः मंगलवार देर रात या बुधवार तड़के लगाया गया था, ताकि सुबह होते ही ज्यादा से ज्यादा लोगों का ध्यान इस पर जा सके। सपा कार्यकर्ताओं को जब अपने स्थानीय सूत्रों और सोशल मीडिया के माध्यम से इस होर्डिंग की सूचना मिली, तो वे तुरंत लामबंद होने लगे। घटनास्थल पर पहुंचते ही कार्यकर्ताओं में भारी आक्रोश फैल गया। उन्होंने तुरंत नारेबाजी शुरू कर दी और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठाए कि आखिर इतनी बड़ी होर्डिंग बिना किसी की नजर में आए कैसे लगा दी गई। कार्यकर्ताओं का स्पष्ट कहना था कि यह किसी एक व्यक्ति का काम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक सोची-समझी राजनीतिक साजिश है।
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कड़ी मशक्कत: ट्रक और पोल के सहारे फाड़ा गया होर्डिंग

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पोस्टर को लगाने वालों ने यह सुनिश्चित किया था कि इसे आसानी से हटाया न जा सके। इसलिए होर्डिंग को जमीन से काफी ऊंचाई पर एक बड़े फ्रेम में कसा गया था। जब सपा कार्यकर्ता वहां पहुंचे, तो उनके लिए पोस्टर तक पहुंचना एक बड़ी चुनौती बन गया। शुरुआत में सीढ़ी या अन्य माध्यमों से इसे हटाने का प्रयास किया गया, लेकिन ऊंचाई अधिक होने के कारण सफलता नहीं मिली। इसके बाद कार्यकर्ताओं ने एक बड़े ट्रक का इंतजाम किया। कुछ उत्साही कार्यकर्ता ट्रक की छत पर चढ़ गए और लंबे बांस और लोहे के पोल (डंडों) का सहारा लेकर होर्डिंग तक पहुंचने में कामयाब हुए। कार्यकर्ताओं ने पूरी ताकत के साथ उस विवादित पोस्टर को खींचकर फाड़ दिया और उसे पूरी तरह से नष्ट कर दिया। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान वहां भारी भीड़ जमा हो गई थी और कुछ समय के लिए यातायात भी प्रभावित हुआ।
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पोस्टर की विषयवस्तु: जातिगत टिप्पणी और राजनीतिक साजिश के आरोप

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इस पूरे विवाद के केंद्र में पोस्टर पर लिखी गई इबारत थी। सपा नेताओं के अनुसार, इस पोस्टर में जानबूझकर ऐसी भाषा का प्रयोग किया गया था जो न केवल एक बड़े राजनीतिक दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष के सम्मान को ठेस पहुंचाती है, बल्कि समाज में जातिगत वैमनस्य भी पैदा करती है। समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेताओं ने कड़े शब्दों में आरोप लगाया है कि विरोधी दल और उनके कुछ असमाजिक तत्व इस तरह की ओछी राजनीति पर उतर आए हैं। उनका मानना है कि चूंकि आगामी राजनीतिक परिदृश्य में समाजवादी पार्टी लगातार मजबूत हो रही है, इसलिए विपक्षी खेमे में बौखलाहट है। इसी बौखलाहट के चलते पार्टी की छवि को खराब करने और आम जनता के बीच भ्रम फैलाने के लिए इस तरह के हथकंडे अपनाए जा रहे हैं।
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पश्चिमी उत्तर प्रदेश की राजनीति और 'पोस्टर वार' का इतिहास

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पश्चिमी उत्तर प्रदेश, विशेषकर मेरठ, हमेशा से ही उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक बड़ा केंद्र रहा है। यहां के राजनीतिक समीकरण पूरे राज्य की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ऐसे में मेरठ में अखिलेश यादव के खिलाफ इस तरह का पोस्टर लगना कोई सामान्य घटना नहीं मानी जा सकती। उत्तर प्रदेश में 'पोस्टर वार' कोई नई बात नहीं है; अक्सर चुनाव से पहले या किसी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम के दौरान अलग-अलग पार्टियां एक-दूसरे पर पोस्टर के जरिए तंज कसती हैं। लेकिन, जब बात व्यक्तिगत और जातिगत टिप्पणियों तक पहुंच जाती है, तो यह कानून-व्यवस्था के लिए भी एक बड़ी चुनौती बन जाता है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह के कृत्य स्वस्थ लोकतंत्र के लिए खतरनाक हैं और ये केवल ध्रुवीकरण की राजनीति को बढ़ावा देते हैं।
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प्रशासन से मांग: सीसीटीवी फुटेज खंगालने और एफआईआर की अपील

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पोस्टर फाड़ने के बाद समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने पुलिस और स्थानीय प्रशासन के खिलाफ भी अपना रोष व्यक्त किया। उन्होंने मौके पर पहुंचे पुलिस अधिकारियों से स्पष्ट मांग की है कि इस मामले में अज्ञात लोगों के खिलाफ तुरंत एफआईआर (FIR) दर्ज की जाए। कार्यकर्ताओं ने सुझाव दिया है कि परतापुर और उसके आसपास के इलाके में लगे सभी सरकारी और निजी सीसीटीवी (CCTV) कैमरों की फुटेज को तत्काल खंगाला जाए। उनका तर्क है कि इतना बड़ा होर्डिंग लगाने के लिए कोई वाहन और कई लोग आए होंगे, जिन्हें सीसीटीवी फुटेज के जरिए आसानी से पहचाना जा सकता है। सपा नेताओं ने चेतावनी दी है कि यदि पुलिस प्रशासन ने इस मामले में ढिलाई बरती और 24 से 48 घंटे के भीतर दोषियों को गिरफ्तार नहीं किया, तो पार्टी बड़े पैमाने पर धरना-प्रदर्शन करने के लिए मजबूर होगी।
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आगे की राह: क्या पुलिस कर पाएगी साजिशकर्ताओं की पहचान?

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फिलहाल, घटना के बाद परतापुर इलाके में तनावपूर्ण शांति है और एहतियात के तौर पर कुछ पुलिस बल भी तैनात किया गया है ताकि किसी भी तरह के टकराव को रोका जा सके। अब पूरी जिम्मेदारी स्थानीय खुफिया इकाई (LIU) और पुलिस प्रशासन पर है कि वे कितनी जल्दी इस मामले का खुलासा करते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या यह किसी सिरफिरे व्यक्ति की करतूत थी या वाकई इसके पीछे कोई गहरी राजनीतिक साजिश काम कर रही थी। बहरहाल, इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में शब्द बाणों के साथ-साथ पोस्टर युद्ध भी अब आक्रामक रूप ले चुका है।