नई दिल्ली: भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है, लेकिन हमारी अर्थव्यवस्था की एक बड़ी कमजोरी हमारा भारी-भरकम 'आयात बिल' (Import Bill) है, विशेषकर ऊर्जा और ईंधन के क्षेत्र में। आज भी भारत अपनी जरूरत की 50 प्रतिशत से अधिक रसोई गैस (LPG - Liquefied Petroleum Gas) खाड़ी देशों से आयात करता है।READ ALSO:-मेरठ में 'कचरे से क्रांति': अब गीले कूड़े से बनेगी CNG गैस; शहर से हमेशा के लिए खत्म होंगे बदबूदार कूड़े के पहाड़, 20 हजार घरों के रोशन होंगे चूल्हे
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अंतरराष्ट्रीय बाजार में जब भी कोई हलचल होती है, तो भारत में गैस के दाम आसमान छूने लगते हैं। इसी विदेशी निर्भरता की बेड़ियों को तोड़ने के लिए भारत सरकार ने 'आत्मनिर्भर भारत' (Aatmanirbhar Bharat) के तहत एक गेम-चेंजर कदम उठाया है। अब देश के किसानों के खेतों और चीनी मिलों से निकलने वाला 'एथेनॉल' सिर्फ गाड़ियों के पेट्रोल में ही नहीं मिलेगा, बल्कि यह सीधे आपकी रसोई तक पहुंचेगा और आपका खाना पकाएगा।
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केंद्रीय खाद्य और सार्वजनिक वितरण सचिव संजीव चोपड़ा ने हाल ही में इस महत्वाकांक्षी परियोजना के संकेत दिए हैं। उनके अनुसार, सरकार न केवल एथेनॉल के उत्पादन पर जोर दे रही है, बल्कि अब इसके बहुआयामी उपयोग (Multi-dimensional use) के लिए बाजार तैयार कर रही है।
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AIDA एनुअल डिस्टिलर्स कॉन्क्लेव 2025: क्या हुआ बड़ा ऐलान?
\r\n\r\nनई दिल्ली में हाल ही में 'AIDA एनुअल डिस्टिलर्स कॉन्क्लेव 2025' (All India Distillers' Association Conclave) का आयोजन किया गया। इस महासम्मेलन में देश भर के डिस्टिलरी मालिक, नीति निर्माता और ऊर्जा विशेषज्ञ शामिल हुए।
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इसी मंच से केंद्रीय सचिव संजीव चोपड़ा ने एक ऐसी घोषणा की, जिसने पूरे ऊर्जा और कृषि क्षेत्र में हलचल मचा दी।
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- \r\n रुडिमेंट्री मॉडल (Rudimentary Models) का प्रदर्शन: संजीव चोपड़ा ने बताया कि सरकार और अनुसंधान एजेंसियों ने मिलकर 'एथेनॉल आधारित कुकिंग स्टोव' (Ethanol-based Cooking Stoves) के शुरुआती और बेसिक मॉडल तैयार कर लिए हैं। इस कॉन्क्लेव में इन चूल्हों का प्रदर्शन भी किया गया ताकि उद्योग जगत इसके भविष्य की संभावनाओं को समझ सके।\r\n \r\n
- \r\n शुरुआती (Nascent) चरण: हालांकि, उन्होंने बड़ी ही स्पष्टता के साथ यह भी जोड़ा कि यह योजना अभी अपने 'नेसेंट' यानी बिल्कुल शुरुआती चरण में है। इसका मतलब यह नहीं है कि कल से ही बाजार में एथेनॉल के चूल्हे मिलने लगेंगे।\r\n \r\n
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अभी किन चीजों पर चल रहा है काम?
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- \r\n तकनीकी पहलू (Technical Feasibility): एथेनॉल गैस नहीं, बल्कि एक तरल (Liquid) ईंधन है। इसे चूल्हे में वाष्पीकृत (Vaporize) करके कैसे सुरक्षित रूप से जलाया जाए, इस तकनीक को परिष्कृत किया जा रहा है।\r\n \r\n
- \r\n सुरक्षा मानक (Safety Standards): घरेलू उपयोग के लिए ईंधन का सुरक्षित होना सर्वोपरि है। एथेनॉल ज्वलनशील होता है, इसलिए सिलेंडरों या कनस्तरों (Canisters) के डिजाइन को 'ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंडर्ड्स' (BIS) के कड़े पैमानों पर कसा जा रहा है।\r\n \r\n
- \r\n उपलब्धता (Availability): क्या गांव-देहात के दूर-दराज इलाकों तक एथेनॉल की बोतलें या सिलेंडर आसानी से पहुंचाए जा सकेंगे? इस पर एक व्यापक सप्लाई चेन रणनीति बन रही है।\r\n \r\n
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भू-राजनीतिक तनाव और LPG का संकट: एथेनॉल की जरूरत क्यों पड़ी?
\r\n\r\nआम जनता के मन में यह सवाल उठना लाजमी है कि जब देश में उज्ज्वला योजना (Ujjwala Yojana) के तहत करोड़ों घरों तक LPG पहुंच चुकी है, तो फिर सरकार एथेनॉल पर इतना जोर क्यों दे रही है? इसका जवाब 'भू-राजनीति' (Geopolitics) में छिपा है।
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हॉर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) का चोकपॉइंट
\r\n\r\nएथेनॉल को विकल्प के रूप में चुनने के पीछे सबसे बड़ा कारण पश्चिम एशिया (मिडल ईस्ट) में जारी युद्ध और अस्थिरता है। दुनिया का एक तिहाई समुद्री तेल और गैस व्यापार 'हॉर्मुज जलडमरूमध्य' से होकर गुजरता है। यह ओमान और ईरान के बीच एक संकरा समुद्री रास्ता है।
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- \r\n इजराइल-हमास-ईरान संघर्ष और लाल सागर में हूती विद्रोहियों के हमलों के कारण इस समुद्री मार्ग से होने वाली एलपीजी और कच्चे तेल की सप्लाई बुरी तरह प्रभावित हुई है।\r\n \r\n
- \r\n जहाजों को लंबा रास्ता तय करना पड़ रहा है, जिससे माल-भाड़ा (Freight Cost) बढ़ गया है और इंश्योरेंस प्रीमियम आसमान छू रहे हैं।\r\n \r\n
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आयातित महंगाई (Imported Inflation) की मार
\r\n\r\nइन भू-राजनीतिक अड़चनों के चलते देश के जमीनी स्तर पर गैस की सप्लाई चेन चरमरा रही है और कीमतों में भारी उछाल दर्ज किया जा रहा है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में गैस महंगी होती है, तो सरकार को या तो सब्सिडी का बोझ उठाना पड़ता है (जिससे राजकोषीय घाटा बढ़ता है) या फिर जनता पर महंगाई का बोझ डालना पड़ता है।
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एथेनॉल ही क्यों? एथेनॉल एक 100% 'स्वदेशी विकल्प' है। यह गन्ने के रस, शीरा (Molasses), मक्का, और खराब हो चुके अनाज से बनता है। इसे बनाने के लिए हमें किसी खाड़ी देश के आगे हाथ नहीं फैलाना पड़ता। यदि हॉर्मुज जलडमरूमध्य ब्लॉक भी हो जाए, तो भी भारत के खेतों में पैदा होने वाले गन्ने और चावल से देश की रसोई की आग बुझने नहीं पाएगी। यह भारत को विदेशी बाधाओं और ब्लैकमेलिंग से मुक्त करेगा।
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पायलट प्रोजेक्ट और सप्लाई चेन: कैसे पहुंचेगा आपके घर तक एथेनॉल?
\r\n\r\nकिसी भी नए ईंधन को घर-घर पहुंचाना एक 'लॉजिस्टिक दुस्वप्न' (Logistical Nightmare) हो सकता है, अगर योजना सही न हो। एलपीजी का इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में भारत को दशकों लग गए। इसलिए सरकार एथेनॉल के मामले में बेहद फूंक-फूंक कर कदम रख रही है।
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डिस्टिलरी आधारित क्लस्टर मॉडल
\r\n\r\nकेंद्रीय सचिव ने जानकारी दी कि एथेनॉल की सप्लाई चेन को व्यावहारिक और सस्ता बनाने के लिए एक 'क्लस्टर मॉडल' (Cluster Model) पर प्रयोग किए जा रहे हैं।
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- \r\n शुरुआती फोकस: योजना यह है कि एथेनॉल आधारित चूल्हों का सबसे पहला परीक्षण (Pilot Project) उन जिलों या क्षेत्रों में किया जाए, जहाँ डिस्टिलरी (एथेनॉल बनाने वाली फैक्ट्रियां) पहले से मौजूद हैं (जैसे उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, और कर्नाटक के गन्ना उत्पादक बेल्ट)।\r\n \r\n
- \r\n लोकल फॉर वोकल: डिस्टिलरी के आसपास के 50-100 किलोमीटर के दायरे में एथेनॉल की ढुलाई का खर्च (Transportation Cost) लगभग न के बराबर होगा। इससे वहां के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में एलपीजी के मुकाबले एथेनॉल बेहद सस्ते दामों पर उपलब्ध कराया जा सकेगा।\r\n \r\n
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यदि यह क्लस्टर मॉडल (पायलट प्रोजेक्ट) सफल रहता है और जनता इसे स्वीकार कर लेती है, तो बॉटलिंग प्लांट और रिटेल डिस्ट्रीब्यूशन नेटवर्क स्थापित करके इसे पूरे देश में बड़े स्तर (National Scale) पर लागू किया जाएगा।
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एथेनॉल की बढ़ती मांग, 30% ब्लेंडिंग का लक्ष्य और नई चुनौतियां
\r\n\r\nभारत की 'इथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम' (EBP - Ethanol Blending Programme) की सफलता दुनिया भर के लिए एक केस स्टडी बन चुकी है।
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20% से 30% ब्लेंडिंग की ओर छलांग
\r\n\r\nकुछ साल पहले तक पेट्रोल में केवल 1.5% एथेनॉल मिलाया जाता था। लेकिन सरकार की नीतियों और डिस्टिलरी क्षमता में किए गए भारी निवेश के कारण, भारत ने समय से पहले ही पेट्रोल में 20% एथेनॉल ब्लेंडिंग (E20) का लक्ष्य हासिल कर लिया है। अब सरकार का अगला बड़ा लक्ष्य 30% ब्लेंडिंग हासिल करना है।
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"अब चुनौती सप्लाई की नहीं, डिमांड की है"
\r\n\r\nसंजीव चोपड़ा के भाषण का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह था जहाँ उन्होंने कहा कि भारत ने अपनी एथेनॉल उत्पादन क्षमता (Production Capacity) में असाधारण सुधार किया है। अब हमारे पास इतना इंफ्रास्ट्रक्चर है कि हम भरपूर एथेनॉल बना सकते हैं। यानी, अब सरकार के सामने चुनौती यह नहीं है कि "एथेनॉल कहां से आएगा?", बल्कि चुनौती यह है कि "इतने सारे एथेनॉल की खपत कहां होगी?" (Demand Generation)।
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बहुआयामी उपयोग (Diversification of Ethanol): सिर्फ पेट्रोल के भरोसे एथेनॉल उद्योग को जीवित नहीं रखा जा सकता। इसलिए सरकार अब नए रास्ते तलाश रही है:
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- \r\n डीजल में ब्लेंडिंग: पेट्रोल के बाद अब भारी वाहनों (ट्रक/बस) में इस्तेमाल होने वाले डीजल में भी एथेनॉल मिलाने (Ethanol blended diesel) पर रिसर्च चल रही है।\r\n \r\n
- \r\n टेक्सटाइल बाय-प्रोडक्ट्स: कपड़ा उद्योग (Textile Industry) में भी एथेनॉल और इसके बाय-प्रोडक्ट्स का उपयोग रसायनों के विकल्प के रूप में किया जा सकता है।\r\n \r\n
- \r\n रसोई ईंधन (Cooking Fuel): और सबसे बड़ा गेम-चेंजर—एलपीजी का विकल्प। घरेलू रसोई ईंधन के रूप में एथेनॉल का उपयोग इस पूरी इंडस्ट्री को एक अनंत बाजार (Infinite Market) प्रदान कर देगा।\r\n \r\n
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'ब्रोकन राइस' (टूटे चावल) का मास्टरस्ट्रोक: एफसीआई और एथेनॉल का गठजोड़
\r\n\r\nएथेनॉल उत्पादन के लिए सबसे ज्यादा जरूरत 'कच्चे माल' (Feedstock) की होती है। पहले भारत पूरी तरह से गन्ने (Sugarcane) पर निर्भर था, लेकिन गन्ने की पैदावार मौसम पर निर्भर करती है और इससे चीनी उत्पादन भी प्रभावित होता है। इसलिए सरकार ने 'अनाज आधारित एथेनॉल' (Grain-based Ethanol) पर फोकस शिफ्ट किया है, विशेषकर मक्का और चावल पर।
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अच्छे चावल की जगह 'टूटे हुए चावल' का उपयोग
\r\n\r\nसरकार को यह सुनिश्चित करना है कि देश की 'फूड सिक्योरिटी' (खाद्य सुरक्षा) दांव पर लगाकर 'फ्यूल सिक्योरिटी' (ईंधन सुरक्षा) न हासिल की जाए। इसलिए एक शानदार नीतिगत बदलाव किया गया है। योजना के अनुसार, भारतीय खाद्य निगम (FCI - Food Corporation of India) के गोदामों में रखे उच्च गुणवत्ता वाले चावल के बजाय, अब 'टूटे हुए चावल' (Broken Rice) का उपयोग एथेनॉल बनाने के लिए बढ़ाया जाएगा। टूटा हुआ चावल इंसान के खाने के लिए कम पसंद किया जाता है, लेकिन इसमें मौजूद स्टार्च (Starch) एथेनॉल बनाने के लिए बिल्कुल परफेक्ट होता है।
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PDS (सार्वजनिक वितरण प्रणाली) का पायलट प्रोजेक्ट
\r\n\r\nसरकार ने एक तीर से दो निशाने साधे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली (Public Distribution System - PDS) के तहत देश के 80 करोड़ गरीबों को मुफ्त या सस्ता राशन दिया जाता है। अक्सर शिकायत आती थी कि राशन के चावल में बहुत ज्यादा टूट (Broken grains) होती है।
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इसे सुधारने के लिए सरकार ने 5 राज्यों में एक पायलट प्रोजेक्ट चलाया है:
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- \r\n गुणवत्ता में सुधार: इस प्रोजेक्ट के तहत, राइस मिलों को सख्त निर्देश दिए गए हैं कि फोर्टिफाइड और कस्टम मिल्ड राइस (CMR) तैयार करते समय चावल में टूटे हुए दानों का प्रतिशत 25% से घटाकर 10% किया जाए।\r\n \r\n
- \r\n गरीबों को लाभ: इससे सीधा फायदा यह होगा कि राशन की दुकानों (कोटेदार) से गरीबों को अब लंबा, साबुत और बेहतरीन गुणवत्ता वाला चावल खाने को मिलेगा।\r\n \r\n
- \r\n उद्योग को कच्चा माल: मिलिंग प्रक्रिया में सुधार और छंटाई से जो 15% अतिरिक्त 'टूटा हुआ चावल' (Extra Broken Rice) बचेगा, उसे सीधे डिस्टिलरीज (एथेनॉल उद्योग) को कच्चे माल के रूप में सप्लाई कर दिया जाएगा।\r\n \r\n
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यह एक ऐसा 'विन-विन' (Win-Win) मॉडल है, जहां देश के गरीब को पोषण युक्त बेहतर भोजन मिलेगा, और देश के एथेनॉल प्लांट को अपना ईंधन बनाने के लिए भरपूर कच्चा माल।
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आम आदमी की जेब और अर्थव्यवस्था पर क्या होगा असर?
\r\n\r\nअगर यह योजना धरातल पर पूरी तरह से उतर जाती है, तो इसका भारतीय अर्थव्यवस्था और आम उपभोक्ता (Consumer) पर व्यापक प्रभाव पड़ेगा।
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- \r\n एलपीजी के मुकाबले सस्ता ईंधन: एथेनॉल को देश के भीतर ही उत्पादित किया जाएगा, जिस पर न तो कोई आयात शुल्क (Import Duty) लगेगा और न ही विदेशी मुद्रा (Dollar) खर्च करनी पड़ेगी। स्थानीय स्तर पर उत्पादित होने के कारण, एथेनॉल चूल्हे का मासिक खर्च एलपीजी सिलेंडर की तुलना में 20% से 30% तक कम हो सकता है।\r\n \r\n
- \r\n किसानों की आय दोगुनी करने का साधन: जब टूटे चावल, मक्का और गन्ने की भारी मांग एथेनॉल के लिए पैदा होगी, तो किसानों को उनकी फसल का उचित और समय पर मूल्य (MSP) मिलेगा। चीनी मिलों पर किसानों का जो करोड़ों रुपये का बकाया सालों तक फंसा रहता था, वह समस्या अब लगभग खत्म हो गई है क्योंकि मिलें एथेनॉल बेचकर तुरंत कैश कमा रही हैं और किसानों का भुगतान कर रही हैं।\r\n \r\n
- \r\n विदेशी मुद्रा की बंपर बचत: भारत हर साल अरबों डॉलर एलपीजी और कच्चा तेल खरीदने में विदेश भेज देता है। एथेनॉल के उपयोग से बचे हुए इस भारी-भरकम विदेशी मुद्रा भंडार (Forex Reserves) का उपयोग देश के इंफ्रास्ट्रक्चर, स्वास्थ्य और शिक्षा में किया जा सकेगा।\r\n \r\n
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पर्यावरण के लिए 'वरदान': प्रदूषण से मिलेगी मुक्ति
\r\n\r\nरसोई ईंधन के रूप में एथेनॉल सिर्फ आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि पर्यावरणीय (Environmental) दृष्टिकोण से भी एलपीजी और अन्य पारंपरिक ईंधनों (लकड़ी, कोयला, उपले) से कहीं बेहतर है।
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- \r\n क्लीन बर्निंग फ्यूल (Clean Burning Fuel): एथेनॉल जलने पर एलपीजी की तरह ही बिल्कुल नीली लौ (Blue Flame) देता है। इसमें कालिख (Soot) या धुआं नहीं निकलता, जिससे बर्तन काले नहीं होते।\r\n \r\n
- \r\n शून्य विषैली गैसें: लकड़ी या कोयले के जलने से कार्बन मोनोऑक्साइड (CO) जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं, जो महिलाओं के फेफड़ों को भारी नुकसान पहुंचाती हैं (जिसे इनडोर एयर पॉल्यूशन कहते हैं)। एथेनॉल के जलने से केवल नाममात्र का कार्बन डाइऑक्साइड और पानी की भाप निकलती है।\r\n \r\n
- \r\n नेट-जीरो (Net-Zero) का लक्ष्य: क्योंकि एथेनॉल पौधों (गन्ना, चावल) से बनता है, और पौधे बड़े होने के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड सोखते हैं, इसलिए एथेनॉल को एक 'कार्बन-न्यूट्रल' (Carbon Neutral) ईंधन माना जाता है। यह भारत के 2070 तक 'नेट-जीरो' उत्सर्जन लक्ष्य को हासिल करने में बड़ी मदद करेगा।\r\n \r\n
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तकनीकी चुनौतियां और सुरक्षा चिंताएं (The Roadblocks)
\r\n\r\nयह योजना जितनी सुनहरी दिखती है, इसे जमीन पर उतारना उतना ही चुनौतीपूर्ण है। सरकार को कई मोर्चों पर एक साथ लड़ना होगा:
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- \r\n चूल्हे का डिजाइन: एलपीजी एक दबाव (Pressure) वाली गैस है जो वाल्व खोलते ही तेजी से निकलती है। एथेनॉल एक तरल (Liquid) है। एथेनॉल को बिना बिजली या पंप के कैसे चूल्हे के बर्नर तक सुरक्षित वाष्पीकृत करके पहुंचाया जाए, इसके लिए एक 'फुल-प्रूफ' तकनीक की जरूरत है।\r\n \r\n
- \r\n उपभोक्ता की आदतें: भारतीय गृहिणियां दशकों से एलपीजी सिलेंडरों की अभ्यस्त हो चुकी हैं। उन्हें एक नए तरल ईंधन (जो शायद बोतलों या छोटे ड्रमों में आए) को इस्तेमाल करना सिखाना और उनकी सुरक्षा चिंताओं को दूर करना एक बड़ा जन-जागरूकता अभियान (Awareness Campaign) मांगेगा।\r\n \r\n
- \r\n कालाबाजारी का डर: एथेनॉल (इथाइल अल्कोहल) मूल रूप से वही शराब है जिसे इंसान पीता है (हालांकि ईंधन वाले एथेनॉल में जहर/केमिकल मिलाकर उसे 'डीनेचर्ड' कर दिया जाता है ताकि उसे पिया न जा सके)। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि ईंधन के नाम पर मिलने वाले सस्ते एथेनॉल को 'अवैध शराब' बनाने वाले माफिया अपने कब्जे में न ले लें।\r\n \r\n
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ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में एक 'मास्टरस्ट्रोक'
\r\n\r\nकेंद्रीय सचिव संजीव चोपड़ा का यह बयान स्पष्ट करता है कि भारत सरकार अब सिर्फ भविष्य की योजनाओं के सपने नहीं बुन रही, बल्कि धरातल पर 'प्रोटोटाइप' बनाकर उनका परीक्षण कर रही है। एथेनॉल को रसोई गैस का विकल्प बनाना एक ऐसा 'मास्टरस्ट्रोक' है, जो मिडिल ईस्ट के तेल उत्पादक देशों (OPEC) की दादागिरी को खत्म कर देगा।
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यदि टूटे हुए चावल और गन्ने के कचरे से बनी 'देसी गैस' हमारे चूल्हों को रोशन करने में सफल हो जाती है, तो यह भारत के लिए ऊर्जा के क्षेत्र में वैसी ही क्रांति होगी, जैसी 1970 के दशक में 'हरित क्रांति' (Green Revolution) अनाज के क्षेत्र में हुई थी।
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अब इंतजार इस बात का है कि सरकार जल्द ही इसके पायलट प्रोजेक्ट के परिणामों की घोषणा करे और आम जनता को एलपीजी के भारी-भरकम सिलेंडरों से मुक्ति दिलाकर एक सुरक्षित, सस्ता और पूरी तरह से स्वदेशी 'एथेनॉल चूल्हा' सौंपे।