उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले के भावनपुर थाना क्षेत्र में इन दिनों भारी तनाव और पुलिसिया हलचल का माहौल है। राली चौहान गांव में बवाल ने अब एक गंभीर रूप ले लिया है, जहां होली के दिन शुरू हुआ एक छोटा सा विवाद अब दो गुटों के बीच खूनी संघर्ष और पुलिस-प्रशासन के लिए एक बड़ी चुनौती बन चुका है। ग्रामीणों के एक गुट ने दूसरे पर जानलेवा हमले और फायरिंग का आरोप लगाया है, वहीं पुलिस की कथित एकतरफा कार्रवाई से क्षुब्ध होकर महिलाओं ने बृहस्पतिवार को सीधे एसएसपी (SSP) कार्यालय पहुंचकर आत्मदाह का खौफनाक प्रयास किया। इस घटना ने पूरे पुलिस महकमे में हड़कंप मचा दिया है।READ ALSO:-बिजनौर: गैस और पेट्रोल की किल्लत महज अफवाह, DM जसजीत कौर ने जारी किया हेल्पलाइन नंबर, लागू हुआ 25 दिन का नया नियम!
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम राली चौहान गांव में बवाल की पूरी टाइमलाइन, होली के दिन हुए झगड़े के कारण, पुलिस की कार्यप्रणाली, एसएसपी कार्यालय पर हुए हाई-वोल्टेज ड्रामे और प्रशासन द्वारा उठाए गए सख्त कदमों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
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होली के दिन से सुलग रही थी विवाद की चिंगारी: कैसे शुरू हुआ राली चौहान गांव में बवाल
\r\n\r\nग्रामीण इलाकों में अक्सर छोटे-मोटे विवाद तूल पकड़कर बड़ी रंजिश का रूप ले लेते हैं। राली चौहान गांव में बवाल की जड़ें भी इसी साल होली के त्योहार (4 मार्च) से जुड़ी हैं। पुलिस रिपोर्ट और दर्ज एफआईआर (FIR) के मुताबिक, घटना की शुरुआत तब हुई जब गांव के दो निवासी—मोनू और रविंद्र—एक शोक कार्यक्रम (Condolence Meeting) में शामिल होने के लिए जा रहे थे।
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तहरीर के अनुसार, जब वे गली से गुजर रहे थे, तभी वहां पहले से मौजूद राजपाल पक्ष के कुछ युवकों—विकास, रोहित, विक्रांत, सौरभ और शनि—ने उन पर अकारण ही कुछ आपत्तिजनक टिप्पणियां (Comments) कर दीं। गांव-देहात में अक्सर ऐसी टिप्पणियां वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा होती हैं। जब मोनू और रविंद्र ने इन टिप्पणियों और गाली-गलौज का विरोध किया, तो विवाद अचानक हिंसक हो गया।
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लाठी-डंडों से जानलेवा हमला: विरोध करने पर राजपाल पक्ष के युवकों ने लाठी और डंडों से मोनू और रविंद्र पर ताबड़तोड़ हमला बोल दिया। इस अचानक हुए हमले में दोनों गंभीर रूप से घायल हो गए। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, इस मारपीट में मोनू की नाक पर गहरी चोट आई और उसकी हड्डी टूट गई, जबकि रविंद्र को इतनी बेरहमी से पीटा गया कि उसकी तीन पसलियां (Ribs) टूट गईं। जब ग्रामीणों ने शोर शराबा सुना और वे बीच-बचाव के लिए दौड़े, तो हमलावर उन्हें जान से मारने की गंभीर धमकियां देते हुए मौके से फरार हो गए।
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इस घटना के बाद मोनू पक्ष ने पुलिस का दरवाजा खटखटाया, लेकिन आरोप है कि पुलिस ने तुरंत सख्त कदम नहीं उठाए। घटना के तीन दिन बाद, यानी 7 मार्च को, पुलिस ने मोनू की तहरीर पर प्राथमिकी (FIR) दर्ज की। दोनों घायलों का फिलहाल एक स्थानीय अस्पताल में गंभीर हालत में इलाज चल रहा है। कई ग्रामीणों का मानना है कि यदि भावनपुर पुलिस ने 4 मार्च को ही इस मामले में त्वरित और कठोर कार्रवाई की होती, तो शायद राली चौहान गांव में बवाल इतना उग्र रूप धारण नहीं करता।
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फायरिंग की घटना और एकतरफा कार्रवाई का गंभीर आरोप
\r\n\r\nहोली के दिन हुई मारपीट के बाद गांव में तनावपूर्ण शांति थी, लेकिन यह शांति एक बड़े तूफान से पहले का सन्नाटा साबित हुई। राली चौहान गांव में बवाल ने 11 मार्च की रात तब एक नया मोड़ ले लिया, जब गांव की गलियों में अचानक गोलियों की तड़तड़ाहट गूंज उठी।
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राजपाल पक्ष के लोगों ने रात के समय पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दी कि मोनू पक्ष के लोगों ने उनके घरों पर फायरिंग (Gun Firing) की है। इस सूचना के बाद भावनपुर थाना पुलिस तुरंत एक्शन में आ गई। रात के अंधेरे में ही गांव में भारी पुलिस बल तैनात कर दिया गया और फायरिंग के आरोप में पुलिस ने मोनू पक्ष के सात लोगों को आनन-फानन में हिरासत में ले लिया।
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यहीं से पुलिस पर एकतरफा और पक्षपातपूर्ण कार्रवाई के गंभीर आरोप लगने शुरू हो गए। मोनू पक्ष के लोगों का स्पष्ट कहना था कि 11 मार्च की रात को फायरिंग राजपाल पक्ष के लोगों ने खुद की थी ताकि वे मोनू पक्ष को झूठे केस में फंसा सकें और 4 मार्च को हुई मारपीट के मामले में समझौते का दबाव बना सकें। मोनू पक्ष के परिजनों का आरोप है कि पुलिस ने बिना किसी निष्पक्ष जांच के, केवल राजपाल पक्ष की झूठी सूचना (Fake Complaint) के आधार पर उनके बेकसूर लोगों को रातों-रात घरों से उठा लिया। राली चौहान गांव में बवाल का यह वह बिंदु था जहां से ग्रामीणों का गुस्सा पुलिस-प्रशासन के खिलाफ फूट पड़ा।
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एसएसपी दफ्तर पर हाई-वोल्टेज ड्रामा: महिलाओं का आत्मदाह का खौफनाक प्रयास
\r\n\r\nजब न्याय मिलने की उम्मीद धूमिल होती दिखाई दी और पुलिस की कथित ज्यादती बर्दाश्त से बाहर हो गई, तो बृहस्पतिवार को मोनू पक्ष के परिवारों का सब्र टूट गया। न्याय की गुहार लगाने और भावनपुर पुलिस की शिकायत करने के लिए बहादुर प्रताप सिंह, अंशुल, आंचल, सविता, सावित्री और सरोज सहित दर्जनों ग्रामीण, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं और छोटे बच्चे शामिल थे, मेरठ के एसएसपी (SSP) कार्यालय पहुंच गए।
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राली चौहान गांव में बवाल की आंच अब सीधे जिले के सबसे बड़े पुलिस अधिकारी के दफ्तर तक पहुंच चुकी थी। एसएसपी कार्यालय के बाहर ग्रामीणों ने भावनपुर पुलिस के खिलाफ जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। उनका आरोप था कि असली अपराधी खुलेआम घूम रहे हैं और पीड़ितों को ही जेल में डाला जा रहा है।
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हंगामा करते हुए अचानक भीड़ में शामिल कुछ महिलाओं ने अपने पास छिपाकर रखी पेट्रोल से भरी बोतलें निकाल लीं। इससे पहले कि वहां मौजूद पुलिसकर्मी कुछ समझ पाते, महिलाओं ने खुद पर पेट्रोल छिड़ककर आत्मदाह (Self-Immolation) करने की चेतावनी दे डाली। यह दृश्य देखकर पूरे एसएसपी कार्यालय परिसर में हड़कंप मच गया। महिलाओं का रो-रोकर बुरा हाल था और वे चीख-चीख कर कह रही थीं कि अगर उन्हें न्याय नहीं मिला और उनके निर्दोष लोगों को नहीं छोड़ा गया, तो वे इसी दफ्तर के बाहर अपनी जान दे देंगी।
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पुलिस की त्वरित सक्रियता और छीना-झपटी में गिरा मासूम बच्चा
\r\n\r\nआत्मदाह के इस खौफनाक प्रयास को देखकर ड्यूटी पर मौजूद पुलिसकर्मियों के हाथ-पांव फूल गए। महिला पुलिसकर्मियों (Women Police Force) की टीम तुरंत हरकत में आई और उन्होंने दौड़कर उन आक्रोशित महिलाओं को पकड़ लिया जिनके हाथों में पेट्रोल की बोतलें थीं।
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इस दौरान पुलिस और प्रदर्शनकारी महिलाओं के बीच भारी छीना-झपटी और धक्का-मुक्की हुई। हर कोई पेट्रोल की बोतल छीनने की कोशिश कर रहा था। इसी अफरतफरी और छीना-झपटी के बीच एक बेहद हृदय विदारक घटना घटी। प्रदर्शन कर रहे ग्रामीणों के साथ आए छोटे बच्चों में से एक मासूम बच्चा संतुलन बिगड़ने के कारण पक्की सड़क पर गिर पड़ा और रोने लगा।
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बच्चे के गिरते ही माहौल और भी ज्यादा भावुक और तनावपूर्ण हो गया। गनीमत रही कि मौके पर मौजूद एक सतर्क महिला पुलिसकर्मी ने तुरंत उस बच्चे को उठाया, उसे संभाला और शांत कराया। पुलिस ने कड़ी मशक्कत के बाद सभी महिलाओं के हाथों से पेट्रोल की बोतलें छीन लीं और उन्हें हिरासत में लेने के बजाय समझा-बुझाकर शांत किया। इस पूरी घटना ने यह स्पष्ट कर दिया कि राली चौहान गांव में बवाल को लेकर ग्रामीणों में पुलिस के प्रति कितना गहरा अविश्वास और रोष भरा हुआ है।
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ग्रामीणों का सीधा आरोप: 'अगर 4 मार्च को होती कार्रवाई, तो न चलती गोलियां'
\r\n\r\nएसएसपी दफ्तर पर जब महिलाओं का गुस्सा कुछ शांत हुआ, तो उन्होंने मीडिया और उच्च अधिकारियों के सामने अपनी पीड़ा व्यक्त की। ग्रामीणों का सबसे बड़ा और सीधा आरोप भावनपुर थाना पुलिस की लचर कार्यप्रणाली पर था। उनका कहना है कि राली चौहान गांव में बवाल के मुख्य जिम्मेदार वे पुलिसकर्मी हैं जिन्होंने 4 मार्च की घटना को हल्के में लिया।
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जब मोनू की नाक तोड़ी गई और रविंद्र की पसलियां तोड़ी गईं, तब पुलिस ने तीन दिन तक एफआईआर क्यों नहीं दर्ज की? और जब एफआईआर दर्ज हुई, तो नामजद आरोपियों की तुरंत गिरफ्तारी क्यों नहीं की गई? ग्रामीणों का तर्क है कि अगर पुलिस ने समय रहते राजपाल पक्ष के हमलावरों पर सख्त कार्रवाई की होती, तो उनका दुस्साहस नहीं बढ़ता और 11 मार्च की रात को गांव में फायरिंग की घटना कभी नहीं होती। ग्रामीणों का यह भी आरोप है कि स्थानीय पुलिस किसी राजनीतिक या स्थानीय बाहुबल के दबाव में आकर राजपाल पक्ष का साथ दे रही है और मोनू पक्ष को प्रताड़ित कर रही है।
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एसएसपी अविनाश पांडेय का कड़ा रुख: एसपी देहात को सौंपी जांच
\r\n\r\nएसएसपी कार्यालय पर हुए इस बड़े ड्रामे और आत्मदाह के प्रयास की खबर जैसे ही वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अविनाश पांडेय तक पहुंची, उन्होंने इस पूरे मामले को बेहद गंभीरता से लिया। एसएसपी ने तुरंत प्रभाव से मामले में हस्तक्षेप करते हुए यह साफ कर दिया कि किसी भी निर्दोष को जेल नहीं भेजा जाएगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
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राली चौहान गांव में बवाल की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच सुनिश्चित करने के लिए एसएसपी ने इस प्रकरण की जांच स्थानीय भावनपुर पुलिस से हटाकर उच्चाधिकारियों को सौंप दी। उन्होंने एसपी देहात (SP Rural) अभिजीत कुमार और क्षेत्राधिकारी (CO) भावनपुर को खुद मौके पर जाकर और थाने में बैठकर पूरे मामले की तहकीकात करने के सख्त निर्देश दिए।
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एसएसपी का यह कदम ग्रामीणों के उस अविश्वास को दूर करने के लिए उठाया गया था जो उन्हें भावनपुर पुलिस की निचली रैंक के अधिकारियों पर था। इस निर्देश के तुरंत बाद एसपी देहात और सीओ ने भावनपुर थाने का रुख किया।
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एसपी देहात की जांच और 13 लोगों की गिरफ्तारी: शांतिभंग की कार्रवाई
\r\n\r\nएसएसपी के निर्देशों का पालन करते हुए एसपी देहात अभिजीत कुमार और सीओ भावनपुर थाने पहुंचे। उन्होंने वहां करीब दो घंटे तक डेरा डाला और राली चौहान गांव में बवाल से जुड़ी दोनों घटनाओं (4 मार्च की मारपीट और 11 मार्च की फायरिंग) की केस डायरी, मेडिकल रिपोर्ट और दर्ज बयानों का गहनता से अध्ययन किया। उन्होंने दोनों पक्षों के लोगों से अलग-अलग पूछताछ भी की।
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जांच के बाद स्थिति को नियंत्रित करने और गांव में शांति व्यवस्था बहाल करने के लिए पुलिस ने एक 'बैलेंसिंग एक्ट' (Balancing Act) किया। एसपी देहात ने मीडिया को जानकारी देते हुए बताया कि पुलिस ने किसी एक पक्ष के दबाव में नहीं, बल्कि कानून व्यवस्था को सर्वोपरि रखते हुए दोनों पक्षों पर कार्रवाई की है।
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गिरफ्तार किए गए आरोपियों का विवरण: पुलिस ने गांव में शांतिभंग करने, उपद्रव मचाने और माहौल बिगाड़ने के आरोप में कुल 13 लोगों को गिरफ्तार किया है।
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- \r\n राजपाल पक्ष से (6 लोग): राजपाल, उनका बेटा विक्रांत, सौरभ, अर्जुन, मन्नू और विकास। (इन पर 4 मार्च की मारपीट और गांव में तनाव फैलाने का आरोप है)।\r\n \r\n
- \r\n मोनू पक्ष से (7 लोग): मोनू, रिंकू, विनय, मनीष, प्रवेश, संतरपाल और प्रशांत। (इन पर 11 मार्च की रात हंगामा करने और शांति भंग करने का आरोप है)।\r\n \r\n
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इन सभी 13 लोगों का सीआरपीसी (CrPC) की धारा 151/107/116 के तहत चालान किया गया है। यह पुलिस की एक प्रिवेंटिव एक्शन (Preventive Action) है ताकि गांव में आगे कोई बड़ा खूनी संघर्ष न हो सके।
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फायरिंग किसने की? असली दोषी की तलाश जारी
\r\n\r\nहालांकि पुलिस ने दोनों पक्षों के 13 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है, लेकिन 11 मार्च की रात हुई फायरिंग का असली रहस्य अभी भी बरकरार है। राली चौहान गांव में बवाल का यह सबसे पेचीदा पहलू है। राजपाल पक्ष का कहना है कि मोनू पक्ष ने उन पर गोलियां चलाईं, जबकि मोनू पक्ष की महिलाओं का आरोप है कि राजपाल पक्ष ने खुद फायरिंग करके पुलिस को झूठी सूचना दी।
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एसपी देहात अभिजीत कुमार ने इस गुत्थी को सुलझाने के लिए बताया कि फायरिंग के मामले में फिलहाल 'अज्ञात' (Unknown) आरोपियों के खिलाफ एक अलग से प्राथमिकी (FIR) दर्ज की गई है। गांव में घटनास्थल से जो खाली कारतूस (Shells) या अन्य सुबूत मिले हैं, उन्हें फोरेंसिक जांच (Forensic Lab) के लिए भेजा जा रहा है।
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पुलिस इस बात की गहराई से तफ्तीश कर रही है कि वास्तव में फायरिंग किस पक्ष ने की थी, या फिर यह किसी तीसरे पक्ष की साजिश थी जो गांव का माहौल बिगाड़ना चाहता था। एसपी देहात ने स्पष्ट किया है कि बैलिस्टिक रिपोर्ट और गांव के अन्य प्रत्यक्षदर्शियों के बयानों के आधार पर जो भी इस फायरिंग का असली दोषी पाया जाएगा, उसके खिलाफ आर्म्स एक्ट (Arms Act) और हत्या के प्रयास जैसी संगीन धाराओं में कड़ी कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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गांव की गुटबाजी और ग्रामीण समाजशास्त्र का एक कड़वा सच
\r\n\r\nराली चौहान गांव में बवाल केवल एक आपराधिक घटना नहीं है, बल्कि यह पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ग्रामीण समाजशास्त्र (Rural Sociology) का एक कड़वा सच भी है। गांवों में अक्सर छोटी-छोटी बातों (जैसे रास्ते का विवाद, बच्चों की लड़ाई, या किसी समारोह में की गई कोई टिप्पणी) को प्रतिष्ठा और 'मूंछ का सवाल' बना लिया जाता है।
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जब गुटबाजी हावी होती है, तो लोग कानून को अपने हाथ में लेने से नहीं हिचकिचाते। इसके बाद शुरू होता है एक-दूसरे पर फर्जी मुकदमे (Fake Cases) लादने का खेल। रात के अंधेरे में खुद ही हवाई फायरिंग करके दूसरे पक्ष को फंसाने की चाल गांवों में बहुत आम हो चुकी है। इसका सबसे बड़ा खामियाजा गांव की महिलाओं, बच्चों और उन निर्दोष लोगों को उठाना पड़ता है, जिनका विवाद से कोई सीधा लेना-देना नहीं होता।
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एसएसपी कार्यालय के बाहर महिलाओं का आत्मदाह का प्रयास इसी हताशा और सामाजिक-प्रशासनिक व्यवस्था के फेल होने का प्रतीक है। जब सिस्टम समय पर न्याय नहीं देता, तो आम नागरिक ऐसे आत्मघाती और उग्र कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। प्रशासन को जरूरत है कि वह गांवों में 'कम्युनिटी पुलिसिंग' (Community Policing) को बढ़ावा दे, जहां पुलिस और ग्रामीणों के बीच संवाद हो, और किसी भी विवाद को हिंसक रूप लेने से पहले ही ग्राम प्रधान और संभ्रांत नागरिकों की मदद से सुलझा लिया जाए।
\r\n\r\nआगे का रास्ता
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राली चौहान गांव में बवाल ने मेरठ पुलिस प्रशासन को एक बहुत बड़ा सबक दिया है—'जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड' (Justice delayed is justice denied)। अगर 4 मार्च की घटना पर भावनपुर पुलिस ने त्वरित संज्ञान लिया होता और एफआईआर दर्ज करने में 3 दिन की देरी न की होती, तो शायद 11 मार्च की रात की फायरिंग और एसएसपी कार्यालय पर आत्मदाह के प्रयास जैसी शर्मनाक घटनाएं नहीं होतीं।
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फिलहाल, एसएसपी अविनाश पांडेय के सख्त निर्देशों और एसपी देहात की त्वरित कार्रवाई से गांव में एक अस्थायी शांति जरूर स्थापित हुई है। 13 लोगों की गिरफ्तारी से दोनों गुटों में कानून का खौफ पैदा हुआ है। लेकिन यह शांति तभी स्थायी बन पाएगी जब 11 मार्च की फायरिंग के असली दोषियों को बेनकाब कर सलाखों के पीछे भेजा जाएगा और 4 मार्च के मारपीट मामले में घायलों (मोनू और रविंद्र) को निष्पक्ष न्याय मिलेगा। प्रशासन ने राली चौहान गांव में एहतियातन पुलिस बल (PAC) तैनात कर दिया है और स्थिति पर लगातार नजर रखी जा रही है। उम्मीद है कि इस जांच के बाद सच सामने आएगा और भविष्य में पुलिस की कार्यप्रणाली अधिक संवेदनशील और पारदर्शी होगी।
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भावनपुर थाना क्षेत्र के राली चौहान गांव में 4 मार्च (होली) को शुरू हुए विवाद ने हिंसक रूप ले लिया, जिसमें एक पक्ष के दो लोग गंभीर रूप से घायल हो गए। आरोप है कि पुलिस की ढिलाई के कारण 11 मार्च की रात गांव में फायरिंग हुई, जिसका आरोप दोनों पक्ष एक-दूसरे पर लगा रहे हैं। पुलिस द्वारा एक पक्ष के सात लोगों को हिरासत में लेने से नाराज होकर महिलाओं ने एसएसपी कार्यालय मेरठ पर पेट्रोल डालकर आत्मदाह का प्रयास किया, जिसे पुलिस ने काफी मशक्कत से विफल किया। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसएसपी अविनाश पांडेय ने एसपी देहात और सीओ को जांच सौंपी। त्वरित कार्रवाई करते हुए पुलिस ने दोनों पक्षों के 13 लोगों को शांतिभंग में गिरफ्तार कर लिया है और फायरिंग के मामले में अज्ञात के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर असली दोषियों की तलाश शुरू कर दी है। गांव में फिलहाल पुलिस बल तैनात कर शांति व्यवस्था कायम की गई है।
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