भीषण गर्मी के बीच मेरठ शहर की बिजली व्यवस्था राम भरोसे होने वाली है। सुरक्षा उपकरणों की कमी, अनुबंध के विपरीत काम के दबाव और अधिकारियों की मनमानी से त्रस्त आउटसोर्स संविदा कर्मचारियों ने पीवीवीएनएल (PVVNL) प्रबंधन को खुली चेतावनी दे दी है। अगर मांगें नहीं मानी गईं, तो 1 जून से कर्मचारी अपना काम बंद कर देंगे।
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मेरठ: उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में इस वक्त भीषण गर्मी का प्रकोप जारी है। आम जनता एक-एक मिनट बिजली कटौती से परेशान हो जाती है। ऐसे में मेरठ वासियों के लिए एक बेहद चिंताजनक खबर सामने आ रही है। जिले की विद्युत आपूर्ति व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने वाले निविदा-संविदा (आउटसोर्स) कर्मचारियों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर पहुंच गया है।Read also:- मेरठ क्राइम न्यूज़: चंद गज जमीन के लिए 'कलयुगी' बड़े भाई ने किया छोटे भाई का कत्ल, 23 दिन तक खेत में दफन रहा हत्या का खौफनाक राज
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लंबे समय से अपनी जान जोखिम में डालकर काम कर रहे इन कर्मचारियों ने अब आर-पार की लड़ाई का मन बना लिया है। निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति (NSEWA), जो नीति आयोग द्वारा मान्यता प्राप्त संगठन है, ने मेरठ के विद्युत नगरीय वितरण मण्डल (PVVNL) के अधीक्षण अभियंता को एक कड़ा मांग पत्र और ज्ञापन सौंपा है। समिति ने स्पष्ट कर दिया है कि अगर आउटसोर्सिंग कंपनी और विभागीय अधिकारियों ने उनका मानसिक और शारीरिक शोषण बंद नहीं किया, तो आगामी 1 जून 2026 से जिले भर के संविदा कर्मचारी बड़ा कदम उठाएंगे, जिससे शहर की बिजली आपूर्ति पूरी तरह से ठप हो सकती है।
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अनुबंध कुछ और, काम कुछ और: जानलेवा है अधिकारियों का दबाव
\r\n\r\nइस पूरे विवाद की जड़ वह अनुबंध (Agreement) है, जो मैसर्स ग्लोबटेक क्रिएशन्स प्रा० लि० और विद्युत नगरीय वितरण मण्डल के बीच 1 अप्रैल 2026 को हुआ था। अनुबंध संख्या 69/2025-2026 के अनुसार, इन आउटसोर्स कर्मचारियों की नियुक्ति केवल 33/11 केवी (KV) उपकेंद्रों एवं एलटी/एचटी (LT/HT) लाइनों के संचालन और अनुरक्षण (Maintenance) के लिए की गई है।
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लेकिन धरातल पर हकीकत कुछ और ही है। निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति के पश्चिमी उत्तर प्रदेश अध्यक्ष सचिन सिंह और अन्य पदाधिकारियों का आरोप है कि विभागीय अधिशासी अभियंता (XEN), उपखंड अधिकारी (SDO) और अवर अभियंता (JE) अपने पद का दुरुपयोग कर रहे हैं। कर्मचारियों पर दबाव बनाया जा रहा है कि वे अपने निर्धारित 33/11 केवी उपसंस्थान को छोड़कर अन्य उपसंस्थानों और यहां तक कि भारी खतरे वाली 33 केवीए (KVA) की हाई-टेंशन लाइनों पर जाकर काम करें।
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यह सीधा-सीधा अनुबंध की शर्तों का उल्लंघन है। बिना उचित ट्रेनिंग और सुरक्षा के 33 केवीए लाइन पर काम करना मौत को दावत देने जैसा है। समिति ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि इस अवैध दबाव के कारण किसी भी कर्मचारी के साथ कोई दुर्घटना घटित होती है या उसकी जान जाती है, तो उसके परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता का भुगतान संबंधित अधिकारियों से ही वसूल कर कराया जाएगा। यदि विभाग आनाकानी करेगा, तो संगठन सीधे न्यायालय का दरवाजा खटखटाएगा और जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ प्रथम सूचना रिपोर्ट (FIR) दर्ज कराएगा।
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रात में पुलिस की प्रताड़ना और आईडी कार्ड (ID Card) का अभाव
\r\n\r\nसंविदा कर्मचारियों की एक सबसे बड़ी और व्यावहारिक समस्या उनकी पहचान को लेकर है। जब शहर सो रहा होता है और कहीं बिजली का फाल्ट आ जाता है, तो ये लाइनमैन और संविदा कर्मी ही रात के अंधेरे में फाल्ट ठीक करने निकलते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि विभाग या कंपनी द्वारा इन्हें कोई आधिकारिक पहचान पत्र (ID Card) जारी नहीं किया गया है।
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जब ये कर्मचारी रात में उपभोक्ताओं की शिकायतों (परिवाद) का निस्तारण करने के लिए सुनसान सड़कों पर जाते हैं, तो अक्सर पुलिस गश्त के दौरान उन्हें रोक लिया जाता है। पुलिस आईडी कार्ड मांगती है, और कार्ड न होने की स्थिति में इन निर्दोष कर्मचारियों को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है और उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई का डर बना रहता है। समिति ने मांग की है कि सभी कर्मचारियों को तुरंत विभागीय आईडी कार्ड जारी किए जाएं ताकि वे बिना किसी पुलिसिया खौफ के अपनी ड्यूटी निभा सकें।
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सुरक्षा उपकरणों की भारी कमी और ESI का झोल
\r\n\r\nबिजली विभाग का काम बेहद जोखिम भरा होता है, जहां एक छोटी सी चूक जान ले सकती है। अनुबंध के नियमों के मुताबिक हर कर्मचारी को सुरक्षा उपकरण दिए जाने चाहिए, लेकिन जमीनी हकीकत भयावह है। समिति ने अपने पत्र में खुलासा किया है कि कर्मचारियों को न तो सही यूनिफॉर्म मिली है, न ही रात के लिए रिफ्लेक्टिव जैकेट दी गई है। सुरक्षा के सबसे अहम उपकरण जैसे सेफ्टी शूज (CD Plus), सेफ्टी बेल्ट और अर्थिंग चेन तक उपलब्ध नहीं कराए गए हैं।
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इसके अलावा, स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर भी बड़ा खिलवाड़ हो रहा है। नियम है कि हर कर्मचारी का ईएसआई (ESI) पंजीकरण होना चाहिए ताकि दुर्घटना या बीमारी की स्थिति में उसका मुफ्त इलाज हो सके। लेकिन कर्मचारियों को समय पर न तो ESI कार्ड दिए जा रहे हैं और न ही पैनल में शामिल अस्पतालों की कोई सूची उपलब्ध कराई गई है। कर्मचारी बीमा पॉलिसी के नाम पर भी अंधेरे में रखे गए हैं। मांग की गई है कि हर कर्मचारी की बीमा पॉलिसी की कॉपी उसे व्यक्तिगत रूप से सौंपी जाए।
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अतिरिक्त काम का बोझ और 'एसिस्ट बिलिंग' का अवैध दबाव
\r\n\r\nशोषण का सिलसिला यहीं नहीं रुकता। संविदा कर्मियों की भर्ती केवल तकनीकी अनुरक्षण (Maintenance) के लिए हुई है, लेकिन उनसे जबरन 'एसिस्ट बिलिंग' (Assist Billing) यानी बिजली के बिलों से जुड़ा राजस्व का काम भी लिया जा रहा है। इसके लिए उन्हें कोई अतिरिक्त वेतन या भत्ता नहीं मिलता। अलग-अलग क्षेत्रों में काम करने के लिए उन्हें अपने निजी वाहन दौड़ाने पड़ते हैं, लेकिन विभाग उन्हें कोई पेट्रोल भत्ता या मोबाइल खर्च (Mobile Allowance) नहीं देता।
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विद्युत उपकेंद्रों पर लगातार फीडरों की संख्या बढ़ाई जा रही है, लेकिन काम करने वाले कर्मचारियों (Manpower) की संख्या वहीं की वहीं है। काम के भारी दबाव के कारण कर्मचारी मानसिक तनाव से गुजर रहे हैं। नियम के अनुसार हर 8 घंटे की शिफ्ट में 1 स्किल्ड और 2 अनस्किल्ड कर्मचारियों का होना अनिवार्य है, लेकिन इस नियम को ताक पर रख दिया गया है। समिति ने मांग की है कि UPPCL आउटसोर्स पोर्टल पर कर्मचारियों का सही डाटा अपलोड किया जाए और शिफ्ट के अनुसार मैनपावर की संख्या तुरंत बढ़ाई जाए।
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1 जून का अल्टीमेटम: आम जनता पर क्या होगा असर?
\r\n\r\nइन तमाम अनसुनी मांगों के बाद अब निविदा-संविदा कर्मचारी सेवा समिति ने आर-पार की लड़ाई का बिगुल फूंक दिया है। पत्र के अंत में एक बेहद गंभीर अल्टीमेटम दिया गया है। समिति ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी मांगें तुरंत नहीं मानी गईं, तो आगामी 1 जून 2026 से सभी कर्मचारी एक बड़ा असहयोग आंदोलन शुरू करेंगे।
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- \r\n निजी वाहनों का बहिष्कार: कोई भी कर्मचारी फाल्ट ठीक करने या विभाग के किसी काम के लिए अपनी निजी मोटरसाइकिल या वाहन का इस्तेमाल नहीं करेगा।\r\n \r\n
- \r\n मोबाइल सेवा बंद: विभाग के काम के लिए कर्मचारी अपने निजी मोबाइल नंबर का उपयोग बंद कर देंगे।\r\n \r\n
- \r\n व्हाट्सएप ग्रुप से एग्जिट: सभी कर्मचारी विभाग द्वारा बनाए गए आधिकारिक व्हाट्सएप ग्रुप्स (WhatsApp Groups) को तुरंत छोड़ देंगे, जिससे सूचनाओं का आदान-प्रदान पूरी तरह ठप हो जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n पूर्ण कार्य बहिष्कार: यदि इसके बाद भी सुनवाई नहीं हुई, तो किसी भी समय पूर्ण कार्य बहिष्कार (हड़ताल) की जा सकती है।\r\n \r\n
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मेरठ वासियों के लिए खतरे की घंटी: इस अल्टीमेटम का सीधा असर मेरठ की आम जनता पर पड़ने वाला है। इस भीषण गर्मी में अगर लाइनमैन और फाल्ट ठीक करने वाले कर्मचारी हड़ताल पर चले गए या उन्होंने निजी वाहनों से जाना बंद कर दिया, तो घंटों तक बिजली के फाल्ट ठीक नहीं हो पाएंगे। इसका मतलब है कि शहर के कई इलाकों को लंबे समय तक बिना बिजली और बिना पानी के रहना पड़ सकता है।
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अब गेंद पीवीवीएनएल (PVVNL) के प्रबंध निदेशक और मेरठ क्षेत्र के मुख्य अभियंता के पाले में है। देखना यह होगा कि क्या 1 जून से पहले विभाग इन संविदा कर्मचारियों की जायज मांगों का संज्ञान लेकर कोई ठोस कदम उठाता है, या फिर मेरठ शहर को एक भयंकर बिजली संकट और अंधकार की ओर धकेल दिया जाएगा। फिलहाल, कर्मचारियों के इस कड़े रुख ने विभागीय अधिकारियों की नींद जरूर उड़ा दी है।
Sabse pehle comment karne wale banein.