भारतीय वाहन बाजार में तेजी से बढ़ते प्रदूषण पर लगाम कसने और गाड़ियों की ईंधन दक्षता (माइलेज) में सुधार लाने के लिए केंद्र सरकार एक दूरगामी और सख्त नीति लागू करने की तैयारी में है। केंद्रीय बिजली मंत्रालय ने इसके लिए CAFE-III नियम (कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी) का नया आधिकारिक ड्राफ्ट पेश कर दिया है। सरकार का यह कदम भारत में कार्बन उत्सर्जन को कम करने और ग्रीन मोबिलिटी को बढ़ावा देने की दिशा में एक मील का पत्थर माना जा रहा है।READ ALSO:-IRCTC ने लॉन्च किया अपनी वेबसाइट का नया बीटा वर्जन: अब चुटकियों में बुक होंगे ट्रेन टिकट, स्मार्ट कैप्चा और फास्ट चेकआउट से यात्रियों को मिलेगी बड़ी राहत
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इस नए नीतिगत ढांचे पर ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों, कार निर्माता कंपनियों और आम नागरिकों से 6 अगस्त 2026 तक सुझाव और आपत्तियां आमंत्रित की गई हैं। यह नया नियम न केवल वाहन निर्माता कंपनियों के उत्पादन के तरीके को बदलेगा, बल्कि आगामी वर्षों में कार खरीदने वाले आम ग्राहकों के फैसले और उनके बजट को भी बड़े पैमाने पर प्रभावित करेगा। आइए इस प्रस्तावित कानून की मुख्य बातों और इसके असर को विस्तार से समझते हैं।
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किन गाड़ियों पर लागू होगा यह नया CAFE-III कानून?
\r\n\r\nमंत्रालय द्वारा जारी किए गए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, नए ईंधन और उत्सर्जन मानक मुख्य रूप से 'M1' श्रेणी के यात्री वाहनों पर प्रभावी होंगे। ऑटोमोबाइल सेक्टर में M1 वर्ग के अंतर्गत वे सभी प्राइवेट कारें शामिल होती हैं, जिनमें चालक (ड्राइवर) सहित अधिकतम 9 लोगों के बैठने की व्यवस्था होती है और जिनका कुल वजन 3,500 किलोग्राम से कम होता है।
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व्यावहारिक तौर पर देखा जाए तो, भारतीय बाजार में वर्तमान में बिकने वाली लगभग हर छोटी-बड़ी गाड़ी, जैसे हैचबैक, सेडान और भारी भरकम एसयूवी (SUV) इसके दायरे में आ जाएगी। सरकार की योजना के अनुसार, यह नई व्यवस्था वित्तीय वर्ष 2027-28 से लेकर 2031-32 के बीच देश में बनने वाली या विदेशों से आयात (इम्पोर्ट) की जाने वाली सभी कारों पर सख्ती से लागू रहेगी।
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क्या है कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE) का गणित?
\r\n\r\nअक्सर लोग यह मान लेते हैं कि CAFE नियम किसी एक अकेली कार के माइलेज या उत्सर्जन को मापते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। CAFE-III नियम किसी भी वाहन निर्माता कंपनी द्वारा पूरे एक वित्तीय वर्ष में बेची गई सभी गाड़ियों के 'औसत कार्बन उत्सर्जन और ईंधन खपत' का आकलन करता है।
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इसका मूल सिद्धांत यह है कि यदि कोई कंपनी बाजार में ज्यादा पेट्रोल-डीजल पीने वाली या भारी एसयूवी गाड़ियां बेचती है (जिनका उत्सर्जन अधिक होता है), तो उसे अपने कुल औसत (Fleet Average) को संतुलित करने के लिए उसी अनुपात में कम उत्सर्जन वाली हाइब्रिड या पूरी तरह से इलेक्ट्रिक वाहन (EV) भी बेचने होंगे। देश में ऊर्जा संरक्षण अधिनियम के तहत ब्यूरो ऑफ एनर्जी एफिशिएंसी (BEE) इन कड़े नियमों की निगरानी करता है और लक्ष्य पूरा न करने वाली कंपनियों पर भारी जुर्माना लगाया जा सकता है।
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ग्राहकों की जेब और बजट पर क्या होगा असर?
\r\n\r\nनई नीति लागू होने के बाद आम ग्राहकों पर इसके दोतरफा असर देखने को मिलेंगे:
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- \r\n पेट्रोल-डीजल के खर्च में भारी कटौती: इस कानून के लागू होने के बाद वाहन निर्माताओं को मजबूरी में ऐसी आधुनिक तकनीक विकसित करनी होगी जिससे गाड़ियां कम ईंधन में ज्यादा दूरी तय कर सकें। इसके परिणामस्वरूप कारों का माइलेज सुधरेगा और वाहन मालिकों का पेट्रोल-डीजल पर होने वाला मासिक खर्च काफी हद तक कम हो जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n शुरुआती कीमत में बढ़ोतरी: दूसरी ओर, कारों के इंजन को ज्यादा कुशल बनाने, आधुनिक हाइब्रिड सिस्टम जोड़ने और बेहतर उत्सर्जन तकनीक का इस्तेमाल करने की वजह से कंपनियों की निर्माण लागत बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर कारों की शुरुआती कीमत (एक्स-शोरूम प्राइस) पर पड़ेगा और गाड़ियां महंगी हो सकती हैं। हालांकि, आर्थिक जानकारों का मानना है कि लंबे समय में बेहतर माइलेज से होने वाली बचत से यह अतिरिक्त लागत कुछ ही सालों में वसूल हो जाएगी।\r\n \r\n
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उद्योग जगत की चिंताएं और मतभेद
\r\n\r\nइस नई नीति को लेकर सरकार और वाहन निर्माताओं के बीच पिछले एक साल से गहन चर्चा और बैठकों का दौर चल रहा है। सितंबर 2025 में सरकार द्वारा लाए गए शुरुआती प्रस्ताव में प्रति किलोमीटर कार्बन उत्सर्जन की सीमा को 113 ग्राम से घटाकर 91.7 ग्राम करने का कड़ा लक्ष्य रखा गया था।
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वर्तमान में ऑटोमोबाइल कंपनियों के बीच सबसे बड़ा मतभेद छोटी और सस्ती कारों को नियमों में विशेष छूट देने को लेकर है। देश की कुछ प्रमुख कार निर्माता कंपनियां इसके पक्ष में हैं कि छोटी कारों पर नियम थोड़े नरम होने चाहिए, जबकि बड़ी और प्रीमियम गाड़ियां बनाने वाले इसका कड़ा विरोध कर रहे हैं। उनका तर्क है कि नियम सभी के लिए एक समान होने चाहिए।
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अंततः, CAFE-III नियम भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग को अंतरराष्ट्रीय मानकों के समकक्ष लाने का एक बेहद अहम प्रयास है। इससे न केवल पर्यावरण को बचाने में मदद मिलेगी, बल्कि देश में इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड वाहनों के बाजार को भी एक नई दिशा और रफ्तार मिलेगी। अब 6 अगस्त तक जनता और स्टेकहोल्डर्स से मिलने वाले अंतिम फीडबैक के आधार पर ही सरकार इस नीति को अंतिम रूप देगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि कंपनियां इन नए नियमों के साथ तालमेल बिठाने के लिए किस तरह की नई तकनीक भारतीय बाजार में पेश करती हैं।
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भारत सरकार ने कारों का माइलेज बढ़ाने और प्रदूषण कम करने के लिए कॉरपोरेट एवरेज फ्यूल इकोनॉमी (CAFE-III) के नए ड्राफ्ट को पेश किया है। यह नियम 2027 से 2032 तक M1 श्रेणी (9 सीटर और 3500kg से कम वजन) की सभी कारों पर लागू होगा। इसके तहत कंपनियों को अपने वाहनों के कुल औसत उत्सर्जन को संतुलित करना होगा, जिससे उन्हें इलेक्ट्रिक और हाइब्रिड गाड़ियां बनाने पर जोर देना पड़ेगा। हालांकि इससे नई कारों की कीमतें बढ़ सकती हैं, लेकिन बेहतर माइलेज के कारण ग्राहकों के ईंधन खर्च में लंबी अवधि में बड़ी बचत होगी। इस ड्राफ्ट पर 6 अगस्त 2026 तक सुझाव मांगे गए हैं।