खबरीलाल डेस्क
नई दिल्ली: भारत जब 2030 तक अपनी रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को नई ऊंचाइयों पर ले जाने की तैयारी कर रहा है, तब एक तकनीक सबसे ज्यादा चर्चा में है—Battery Energy Storage System (BESS)। बाजार में अब तक इसे एक साधारण 'प्रोडक्ट' या कमोडिटी माना जाता रहा है, जिसे कहीं से भी खरीदकर लगाया जा सकता है। लेकिन भारत की अग्रणी एनर्जी स्टोरेज कंपनी, सनवरू (Sanvaru) ने इस धारणा को सिरे से खारिज कर दिया है।READ ALSO:-नए साल पर वैष्णो देवी जाने वाले सावधान! श्राइन बोर्ड ने बदला 'दर्शन' का तरीका, एक गलती और कैंसिल हो जाएगी आपकी यात्रा
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सनवरू ने उद्योग जगत को चेतावनी देते हुए एक महत्वपूर्ण तकनीकी दृष्टिकोण साझा किया है। कंपनी का स्पष्ट कहना है कि BESS को केवल बैटरियों का डिब्बा समझना एक बड़ी भूल साबित हो सकती है। यह वास्तव में एक 'टाइटली कपल्ड (Tightly Coupled)' इलेक्ट्रो-मैकेनिकल सिस्टम है, जो अत्यधिक सटीक इंजीनियरिंग की मांग करता है।
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BESS: महज एक प्रोडक्ट नहीं, परतों में बुना हुआ विज्ञान

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अक्सर यह माना जाता है कि बैटरी स्टोरेज एक 'प्लग-एंड-प्ले' डिवाइस है। लेकिन सनवरू के विशेषज्ञों के अनुसार, तकनीकी वास्तविकता इससे कोसों दूर है। एक सफल BESS कई जटिल परतों (Layers) का मिश्रण है, और इनमें से किसी एक में भी चूक पूरे प्रोजेक्ट को विफल कर सकती है।
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सनवरू ने BESS की तीन मुख्य इंजीनियरिंग परतों को उजागर किया है:

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    आर्किटेक्चर का खेल (Cell-to-Module): यह केवल तारों को जोड़ने का काम नहीं है। बैटरी सेल्स को मॉड्यूल में और मॉड्यूल को रैक में कैसे व्यवस्थित किया जाता है, यही सिस्टम की दक्षता तय करता है। अगर आर्किटेक्चर गलत हुआ, तो बैटरी में 'हॉटस्पॉट्स' बन सकते हैं, जो भविष्य में आग लगने का कारण बन सकते हैं।
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    हाई-वोल्टेज सुरक्षा: BESS में हाई-वोल्टेज डायरेक्ट करंट (DC) का प्रवाह होता है। इसका डिज़ाइन प्रोटेक्शन कोऑर्डिनेशन के साथ होना चाहिए, ताकि शॉर्ट सर्किट या ओवरलोड की स्थिति में सिस्टम खुद को सुरक्षित रख सके।
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    रियल-टाइम संवाद (Interoperability): एक BESS के तीन दिमाग होते हैं—BMS (बैटरी मैनेजमेंट सिस्टम), PCS (पावर कन्वर्जन सिस्टम), और EMS (एनर्जी मैनेजमेंट सिस्टम)। सनवरू का कहना है कि अगर BMS खतरे का संकेत देता है, तो PCS को मिलीसेकंड में प्रतिक्रिया देनी होती है। अगर इनके बीच 'कम्युनिकेशन गैप' हुआ, तो हादसा तय है।
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असेंबली से कहीं आगे है इंजीनियरिंग: एक ढीला पेंच और सब खत्म

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सनवरू ने इस बात पर विशेष जोर दिया है कि BESS का निर्माण "सिर्फ पुर्जे जोड़ने का काम नहीं है।" यह एक गलतफहमी है कि आप अलग-अलग जगह से कंपोनेंट्स खरीदकर उन्हें जोड़ सकते हैं।
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जोखिम क्या हैं?

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    टॉर्क (Torque): इंस्टॉलेशन के दौरान अगर कनेक्शन में पेंच कसने का टॉर्क सही नहीं है, तो रेजिस्टेंस बढ़ सकता है। इससे गर्मी पैदा होगी और आग लग सकती है।
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    ग्राउंडिंग (Grounding): कम्युनिकेशन लॉजिक या पैरामीटराइज़ेशन में मामूली बदलाव भी सिस्टम की स्टेबिलिटी (Stability) और जीवनकाल (Lifecycle) पर सीधा असर डालते हैं।
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सनवरू का 'मेक इन इंडिया' मॉडल: विदेशी निर्भरता पर प्रहार

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जहां कई कंपनियां विदेशी किट को असेंबल कर रही हैं, वहीं सनवरू ने Sanvaru Engineering Services के तहत एक अनूठा 'मेक इन इंडिया' मॉडल अपनाया है।
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कंपनी का दावा है कि वे केवल सेल्स (Cells) और कोर BMS को बाहर से सोर्स करते हैं। इसके अलावा, स्ट्रक्चर, मॉड्यूल, रैक, एनक्लोजर, पावर आर्किटेक्चर, इंटीग्रेशन और कंट्रोल्स—सब कुछ भारत में ही स्थानीय स्तर पर इंजीनियर किया जाता है।
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इसका फायदा:

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    पूर्ण नियंत्रण: परफॉर्मेंस और सेफ्टी पर कंपनी का पूरा कंट्रोल रहता है।
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    स्केलेबिलिटी: चाहे छोटा प्रोजेक्ट हो या ग्रिड-स्केल स्टोरेज, वे इसे स्थानीय जरूरतों के हिसाब से ढाल सकते हैं।
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कागजों पर नहीं, जमीन पर होती है परीक्षा

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सनवरू का यह संदेश स्पष्ट है: "BESS का परफॉर्मेंस फील्ड में तय होता है, पावरपॉइंट स्लाइड्स पर नहीं।" कागजों पर सिस्टम चाहे कितना भी अच्छा दिखे, उसकी असली परीक्षा तब होती है जब उसे भारत की भीषण गर्मी, धूल और ग्रिड की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है।
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कंपनी अब डिजाइन से लेकर कमीशनिंग (FAT से SAT तक) तक की पूरी 'टेक्निकल ओनरशिप' ले रही है, जो भारत के एनर्जी स्टोरेज बाजार के लिए एक गेम-चेंजर साबित हो सकता है।