मेरठ/डेस्क। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का प्रमुख शहर और क्रांतिधरा मेरठ अब अपनी पुरानी छवि को तोड़कर एक 'स्मार्ट और हाईटेक' शहर बनने की दिशा में एक विशाल छलांग लगाने जा रहा है। अक्सर शाम ढलते ही शहर के कई प्रमुख मार्ग अंधेरे के आगोश में समा जाते थे। कहीं स्ट्रीट लाइट खराब पड़ी होती थी, तो कहीं उसे ऑन करने वाला कर्मचारी नदारद रहता था। लेकिन अब, मेरठ नगर निगम (Meerut Nagar Nigam) ने इस समस्या का एक ऐसा तकनीकी समाधान खोज निकाला है, जो किसी साइंस फिक्शन फिल्म जैसा प्रतीत होता है।READ ALSO:-दिल्ली बनी 'गैस चैंबर': हवाओं की रफ्तार थमते ही राजधानी का दम घुटा, AQI 343 के पार; अगले 48 घंटे 'रेड अलर्ट' जैसी स्थिति!
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कल्पना कीजिए कि सड़क पर कोई वाहन नहीं है, तो स्ट्रीट लाइट धीमी जल रही है, और जैसे ही आपकी गाड़ी वहां पहुंचती है, लाइट पूरी क्षमता से जगमगा उठती है। यह कोई सपना नहीं, बल्कि मेरठ की हकीकत बनने जा रहा है। नगर निगम ने शहर की प्रकाश व्यवस्था को 'सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल एंड मॉनिटरिंग सिस्टम' (CCMS) से जोड़ने का फैसला किया है। अब स्ट्रीट लाइटों को जलाने और बुझाने के लिए खंभों के पास जाकर स्विच दबाने की जरूरत नहीं होगी, बल्कि यह काम कंट्रोल रूम में बैठी उंगलियों के एक 'टच' से होगा।
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इस महत्वाकांक्षी परियोजना के लिए नगर निगम ने पहले चरण में 1500 लाइटों के लिए टेंडर जारी कर दिया है। यह कदम न केवल शहर को स्मार्ट बनाएगा, बल्कि बिजली की भारी बचत और सुरक्षा व्यवस्था को भी चाक-चौबंद करेगा।
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क्या है यह 'जादुई' प्रोजेक्ट? (Project Overview)
\r\n\r\nमेरठ नगर निगम ने जिस व्यवस्था को अपनाने का निर्णय लिया है, उसे तकनीकी भाषा में CCMS यानी 'सेंट्रलाइज्ड कंट्रोल एंड मॉनिटरिंग सिस्टम' कहा जाता है। सरल भाषा में समझें तो यह पूरे शहर की लाइटों को एक ही कमरे से संचालित करने की तकनीक है।
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3 करोड़ का बजट और आईआईटी का दिमाग इस पूरे प्रोजेक्ट की रूपरेखा तैयार करने में देश के प्रतिष्ठित संस्थान आईआईटी दिल्ली (IIT Delhi) के तकनीकी विशेषज्ञों की मदद ली गई है। उनकी राय और तकनीकी रिपोर्ट के आधार पर ही निविदा (Tender) निकाली गई है। इस प्रोजेक्ट के लिए अवस्थापना निधि से 3 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
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पायलट प्रोजेक्ट की शुरुआत चूंकि यह तकनीक मेरठ के लिए नई है, इसलिए प्रशासन ने इसे सीधे पूरे शहर में लागू करने के बजाय पहले 'पायलट प्रोजेक्ट' के तौर पर शुरू करने का फैसला किया है।
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- \r\n कुल लाइटें: 1500 (प्रथम चरण में)\r\n \r\n
- \r\n टेंडर खुलने की तारीख: 7 फरवरी\r\n \r\n
- \r\n प्री-बिड मीटिंग: 21 जनवरी\r\n \r\n
- \r\n लक्षित क्षेत्र: शहर के प्रमुख मार्ग और चौराहे\r\n \r\n
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नगर निगम का उद्देश्य है कि पहले इन 1500 लाइटों के जरिए सिस्टम की सफलता को परखा जाए और फिर चरणबद्ध तरीके से शहर की सभी 56,000 स्ट्रीट लाइटों को इस सिस्टम से जोड़ दिया जाए।
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तकनीक का तिलिस्म - कैसे काम करेगा सिस्टम?
\r\n\r\nखबरीलाल ने अपने पाठकों के लिए इस जटिल तकनीक को आसान शब्दों में डिकोड किया है। आखिर यह 'टच स्क्रीन' और 'सेंसर' वाली लाइटें काम कैसे करेंगी?
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1. टच स्क्रीन कंट्रोल पैनल (Touch Screen Control): अब तक स्ट्रीट लाइटों को ऑन-ऑफ करने के लिए हर जोन में कर्मचारियों की ड्यूटी लगती थी, जो शाम को जाकर मैनुअल स्विच (MCB) उठाते थे और सुबह गिराते थे। इसमें अक्सर लापरवाही होती थी। दिन में भी लाइटें जलती रहती थीं। नई व्यवस्था में, नगर निगम के मुख्यालय में एक 'कंट्रोल एंड कमांड सेंटर' बनेगा। यहाँ बड़ी-बड़ी स्क्रीन्स लगी होंगी। अधिकारी कंप्यूटर या टच स्क्रीन पैनल पर एक बटन दबाकर शहर के किसी भी हिस्से की लाइट को जला या बुझा सकेंगे। यह सिस्टम इंटरनेट और क्लाउड तकनीक से जुड़ा होगा।
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2. सेंसिटिव सेंसर तकनीक (Sensitive Sensor Technology): इस प्रोजेक्ट की असली जान इसमें लगने वाले 'सेंसर' हैं। खंभों पर दो प्रकार के सेंसर लगाए जाएंगे:
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- \r\n डे-लाइट सेंसर (Day-Light Sensor): इसे 'लक्स सेंसर' भी कहा जाता है। यह सेंसर सूरज की रोशनी को पहचानता है। जैसे ही सुबह सूरज की पहली किरण निकलेगी, सेंसर उसे डिटेक्ट करेगा और लाइट को अपने आप बंद (OFF) कर देगा। वहीं, शाम को जैसे ही अंधेरा एक निश्चित स्तर पर पहुंचेगा, लाइटें अपने आप जल (ON) उठेंगी। इससे मैनुअल गलती की गुंजाइश खत्म हो जाएगी।\r\n \r\n
- \r\n मोशन सेंसर (Motion Sensor): यह सबसे क्रांतिकारी फीचर है। अक्सर रात के 2 बजे या 3 बजे सड़कों पर सन्नाटा होता है, लेकिन लाइटें पूरी ताकत से जलती रहती हैं, जिससे बिजली बर्बाद होती है। मोशन सेंसर वाहनों या इंसानों की आवाजाही को भांप लेगा।\r\n\r\n
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- \r\n परिदृश्य: अगर सड़क खाली है, तो लाइट अपनी क्षमता का केवल 30% या 50% ही जलेगी (डिम हो जाएगी)।\r\n \r\n
- \r\n एक्शन: जैसे ही कोई कार, बाइक या पैदल यात्री सेंसर की रेंज में आएगा, लाइट तुरंत 100% क्षमता के साथ जलने लगेगी।\r\n \r\n
- \r\n परिणाम: यह तकनीक हाइवे और एक्सप्रेस-वे पर इस्तेमाल होती है, जो अब मेरठ की सड़कों पर दिखेगी।\r\n \r\n
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3. स्मार्ट पैनल और सिम कार्ड: स्ट्रीट लाइट के खंभों पर एक विशेष डिवाइस बॉक्स लगाया जाएगा।
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- \r\n कुल 500 पैनल लगाए जाएंगे।\r\n \r\n
- \r\n एक पैनल से लगभग 20 से 25 खंभों (पोल) को कनेक्ट किया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n इन पैनल्स में सिम कार्ड या रेडियो फ्रीक्वेंसी डिवाइस होगी जो कंट्रोल रूम से लगातार संपर्क में रहेगी।\r\n \r\n
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भिवाड़ी मॉडल - प्रेरणा का स्रोत
\r\n\r\nहर बड़े बदलाव के पीछे एक सफल उदाहरण होता है। मेरठ नगर निगम ने इस प्रोजेक्ट के लिए भिवाड़ी (Bhiwadi) को अपना रोल मॉडल बनाया है। भिवाड़ी, जो राजस्थान के अलवर जिले में स्थित है और हरियाणा सीमा से सटा हुआ है, एक बड़ा औद्योगिक केंद्र है। वहाँ के नगर प्रशासन ने इसी तकनीक का उपयोग कर न केवल करोड़ों रुपये की बिजली बचाई है, बल्कि शहर की सुरक्षा व्यवस्था को भी मजबूत किया है।
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मुख्य अभियंता का बयान: नगर निगम के मुख्य अभियंता प्रमोद कुमार ने बताया, "हरियाणा बॉर्डर स्थित भिवाड़ी में यह व्यवस्था बेहद सफल रही है। उसी तर्ज पर मेरठ की पथ प्रकाश व्यवस्था (Street Light System) का कायाकल्प किया जा रहा है। हमने आईआईटी दिल्ली के विशेषज्ञों से सलाह ली है ताकि मेरठ की भौगोलिक स्थिति के अनुसार इसे ढाला जा सके। 7 फरवरी को तकनीकी बिड खुलने के बाद काम में तेजी आएगी।"
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भिवाड़ी की सफलता ने ही मेरठ के अधिकारियों को यह विश्वास दिलाया कि यह 'स्मार्ट लाइटिंग' केवल कागजी शेर नहीं, बल्कि धरातल पर उतरने वाला एक व्यावहारिक समाधान है।
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मौजूदा हालात और बदलाव की जरूरत
\r\n\r\nआखिर मेरठ को इस हाई-टेक सिस्टम की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब शहर की वर्तमान स्थिति में छिपा है।
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10 हजार लाइटें खराब - अंधेरे में शहर: नगर निगम के आंकड़ों के मुताबिक, मेरठ शहर में कुल मिलाकर 56,000 से ज्यादा स्ट्रीट लाइटें लगी हुई हैं। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि इनमें से करीब 10,000 स्ट्रीट लाइटें खराब या बंद पड़ी हैं।
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प्रमुख 'ब्लैक स्पॉट्स' (Dark Spots): शहर के कई महत्वपूर्ण और व्यस्त इलाके शाम होते ही अंधेरे में डूब जाते हैं। इससे न केवल राहगीरों को परेशानी होती है, बल्कि दुर्घटनाओं और अपराध का खतरा भी बना रहता है। जिन इलाकों में स्थिति सबसे खराब है, वे हैं:
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- \r\n बिजली बंबा बाइपास रोड (यहाँ भारी वाहनों का आवागमन रहता है)।\r\n \r\n
- \r\n मवाना रोड।\r\n \r\n
- \r\n बागपत रोड।\r\n \r\n
- \r\n दिल्ली रोड (परतापुर फ्लाई ओवर से शताब्दी नगर तक)।\r\n \r\n
- \r\n सोतीगंज के आसपास का क्षेत्र।\r\n \r\n
- \r\n जलीकोठी और खैरनगर।\r\n \r\n
- \r\n रेलवे रोड चौराहे से सिटी स्टेशन के बीच का मार्ग।\r\n \r\n
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पुरानी व्यवस्था में समस्या यह थी कि जब तक कोई पार्षद या स्थानीय निवासी शिकायत नहीं करता था, निगम को पता ही नहीं चलता था कि लाइट खराब है। कई बार लाइट ठीक होने में हफ्तों लग जाते थे। नई व्यवस्था इस 'इंतजार' को खत्म कर देगी।
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बिजली बिल और 'चोरी' का खेल खत्म
\r\n\r\nइस नई तकनीक का एक और बड़ा पहलू आर्थिक पारदर्शिता (Financial Transparency) है। अब तक नगर निगम और बिजली विभाग के बीच बिलों को लेकर अक्सर खींचतान चलती थी।
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अब तक क्या होता था? (The Old Way) अब तक स्ट्रीट लाइट का बिजली बिल 'अनुमानित' (Estimated) आधार पर आता था। यानी यह मान लिया जाता था कि लाइट 10 घंटे जली होगी और उसी हिसाब से बिल भेज दिया जाता था। चाहे लाइट खराब हो या बिजली न आई हो, निगम को फिक्स चार्ज देना पड़ता था।
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अब क्या होगा? (The New Way) नए स्मार्ट पैनल्स में इलेक्ट्रिक मीटर इनबिल्ट होंगे।
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- \r\n वास्तविक बिलिंग: पैनल यह रिकॉर्ड करेगा कि लाइट वास्तव में कितने घंटे और कितनी यूनिट जली।\r\n \r\n
- \r\n रियल-टाइम डेटा: बिजली की खपत का डेटा सीधे सर्वर पर जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n बचत: सेंसर द्वारा लाइट डिम करने से बिजली की खपत कम होगी, जिससे बिल में भारी गिरावट आएगी।\r\n \r\n
- \r\n चोरी पर रोक: अगर किसी पोल से कोई अवैध रूप से तार जोड़कर बिजली चोरी करने की कोशिश करेगा (कटिया डालेगा), तो सिस्टम तुरंत कंट्रोल रूम में 'टेम्परिंग अलर्ट' (Tampering Alert) भेज देगा और उस पोल की बिजली काटी जा सकती है।\r\n \r\n
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शिकायतों के निस्तारण में क्रांति
\r\n\r\nजनता की सबसे बड़ी शिकायत यह होती है—"साहब, हमारे घर के सामने की लाइट 10 दिन से बंद है।" नई तकनीक इस शिकायत को इतिहास बना देगी।
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ऑटोमेटिक फॉल्ट डिटेक्शन (Automatic Fault Detection): पैनल के सेंसर स्ट्रीट लाइट की 'सेहत' पर लगातार नजर रखेंगे।
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- \r\n जैसे ही कोई बल्ब फ्यूज होगा या सर्किट में कोई खराबी आएगी, पैनल तुरंत कंट्रोल रूम के कंप्यूटर पर 'रेड अलर्ट' के साथ मैसेज फ्लैश कर देगा।\r\n \r\n
- \r\n मैसेज में उस पोल का नंबर और लोकेशन (GPS Coordinates) भी होगा।\r\n \r\n
- \r\n मरम्मत करने वाली टीम (Maintenance Team) को शिकायत आने का इंतजार नहीं करना पड़ेगा। वे सूचना मिलते ही गाड़ी लेकर मौके पर पहुंचेंगे और लाइट ठीक कर देंगे।\r\n \r\n
- \r\n टेंडर की शर्तों में भी मेंटेनेंस कंपनी के लिए 'रिस्पॉन्स टाइम' (Response Time) तय किया जाएगा।\r\n \r\n
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यह सिस्टम 'प्रो-एक्टिव' (सक्रिय) है, न कि 'रिएक्टिव' (प्रतिक्रियाशील)। यानी समस्या बताने से पहले ही उसका समाधान शुरू हो जाएगा।
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पर्यावरण और सुरक्षा पर प्रभाव (Impact Analysis)
\r\n\r\nएक जिम्मेदार मीडिया हाउस होने के नाते, खबरीलाल इस परियोजना के सामाजिक और पर्यावरणीय प्रभावों का भी विश्लेषण करता है।
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1. कार्बन फुटप्रिंट में कमी (Environmental Benefit): जब लाइटें जरूरत के हिसाब से जलेंगी और बुझेंगी, तो ऊर्जा की खपत कम होगी। ऊर्जा की बचत का सीधा मतलब है कम कार्बन उत्सर्जन। यह प्रोजेक्ट मेरठ को 'ग्रीन सिटी' बनाने में मदद करेगा। एलईडी (LED) लाइटों के साथ स्मार्ट कंट्रोल का मतलब है 40% से 50% तक ऊर्जा की बचत।
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2. महिला सुरक्षा और अपराध नियंत्रण (Safety & Crime): पुलिस के आंकड़े बताते हैं कि अंधेरे रास्तों पर चेन स्नैचिंग, छेड़खानी और लूटपाट की घटनाएं अधिक होती हैं। यूनिवर्सिटी रोड, गढ़ रोड और रेलवे रोड जैसे इलाकों में जब स्मार्ट लाइटें लगेंगी, तो रात में भी दिन जैसा उजाला होगा।
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- \r\n सेंसर वाली लाइटें अपराधी को चौंका सकती हैं। जैसे ही कोई अपराधी अंधेरे समझकर किसी सुनसान गली में घुसेगा, मोशन सेंसर उसे डिटेक्ट कर लाइट तेज कर देगा, जिससे वह बेनकाब हो जाएगा। इसे 'साइकोलॉजिकल डेटरेंस' (मनोवैज्ञानिक भय) कहा जाता है।\r\n \r\n
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3. सड़क सुरक्षा (Road Safety): कोहरे के दिनों में या बारिश की रात में, सही रोशनी न होने से एक्सीडेंट होते हैं। ये स्मार्ट लाइटें मौसम के अनुसार भी अपनी तीव्रता (Intensity) को समायोजित करने में सक्षम हो सकती हैं (भविष्य के अपग्रेड में)। सही रोशनी से ड्राइवरों को दूर तक देखने में मदद मिलेगी।
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भविष्य की राह और चुनौतियां
\r\n\r\nहालांकि यह योजना बेहद शानदार है, लेकिन इसकी राह में कुछ चुनौतियां भी होंगी, जिनका सामना नगर निगम को करना होगा।
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चुनौतियां:
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- \r\n नेटवर्क कनेक्टिविटी: पूरा सिस्टम इंटरनेट और सर्वर पर आधारित है। अगर नेटवर्क फेल हुआ, तो क्या मैनुअल ओवरराइड की व्यवस्था होगी?\r\n \r\n
- \r\n मेंटीनेंस: सेंसर और टच पैनल नाजुक उपकरण हैं। धूल, बारिश और बंदरों (जो मेरठ में बड़ी समस्या हैं) से इन्हें बचाना एक चुनौती होगी।\r\n \r\n
- \r\n चोरी: महंगे पैनल और सेंसर चोरी होने का डर भी बना रहेगा। इसके लिए एंटी-थेफ्ट नट-बोल्ट और सीसीटीवी निगरानी की जरूरत होगी।\r\n \r\n
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भविष्य का रोडमैप: प्रथम चरण में 1500 लाइटों के सफल होने के बाद, अगले चरणों में पूरे शहर को कवर किया जाएगा। भविष्य में इन पोल्स पर:
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- \r\n सीसीटीवी कैमरे लगाए जा सकते हैं।\r\n \r\n
- \r\n पब्लिक एड्रेस सिस्टम (लाउडस्पीकर) लगाए जा सकते हैं।\r\n \r\n
- \r\n वाई-फाई हॉटस्पॉट बनाए जा सकते हैं।\r\n \r\n
- \r\n पर्यावरण सेंसर (AQI मीटर) लगाए जा सकते हैं।\r\n \r\n
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यानी आज का यह स्ट्रीट लाइट पोल, कल का 'स्मार्ट पोल' (Smart Pole) बनने जा रहा है।
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खबरीलाल विशेष - पाठकों के लिए सारांश (Key Takeaways)
\r\n\r\nयदि आप मेरठ के निवासी हैं, तो आपके लिए यह जानना जरूरी है कि 7 फरवरी के बाद आपके शहर में क्या बदलने वाला है:
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- \r\n कहां बदलाव दिखेगा: शुरुआत में यूनिवर्सिटी रोड, गढ़ रोड, और अन्य मुख्य चौराहों पर नई लाइटें दिखेंगी।\r\n \r\n
- \r\n शिकायत: अब आपको पार्षद के चक्कर नहीं लगाने होंगे, सिस्टम खुद लाइट ठीक करवाएगा।\r\n \r\n
- \r\n टैक्स का सही उपयोग: आपके द्वारा दिए गए टैक्स का पैसा अब बिजली बिलों की बर्बादी में नहीं, बल्कि विकास में लगेगा।\r\n \r\n
- \r\n ड्राइविंग का अनुभव: रात में ड्राइव करना अब ज्यादा सुरक्षित और सुखद होगा।\r\n \r\n
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एक नए युग की शुरुआत
\r\n\r\nमेरठ नगर निगम का यह कदम निस्संदेह सराहनीय है। स्ट्रीट लाइट को केवल एक 'बल्ब' न मानकर उसे 'डेटा' और 'तकनीक' से जोड़ना एक दूरदर्शी सोच है। यह प्रोजेक्ट साबित करता है कि मेरठ अब पुराने ढर्रे को छोड़कर आधुनिकता की दौड़ में शामिल होने के लिए तैयार है। 7 फरवरी को जब टेंडर खुलेगा, तो यह केवल एक कागजी प्रक्रिया नहीं होगी, बल्कि मेरठ के 'स्मार्ट सिटी' बनने के सपने की पहली ईंट रखी जाएगी। अब देखना यह है कि जिस उत्साह के साथ यह योजना बनी है, क्या उसी कुशलता के साथ इसे जमीन पर उतारा जा सकेगा? खबरीलाल की नजर इस प्रोजेक्ट के हर अपडेट पर बनी रहेगी।
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(खबर अभी जारी है, मेरठ नगर निगम और शहर के विकास से जुड़ी पल-पल की अपडेट के लिए जुड़े रहें www.khabreelal.com के साथ)
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Sabse pehle comment karne wale banein.