मेरठ के अपर सत्र न्यायाधीश (न्यायालय संख्या 01) मोहम्मद असलम सिद्दीकी ने एक बेहद अहम और कड़े फैसले में, देश के राजस्व को भारी नुकसान पहुंचाने वाले एक बड़े फर्जी आईटीसी घोटाला (Fake ITC Scam) मामले में मुख्य आरोपी नितिन अग्रवाल की प्रथम जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। यह मामला महानिदेशालय जीएसटी इंटेलिजेंस (DGGI) गाजियाबाद द्वारा उजागर किया गया था, जिसमें बिना माल की आपूर्ति किए करोड़ों रुपये का इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) अवैध रूप से क्लेम किया गया था। इस आर्थिक अपराध की गंभीरता को देखते हुए न्यायालय ने आरोपी को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया।Read also:-मेरठ में गैस सिलेंडरों की भारी किल्लत: बुकिंग के लिए तरस रहे उपभोक्ता, ₹2000 तक में हो रही ब्लैक मार्केटिंग
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1. मामले की पृष्ठभूमि और DGGI की कार्रवाई
\r\n\r\nयह पूरा मामला (मामला संख्या: 144/2026) DGGI गाजियाबाद की उस सघन जांच से जुड़ा है, जिसमें फर्जी संस्थाओं के एक बड़े सिंडिकेट का भंडाफोड़ हुआ था। 29 जनवरी 2026 को DGGI की टीमों ने M/S NTEXX Textiles Pvt. Ltd. सहित कई अन्य संदिग्ध फर्मों के ठिकानों पर ताबड़तोड़ छापेमारी की थी। जांच के दौरान यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि कागजों पर चल रही इन फर्मों के माध्यम से एक विशाल फर्जी आईटीसी घोटाला संचालित किया जा रहा था।
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विभाग के अनुसार, नितिन अग्रवाल पुत्र नरेंद्र कुमार अग्रवाल (निवासी: 91, दीपाली एन्क्लेव, पीतमपुरा, दिल्ली) इस पूरे गिरोह का 'मास्टरमाइंड' है। उसने डमी और फर्जी निदेशकों के जरिए कुल 87 फर्जी फर्मों का एक जाल बुना। इन फर्मों के जरिए उसने बिना किसी वास्तविक माल की खरीद-फरोख्त के, केवल बिलों के आधार पर लगभग 60,57,35,927/- (साठ करोड़ सत्तावन लाख रुपये से अधिक) का धोखाधड़ी वाला ITC प्राप्त किया और उसे आगे के कारोबारियों को पास कर दिया।
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2. बचाव पक्ष (आवेदक) की दलीलें
\r\n\r\nअदालत में आवेदक नितिन अग्रवाल के वकील ने जमानत (प्रथम जमानत आवेदन संख्या: 514/2026) के पक्ष में कई महत्वपूर्ण तर्क रखे:
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- \r\n अवैध गिरफ्तारी का आरोप: बचाव पक्ष ने दलील दी कि आवेदक को 30 जनवरी 2026 को ही हिरासत में ले लिया गया था, लेकिन उसे मजिस्ट्रेट के सामने 31 जनवरी 2026 को पेश किया गया। वकील के अनुसार, यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 58 का खुला उल्लंघन है, जो 24 घंटे के भीतर पेशी को अनिवार्य बनाती है।\r\n \r\n
- \r\n फर्मों से कोई सीधा संबंध नहीं: अदालत में यह दावा किया गया कि जिन 87 फर्मों से यह फर्जी आईटीसी घोटाला होने की बात कही जा रही है, आवेदक न तो उनका शेयरधारक है, न निदेशक है और न ही मालिक है।\r\n \r\n
- \r\n दबाव में बयान दर्ज करने का आरोप: बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि गिरफ्तारी के समय आवेदक को कानूनी सहायता से वंचित रखा गया। आधी रात को मानसिक दबाव डालकर उससे सादे कागजों पर हस्ताक्षर कराए गए। यह भी तर्क दिया गया कि वह अपना बयान पहले ही वापस ले चुका है (Retracted Statement)।\r\n \r\n
- \r\n गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं: मानवीय आधार पर जमानत की गुहार लगाते हुए कहा गया कि नितिन अग्रवाल ब्रोंकियल अस्थमा (Bronchial Asthma) और टाइप-2 मधुमेह (Type-2 Diabetes) जैसी गंभीर बीमारियों से पीड़ित है। न्यायिक हिरासत (जेल) में उसका उचित इलाज संभव नहीं है, जिससे उसकी जान को खतरा हो सकता है।\r\n \r\n
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3. अभियोजन (DGGI/भारत संघ) का कड़ा विरोध
\r\n\r\nबचाव पक्ष की दलीलों का जवाब देते हुए अभियोजन पक्ष की तरफ से लक्ष्य कुमार सिंह विशेष अभियोजन अधिकारी एवं उनकी सहयोगी श्रीमती वंदना सिंह एडवोकेट ने जमानत का कड़ा विरोध किया और अदालत के सामने इस फर्जी आईटीसी घोटाला के पुख्ता सबूत पेश किए:
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- \r\n मुख्य साजिशकर्ता (De facto Controller): विभाग ने स्पष्ट किया कि भले ही नितिन अग्रवाल का नाम कागजों पर न हो, लेकिन वही इन सभी फर्जी फर्मों का वास्तविक नियंत्रक (de facto controller) है। उसने अपना क्रेडिट स्कोर खराब होने के कारण चालाकी से अपने बेटे (गर्वित अग्रवाल) और अपने कर्मचारियों के नाम पर यह सारा व्यापार खड़ा किया।\r\n \r\n
- \r\n इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य और सह-आरोपियों के बयान: DGGI ने अदालत को बताया कि आरोपी के मोबाइल से प्राप्त व्हाट्सएप चैट, इलेक्ट्रॉनिक डेटा और सह-आरोपियों के बयानों से उसकी संलिप्तता पूरी तरह स्पष्ट है। उसके खुद के बेटे गर्वित ने बयान दिया है कि वह फर्मों का केवल नाममात्र का मालिक है, जबकि वित्तीय नियंत्रण और सारा काम उसके पिता नितिन अग्रवाल ही देखते हैं।\r\n \r\n
- \r\n गवाहों को प्रभावित करने का अंदेशा: अभियोजन ने अदालत को आगाह किया कि यदि ऐसे शातिर और प्रभावशाली व्यक्ति को जमानत दी गई, तो वह बाहर आकर गवाहों को डरा-धमका सकता है और सबूतों को नष्ट कर सकता है, जिससे जांच की दिशा भटक सकती है।\r\n \r\n
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4. C.G.S.T. अधिनियम, 2017 की धाराएं और अपराध की प्रकृति
\r\n\r\nइस फर्जी आईटीसी घोटाला में आवेदक पर C.G.S.T. अधिनियम, 2017 की धारा 132(1)(b), 132(1)(c) और 132(1)(i) लगाई गई है।
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- \r\n धारा 132(1)(b): बिना वास्तविक आपूर्ति के चालान (Invoices) जारी करना।\r\n \r\n
- \r\n धारा 132(1)(c): ऐसे फर्जी चालानों का उपयोग करके अवैध इनपुट टैक्स क्रेडिट (ITC) का लाभ उठाना।\r\n \r\n
- \r\n धारा 132(1)(i): उपर्युक्त अपराधों से संबंधित दस्तावेजों को नष्ट करना या सूचनाओं को छिपाना।\r\n \r\n
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चूंकि कर चोरी की रकम 5 करोड़ रुपये से अधिक (इस मामले में 60 करोड़ से ज्यादा) है, इसलिए यह एक संज्ञेय (Cognizable) और गैर-जमानती (Non-bailable) अपराध की श्रेणी में आता है।
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5. न्यायालय का निष्कर्ष और अंतिम आदेश
\r\n\r\nअपर सत्र न्यायाधीश, न्यायालय संख्या 01, मेरठ के पीठासीन अधिकारी मोहम्मद असलम सिद्दीकी (H.J.S) ने दोनों पक्षों को विस्तार से सुना। न्यायालय ने अपने आदेश (दिनांक 27.02.2026) में स्पष्ट किया:
\r\n\r\nअभिलेखों और तर्कों के अनुशीलन से यह प्रथम दृष्टया (prima facie) साबित होता है कि नितिन अग्रवाल ही इस पूरे सिंडिकेट का मुख्य संचालक था। न्यायालय ने बेटे गर्वित अग्रवाल के बयान को महत्वपूर्ण माना, जिसमें उसने स्वीकार किया था कि वह सिर्फ कागजी मालिक है और सारा खेल उसके पिता का है। कोर्ट ने इस दलील को भी खारिज कर दिया कि आरोपी का फर्मों से कोई सीधा संबंध नहीं है, क्योंकि मास्टरमाइंड अक्सर पर्दे के पीछे से ही ऐसे फर्जी आईटीसी घोटाला को अंजाम देते हैं।
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न्यायालय ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न दृष्टांतों (Precedents) का हवाला देते हुए टिप्पणी की कि आर्थिक अपराध देश की अर्थव्यवस्था की जड़ों को खोखला कर देते हैं। ये अपराध गहरी साजिश और ठंडे दिमाग से किए जाते हैं। इतने बड़े पैमाने पर सरकारी खजाने (राजस्व) को नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति को प्रारंभिक जांच के चरण में जमानत देना न्याय के हित में नहीं होगा।
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अंततः, न्यायालय ने बचाव पक्ष के स्वास्थ्य और कानूनी खामियों के तर्कों को नाकाफी मानते हुए कहा: "आवेदक नितिन अग्रवाल का जमानत आवेदन एतद्द्वारा निरस्त किया जाता है।"
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मेरठ कोर्ट का यह फैसला उन कर चोरों के लिए एक सख्त संदेश है जो डमी कंपनियों और फर्जी बिलों के सहारे रातों-रात करोड़पति बनने का सपना देखते हैं। DGGI गाजियाबाद द्वारा 60 करोड़ से अधिक के इस फर्जी आईटीसी घोटाला का पर्दाफाश करना यह साबित करता है कि अब डेटा एनालिटिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की मदद से GST विभाग कर चोरों तक आसानी से पहुंच रहा है। आर्थिक अपराधों के मामले में न्यायपालिका का यह कठोर रुख देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत और पारदर्शी बनाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम है।
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दिनांक 27.02.2026 को मेरठ के अपर सत्र न्यायाधीश मोहम्मद असलम सिद्दीकी ने 60.57 करोड़ रुपये के फर्जी आईटीसी घोटाला में मास्टरमाइंड नितिन अग्रवाल की जमानत याचिका खारिज कर दी है। DGGI गाजियाबाद की जांच में यह सामने आया था कि अग्रवाल ने 87 फर्जी फर्मों के जरिए बिना माल सप्लाई किए करोड़ों का GST क्लेम किया। कोर्ट ने इसे एक गंभीर आर्थिक अपराध मानते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।
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डिस्क्लेमर: यह न्यूज़ रिपोर्ट मौजूद प्रेस रिलीज़ और स्पेशल प्रॉसिक्यूशन ऑफिसर और आरोपी के वकील की दलीलों और वैलिड कोर्ट के ऑर्डर पर आधारित है।
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Sabse pehle comment karne wale banein.