एक तरफ उत्तर प्रदेश के शहरों को 'स्मार्ट सिटी' (Smart City) बनाने की दिशा में करोड़ों रुपये के बजट पास किए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। मेरठ शहर का गंगानगर इलाका, जिसे कभी एक व्यवस्थित और साफ-सुथरी आवासीय कॉलोनी के रूप में बसाया गया था, आज नगर निगम (Nagar Nigam) और स्थानीय प्रशासन की घोर लापरवाही का जीता-जागता स्मारक बन चुका है। जीपी-पॉकेट (GP-Pocket) के निवासी पिछले एक दशक से अधिक समय से बुनियादी सुविधाओं—सड़क, नाली और पार्क—के लिए तरस रहे हैं।READ ALSO:-नशे के काले कारोबार का भंडाफोड़: बिजनौर में 1.5 लाख की स्मैक और 88 हजार कैश के साथ दो महिला तस्कर गिरफ्तार, जानें 'ऑपरेशन' की पूरी इनसाइड स्टोरी
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लगातार गुहार लगाने, प्रार्थना पत्र देने और अधिकारियों के चक्कर काटने के बाद भी जब कोई समाधान नहीं निकला, तो रविवार को स्थानीय निवासियों का गुस्सा ज्वाला बनकर फूट पड़ा। आर-पार की लड़ाई का मन बना चुके निवासियों ने एक स्वर में हुंकार भरी और सीधे नगर निगम के मुखिया, यानी मेयर के आवास का घेराव कर डाला।
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12 वर्षों का वनवास: आखिर क्यों फूटा गंगानगर वासियों का गुस्सा?

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गंगानगर जीपी-पॉकेट की समस्या कोई एक या दो दिन पुरानी नहीं है। निवासियों का आरोप है कि पिछले 12 वर्षों से इस पॉकेट की पूरी तरह से अनदेखी की जा रही है। टैक्स भरने के बावजूद उन्हें एक सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जीने का अधिकार नहीं मिल रहा है।
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लोगों की प्रमुख शिकायतें इस प्रकार हैं:

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1. मेयर के निर्देश पर उखाड़ी गई सड़क, एक साल से काम ठप: लोगों का सबसे बड़ा और तीखा आक्रोश उस मुख्य सड़क को लेकर है, जिसे ठीक करने के नाम पर पूरी तरह से बर्बाद कर दिया गया। स्थानीय लोगों ने बताया कि लगभग एक वर्ष पूर्व खुद मेयर हरिकान्त अहलूवालिया के निर्देश पर इस जर्जर मुख्य सड़क को नए सिरे से बनाने के लिए उखाड़ा गया था। लोगों में उम्मीद जगी थी कि अब उन्हें गड्ढों से निजात मिलेगी। लेकिन विडंबना देखिए, सड़क उखाड़ने के बाद ठेकेदार और नगर निगम की टीम मानो गायब ही हो गई। आज एक साल बीत जाने के बाद भी निर्माण कार्य अधूरा पड़ा है।
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2. हादसों का 'डेथ जोन' बनीं सड़कें: सड़क उखड़ी होने के कारण वहां गहरे गड्ढे बन गए हैं, जिनमें अक्सर ई-रिक्शा, दोपहिया वाहन और स्कूल जाने वाले बच्चों की गाड़ियां पलट जाती हैं। बारिश के मौसम में तो यह गड्ढे तालाब का रूप ले लेते हैं, जिससे यह अंदाजा लगाना मुश्किल हो जाता है कि सड़क में गड्ढा है या गड्ढे में सड़क। आए दिन राहगीर और स्थानीय निवासी इन गड्ढों का शिकार होकर अपने हाथ-पैर तुड़वा रहे हैं।
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3. बीमारी का गढ़ बनीं उफनती नालियां: सड़कों से भी बदतर हाल इलाके की जल निकासी (Drainage System) व्यवस्था का है। नालियां टूट चुकी हैं और उनका गंदा व बदबूदार पानी सीधे सड़कों पर और लोगों के घरों के बाहर जमा रहता है। इस ठहरे हुए गंदे पानी में मच्छरों की फौज पनप रही है। निवासियों का कहना है कि इलाके में डेंगू, मलेरिया और वायरल फीवर जैसी संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा लगातार मंडरा रहा है।
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4. खंडहर में तब्दील हो चुके पार्क: कॉलोनी बसाई गई थी तो बच्चों के खेलने और बुजुर्गों के टहलने के लिए हरे-भरे पार्क दिए गए थे। लेकिन आज देखरेख और नगर निगम के उद्यान विभाग की लापरवाही के अभाव में ये पार्क खंडहर और कूड़ाघरों में तब्दील हो चुके हैं। पार्कों की बाउंड्री वॉल टूट चुकी है और वहां आवारा पशुओं का जमावड़ा लगा रहता है।
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मेयर आवास पर हंगामा: 'गंगानगर कल्याण एवं जन उत्थान एसोसिएशन' का नेतृत्व

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स्थानीय लोगों ने अपनी इस लड़ाई को एक संगठित रूप देते हुए 'गंगानगर कल्याण एवं जन उत्थान एसोसिएशन' का गठन किया है। इसी एसोसिएशन के नेतृत्व में सैकड़ों की संख्या में महिलाएं, बुजुर्ग और युवा मेयर हरिकान्त अहलूवालिया के आवास पर पहुंचे।
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लोगों ने मेयर के सामने अपनी समस्याओं का अंबार लगा दिया और स्पष्ट शब्दों में चेतावनी दी कि अगर जल्द ही उनकी कॉलोनी का जीर्णोद्धार नहीं हुआ, तो वे नगर निगम कार्यालय पर तालाबंदी करने और आगामी चुनावों का पूर्ण बहिष्कार करने से भी पीछे नहीं हटेंगे। निवासियों ने पूछा कि जब वे हाउस टैक्स और सीवर टैक्स समय पर जमा करते हैं, तो उन्हें 12 साल से बुनियादी सुविधाओं से वंचित क्यों रखा जा रहा है?
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मेयर का एक्शन और पार्षद पति का आश्वासन: क्या शांत होगा जनता का आक्रोश?

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अपने आवास पर इतनी बड़ी संख्या में आक्रोशित भीड़ और उनके तीखे तेवरों को देखकर मेयर हरिकान्त अहलूवालिया तुरंत हरकत में आए।
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    अधिकारियों को कड़ी फटकार: मेयर ने स्थिति की गंभीरता को भांपते हुए मौके पर ही नगर निगम के निर्माण विभाग के संबंधित अधिकारियों और इंजीनियरों को फोन लगाया। उन्होंने अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाते हुए निर्देश दिए कि जीपी-पॉकेट के रुके हुए सड़क निर्माण कार्य में तुरंत तेजी लाई जाए और जलभराव की समस्या का अस्थाई समाधान तत्काल प्रभाव से किया जाए।
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    पार्षद पति की सफाई: इस पूरे हंगामे के दौरान स्थानीय क्षेत्र के 'पार्षद पति' (Councilor's Husband) भी मौके पर मौजूद थे। उत्तर प्रदेश की स्थानीय राजनीति में अमूमन महिला पार्षदों का कामकाज उनके पति ही संभालते हैं। पार्षद पति ने आक्रोशित लोगों के बीच जाकर उन्हें शांत कराने का प्रयास किया। उन्होंने दावा किया कि "सड़क निर्माण का नया प्रस्ताव (Proposal) बोर्ड बैठक में पहले ही पास कराया जा चुका है। वर्तमान में टेंडर प्रक्रिया (Tender Process) चल रही है। जैसे ही कागजी औपचारिकताएं पूरी होंगी, सबसे पहले इसी मुख्य सड़क का निर्माण कार्य धरातल पर शुरू कर दिया जाएगा।"
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अटकलें जारी: क्या इस बार मिलेगा स्थायी समाधान या फिर वही 'तारीख पे तारीख'?

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मेयर के फोन कॉल्स और पार्षद पति के आश्वासनों के बावजूद गंगानगर वासियों के चेहरों पर अविश्वास साफ झलक रहा था। निवासियों का कहना है कि:
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"हम पिछले 12 वर्षों से इसी तरह के खोखले आश्वासन सुनते आ रहे हैं। कभी बजट न होने का बहाना बनाया जाता है, तो कभी आचार संहिता का। एक साल पहले जब सड़क उखाड़ी गई थी, तब भी यही कहा गया था कि अगले महीने शानदार सड़क बन जाएगी। हमारी आंखें अब पक्की सड़क देखने को तरस गई हैं।"
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गंगानगर जीपी-पॉकेट का यह मामला हमारे शहरी विकास के उस कड़वे सच को उजागर करता है, जहां योजनाएं फाइलों में तो दौड़ती हैं, लेकिन जमीन पर रेंगती भी नहीं हैं। मेयर हरिकान्त अहलूवालिया द्वारा दिए गए ताजे निर्देशों के बाद अब गेंद पूरी तरह से नगर निगम प्रशासन के पाले में है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि मेयर और स्थानीय जनप्रतिनिधियों का यह नया आश्वासन धरातल पर कब तक उतरता है, या फिर गंगानगर वासियों को एक बार फिर लंबी प्रतीक्षा, धूल-धक्कड़ और दुश्वारियों के बीच अपनी जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर होना पड़ेगा।
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स्थानीय लोगों ने यह साफ कर दिया है कि यदि इस बार भी काम शुरू नहीं हुआ, तो उनका अगला कदम और भी अधिक उग्र होगा।
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