नई दिल्ली/स्थानीय रिपोर्टर: शहर के सबसे प्रमुख और व्यस्त व्यापारिक केंद्रों में से एक 'सेंट्रल मार्केट' के व्यापारियों और स्थानीय निवासियों की रातों की नींद उड़ गई है। सुप्रीम कोर्ट के एक बेहद सख्त आदेश के बाद सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माण और आवासीय भूखंडों (Residential Plots) के व्यावसायिक उपयोग को लेकर एक बड़ी और ऐतिहासिक कार्रवाई की तैयारी चल रही है। अदालत ने साफ कर दिया है कि नियमों को ताक पर रखकर किए गए किसी भी निर्माण को बख्शा नहीं जाएगा। पहले चरण की कार्रवाई के बाद अब 815 अन्य संपत्तियों पर बुलडोजर चलने या सीलिंग की तलवार लटक गई है। इस फैसले ने पूरे इलाके में दहशत का माहौल पैदा कर दिया है।READ ALSO:-एटीएम कैश हड़ताल से गहराया संकट: यूपी, दिल्ली और हरियाणा के एटीएम में लटके 'नो कैश' के बोर्ड, वेतन वृद्धि को लेकर कर्मचारियों ने किया काम बंद
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सेंट्रल मार्केट का पूरा गणित समझिए: कैसे शुरू हुआ विवाद?

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इस पूरे विवाद की जड़ में आवासीय संपत्तियों का अवैध तरीके से व्यावसायिक (Commercial) रूप में इस्तेमाल किया जाना है। प्रशासन के आंकड़ों के अनुसार, सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में कुल 860 संपत्तियां चिन्हित की गई हैं। इनमें से ज्यादातर भूखंडों का मूल आवंटन आवासीय उद्देश्य (रहने के लिए) से किया गया था। लेकिन समय के साथ, लालच और नियमों की अनदेखी के चलते लोगों ने इन आवासीय भूखंडों पर दुकानें, शोरूम और व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स तान दिए।
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जब यह मामला स्थानीय प्रशासन से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, तो सर्वोच्च न्यायालय ने इस पर कड़ी आपत्ति जताई। अदालत के आदेश के बाद पहले चरण की बड़ी कार्रवाई हो चुकी है, जिसमें 44 व्यावसायिक संपत्तियों को सील कर दिया गया था और एक मकान को पूरी तरह से जमींदोज (Demolish) कर दिया गया था। अब बाकी बची 815 संपत्तियों पर भी प्रशासन का हथौड़ा चलने की तैयारी है। कोर्ट ने विकास प्राधिकरण को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि सभी अवैध निर्माण हटाकर भवनों को उनके नियमों के अनुसार 'मूल स्वरूप' (Original Residential Form) में लाया जाए।
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नियम सबके लिए बराबर: प्लॉट का साइज नहीं बचा पाएगा

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व्यापारियों को उम्मीद थी कि शायद छोटे भूखंडों या आंशिक व्यावसायिक उपयोग वालों को कोर्ट से कोई राहत मिल जाएगी, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सेक्टर-2 के प्रमुख व्यापारी अर्पित मोगा ने सुनवाई के बाद की स्थिति को स्पष्ट करते हुए बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में किसी भी प्रकार के भेदभाव या रियायत से इनकार किया है।
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अर्पित मोगा के अनुसार, कोर्ट ने साफ कर दिया है कि भवन चाहे 25 मीटर का हो, 38 मीटर का, 44 मीटर का या उससे भी बड़ा, सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माण के खिलाफ सभी पर एक समान नियम लागू होंगे। कार्रवाई का खाका कुछ इस प्रकार तैयार किया गया है:
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    पूर्ण व्यावसायिक उपयोग: जिन आवासीय भवनों का पूरा हिस्सा 100% व्यावसायिक उपयोग (Commercial Use) में लाया जा रहा है, वहां पूरी तरह से ध्वस्तीकरण (Demolition) की कार्रवाई की जाएगी।
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    आंशिक व्यावसायिक उपयोग: जिन भवनों में लोग रह भी रहे हैं और आगे या नीचे के हिस्से में दुकानें खोल रखी हैं, उनका प्रशासन की टीम द्वारा मौके पर जाकर बारीकी से निरीक्षण किया जाएगा। निरीक्षण रिपोर्ट के आधार पर ही यह तय होगा कि सीलिंग की जाएगी या ध्वस्तीकरण।
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EWS, LIG और MIG वालों को भी नहीं मिली कोई राहत

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इस फैसले का सबसे बड़ा और दर्दनाक असर मध्यम और गरीब वर्ग के लोगों पर पड़ रहा है। प्रभावित लोगों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट या स्थानीय प्रशासन ने EWS (आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग), LIG (लोअर इनकम ग्रुप) और MIG (मिडिल इनकम ग्रुप) श्रेणी के मकानों को भी कोई राहत नहीं दी है।
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स्थानीय लोगों का आरोप है कि मकान चाहे जितना भी छोटा हो, अगर उसमें सेटबैक (Setback Area - भवन के आगे-पीछे छोड़ी जाने वाली खाली जगह) का उल्लंघन हुआ है या कोई अन्य तकनीकी खामी है, तो किसी भी आधार पर छूट नहीं दी गई है। छोटे मकानों में लोगों ने अपनी आजीविका चलाने के लिए एक छोटी सी दुकान खोल ली थी, लेकिन अब उन्हें भी बेदखली और कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है।
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G+1, G+2 मंजिलों पर भी एक्शन: गहराया बेघर होने का संकट

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मामला सिर्फ दुकानों और शोरूम तक ही सीमित नहीं है। सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माण के दायरे में वो मकान भी आ गए हैं, जहां बिना प्राधिकरण से नक्शा पास कराए (Without Approved Map) अतिरिक्त मंजिलें बना ली गई हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि जिन भवनों में बिना अनुमति G+1 (ग्राउंड फ्लोर + 1), G+2 या G+3 मंजिलें बनाई गई हैं, प्रशासन उन पर भी बुलडोजर चलाने की तैयारी में है।
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लोगों की दलील है कि पिछले कुछ दशकों में जैसे-जैसे परिवारों का आकार बढ़ा और बच्चों की जरूरतें बढ़ीं, उन्होंने मजबूरी में अपने ही मकानों का ऊपर की तरफ विस्तार कर लिया था। अब अगर इन ऊपरी मंजिलों पर कार्रवाई होती है, तो कई भरे-पूरे परिवारों के सामने सिर छुपाने और रहने का एक बड़ा संकट (Housing Crisis) खड़ा हो जाएगा।
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सेंट्रल मार्केट में अवैध निर्माण का यह मामला शहरी नियोजन की विफलता और नियमों की खुली अनदेखी का एक क्लासिक उदाहरण बन गया है। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का यह सख्त आदेश उन लोगों के लिए एक बड़ा सबक है जो नियमों को ताक पर रखकर कॉलोनियों का स्वरूप बिगाड़ते हैं, वहीं दूसरी तरफ उन सैकड़ों परिवारों के लिए यह किसी बुरे सपने से कम नहीं है जिनके आशियाने और रोजगार अब छिनने वाले हैं। अब देखना यह होगा कि क्या स्थानीय प्रशासन 815 संपत्तियों पर एक साथ कार्रवाई कर पाता है, या प्रभावित व्यापारी और नागरिक किसी पुनर्वास योजना की मांग को लेकर सरकार का दरवाजा खटखटाते हैं।
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सेंट्रल मार्केट की 860 संपत्तियों में से 815 पर अवैध व्यावसायिक निर्माण के चलते सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर ध्वस्तीकरण और सीलिंग की कार्रवाई की तैयारी चल रही है। आवासीय भूखंडों पर बनी दुकानों और बिना नक्शे की G+1, G+2 मंजिलों को उनके मूल स्वरूप में लाने के निर्देश हैं। 25 से 44 मीटर तक के सभी प्लॉटों पर समान नियम लागू होंगे। इस कार्रवाई से EWS, LIG और MIG श्रेणी के लोगों को भी कोई राहत नहीं मिली है, जिससे कई परिवारों के सामने बेघर होने और रोजगार छिनने का गहरा संकट पैदा हो गया है।
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