खबरीलाल डेस्क
मेरठ (Meerut) शहर के दिल कहे जाने वाले शास्त्रीनगर (Shastri Nagar) इलाके में इन दिनों हड़कंप मचा हुआ है। आवासीय संपत्तियों (Residential Properties) का मनमाने तरीके से व्यावसायिक (Commercial) इस्तेमाल करने वालों पर अब सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) का डंडा चल गया है। सर्वोच्च न्यायालय के सख्त आदेशों के अनुपालन में मेरठ आवास एवं विकास परिषद ने शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट में सील की गई 44 संपत्तियों को अब डी-सील (De-seal) करना शुरू कर दिया है।READ ALSO:-रक्षाबंधन पर बहनों को इंडिया पोस्ट का महा-तोहफा! बदल गए स्पीड पोस्ट के रेट, अब 24 घंटे में पहुंचेगी राखी, जानें 'डॉक्यूमेंट और पार्सल' का नया नियम
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सोमवार को इस कड़ी में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए लगभग 28 संपत्तियों की सील खोल दी गई है। हालांकि, यह डी-सीलिंग कोई राहत नहीं है, बल्कि अवैध निर्माण करने वालों के लिए अपने हाथों से अपना नुकसान कम करने का एक आखिरी मौका है। आइए, इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं कि आखिर क्यों आवासीय संपत्तियों पर ताले जड़े गए थे और अब आगे क्या होने वाला है।
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15 दिन का सख्त अल्टीमेटम: खुद तोड़ें, वरना चलेगा सरकारी बुलडोजर

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आवास विकास परिषद के अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि जिन संपत्तियों को डी-सील किया जा रहा है, वह केवल उन भवन स्वामियों के लिए है जिन्होंने खुद डी-सीलिंग के लिए विधिवत आवेदन दिया था। यह सील इसलिए खोली जा रही है ताकि भवन मालिक स्वयं अपने स्तर से अवैध निर्माण को हटाने (Demolition) की कार्रवाई कर सकें।
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परिषद की ओर से जारी दिशा-निर्देशों में साफ तौर पर 15 दिन का सख्त अल्टीमेटम दिया गया है:
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    सेटबैक खाली करना अनिवार्य: भवन स्वामियों को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुरूप भवनों का निर्धारित 'सेटबैक' (Setback - भवन के आगे और किनारों पर छोड़ी जाने वाली अनिवार्य खाली जगह) हर हाल में खाली करना होगा।
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    स्वयं करें ध्वस्त: इस 15 दिन की मोहलत में मालिकों को अपनी दुकानों, छज्जों या व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स के अवैध हिस्सों को खुद तोड़ना होगा।
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    खर्च की वसूली (Cost Recovery): यदि तय समय सीमा (15 दिन) के भीतर भवन स्वामी कार्रवाई नहीं करते हैं, तो 16वें दिन से आवास एवं विकास परिषद अपना बुलडोजर लेकर मैदान में उतरेगा। सबसे अहम बात यह है कि सरकारी स्तर से होने वाले इस ध्वस्तीकरण अभियान (Demolition Drive) में आने वाला पूरा खर्च (मशीनों, मजदूरों और पुलिस बल का खर्चा) संबंधित संपत्ति के मालिकों से ही वसूला जाएगा।
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flashback: आखिर क्यों सील की गई थीं ये 44 संपत्तियां?

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मेरठ का शास्त्रीनगर इलाका मूल रूप से एक आवासीय योजना (Residential Scheme) के तहत विकसित किया गया था। आवास विकास परिषद की शास्त्रीनगर आवासीय योजना संख्या-7 के तहत लोगों को रहने के लिए प्लॉट और मकान दिए गए थे। लेकिन समय के साथ लालच और मिलीभगत के चलते इन आवासीय भूखंडों का स्वरूप पूरी तरह से व्यावसायिक (Fully Commercial) कर दिया गया।
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आवासीय इलाके में पनपा कमर्शियल जंगल: सर्वे के दौरान यह चौंकाने वाला सच सामने आया कि जिन जमीनों पर लोगों के घर होने चाहिए थे, वहां धड़ल्ले से बड़े-बड़े व्यावसायिक प्रतिष्ठान चल रहे थे। इन 44 संपत्तियों पर जो अवैध गतिविधियां हो रही थीं, उनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:
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    विवाह मंडप (Banquet Halls): आवासीय बीच में बड़े-बड़े बैंक्वेट हॉल बना दिए गए, जिससे ट्रैफिक जाम और ध्वनि प्रदूषण की भयंकर समस्या पैदा हो गई।
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    निजी स्कूल और अस्पताल: नियमों को ताक पर रखकर प्राइवेट स्कूल, नर्सिंग होम और बड़े अस्पताल खोल दिए गए।
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    डायग्नोस्टिक सेंटर और बैंक: रिहायशी इलाकों की शांति भंग करते हुए पैथोलॉजी लैब, डायग्नोस्टिक सेंटर और बैंकों की शाखाएं संचालित होने लगीं।
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    अवैध दुकानें: हद तो तब हो गई जब कई भूखंड मालिकों ने अपने एक ही प्लॉट में 10 से 20 तक छोटी-बड़ी दुकानें बनाकर उन्हें एक पूरे 'व्यावसायिक कॉम्प्लेक्स' (Commercial Complex) का रूप दे दिया।
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इन्हीं गंभीर उल्लंघनों को संज्ञान में लेते हुए मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था, जिसके बाद कोर्ट ने बिना किसी रियायत के इन संपत्तियों को सील करने और निर्धारित सेटबैक खाली कराने का ऐतिहासिक आदेश सुनाया।
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कार्रवाई से पहले हुआ था माइक्रो-लेवल सर्वे (Micro-level Survey)

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आवास विकास परिषद इस बार किसी भी तरह की कानूनी या तकनीकी चूक नहीं करना चाहता था। सीलिंग और डी-सीलिंग की इस बड़ी कार्रवाई को अंजाम देने से पहले, परिषद की टीम द्वारा पूरे शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट और विवादित संपत्तियों का एक बेहद सघन और माइक्रो-लेवल सर्वे कराया गया था।
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सर्वे में इन बातों को किया गया था नोट:

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    एक-एक भूखंड (Plot) के कुल कितने असल मालिक हैं?
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    एक भूखंड के अंदर कितनी अवैध दुकानें या केबिन बनाए गए हैं?
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    संपत्तियों पर कितना क्षेत्रफल (Area) अवैध रूप से कवर किया गया है?
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    किन भवनों में सेटबैक (Setback) के नियमों की 100% अनदेखी की गई है?
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इस सटीक डेटाबेस के आधार पर ही अब ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की रूपरेखा तैयार की गई है। अधिकारियों के पास हर एक इंच का रिकॉर्ड मौजूद है, इसलिए अब किसी भी तरह की सिफारिश या बहानेबाजी काम नहीं आने वाली है।
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क्या होता है 'सेटबैक' (Setback) और यह क्यों है जरूरी?

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अर्बन प्लानिंग (Urban Planning) और बिल्डिंग बायलॉज के अनुसार, जब भी कोई भवन (चाहे वह आवासीय हो या व्यावसायिक) बनाया जाता है, तो प्लॉट की बाउंड्री वॉल और मुख्य भवन के बीच कुछ खाली जगह छोड़ना अनिवार्य होता है। इसी खाली जगह को 'सेटबैक' कहा जाता है।
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सेटबैक छोड़ने के मुख्य कारण:

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    फायर सेफ्टी (Fire Safety): आपात स्थिति में फायर ब्रिगेड की गाड़ियों और कर्मियों को बिल्डिंग के चारों ओर घूमने के लिए जगह मिल सके।
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    पार्किंग (Parking): ताकि सड़क पर गाड़ियां खड़ी न हों और ट्रैफिक जाम न लगे। (शास्त्रीनगर सेंट्रल मार्केट में इसी सेटबैक को कवर करके दुकानें बना ली गई थीं, जिससे पार्किंग सड़क पर होने लगी और भयंकर जाम लगने लगा)।
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    हवा और रोशनी (Ventilation): भवन में उचित वेंटिलेशन और प्राकृतिक रोशनी सुनिश्चित करने के लिए।
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सुप्रीम कोर्ट का मुख्य जोर इसी बात पर है कि जिन लोगों ने लालच में आकर इस अनिवार्य खाली जगह (सेटबैक) पर पक्की दुकानें या ढांचे खड़े कर लिए हैं, उन्हें हर हाल में जमींदोज किया जाए।
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आगे क्या होगा? (Impact and Future Action)

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अब इस 15 दिन की मोहलत के बाद मेरठ के शास्त्रीनगर में ध्वस्तीकरण (Demolition) की कार्रवाई में एक बार फिर तेजी देखने को मिलेगी। जो भवन स्वामी यह सोच रहे हैं कि 15 दिन बीत जाने के बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा, वे बड़ी भूल कर रहे हैं।
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आवास विकास परिषद का स्पष्ट कहना है कि न्यायालय के आदेशों का हर हाल में, और तय समय सीमा के भीतर पालन कराया जाएगा। इस कार्रवाई ने पूरे मेरठ शहर और उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में अवैध निर्माणकर्ताओं को एक कड़ा संदेश दिया है कि आवासीय जमीनों का व्यावसायिक दोहन अब बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फिलहाल, शास्त्रीनगर के दुकानदारों और संपत्ति मालिकों में दहशत का माहौल है और कई जगहों पर हथौड़े-छेनी चलने की आवाजें आनी शुरू हो गई हैं।
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सुप्रीम कोर्ट के डंडे ने प्रशासन को जगा दिया है। अब देखना यह होगा कि 15 दिन बाद कितने लोग स्वेच्छा से अपना अवैध निर्माण हटाते हैं और कितनों पर आवास विकास का पीला पंजा (बुलडोजर) चलता है। शहर के नियोजित विकास के लिए यह एक बेहद जरूरी और स्वागत योग्य कदम माना जा रहा है।