लखनऊ (Lucknow News): उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित प्रतिष्ठित लखनऊ विश्वविद्यालय (Lucknow University) शुक्रवार को एक बार फिर छात्र राजनीति और पुलिसिया कार्रवाई का केंद्र बन गया। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों के समर्थन और उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव (Caste Discrimination) को पूरी तरह खत्म करने की मांग को लेकर छात्रों द्वारा आयोजित 'समता संवर्धन मार्च' को पुलिस ने बलपूर्वक रोक दिया।READ ALSO:-यूपी में 'जाम' छलकाना होगा महंगा: 1 अप्रैल से बदल जाएंगे शराब के रेट और नियम; योगी सरकार की नई आबकारी नीति का पूरा 'पोस्टमार्टम'
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इस दौरान विश्वविद्यालय का गेट नंबर 3 छावनी में तब्दील नजर आया। छात्रों और पुलिस के बीच तीखी नोकझोंक हुई, जिसके बाद पुलिस ने कई छात्र नेताओं को जबरन हिरासत में ले लिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, पुलिस ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे छात्रों को घसीटकर गाड़ियों में बैठाया, जिसका वीडियो अब सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। यह घटना न केवल विश्वविद्यालय प्रशासन बल्कि राज्य की कानून व्यवस्था और छात्रों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर भी गंभीर सवाल खड़े करती है।
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क्या था पूरा मामला? (The Incident Detail)
\r\n\r\nशुक्रवार दोपहर, लखनऊ विश्वविद्यालय के विभिन्न छात्र संगठनों—आइसा (AISA), एनएसयूआई (NSUI), एससीएस (SCS), एसएफआई (SFI) और अंबेडकरवादी विद्यार्थी संघ—ने संयुक्त रूप से एक मार्च का आह्वान किया था। इस मार्च को 'समता संवर्धन मार्च' (Equality Promotion March) नाम दिया गया था।
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योजना के अनुसार, यह मार्च विश्वविद्यालय के गेट नंबर 3 से शुरू होकर गेट नंबर 1 तक जाने वाला था। छात्र हाथों में तख्तियां और बैनर लिए हुए थे, जिन पर "जातिवाद मुक्त परिसर चाहिए" और "स्वतंत्र शिकायत निवारण तंत्र लागू करो" जैसे नारे लिखे थे।
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जैसे ही छात्र गेट नंबर 3 पर इकट्ठा हुए और आगे बढ़ने की कोशिश की, वहां पहले से तैनात भारी पुलिस बल ने उन्हें रोक लिया। पुलिस ने बैरिकेडिंग कर रास्ता ब्लॉक कर दिया था। छात्रों ने जब आगे बढ़ने की जिद की, तो पुलिस ने सख्ती बरती।
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सड़क पर बैठे छात्र, पुलिस ने की जबरदस्ती
\r\n\r\nपुलिस द्वारा रोके जाने पर आक्रोशित छात्र वहीं सड़क पर धरने पर बैठ गए और नारेबाजी शुरू कर दी। स्थिति तनावपूर्ण होते देख पुलिस ने एक्शन लेना शुरू किया। वायरल वीडियो और मौके पर मौजूद छात्रों के बयानों के अनुसार, पुलिसकर्मियों ने छात्रों को जबरन उठाना शुरू किया।
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इस दौरान कई छात्रों के साथ कथित तौर पर धक्का-मुक्की भी हुई। छात्र नेताओं को पुलिस वैन में भरकर पुलिस लाइन ले जाया गया। छात्रों का आरोप है कि उन्होंने प्रशासन को इस मार्च की पूर्व सूचना लिखित में दी थी, इसके बावजूद उन्हें लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने से रोका गया।
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छात्रों की मुख्य मांगें: क्यों हो रहा है प्रदर्शन?
\r\n\r\nयह प्रदर्शन केवल एक मार्च नहीं था, बल्कि इसके पीछे छात्रों की लंबी और गहरी मांगें थीं। छात्र संगठन यूजीसी (UGC) के उन नए प्रस्तावित नियमों का समर्थन कर रहे थे जो परिसरों में भेदभाव रोकने के लिए लाए जा रहे हैं, लेकिन छात्र इसमें और अधिक सख्ती और पारदर्शिता चाहते हैं।
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प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
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- \r\n जाति आधारित भेदभाव को कानूनी अपराध माना जाए: छात्र मांग कर रहे हैं कि उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव को केवल एक 'गलती' नहीं, बल्कि एक 'कानूनी और दंडनीय संस्थागत उल्लंघन' माना जाए।\r\n \r\n
- \r\n स्वतंत्र आयोग का गठन: राज्य स्तर पर एक स्वतंत्र "उच्च शिक्षा सामाजिक न्याय आयोग" (Higher Education Social Justice Commission) का गठन हो। यह आयोग विश्वविद्यालय प्रशासन से पूरी तरह मुक्त हो और इसे जांच करने व कार्रवाई करने की बाध्यकारी शक्ति (Binding Powers) प्राप्त हो।\r\n \r\n
- \r\n स्वायत्त शिकायत निवारण तंत्र: वर्तमान में मौजूद शिकायत कमेटियों (Grievance Cells) में अक्सर उसी कॉलेज के प्रोफेसर होते हैं, जिससे निष्पक्ष जांच नहीं हो पाती। छात्र चाहते हैं कि अपील की व्यवस्था प्रशासन से बाहर हो।\r\n \r\n
- \r\n प्रतिनिधित्व की सुनिश्चितता: सभी शिकायत निवारण कमेटियों में एससी (SC), एसटी (ST), ओबीसी (OBC), अल्पसंख्यक, महिलाओं और विकलांग व्यक्तियों की निर्णायक भागीदारी हो।\r\n \r\n
- \r\n रोहित वेमुला एक्ट जैसी सुरक्षा: शिकायतकर्ताओं को प्रताड़ना से बचाने के लिए कानूनी सुरक्षा (Legal Protection) मिले। अक्सर शिकायत करने वाले छात्र को इंटरनल मार्क्स या थीसिस में परेशान किया जाता है।\r\n \r\n
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आंकड़े जो डराते हैं: भेदभाव में 118% की वृद्धि
\r\n\r\nप्रदर्शनकारी छात्रों ने यूजीसी (UGC) के आंकड़ों का हवाला देते हुए एक चौंकाने वाला तथ्य सामने रखा। छात्र नेताओं ने बताया कि पिछले पांच वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न की शिकायतों में लगभग 118 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।
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यह आंकड़ा यह साबित करने के लिए काफी है कि मौजूदा सिस्टम फेल हो चुका है। कॉलेजों में बनी 'एससी/एसटी सेल' या तो निष्क्रिय हैं या उनके पास कोई पावर नहीं है। छात्रों का तर्क है कि जब तक बाहरी और निष्पक्ष एजेंसी जांच नहीं करेगी, तब तक दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों को न्याय नहीं मिलेगा।
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छात्र नेताओं के बयान: आक्रोश और संकल्प
\r\n\r\nपुलिसिया कार्रवाई के बाद छात्र नेताओं ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। अलग-अलग संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस कार्रवाई को "अलोकतांत्रिक" और "दमनकारी" बताया।
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- \r\n हर्षवर्धन (संयुक्त सचिव, आइसा यूपी): "जब भेदभाव की शिकायतों में इतनी तेज़ वृद्धि हो रही है, तो छात्रों को मार्च निकालने से रोकना यह साबित करता है कि सरकार और प्रशासन डरे हुए हैं। हमें एक ऐसे तंत्र की जरूरत है जो सिर्फ कागज पर न हो, बल्कि जमीन पर लागू हो।"\r\n \r\n
- \r\n शुभम खरवार (महासचिव, एनएसयूआई यूपी): "संवैधानिक मांग उठाना कब से गुनाह हो गया? हम शांतिपूर्ण मार्च कर रहे थे। संस्थागत जवाबदेही (Institutional Accountability) की मांग को पुलिस के बल पर नहीं दबाया जा सकता।"\r\n \r\n
- \r\n महेंद्र यादव (राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, एससीएस): "जाति आधारित भेदभाव एक संरचनात्मक (Structural) समस्या है। इसे केवल 'रैगिंग' कहकर नहीं टाला जा सकता। इसके लिए सख्त कानून और बाहरी निगरानी चाहिए।"\r\n \r\n
- \r\n अब्दुल वहाब (सचिव, एसएफआई यूपी): "शांतिपूर्ण विरोध हमारा संवैधानिक अधिकार है। आज हमें घसीटा गया, लेकिन इससे हमारा आंदोलन कमजोर नहीं होगा, बल्कि और तेज होगा।"\r\n \r\n
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दलित और वंचित छात्रों की गरिमा का सवाल
\r\n\r\nअंबेडकरवादी विद्यार्थी संघ के नेताओं, विपिन कुमार और रोहित कुमार ने इसे "गरिमा की लड़ाई" बताया। उन्होंने कहा कि प्रशासनिक रुकावटों से दलित और वंचित समाज के छात्रों के सवाल खत्म नहीं हो जाएंगे।
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युवा (YUVA) संगठन के अध्यक्ष अमेन्द्र कुमार ने कहा, "अगर मौजूदा समानता तंत्र (Equality Mechanism) प्रभावी होते, तो आज छात्रों को सड़कों पर नहीं उतरना पड़ता। बल प्रयोग किसी समस्या का समाधान नहीं है।"
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वहीं, लखनऊ विश्वविद्यालय के छात्र समीर कुमार, जो प्रदर्शन में शामिल थे, ने कहा, "हमारा मार्च शांतिपूर्ण था। पुलिस ने जिस तरह नेताओं को घसीटा, वह यह दिखाता है कि हम जिन 'स्वतंत्र तंत्रों' की मांग कर रहे हैं, वे क्यों जरूरी हैं। जब पुलिस प्रशासन का साथ देती है, तो छात्र कहां जाएं?"
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भेदभाव का संस्थागत स्वरूप: फेलोशिप और मार्क्स
\r\n\r\nछात्रों की मांगों में एक महत्वपूर्ण मुद्दा "फेलोशिप में देरी" और "पक्षपातपूर्ण मूल्यांकन" (Biased Evaluation) का भी था। अक्सर देखा गया है कि पीएचडी और शोध कर रहे आरक्षित वर्ग के छात्रों की फेलोशिप जानबूझकर रोकी जाती है या वाइवा (Viva) में उन्हें कम नंबर देकर फेल किया जाता है।
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छात्रों ने मांग की है कि:
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- \r\n फेलोशिप में देरी के लिए अधिकारियों की जवाबदेही तय हो।\r\n \r\n
- \r\n हर साल भेदभाव से संबंधित आंकड़ों की सार्वजनिक रिपोर्ट (Public Report) जारी की जाए।\r\n \r\n
- \r\n समय-समय पर स्वतंत्र एजेंसियों द्वारा सामाजिक समानता ऑडिट (Social Equality Audit) कराया जाए।\r\n \r\n
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पुलिस और प्रशासन का पक्ष
\r\n\r\nहालांकि पुलिस ने आधिकारिक तौर पर कोई विस्तृत बयान जारी नहीं किया है, लेकिन मौके पर मौजूद पुलिस अधिकारियों का कहना था कि विश्वविद्यालय के गेट पर प्रदर्शन से यातायात बाधित हो रहा था और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए छात्रों को हटाया गया। प्रशासन का तर्क है कि परिसर में बिना अनुमति के बड़े जुलूस निकालने से शैक्षणिक माहौल खराब होता है।
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लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या "शैक्षणिक माहौल" बचाने के नाम पर छात्रों के "सुरक्षित माहौल" की मांग को अनसुना किया जा सकता है?
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सामाजिक न्याय की लड़ाई और भविष्य
\r\n\r\nलखनऊ विश्वविद्यालय का यह प्रदर्शन देश भर के विश्वविद्यालयों में चल रही एक बड़ी बहस का हिस्सा है। रोहित वेमुला से लेकर दर्शन सोलंकी तक, कई छात्रों ने भेदभाव के कारण अपनी जान गंवाई है। यूजीसी समय-समय पर गाइडलाइंस जारी करता है, लेकिन उनका पालन कितना होता है, यह एक बड़ा सवाल है।
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छात्रों का यह 'समता संवर्धन मार्च' इसी खाई को पाटने की कोशिश थी। वे चाहते हैं कि नियम केवल फाइलों में बंद न रहें, बल्कि वे एक रक्षक की भूमिका निभाएं।
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लखनऊ विश्वविद्यालय में शुक्रवार को जो हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। एक तरफ सरकार 'सबका साथ, सबका विकास' की बात करती है, वहीं दूसरी तरफ जब छात्र 'सबकी समानता' के लिए मार्च निकालते हैं, तो उन्हें पुलिसिया दमन का शिकार होना पड़ता है।
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118% शिकायतों की वृद्धि यह बताने के लिए काफी है कि बीमारी गंभीर है और इसके इलाज के लिए केवल 'बैंड-एड' नहीं, बल्कि 'सर्जरी' की जरूरत है। छात्रों की मांग—एक स्वतंत्र और शक्तिशाली आयोग—शायद इसी दिशा में एक सही कदम हो सकता है। अब देखना यह होगा कि विश्वविद्यालय प्रशासन और सरकार इन मांगों पर क्या रुख अपनाती है। क्या छात्रों की आवाज सुनी जाएगी, या उसे फिर बैरिकेड्स के पीछे कैद कर दिया जाएगा?
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लखनऊ विश्वविद्यालय में शुक्रवार को छात्रों द्वारा निकाले जा रहे 'समता संवर्धन मार्च' को पुलिस ने गेट नंबर 3 पर रोक दिया और कई छात्र नेताओं को हिरासत में ले लिया। ये छात्र यूजीसी के नए नियमों के तहत जातिगत भेदभाव के खिलाफ एक स्वतंत्र और प्रभावी 'सामाजिक न्याय आयोग' के गठन की मांग कर रहे थे। छात्रों ने आरोप लगाया कि परिसरों में भेदभाव की शिकायतें 118% बढ़ी हैं, लेकिन मौजूदा तंत्र फेल है। पुलिस कार्रवाई के खिलाफ छात्र संगठनों (AISA, NSUI, SFI, आदि) ने भारी विरोध दर्ज कराया है।