नई दिल्ली (पॉलिटिकल एंड सोशल एनालिसिस डेस्क): भारतीय राजनीति के पन्नों में यह आंदोलन हमेशा के लिए दर्ज हो गया है। एक ऐसा आंदोलन जिसका नेतृत्व न तो किसी मंझे हुए राजनेता ने किया और न ही किसी पारंपरिक राजनीतिक दल ने। यह आंदोलन था उन युवाओं का, जिन्हें सिस्टम 'आलसी' और 'बेरोजगार' समझता था।READ ALSO:-छात्र शक्ति की ऐतिहासिक विजय! प्रह्लाद जोशी को सौंपा गया शिक्षा मंत्रालय, सरकार के सरेंडर के बाद CJP ने खत्म किया 36 दिन का 'महा-संग्राम'
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NEET-UG परीक्षा में हुई धांधली को लेकर जंतर-मंतर पर छात्रों के उग्र विरोध प्रदर्शन के बाद आखिरकार केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा। इस इस्तीफे ने सत्ता के गलियारों में भूचाल ला दिया है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) के संस्थापक अभिजीत दीपके ने इस जीत पर हुंकार भरते हुए कहा, "हमने कर दिखाया! यह इस्तीफा इस बात का जीता-जागता सबूत है कि अगर आप लोग डरते नहीं हैं और सरकार के आगे नहीं झुकते हैं, तो हम किसी का भी इस्तीफा ले सकते हैं— झुकती है दुनिया, झुकाने वाला चाहिए।"
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आइए, 'खबरीलाल' की इस विस्तृत विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में समझते हैं कि कैसे एक इंटरनेट मीम (Meme) ने जन-आंदोलन का रूप लिया और कैसे इस युवा शक्ति ने विपक्ष को एक बड़ी राजनीतिक सीख दी है।
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एक 'मीम' से 'महासंग्राम' तक: क्या है CJP की कहानी?
\r\n\r\nसुनने में भले ही अजीब लगे, लेकिन 'कॉकरोच जनता पार्टी' (CJP) का जन्म इसी साल 15 मई को एक इंटरनेट सटायर (व्यंग्य) के रूप में हुआ था। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की एक टिप्पणी के बाद अभिजीत दीपके ने तंज कसते हुए एक वेबसाइट लॉन्च की।
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इस पार्टी की टैगलाइन थी— "आलसी और बेरोज़गारों की आवाज।" दीपके ने इसे उन सभी युवाओं का प्लेटफॉर्म बताया, जिनका एलिजिबिलिटी क्राइटेरिया (Eligibility Criteria) बेरोजगार, आलसी, हमेशा ऑनलाइन रहने वाला और 'प्रोफेशनली बकवास' करने में सक्षम होना था। लेकिन जून की शुरुआत में जब NEET-UG पेपर लीक का मामला तूल पकड़ने लगा, तो यह सटायरिकल (व्यंग्यात्मक) पोस्ट एक गंभीर आंदोलन में बदल गई। अभिजीत दीपके विदेश से भारत लौट आए और सीधे जंतर-मंतर पर मोर्चे की कमान संभाल ली। शुरुआत में उनकी वापसी को शक की नजर से देखा गया कि क्या 'ऑनलाइन' रहने वाले युवा 'ऑफलाइन' (सड़कों पर) टिक पाएंगे? लेकिन Gen-Z ने अपनी ताकत से सभी आलोचकों का मुंह बंद कर दिया।
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विपक्ष के लिए बड़ा सबक: जो काम 12 साल में नहीं हुआ, वो 2 महीने में हो गया
\r\n\r\nधर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा कोई सामान्य राजनीतिक घटना नहीं है। यह भारत की वर्तमान राजनीति (NDA युग) में एक 'वाटरशेड मोमेंट' (Watershed Moment) है। CJP ने मात्र दो महीनों में वो कर दिखाया, जो विपक्ष की तमाम बड़ी पार्टियां पिछले 12 वर्षों (2014 से अब तक) में नहीं कर पाईं।
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इस इस्तीफे की अहमियत को समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना होगा:
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- \r\n UPA का दौर (2004-2014): कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौरान कई बड़े मंत्रियों (जैसे ए. राजा, पवन कुमार बंसल, अश्विनी कुमार) को भ्रष्टाचार या प्रशासनिक नाकामियों के चलते इस्तीफा देना पड़ा था।\r\n \r\n
- \r\n NDA का सख्त रवैया: 2014 में सत्ता बदलने के बाद स्थिति बिल्कुल उलट गई। जब कांग्रेस ललित मोदी विवाद को लेकर बीजेपी के कुछ बड़े नेताओं के इस्तीफे की मांग कर रही थी, तब राजनाथ सिंह ने संसद में स्पष्ट कहा था: "यहां मंत्री इस्तीफा नहीं देते। यह UPA नहीं है; यह NDA है।"\r\n \r\n
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पिछले 12 सालों में देश ने कई बड़े आंदोलन (जैसे किसान आंदोलन, सीएए-एनआरसी विरोध) देखे, लेकिन कोई भी आंदोलन किसी केंद्रीय मंत्री का इस्तीफा नहीं ले सका। 2014 के बाद से जिन भी मंत्रियों की छुट्टी हुई (जैसे 2021 में स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन, रविशंकर प्रसाद या प्रकाश जावड़ेकर), वह किसी जन-दबाव या विरोध का सीधा नतीजा नहीं था, बल्कि वह कैबिनेट फेरबदल (Cabinet Reshuffle) का हिस्सा था। लेकिन, धर्मेंद्र प्रधान का जाना पूरी तरह से 'विरोध के दबाव' (Protest Pressure) का सीधा नतीजा है। यह विपक्ष के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि यदि मुद्दों में सच्चाई हो और सड़क पर संघर्ष करने का जज्बा हो, तो सरकार को भी अपने फैसले बदलने पड़ते हैं।
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सोनम वांगचुक का अनशन: आंदोलन में फूंकी नई जान
\r\n\r\nदीपके को युवाओं को इकट्ठा करने का पूरा क्रेडिट जाता है, लेकिन इस सफलता की कहानी सोनम वांगचुक (Sonam Wangchuk) के बिना अधूरी है। लद्दाख के इस जाने-माने क्लाइमेट एक्टिविस्ट ने जब जंतर-मंतर पहुंचकर हाथ में गुलाब का फूल (Rose Diplomacy) लेकर छात्रों का समर्थन किया, तो आंदोलन की दिशा ही बदल गई।
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वांगचुक की 26 दिन लंबी भूख हड़ताल ने यह सुनिश्चित किया कि सरकार और मीडिया का पूरा फोकस इस मुद्दे पर बना रहे। जिस वक्त सरकार प्रदर्शनकारियों से बात करने में हिचकिचा रही थी, उस वक्त वांगचुक के अनशन ने सरकार पर भारी नैतिक और राष्ट्रीय दबाव बनाया।
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हालांकि, गुरुवार रात को जब वांगचुक का अनशन अस्पताल में समाप्त हुआ, तब वहां दो केंद्रीय मंत्री मौजूद थे, लेकिन CJP का कोई प्रतिनिधि नहीं था। इससे सरकार के साथ 'बैकडोर डील' (Backdoor Deal) की कुछ अफवाहें जरूर उड़ीं, लेकिन अंततः शिक्षा मंत्री के इस्तीफे ने उन सभी शंकाओं को दरकिनार कर दिया और यह साबित कर दिया कि आंदोलन अपने मूल लक्ष्य में सफल रहा है।
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जंतर-मंतर से उठी यह Gen-Z की आंधी देश की राजनीति का नैरेटिव बदल रही है। 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने देश को यह सिखाया है कि लोकतंत्र में सत्ता चाहे कितनी भी मजबूत क्यों न दिखे, असली ताकत जनता और युवाओं के पास ही होती है। धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे ने न केवल लाखों छात्रों को न्याय की एक नई किरण दिखाई है, बल्कि एक दिशाहीन विपक्ष को भी यह बता दिया है कि वातानुकूलित (AC) कमरों से ट्वीट (Tweet) करने के बजाय सड़कों पर उतरकर लाठियां खाने से ही परिणाम मिलते हैं।
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