खबरीलाल डेस्क
भारत में बुजुर्गों के अधिकारों और उनके सम्मान की रक्षा के लिए सर्वोच्च अदालत से एक ऐतिहासिक निर्णय आया है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक बार फिर यह साबित करता है कि कानून समाज के सबसे कमजोर और बुजुर्ग वर्ग की सुरक्षा के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को एक बेहद अहम आदेश में स्पष्ट किया है कि सीनियर सिटीजन्स (वरिष्ठ नागरिक) अपनी सुरक्षा और शांति के लिए अपनी संपत्ति से अपने बच्चों या रिश्तेदारों को बेदखल कर सकते हैं, यदि वे उनके साथ दुर्व्यवहार करते हैं या उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी नहीं उठाते हैं। कोर्ट ने साफ तौर पर कहा कि बढ़ती उम्र का मतलब किसी भी व्यक्ति के लिए असुरक्षा, उपेक्षा या अपमान कतई नहीं होना चाहिए। हर एक व्यक्ति को अपने जीवन के अंतिम पड़ाव तक गरिमा और सम्मान के साथ जीने का पूरा मौलिक अधिकार है।Read also:-Toll Pass New Rule: 121 टोल प्लाजा पर डिजिटल पास शुरू, अब झंझट खत्म! जानें घर बैठे अप्लाई करने का सबसे आसान तरीका
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इस महत्वपूर्ण मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने कई अहम टिप्पणियां कीं। कोर्ट ने कहा कि किसी भी सभ्य समाज का स्तर अक्सर इसी बात से तय होता है कि वह अपने बुजुर्गों को कितनी गरिमा, सम्मान और सुरक्षा प्रदान करता है। देश में आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला न सिर्फ कानूनी बल्कि सामाजिक दृष्टिकोण से भी नई पीढ़ी के लिए एक कड़ा संदेश है।
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इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को किया रद्द

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इस विवाद की जड़ें उत्तर प्रदेश के लखनऊ से जुड़ी हुई हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह से पलट दिया है, जिसमें हाईकोर्ट ने एक बेटे और बहू को मकान से बेदखल करने के 'मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल' (रखरखाव अधिकरण) के आदेश को गैर-कानूनी बताते हुए रद्द कर दिया था।
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यह मामला रवि कांत गुप्ता नामक एक व्यक्ति से जुड़ा था, जिनकी 81 वर्षीय बुजुर्ग मां को उनके ही घर से निकाल दिया गया था और उन्हें एक ओल्ड एज होम (वृद्धाश्रम) में रहने के लिए मजबूर किया गया था। इस अमानवीय प्रताड़ना के खिलाफ पीड़ित पक्ष ने जिलाधिकारी (DM) और सब-डिविजनल मजिस्ट्रेट (SDM) के पास गुहार लगाई थी। एसडीएम और डीएम ने साल 2022 और 2023 में 'मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007' (वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण अधिनियम) के तहत सुनवाई करते हुए आरोपी बेटे और बहू को घर से बाहर निकालने (बेदखली) का आदेश दिया था।
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लेकिन बेटे ने इस फैसले को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने यह कहते हुए बेदखली के आदेश को रद्द कर दिया कि ट्रिब्यूनल के पास बच्चों को संपत्ति से निकालने का कानूनी अधिकार नहीं है। अब इसी मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया है, जिसने हाईकोर्ट के नजरिए को गलत ठहराते हुए बुजुर्गों के पक्ष में ट्रिब्यूनल की शक्तियों को पूरी तरह से बहाल कर दिया है।
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ट्रिब्यूनल के पास है बेदखली का आदेश देने की पूर्ण शक्ति

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सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि हाईकोर्ट ने ट्रिब्यूनल के आदेश में दखल देकर बड़ी गलती की है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि बुजुर्गों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए यदि जरूरी हो, तो ट्रिब्यूनल बिना किसी हिचकिचाहट के बेदखली (Eviction) का आदेश दे सकता है।
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अदालत ने 'मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007' के विभिन्न कानूनी प्रावधानों की बहुत ही सूक्ष्मता से व्याख्या की। कोर्ट ने बताया कि:
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    धारा 7 (Section 7): इस अधिनियम के तहत बुजुर्गों की शिकायतों के त्वरित निवारण और उनके अधिकारों की रक्षा के लिए विशेष ट्रिब्यूनल बनाए गए हैं।
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    धारा 8 (Section 8): यह महत्वपूर्ण धारा इन ट्रिब्यूनल को संक्षिप्त प्रक्रिया (Summary Procedure) के माध्यम से जांच करने का अधिकार देती है और उन्हें एक 'सिविल कोर्ट' (दीवानी अदालत) जैसी व्यापक शक्तियां प्रदान करती है।
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    धारा 27 (Section 27): यह धारा स्पष्ट रूप से ऐसे मामलों में सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र पर रोक लगाती है, जिसका अर्थ है कि वरिष्ठ नागरिकों के मामले में ट्रिब्यूनल का फैसला ही प्रमुख होगा।
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इन सभी कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, पीठ ने कहा कि ट्रिब्यूनल को कानून के मूल उद्देश्य को लागू करने के लिए सभी जरूरी कदम उठाने की अंतर्निहित शक्ति प्राप्त है। इसलिए अपनी सुरक्षा के लिए बच्चों को संपत्ति से बेदखल करने का आदेश भी उसी कानूनी शक्ति का एक अटूट हिस्सा है।
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संविधान के मौलिक अनुच्छेदों का दिया गया हवाला

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इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल एक अधिनियम तक सीमित नहीं रहा, बल्कि अदालत ने संविधान द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों का भी गहराई से जिक्र किया। पीठ ने भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) और अनुच्छेद 41 (काम, शिक्षा और कुछ मामलों में सार्वजनिक सहायता का अधिकार) का हवाला दिया।
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अदालत ने कहा कि ये संवैधानिक प्रावधान एक ऐसे सामाजिक ताने-बाने की कल्पना करते हैं जो कमजोर वर्गों की रक्षा करे और हर व्यक्ति को जीवनभर गरिमा के साथ जीने में सक्षम बनाए। संसद ने 2007 में यह कानून इसीलिए बनाया था ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि बुढ़ापा असुरक्षा, बेबसी या अपमान का पर्याय न बन जाए।
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पुराने ऐतिहासिक फैसलों की दिलाई गई याद

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अपने इस सख्त और स्पष्ट आदेश को आधार देते हुए, सुप्रीम कोर्ट ने कई पुराने महत्वपूर्ण मुकदमों और फैसलों का भी विस्तार से जिक्र किया।
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कोर्ट ने 'एस. वनिता बनाम डिप्टी कमिश्नर (2021)' मामले का हवाला दिया, जिसमें तीन जजों की बेंच ने यह ऐतिहासिक व्यवस्था दी थी कि माता-पिता या वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण और सुरक्षा के लिए जरूरत पड़ने पर ट्रिब्यूनल बेदखली का आदेश दे सकता है। यानी, अपनी ही संपत्ति से दुर्व्यवहार करने वाले बच्चों को हटाना बुजुर्गों के अधिकारों और उनके शांतिपूर्ण जीवन की रक्षा का एक अत्यंत आवश्यक और कानूनी तरीका हो सकता है।
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सुप्रीम कोर्ट ने आगे बताया कि यही समान कानूनी स्थिति और न्यायिक दृष्टिकोण बाद में साल 2025 के दो बड़े मामलों—'समटोला देवी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2025)' और 'कमलकांत मिश्रा बनाम एडिशनल कलेक्टर (2025)' में भी सख्ती से दोहराया गया था। इन सभी पुराने मामलों में सुप्रीम कोर्ट का फैसला हमेशा वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा और उनके सम्मानजनक जीवन के पक्ष में ही रहा है।
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क्यों जरूरी है ऐसा कानून और सुप्रीम कोर्ट का फैसला?

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आज के तेजी से बदलते सामाजिक परिवेश और एकल परिवारों (Nuclear Families) के बढ़ते चलन के बीच, बुजुर्गों की अनदेखी के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। कई बार ऐसा देखने में आता है कि बच्चे धोखे से संपत्ति को अपने नाम करवा लेते हैं या फिर माता-पिता की ही संपत्ति पर कब्जा करके उन्हें घर के एक छोटे से कोने में पड़े रहने को मजबूर कर देते हैं। उन्हें बुनियादी सुख-सुविधाओं से वंचित रखा जाता है और कई मामलों में तो शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना भी दी जाती है।
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ऐसी अत्यंत संवेदनशील और गंभीर स्थितियों में 'मेंटेनेंस एंड वेलफेयर ऑफ पैरेंट्स एंड सीनियर सिटीजन्स एक्ट, 2007' बुजुर्गों के लिए एक बड़ी संजीवनी का काम करता है। इस अधिनियम का सबसे बड़ा लाभ यह है कि बुजुर्गों को न्याय पाने के लिए सामान्य अदालतों के लंबे, महंगे और जटिल चक्कर नहीं काटने पड़ते। वे सीधे अपने जिले के एसडीएम (SDM) या डीएम (DM) की अध्यक्षता वाले ट्रिब्यूनल में शिकायत दर्ज करा सकते हैं, जहां बिना किसी देरी के त्वरित कार्रवाई की जाती है।
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अंत में, यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश के उन लाखों बुजुर्गों के लिए एक बहुत बड़ी कानूनी और नैतिक जीत है, जो अपने जीवन की ढलती शाम में अपने ही बच्चों द्वारा उपेक्षा और प्रताड़ना का शिकार होते हैं। यह ऐतिहासिक फैसला स्पष्ट करता है कि बुजुर्ग माता-पिता अब समाज में असहाय नहीं हैं। यदि उनके साथ किसी भी प्रकार का गलत व्यवहार होता है, तो देश का कानून पूरी सख्ती के साथ उनके समर्थन में खड़ा है। ट्रिब्यूनल के पास बेदखली का अधिकार होना इस बात की पक्की गारंटी है कि कोई भी बुजुर्ग अपने ही घर में बेगाना या डरा हुआ महसूस न करे। समाज को यह समझना होगा कि बुजुर्गों का सम्मान सिर्फ एक नैतिक जिम्मेदारी ही नहीं, बल्कि एक सख्त कानूनी बाध्यता भी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसी दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।