खबरीलाल डेस्क
नई दिल्ली/जींद: देश में एक बार फिर से किसान आंदोलन (Farmers Protest) की सुगबुगाहट तेज हो गई है। हरियाणा और पंजाब की सीमाओं पर फिर से वही नजारा देखने को मिल रहा है, जो पिछले किसान आंदोलनों के दौरान दिखा था। संयुक्त किसान मोर्चा (गैर-राजनीतिक) द्वारा 16 अगस्त से 'दिल्ली मार्च' (Delhi March) के ऐलान के बाद प्रशासन पूरी तरह से सतर्क हो गया है। इस बार किसानों के निशाने पर है 'इंडिया-यूएस ट्रेड डील' (India-US Trade Deal), जिसे किसान अपने हितों के खिलाफ मान रहे हैं।
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​इस ऐलान के तुरंत बाद हरियाणा पुलिस और जींद प्रशासन ने मोर्चा संभाल लिया है। किसी भी तरह की कानून-व्यवस्था की स्थिति बिगड़ने से रोकने के लिए पंजाब और हरियाणा को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण खनौरी बॉर्डर (Khanauri Border) को सील कर दिया गया है।
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खनौरी बॉर्डर पर छावनी जैसे हालात: 5 लेयर की अभेद्य बैरिकेडिंग

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​किसानों को दिल्ली की ओर बढ़ने से रोकने के लिए जींद प्रशासन ने शुक्रवार देर रात ही खनौरी बॉर्डर पर सुरक्षा के कड़े इंतजाम कर दिए हैं।
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    5 लेयर सुरक्षा चक्र: प्रशासन ने हाईवे पर कंक्रीट के भारी-भरकम ब्लॉक, लोहे की कीलें, कंटीले तार और बड़े कंटेनर लगाकर पांच परतों वाली (5-Layer Barricading) मजबूत बैरिकेडिंग की है।
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    भारी पुलिस बल तैनात: स्थानीय पुलिस के अलावा रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) और अतिरिक्त सुरक्षा बलों की टुकड़ियों को तैनात किया गया है। दंगा-रोधी उपकरणों (Riot Gear) के साथ जवान 24 घंटे पहरा दे रहे हैं।
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    ट्रैफिक डायवर्जन: खनौरी और आसपास के इलाकों में आम लोगों की आवाजाही को सीमित कर दिया गया है। कई रूट डायवर्ट किए गए हैं ताकि आवश्यक सेवाओं को छोड़कर अन्य वाहन सीधे बॉर्डर की तरफ न जा सकें।
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अधिकारी किसी भी बड़ी भीड़ के जमावड़े से निपटने के लिए ड्रोन कैमरों से लगातार बॉर्डर और आसपास के गांवों की निगरानी कर रहे हैं।
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​'किसान बचाओ पदयात्रा' का पूरा ब्लूप्रिंट और रूट

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​किसान नेता जगजीत सिंह डल्लेवाल (Jagjit Singh Dallewal) के नेतृत्व में इस विरोध प्रदर्शन को 'किसान बचाओ पदयात्रा' का नाम दिया गया है। किसान संगठनों ने इस बार ट्रैक्टर-ट्रॉलियों की बजाय पैदल मार्च का रास्ता चुना है ताकि शांतिपूर्ण तरीके से अपना संदेश सरकार तक पहुंचाया जा सके।
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    शुरुआत: यह पदयात्रा 16 अगस्त को दोपहर करीब 3 बजे पंजाब-हरियाणा बॉर्डर के पास स्थित दाता सिंहवाला गांव से शुरू होगी।
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    प्रार्थना और जनसभा: यात्रा शुरू होने से पहले दाता सिंहवाला में किसानों द्वारा एक विशाल जनसभा और प्रार्थना सभा का आयोजन किया जाएगा।
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    पहला पड़ाव: मार्च के आगे बढ़ने पर उझाना गांव के मेन मार्केट में किसानों का स्वागत किया जाएगा। इसके बाद पहली रात का ठहराव बेलरखा गांव में सुनिश्चित किया गया है।
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    दिल्ली पहुंचने का लक्ष्य: यह पूरी यात्रा 228 किलोमीटर लंबी होगी। 51 किसानों का एक मुख्य जत्था इस पूरे रास्ते को पैदल नापेगा। रास्ते में हजारों अन्य किसान, ग्रामीण और स्वयंसेवक उनके समर्थन में जुड़ेंगे। इस यात्रा का अंतिम लक्ष्य 29 अगस्त को दिल्ली के जंतर-मंतर (Jantar Mantar) पहुंचना है।
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मुख्य मुद्दा: किसान 'इंडिया-US ट्रेड डील' का विरोध क्यों कर रहे हैं?

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​इस आंदोलन की सबसे बड़ी और नई वजह है भारत-अमेरिका व्यापार समझौता (India-US Trade Deal)। किसान नेताओं का साफ तौर पर आरोप है कि यह समझौता भारतीय कृषि और घरेलू किसानों को पूरी तरह से बर्बाद कर देगा।
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विरोध के मुख्य कारण:

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    आयात शुल्क (Import Duty) में कटौती: इस डील के तहत अमेरिका से आने वाले कृषि उत्पादों (जैसे- सेब, अखरोट, बादाम, और दालों) पर भारत सरकार आयात शुल्क कम कर रही है। किसानों का तर्क है कि इससे अमेरिकी उत्पाद भारतीय बाजार में सस्ते हो जाएंगे, जिससे कश्मीर, हिमाचल और अन्य राज्यों के किसानों की उपज को सही भाव नहीं मिलेगा।
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    पोल्ट्री और डेयरी सेक्टर पर खतरा: अमेरिकी पोल्ट्री (चिकन) और डेयरी उत्पादों के भारतीय बाजार में डंपिंग (Dumping) का डर है। अमेरिका में बड़े कॉर्पोरेट फार्म्स को भारी सब्सिडी मिलती है, जिससे उनके उत्पाद बेहद सस्ते होते हैं। भारतीय किसान, जिनके पास छोटी जोत और कम संसाधन हैं, इस वैश्विक प्रतिस्पर्धा में टिक नहीं पाएंगे।
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    खेती का कॉरपोरेटीकरण: संयुक्त किसान मोर्चा का मानना है कि ऐसी संधियां विश्व व्यापार संगठन (WTO) के दबाव में की जा रही हैं, जो अंततः भारतीय कृषि को मल्टीनेशनल कंपनियों के हाथों में सौंपने की साजिश है।
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आंदोलन की अन्य प्रमुख और पुरानी मांगें

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​सिर्फ ट्रेड डील ही नहीं, किसान अपनी उन पुरानी मांगों को लेकर भी सड़क पर उतरे हैं जिन पर सरकार के साथ अभी तक कोई ठोस सहमति नहीं बन पाई है:
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    MSP की कानूनी गारंटी: सभी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) की खरीद के लिए एक सख्त कानून बनाया जाए, जिसे डॉ. स्वामीनाथन आयोग की 'C2+50%' फॉर्मूले के आधार पर तय किया जाए।
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    संपूर्ण कर्ज माफी: देश भर के किसानों और खेतिहर मजदूरों का सारा कर्ज माफ किया जाए, क्योंकि खेती घाटे का सौदा बन चुकी है।
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    बिजली संशोधन विधेयक रद्द हो: स्मार्ट मीटर और बिजली के निजीकरण की नीतियों पर रोक लगाई जाए।
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    लखीमपुर खीरी और अन्य मामले: पिछले आंदोलनों के दौरान किसानों पर दर्ज किए गए सभी पुलिस केस वापस लिए जाएं और लखीमपुर खीरी कांड के पीड़ितों को पूर्ण न्याय मिले।
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प्रशासन की चिंता का असली कारण: हांसी की घटना

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​प्रशासन इस बार इतनी अधिक सख्ती क्यों बरत रहा है, इसका एक बड़ा कारण हाल ही में हुई कुछ हिंसक घटनाएं हैं। प्रशासन अतिरिक्त सावधानी बरत रहा है क्योंकि इससे पहले हरियाणा के हांसी (Hansi) में किसानों और पुलिस के बीच भारी टकराव हुआ था। उस विरोध प्रदर्शन के दौरान कथित तौर पर हुए पथराव में जिले के एसपी (SP) और डीएसपी (DSP) गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
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​पुलिस महानिदेशक और गृह विभाग के अधिकारियों ने साफ निर्देश दिए हैं कि किसी भी कीमत पर कानून-व्यवस्था नहीं बिगड़नी चाहिए। हालांकि, किसान संगठनों ने बार-बार यह आश्वासन दिया है कि उनकी पदयात्रा पूरी तरह से शांतिपूर्ण, अनुशासित और लोकतांत्रिक तरीके से निकाली जाएगी।
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​29 अगस्त तक चलने वाली इस 228 किलोमीटर की लंबी यात्रा के दौरान हर दिन नई चुनौतियां सामने आएंगी। यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या हरियाणा पुलिस किसानों को उनके पहले ही पड़ाव पर रोक लेती है, या फिर यह 51 किसानों का जत्था जंतर-मंतर तक पहुंचने में कामयाब रहता है। एक बात तय है कि आने वाले दो हफ्तों तक हरियाणा की सड़कों पर राजनीति और किसानी के अधिकारों का यह संघर्ष देशभर की मीडिया की सुर्खियों में रहने वाला है।