खबरीलाल डेस्क
राष्ट्रीय डेस्क, नई दिल्ली:
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देश के लोकतांत्रिक ढांचे को मजबूत करने और मतदाता सूची (Voter List) को पूरी तरह त्रुटिहीन बनाने के लिए भारतीय चुनाव आयोग (ECI) ने एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण कदम उठाया है। देशभर में जारी विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision - SIR) प्रक्रिया के बीच, चुनाव आयोग ने नए मतदाताओं द्वारा भरे जाने वाले 'फॉर्म-6' (Form-6) के प्रारूप में एक बड़ा तकनीकी बदलाव कर दिया है।
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​इस नए बदलाव के तहत अब नए आवेदकों को अपने माता-पिता या दादा-दादी के चुनावी इतिहास और मतदाता सूची में उनके नाम से जुड़ी गोपनीय व महत्वपूर्ण जानकारियां साझा करनी होंगी। हालांकि, आयोग ने आधिकारिक तौर पर इस नए सेक्शन को 'गैर-अनिवार्य' (Not Mandatory) श्रेणी में रखा है, लेकिन तकनीकी रूप से इसे भरे बिना ऑनलाइन पोर्टल पर फॉर्म को आगे सबमिट करना नामुमकिन बना दिया गया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि यह पूरा मामला क्या है और आम जनता पर इसका क्या असर पड़ने वाला है।
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​क्या है फॉर्म-6 और किन लोगों के लिए है यह जरूरी?

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​भारतीय चुनाव प्रक्रिया में 'फॉर्म-6' का स्थान सबसे महत्वपूर्ण है। यह मुख्य रूप से उन नागरिकों के लिए होता है जो पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम शामिल करवाना चाहते हैं। इसके दायरे में निम्नलिखित आवेदक आते हैं:
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    नए युवा मतदाता: जो नागरिक हाल ही में 18 वर्ष की आयु पूरी कर चुके हैं।
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    प्रवासी नागरिक: जो विदेशी नागरिकता छोड़कर भारतीय नागरिकता प्राप्त कर चुके हैं और देश के वोटर बनना चाहते हैं।
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    वोटर लिस्ट से हटे नाम: ऐसे लोग जिनका नाम किसी कारणवश पिछली वोटर लिस्ट से हटा दिया गया था और वे फिर से मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के लिए नए सिरे से आवेदन कर रहे हैं।
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क्या हुआ है तकनीकी बदलाव? ECINET पोर्टल पर दिखा नया सेक्शन

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​शनिवार को चुनाव आयोग के आधिकारिक ECINET पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन करने वाले यूजर्स को फॉर्म-6 के अंदर एक बड़ा तकनीकी बदलाव देखने को मिला।
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    नया डिक्लेरेशन सेक्शन: ऑनलाइन फॉर्म के सेक्शन J और सेक्शन K के ठीक बीच में एक बिना लेबल (Unlabeled) वाला डिक्लेरेशन (घोषणा पत्र) सेक्शन जोड़ा गया है।
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    डाउनलोड पीडीएफ में उपलब्ध नहीं: हैरान करने वाली बात यह है कि चुनाव आयोग के पोर्टल पर जो फॉर्म-6 पीडीएफ प्रारूप में डाउनलोड के लिए उपलब्ध है, उसमें अभी तक इस नए सेक्शन को शामिल नहीं किया गया है।
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    पोर्टल पर पाबंदी: यह नया बदलाव केवल उन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के डिजिटल आवेदकों के लिए लाइव दिखाई दे रहा है, जहां या तो 2025 में SIR प्रक्रिया पूरी हो चुकी है या फिर वर्तमान साल 2026 में अभी भी जारी है। यदि आवेदक इस नए सेक्शन को खाली छोड़ता है, तो पोर्टल फॉर्म को आगे प्रोसेस नहीं करता है।
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नए सेक्शन के 3 विकल्प: आवेदकों को क्या करना होगा?

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​नए ऑनलाइन फॉर्म-6 में आवेदकों को एक घोषणा पत्र के तहत तीन विकल्पों (Options) में से किसी एक का चयन करना अनिवार्य कर दिया गया है। इन विकल्पों का ढांचा इस प्रकार है:
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विकल्प 1: स्वयं का पुराना रिकॉर्ड

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​"मेरा नाम पिछले SIR (विशेष गहन पुनरीक्षण) की मतदाता सूची में शामिल है।"
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विकल्प 2: माता-पिता या दादा-दादी का रिकॉर्ड

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​"मेरे माता-पिता और/या दादा-दादी का नाम पिछले SIR की वोटर लिस्ट में दर्ज है।"
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विकल्प 3: कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं

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​"न तो मेरा नाम और न ही मेरे माता-पिता का नाम पिछले SIR की मतदाता सूची में दर्ज है।"
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यदि आप पहला या दूसरा विकल्प चुनते हैं, तो क्या होगा?

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​अगर कोई आवेदक पहले दो विकल्पों में से किसी एक को चुनता है, तो उसे प्रमाण के तौर पर निम्नलिखित तीन बेहद सटीक जानकारियां फॉर्म में दर्ज करनी होंगी:
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    ​उसकी पुरानी या माता-पिता की विधानसभा सीट का नाम (Assembly Constituency).
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    ​संबंधित मतदान केंद्र का बूथ नंबर (Booth Number).
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    ​पिछली SIR वोटर लिस्ट में नाम का सटीक सीरियल नंबर (Serial Number).
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तीसरे विकल्प पर संशय: यदि किसी आवेदक के पास यह जानकारियां उपलब्ध नहीं हैं और वह तीसरा विकल्प चुनता है, तो उसके आवेदन का क्या हश्र होगा या उसे कौन से अतिरिक्त दस्तावेज देने होंगे, इसके बारे में फॉर्म या पोर्टल पर स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है।
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​आखिर चुनाव आयोग को क्यों करना पड़ा यह अचानक बदलाव?

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​इस बड़े बदलाव के पीछे पिछले डेढ़ साल के आंकड़े और देश के राजनीतिक दलों द्वारा उठाए गए गंभीर सवाल हैं।
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5.58 करोड़ वोटरों के नाम हटना:

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साल 2025 में देश के 10 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों में बड़े पैमाने पर विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान चलाया गया था। इस अभियान के बाद मतदाता सूची को शुद्ध करने के नाम पर करीब 5.58 करोड़ से ज्यादा लोगों के नाम वोटर लिस्ट से काट दिए गए थे। इतनी बड़ी संख्या में नाम हटाए जाने के बाद सामाजिक और राजनीतिक हलकों में तीखी प्रतिक्रिया हुई थी। सबसे बड़ा सवाल यह उठाया गया कि जिन माता-पिता के नाम लिस्ट से हटे हैं, क्या उनके 18 साल के हो चुके बच्चों को भी देश में नए वोटर बनने से रोक दिया जाएगा?
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पश्चिम बंगाल का उदाहरण:

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इस बदलाव की सबसे बड़ी तात्कालिक वजह अप्रैल 2026 में हुए पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव को माना जा रहा है। पश्चिम बंगाल में चुनाव से ठीक पहले करीब 27 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से साफ कर दिए गए थे। इसके कारण लाखों नागरिक मतदान करने से वंचित रह गए, जबकि उनके नाम काटे जाने के खिलाफ दी गई शिकायतें आज भी चुनाव आयोग के दफ्तरों में लंबित हैं। इसी तरह की विसंगतियों को रोकने और आवेदकों के पारिवारिक लिंकेज की जांच करने के लिए आयोग ने यह नया सेक्शन जोड़ा है।
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भारत में SIR की वर्तमान स्थिति: किस राज्य का क्या है हाल?
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​फरवरी 2026 में चुनाव आयोग ने देश के 23 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) कराने का आधिकारिक ऐलान किया था, जहां अप्रैल 2026 से यह प्रक्रिया युद्ध स्तर पर जारी है। नीचे दी गई तालिका से आप समझ सकते हैं कि देश में इस समय SIR की क्या स्थिति है:
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वर्तमान में जारी SIR (2026 चरण)
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SIR प्रक्रिया पूर्ण (2025 चरण)
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आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, चंडीगढ़, दादरा और नगर हवेली तथा दमन और दीव, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, झारखंड, कर्नाटक, लद्दाख, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, दिल्ली, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, त्रिपुरा, तेलंगाना, उत्तराखंड और बिहार (बिहार में हाल ही में संपन्न)
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उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, राजस्थान, तमिलनाडु, गुजरात, केरल, छत्तीसगढ़, अंडमान और निकोबार, गोवा, लक्षद्वीप, पुडुचेरी
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चुनाव आयोग का फॉर्म-6 में यह नया सेक्शन जोड़ना सुरक्षा और सत्यापन के लिहाज से एक बड़ा कदम हो सकता है, लेकिन दूरदराज के इलाकों में रहने वाले उन नए मतदाताओं के लिए यह बड़ी मुसीबत बन सकता है जिनके पास अपने माता-पिता के पुराने बूथ नंबर या सीरियल नंबर की सटीक जानकारी नहीं है। यदि आप भी नए वोटर कार्ड के लिए ऑनलाइन आवेदन करने जा रहे हैं, तो अपने परिवार का पुराना वोटर डेटा पहले से निकालकर पास रख लें, ताकि तकनीकी दिक्कतों से बचा जा सके।