नई दिल्ली/जिनेवा (Weather & Climate News): दुनिया अभी पिछले कुछ सालों की रिकॉर्ड तोड़ गर्मी, बेमौसम बारिश और जलवायु परिवर्तन के झटकों से पूरी तरह संभल भी नहीं पाई थी कि जलवायु वैज्ञानिकों ने एक नई और दिल दहला देने वाली चेतावनी जारी कर दी है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार, हमारी धरती एक ऐसे मौसमी महाविनाश के मुहाने पर खड़ी है, जिसकी कल्पना मात्र से सिहरन पैदा होती है।READ ALSO:-ड्यूटी पर रील बनाई तो खैर नहीं: CM योगी का UP पुलिस को सख्त अल्टीमेटम, 'हंसी का पात्र न बनें, डिजिटल वॉरियर बनकर दिखाएं'
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प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के उष्णकटिबंधीय क्षेत्र में एक बेहद शक्तिशाली और विनाशकारी ‘अल नीनो’ (El Niño) घटना बड़ी तेजी से आकार ले रही है। शुरुआती पूर्वानुमानों और सैटेलाइट डेटा से जो संकेत मिल रहे हैं, वे बेहद खौफनाक हैं। यह मौसमी घटना न केवल आने वाले कुछ महीनों में बहुत अधिक उग्र और मजबूत होगी, बल्कि इसके साल 2027 तक लगातार सक्रिय रहने की आशंका है। अगर यह पूर्वानुमान सटीक साबित होता है, तो यह पूरी दुनिया में मौसम के स्थापित चक्र को पूरी तरह से तहस-नहस कर देगा।
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क्या कह रहे हैं मौसम विज्ञान के नवीनतम मॉडल?

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'नॉर्थ अमेरिकन मल्टी-मॉडल एन्सेम्बल' (North American Multi-Model Ensemble - NMME), जो दुनिया के सबसे सटीक जलवायु पूर्वानुमान मॉडलों में से एक माना जाता है, की ओर से नवंबर-दिसंबर और जनवरी 2027 के लिए समुद्र की सतह के तापमान (Sea Surface Temperature) का एक नया पूर्वानुमान जारी किया गया है। यह पूर्वानुमान एक बेहद डरावनी तस्वीर पेश कर रहा है।
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मौसम विज्ञान के इन उन्नत मॉडल्स से जो डेटा सामने आया है, उसके मुताबिक, मध्य और पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के एक बहुत बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य (औसत) से कम से कम 2 डिग्री सेल्सियस अधिक रहने की संभावना है। लेकिन चौंकाने और डराने वाली बात यह है कि कुछ जलवायु मॉडल्स तो यह भी इशारा कर रहे हैं कि तापमान का यह कांटा 5 डिग्री सेल्सियस की खतरनाक सीमा को भी पार कर सकता है। अगर ऐसा सचमुच होता है, तो यह मानव इतिहास में अब तक रिकॉर्ड किया गया सबसे खतरनाक, उग्र और मजबूत अल नीनो एपिसोड बन जाएगा।
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कब बनता है 'सुपर अल नीनो'? (The Science of Super El Nino)

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अल नीनो कोई रातों-रात होने वाली घटना नहीं है। यह एक जटिल जलवायु पैटर्न है जो प्रशांत महासागर के पानी के गर्म होने से जुड़ा है। जलवायु वैज्ञानिक आधिकारिक तौर पर एक मजबूत अल नीनो की घोषणा तब करते हैं, जब प्रशांत महासागर के खास ‘नीनो 3.4’ (Niño 3.4) क्षेत्र का तापमान औसत तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस से लेकर 1.9 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा हो जाता है।
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लेकिन स्थिति तब बेकाबू मानी जाती है जब तापमान में यह बढ़ोतरी 2 डिग्री सेल्सियस के आंकड़े को पार कर जाती है। 2 डिग्री सेल्सियस से अधिक की इस असामान्य वृद्धि को ही मौसम विज्ञान की भाषा में ‘वेरी स्ट्रांग’ (Very Strong) या ‘सुपर अल नीनो’ (Super El Niño) कहा जाता है। क्लाइमेट एक्सपर्ट्स और ओशनोग्राफर्स का कहना है कि दुनिया भर के लगातार कई मॉडल्स से एक जैसे ही संकेत मिल रहे हैं। इन संकेतों के मुताबिक, प्रशांत महासागर के तापमान का यह आंकड़ा 2026 के आखिरी महीनों तक 2 डिग्री सेल्सियस को आसानी से पार कर सकता है। इसलिए वैज्ञानिकों ने दुनिया भर की सरकारों को चेतावनी दी है कि इस पूर्वानुमान को किसी भी कीमत पर हल्के में नहीं लिया जा सकता।
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वैश्विक मौसम पर क्या होगा इस महासंकट का असर?

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सुपर अल नीनो का असर सिर्फ समंदर तक सीमित नहीं रहता; यह वायुमंडल के सर्कुलेशन को बदल देता है। इसके कारण जेट स्ट्रीम (हवा की तेज धाराएं) अपनी दिशा बदल लेती हैं। इसका परिणाम यह होता है कि दुनिया के जिन हिस्सों में भारी बारिश होनी चाहिए, वहां सूखा पड़ जाता है और जो इलाके सूखे रहते हैं, वहां विनाशकारी बाढ़ आ जाती है।
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    दक्षिण अमेरिका: पेरू और इक्वाडोर जैसे देशों में भयानक बाढ़ और भूस्खलन का खतरा बढ़ जाएगा।
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    ऑस्ट्रेलिया और इंडोनेशिया: इन क्षेत्रों में बारिश गायब हो जाएगी, जिससे भयंकर सूखा पड़ेगा और जंगलों में भीषण आग (Bushfires) लगने की घटनाएं कई गुना बढ़ जाएंगी।
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    वैश्विक तापमान: अल नीनो धरती के औसत तापमान को और बढ़ा देगा, जिससे ग्लोबल वार्मिंग के सारे पुराने रिकॉर्ड टूट जाएंगे और ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार तेज हो जाएगी।
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भारत के लिए क्या है सबसे बड़ा और सीधा खतरा? (Direct Threat to India)

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अगर भारत के संदर्भ में बात की जाए, तो ‘अल नीनो’ का इतिहास भारत के लिए हमेशा से बेहद डरावना और नुकसानदेह रहा है। प्रशांत महासागर में होने वाली इस उथल-पुथल का सबसे सीधा और विनाशकारी असर भारतीय मानसून (Indian Summer Monsoon) पर पड़ता है।
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ऐतिहासिक रूप से यह देखा गया है कि अल नीनो का संबंध भारत में कमजोर मानसून और सामान्य से काफी कम बारिश से रहा है। जब-जब प्रशांत महासागर में मजबूत अल नीनो ने दस्तक दी है, तब-तब दक्षिण एशिया और विशेषकर भारत को भयंकर सूखे का सामना करना पड़ा है।
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भारत पर संभावित प्रभाव:

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    मानसून की विफलता: भारत की कृषि आज भी काफी हद तक दक्षिण-पश्चिम मानसून पर निर्भर है। अल नीनो के कारण मानसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाएंगी, जिससे बारिश के पैटर्न में भारी रुकावट आएगी।
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    कृषि संकट और महंगाई: बारिश न होने से धान, सोयाबीन, मक्का और दालों जैसी खरीफ की प्रमुख फसलें बर्बाद हो सकती हैं। उत्पादन गिरने से देश में खाद्य महंगाई (Food Inflation) चरम पर पहुंच सकती है, जो आम आदमी की कमर तोड़ देगी।
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    जल संकट (Water Crisis): मानसून की कमी के कारण देश के प्रमुख जल जलाशयों (Dams and Reservoirs) का जलस्तर खतरनाक रूप से नीचे चला जाएगा। इससे न केवल पीने के पानी का हाहाकार मचेगा, बल्कि जलविद्युत (Hydroelectricity) उत्पादन भी ठप हो सकता है।
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    रिकॉर्ड तोड़ लू (Deadly Heatwaves): अल नीनो के प्रभाव से भारत के उत्तर, मध्य और पश्चिमी हिस्सों में तापमान सामान्य से कई डिग्री ऊपर चला जाएगा। लंबे समय तक भयंकर और जानलेवा लू चलेगी, जिससे हीटस्ट्रोक के मामले बढ़ेंगे और जनजीवन अस्त-व्यस्त हो जाएगा।
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आगे का रास्ता क्या है?

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2027 तक चलने वाले इस संभावित 'सुपर अल नीनो' ने पूरी दुनिया के सामने एक अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी है। चूंकि इस बार इसका प्रभाव कई सालों तक रहने की आशंका है, इसलिए इसका आर्थिक और सामाजिक नुकसान कल्पना से परे हो सकता है। भारत सरकार, मौसम विभाग (IMD) और आपदा प्रबंधन एजेंसियों को अभी से इस संभावित महासंकट से निपटने के लिए एक ठोस 'एक्शन प्लान' तैयार करना होगा। किसानों को सूखे से निपटने वाली फसलों की बुवाई के लिए जागरूक करना और जल संरक्षण के युद्धस्तर पर प्रयास करना ही इस प्राकृतिक तबाही के असर को कुछ कम कर सकता है। समय रहते की गई तैयारी ही इस खौफनाक अल नीनो से बचने का एकमात्र रास्ता है।
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