राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और अन्य राज्यों में चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) अभियान तथा वोटर लिस्ट की जांच प्रक्रिया को लेकर शीर्ष अदालत ने अपना रुख साफ किया है। Supreme Court Election Commission के इस मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया कि चुनाव आयोग द्वारा इस्तेमाल की जा रही 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' श्रेणी की कानूनी वैधता पर अभी अंतिम निर्णय होना बाकी है। इसके साथ ही कोर्ट ने दिल्ली में रहने वाले उन नागरिकों से दोबारा 'फॉर्म 6' भरवाने पर चुनाव आयोग से तीखा सवाल पूछा है, जो पहले से ही मतदाता हैं और जिन्होंने केवल अपना पता बदला है।

'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थिति की स्पष्ट

मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की विशेष बेंच ने मामले की सुनवाई करते हुए यह अहम टिप्पणी की। देश की शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि पश्चिम बंगाल में एसआईआर प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग को 'लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी' के आधार पर आगे बढ़ने की जो अनुमति प्रदान की गई थी, वह केवल एक अंतरिम व्यवस्था थी।

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पीठ ने साफ किया कि अंतरिम अनुमति का यह अर्थ बिल्कुल नहीं निकाला जाना चाहिए कि अदालत ने इस प्रक्रिया की कानूनी मान्यता पर अपनी अंतिम मुहर लगा दी है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस पूरी प्रक्रिया और श्रेणी की कानूनी वैधता की समीक्षा अभी पेंडिंग है, जिस पर अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी है।

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दिल्ली एसआईआर पर चुनाव आयोग से कड़ा सवाल

मामले की सुनवाई के दौरान विशेष पीठ ने दिल्ली में जारी एसआईआर अभियान को लेकर भी चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े किए। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से सीधा सवाल पूछा कि जो नागरिक पहले से ही मतदाता सूची में पंजीकृत हैं और जिन्होंने केवल अपना घर या पता बदला है, उनसे दोबारा 'फॉर्म 6' क्यों भरवाया जा रहा है?

उल्लेखनीय है कि 'फॉर्म 6' का उपयोग आमतौर पर नए मतदाताओं के नाम मतदाता सूची में जोड़ने के लिए किया जाता है। ऐसे में पुराने और पहले से ही प्रमाणित मतदाताओं पर दोबारा नए वोटर की तरह लंबी कागजी प्रक्रिया थोपने को लेकर अदालत ने आयोग से स्पष्टीकरण मांगा है।

तकनीकी विसंगतियों और नोटिस प्रक्रिया पर कानूनी बहस तेज

सुप्रीम कोर्ट के इस सख्त रुख के बाद मतदाता सूची से नाम काटे जाने और तकनीकी विसंगतियों के नाम पर नागरिकों को नोटिस भेजे जाने को लेकर चल रही कानूनी बहस और तेज हो गई है। निर्वाचन आयोग के विशेष अभियान के तहत डेटा में पाई जाने वाली तार्किक विसंगतियों के आधार पर वोटरों की जांच की जा रही है।

हालांकि, अदालत के इस कड़े रुख के बाद अब चुनाव आयोग के नियमों और प्रशासनिक प्रक्रियाओं की वैधानिकता की गहन समीक्षा की जाएगी। कोर्ट यह सुनिश्चित करना चाहता है कि किसी भी वैध नागरिक का नाम मतदाता सूची से अनुचित तरीके से न हटे और न ही उन पर बेवजह की प्रक्रियाएं थोपी जाएं।

पुरानी सूची के सत्यापन और अधिकारों का संतुलन

चुनाव आयोग के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन अभियान का मूल उद्देश्य मतदाता सूची को पूरी तरह त्रुटिरहित बनाना है। लेकिन प्रक्रियात्मक जटिलताओं के कारण पहले से पंजीकृत नागरिकों को होने वाली असुविधा पर न्यायपालिका ने ध्यान आकर्षित किया है।

अदालत की इस टिप्पणी से यह संकेत मिलता है कि आगामी दिनों में आयोग को अपनी प्रक्रियाओं में सुधार करना पड़ सकता है, ताकि स्थानांतरित हुए मतदाताओं को आसानी से नई सूची में शामिल किया जा सके।

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