देश भर में झुलसा देने वाली गर्मी और लू के थपेड़ों के बीच हर किसी की निगाहें आसमान की तरफ टिकी हैं। हर कोई बस एक ही सवाल पूछ रहा है— "आखिर बारिश कब होगी?" इस साल देश में मॉनसून की एंट्री ने लोगों के चेहरों पर मुस्कान ला दी थी। शुरुआत इतनी दमदार थी कि महज 15 दिनों के भीतर ही मॉनसून के बादल 19 राज्यों तक पहुंच गए। ऐसा लगा मानो इस बार इंद्रदेव मेहरबान हैं और झमाझम बारिश से गर्मी का नामोनिशान मिट जाएगा। लेकिन, इसके बाद मॉनसून की रफ्तार को मानो किसी की बुरी नजर लग गई।READ ALSO:-सोशल मीडिया पर तमंचे के साथ 'भौकाल' बनाना पड़ा भारी: फोटो वायरल होते ही मुज़फ्फरनगर पुलिस का एक्शन, आरोपी गिरफ्तार
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मौसम विभाग (IMD) के ताजा और चौंकाने वाले आंकड़ों के मुताबिक, मॉनसून पिछले 11 दिनों से तेलंगाना में ही डेरा डाले हुए है। 8 जून के बाद से इसके कदम एक इंच भी आगे नहीं बढ़े हैं। इस अभूतपूर्व गतिरोध ने उत्तर, मध्य और पश्चिमी भारत के लोगों को चिंता में डाल दिया है। आइए विस्तार से समझते हैं कि आखिर मॉनसून क्यों अटक गया है, इसके पीछे कौन से 5 मौसम वैज्ञानिक कारण (विलेन) जिम्मेदार हैं और आगे मौसम विभाग की क्या चेतावनी है।
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आंकड़ों की जुबानी: सूखे और गर्मी का डरावना संकट

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मॉनसून के इस अचानक ठहराव ने देश के एक बड़े हिस्से में सूखे जैसी स्थिति पैदा कर दी है। विशेष रूप से उत्तर-मध्य भारत के 7 राज्य बारिश की एक-एक बूंद के लिए तरस रहे हैं। इन इलाकों में सामान्य के मुकाबले 60% तक कम बारिश रिकॉर्ड की गई है।
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अगर हम 1 जून से 18 जून के बीच के देशव्यापी आंकड़ों पर नजर डालें, तो स्थिति बेहद डरावनी नजर आती है:
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    देशव्यापी कमी: इस अवधि में पूरे भारत में सामान्य से 38% कम बारिश दर्ज की गई है। यह आंकड़ा कृषि प्रधान देश के लिए बेहद चिंताजनक है।
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    गुजरात की बदहाली: मॉनसून की बेरुखी की सबसे भारी कीमत गुजरात चुका रहा है। राज्य में सामान्य से 79% कम बारिश हुई है, जिससे खरीफ फसलों की बुवाई पर संकट के बादल मंडराने लगे हैं।
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    महाराष्ट्र का हाल भी बेहाल: महाराष्ट्र, जहां खेती पूरी तरह से मॉनसून पर निर्भर करती है, वहां हालात बेहद चिंताजनक हैं। यहां सामान्य से 78% कम वर्षा दर्ज की गई है। मराठवाड़ा और विदर्भ जैसे इलाके पहले से ही जल संकट से जूझ रहे हैं।
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प्री-मॉनसून की 'कंजूस' बारिश और 40 डिग्री का टॉर्चर

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मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान, छत्तीसगढ़, हरियाणा और राजधानी दिल्ली में आसमान में बादल तो दिख रहे हैं और रुक-रुक कर प्री-मॉनसून बारिश (Pre-monsoon showers) भी हो रही है, लेकिन यह नाकाफी है। यह बूंदाबांदी इस भीषण गर्मी की आग को शांत करने के लिए ऊंट के मुंह में जीरे के समान है। यूपी और राजस्थान समेत इन 7 राज्यों में सूरज के तेवर अभी भी नरम नहीं पड़े हैं और पारा लगातार 40 डिग्री सेल्सियस के पार बना हुआ है। उमस और गर्मी ने आम जनजीवन को बुरी तरह से प्रभावित कर दिया है।
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वो 5 बड़े 'विलेन', जिन्होंने खड़ी कर दी मॉनसून के रास्ते में दीवार

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मौसम विज्ञानियों की मानें तो आम तौर पर मॉनसून के कमजोर पड़ने या रुकने के पीछे कोई एक भौगोलिक या वायुमंडलीय कारण (Factor) जिम्मेदार होता है। लेकिन इस साल की कहानी बिल्कुल अलग है। इस बार एक ही समय पर 5 अलग-अलग सिस्टम ने आपस में हाथ मिला लिया है और मॉनसून की राह में एक अभेद्य दीवार खड़ी कर दी है। जानिए इन 5 'विलेन्स' के बारे में:
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1. अरब सागर में नमी वाली हवाओं का दम निकलना

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भारत में अच्छी और झमाझम बारिश के लिए अरब सागर (Arabian Sea) से उठने वाली नमी युक्त हवाएं मुख्य 'ईंधन' का काम करती हैं। जब तक इन हवाओं में भरपूर नमी नहीं होगी, बादल नहीं बरसेंगे। लेकिन इस समय अरब सागर से आने वाली ये हवाएं बेहद कमजोर पड़ चुकी हैं। इनका दम निकल गया है, जिसके कारण ये भारत के भीतरी इलाकों तक नमी नहीं पहुंचा पा रही हैं।
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2. दक्षिण-पश्चिमी हवाओं की सुस्ती

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मॉनसून मुख्य रूप से दक्षिण-पश्चिम हवाओं (South-West Winds) पर निर्भर करता है। अरब सागर के ऊपर इन हवाओं की रफ्तार अचानक से बहुत धीमी हो गई है। हवाओं की गति कम होने के कारण महाराष्ट्र, गुजरात और उसके आसपास के तटीय इलाकों तक पर्याप्त नमी नहीं पहुंच पा रही है, जिससे बादलों का निर्माण रुक गया है।
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3. कमजोर ‘क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो’ (Cross-Equatorial Flow)

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यह मॉनसून के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। भूमध्य रेखा (Equator) को पार करके जो हवाएं दक्षिणी गोलार्ध से भारत की तरफ आती हैं, वे अपने साथ महासागरों की विशाल नमी लाती हैं। इस बार इस ‘क्रॉस-इक्वेटोरियल फ्लो’ में नमी का स्तर बेहद कम है। जब पीछे से आने वाला 'पुश' ही कमजोर है, तो पूरा मॉनसून सिस्टम अपने आप धीमा पड़ गया है।
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4. ‘लो-प्रेशर सिस्टम’ (कम दबाव के क्षेत्र) का अकाल

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मॉनसून की हवाओं को भारतीय भूभाग की ओर खींचने के लिए समुद्र में एक शक्तिशाली 'चुंबक' की जरूरत होती है, जिसे मौसम विज्ञान की भाषा में 'कम दबाव का क्षेत्र' (Low-Pressure Area) कहते हैं। अरब सागर और बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) दोनों ही जगहों पर फिलहाल ऐसा कोई मजबूत कम दबाव का क्षेत्र नहीं बन पा रहा है। इस सिस्टम के अभाव में मॉनसून आगे की ओर मार्च नहीं कर पा रहा है।
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5. मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) की बेरुखी

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मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) उष्णकटिबंधीय मौसम को प्रभावित करने वाला एक बड़ा वैश्विक सिस्टम है। आप इसे बादलों का एक चलता-फिरता बैंड समझ सकते हैं। इसका मुख्य काम दक्षिण भारत के समुद्रों से बादलों को उत्तर भारत की ओर धकेलना होता है। जब MJO भारत के अनुकूल चरण में होता है, तो भारी बारिश होती है। लेकिन इस समय यह वैश्विक सिस्टम बेहद कमजोर और शांत अवस्था में है, जिससे बादलों का उत्तर की ओर बढ़ना पूरी तरह से रुक गया है।
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किसानों की चिंता: बुवाई में हो रही देरी

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मॉनसून के इस चक्रव्यूह का सबसे सीधा और भयानक असर भारतीय किसानों पर पड़ रहा है। जून का महीना खरीफ फसलों (जैसे धान, मक्का, सोयाबीन, कपास) की बुवाई का मुख्य समय होता है। बारिश में देरी के कारण किसान खेतों में बीज नहीं डाल पा रहे हैं। जिन किसानों ने शुरुआती बारिश देखकर बुवाई कर दी थी, उनकी फसलें अब पानी की कमी से सूखने की कगार पर हैं। अगर अगले एक हफ्ते में अच्छी बारिश नहीं हुई, तो कृषि उत्पादन पर इसका गहरा नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है, जो अंततः महंगाई को भी बढ़ा सकता है।
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आगे क्या? कब टूटेगा यह चक्रव्यूह और मिलेगी राहत?

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इतनी निराशाजनक स्थिति के बीच मौसम विभाग (IMD) ने एक उम्मीद की किरण दिखाई है। मौसम विज्ञानियों का अनुमान है कि मॉनसून का यह ठहराव हमेशा के लिए नहीं है।
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क्या है IMD का पूर्वानुमान? मौसम विभाग को उम्मीद है कि जून के आखिरी हफ्ते में इन वायुमंडलीय प्रणालियों (Systems) में बड़ा बदलाव देखने को मिलेगा। जैसे ही बंगाल की खाड़ी (Bay of Bengal) में एक नया 'साइक्लोनिक सर्कुलेशन' या कम दबाव का क्षेत्र (Low-Pressure Area) बनेगा, समुद्र में नई हलचल शुरू हो जाएगी। यह नई हलचल उन 5 'विलेन्स' को कमजोर कर देगी और मॉनसून का यह चक्रव्यूह टूट जाएगा।
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इसके बाद ठहरी हुई मानसूनी हवाएं फिर से रफ्तार पकड़ेंगी और महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश होते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार और दिल्ली तक पहुंचेंगी। तब तक के लिए इन 19 राज्यों के लोगों को चिलचिलाती धूप और उमस भरी गर्मी का सामना करने के लिए खुद को तैयार रखना होगा और उस सुखद पल का इंतजार करना होगा जब आसमान से राहत की ठंडी बूंदें बरसेंगी।
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