भारत के सबसे लोकप्रिय और सर्दियों में भारी डिमांड वाले शराब ब्रांड्स में से एक 'ओल्ड मंक' (Old Monk) इन दिनों गहरे संकट में है। Old Monk Controversy के चलते महाराष्ट्र राज्य में इस साल मई-जून महीने से ही इसकी बिक्री पूरी तरह से बंद पड़ी है। बाजार से इस मशहूर ड्रिंक के अचानक गायब हो जाने के पीछे फूड रेगुलेटर भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) का एक कड़ा फैसला है। FSSAI ने ओल्ड मंक को 'असली रम' मानने से साफ इनकार कर दिया है। अब इस कड़े रुख के बाद ओल्ड मंक का उत्पादन करने वाली कंपनी ने बॉम्बे हाई कोर्ट से अपनी याचिका वापस ले ली है और FSSAI के निर्देशानुसार नए लेबल जमा करने के लिए तैयार हो गई है।

रेगुलेटर को ओल्ड मंक के लेबल से क्या आपत्ति है? यह पूरा विवाद मुख्य रूप से ओल्ड मंक की बोतल पर लगे लेबल से शुरू हुआ था। FSSAI का स्पष्ट कहना है कि इस ड्रिंक के निर्माण में न्यूट्रल स्पिरिट के साथ बाहर से रम का फ्लेवर मिलाया गया है। लेकिन, बोतल के लेबल पर ग्राहकों को यह जानकारी नहीं दी गई है कि यह 'फ्लेवर्ड लिकर' (Flavoured Liquor) है या 'रम-फ्लेवर्ड स्पिरिट'। रेगुलेटर के अनुसार, इस अहम जानकारी को छिपाकर ग्राहकों को गुमराह किया जा रहा है। सितंबर में बॉम्बे हाई कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान FSSAI के वकील राजशेखर गोविलकर ने दो टूक शब्दों में कहा था कि बाहर से फ्लेवर मिलाकर बनाए गए इस प्रोडक्ट को किसी भी सूरत में 'रम' (Rum) के तौर पर नहीं बेचा जा सकता है।

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इसके साथ ही, FSSAI को ओल्ड मंक की बोतल पर लिखे '7 साल पुरानी ब्लेंडेड' (7 years old blended) के बड़े दावे पर भी सख्त एतराज है। वकील गोविलकर ने कोर्ट को बताया कि इस फ्लेवर वाले प्रोडक्ट को किसी खास लकड़ी के पीपे (Barrel) में रखकर पुराना नहीं किया गया है, जो कि असली रम बनाने की पारंपरिक प्रक्रिया है। FSSAI ने शर्त रखी है कि अगर लेबल पर रम की जगह 'रम-जैसा' (rum-like) स्पष्ट रूप से लिखा जाए, तभी वह महाराष्ट्र में इसकी बिक्री की दोबारा इजाजत देगा।

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कोर्ट में कंपनी ने क्या रखा था अपना पक्ष? FSSAI के इस सख्त आदेश के खिलाफ मोहन मीकिन ग्रुप से जुड़ी उत्पादन कंपनी 'मोहन रॉकी स्प्रिंगवाटर प्राइवेट लिमिटेड' ने अगस्त में बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कंपनी के वकील नवरोज सीरवई ने दलील दी थी कि वे कानून के दायरे में रहते हुए कृषि मूल के न्यूट्रल, रेक्टिफाइड और डिस्टिल्ड स्पिरिट से ही असली रम बना रहे हैं।

हालांकि, 31 अगस्त को कोर्ट ने बिक्री पर लगी रोक हटाने से साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद कंपनी ने 3 सितंबर को कुछ बदलावों के साथ नया लेबल भी जमा किया, जिसमें 'एडेड फ्लेवर' (Added Flavour) लिखा गया और '7 साल पुरानी ब्लेंडेड' का टैग हटा दिया गया। लेकिन रेगुलेटर इस बात पर अड़ा रहा कि इसे 'रम' ही नहीं कहा जा सकता। आखिरकार, 5 नवंबर को चीफ जस्टिस महेश चंद्र त्रिपाठी की पीठ के सामने कंपनी ने अपनी याचिका वापस ले ली और कहा कि वे अब फूड रेगुलेटर को नए लेबल सौंपेंगे।

दूसरे ब्रांड्स पर असर और सरकार को भारी घाटा यह Old Monk Controversy केवल एक ब्रांड तक सीमित नहीं है। FSSAI उन सभी शराब कंपनियों पर शिकंजा कस रहा है जो स्पिरिट में रम या व्हिस्की का फ्लेवर मिलाकर बिना सही लेबल के बाजार में उतार रही हैं। मैकडॉवेल्स नंबर 1 (McDowells No. 1) बनाने वाली कंपनी यूनाइटेड स्पिरिट्स लिमिटेड ने भी इस मामले में कोर्ट का रुख किया था, लेकिन बाद में उसने भी अपनी याचिका वापस ले ली।

इस विवाद का सीधा असर राज्य के राजस्व पर भी पड़ा है। पिछले महीने 12 अक्टूबर को हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान बताया गया था कि ओल्ड मंक की बिक्री रुकने के कारण महाराष्ट्र के आबकारी विभाग को अब तक करीब 350 करोड़ रुपये के बड़े राजस्व का नुकसान हो चुका है। शराब कंपनियों ने चेतावनी दी है कि इस तरह की सख्ती से देश की पूरी स्पिरिट इंडस्ट्री प्रभावित हो सकती है। अब देखना यह है कि FSSAI नए लेबल को मंजूरी देता है या महाराष्ट्र में ओल्ड मंक के शौकीनों को अभी और इंतजार करना होगा।

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