भारत में इन दिनों फिटनेस, जिम और बेहतर सेहत को लेकर एक नई बहस और जागरूकता देखने को मिल रही है। लोग अपनी जीवनशैली को सुधारने और लाइफस्टाइल से जुड़ी बीमारियों से बचने के लिए इंटरनेट पर डाइट प्लान सर्च कर रहे हैं। लेकिन, जब बात हमारी रोजमर्रा की खाने की थाली (Indian Thali) की आती है, तो हकीकत काफी अलग और चौंकाने वाली नजर आती है। एक हालिया अध्ययन ने इस बात का खुलासा किया है कि स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बावजूद, ज्यादातर भारतीयों के दैनिक आहार में प्रोटीन (Protein) और फाइबर (Fiber) जैसे अत्यंत आवश्यक पोषक तत्वों की भारी कमी बनी हुई है।

​अध्ययन के चौंकाने वाले आंकड़े

पेप्सिको इंडिया (PepsiCo India) और यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल (Euromonitor International) द्वारा संयुक्त रूप से किए गए एक विस्तृत अध्ययन में सामने आया है कि शहरी भारत में पर्याप्त पोषण लेना आज भी एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यह अध्ययन देश के पांच प्रमुख महानगरों— दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, कोलकाता और कोच्चि में किया गया, जिसमें 1,250 लोगों के आहार और पोषण संबंधी आदतों का गहराई से विश्लेषण किया गया।

​अध्ययन के आंकड़े शहरी आबादी की पोषण स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं:

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  • ​प्रोटीन की कमी: रिपोर्ट के अनुसार, 70 प्रतिशत शहरी भारतीय रोजाना 41 ग्राम से भी कम प्रोटीन का सेवन करते हैं, जो एक स्वस्थ वयस्क शरीर की दैनिक आवश्यकता से काफी कम है। शरीर में मांसपेशियों के विकास, रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) बढ़ाने और शारीरिक मरम्मत के लिए प्रोटीन अत्यंत आवश्यक है।
  • ​फाइबर की अनदेखी: पाचन तंत्र (Digestion) और आंतों के स्वास्थ्य (Gut Health) के लिए जरूरी फाइबर के मामले में भी स्थिति चिंताजनक है। लगभग 61 प्रतिशत लोग अपनी दैनिक आवश्यकता से बहुत कम फाइबर ले रहे हैं।

​सही पोषण की राह में तीन प्रमुख बाधाएं

आखिर जागरूकता होने के बावजूद लोग सही पोषण क्यों नहीं ले पा रहे हैं? इस सवाल के जवाब में अध्ययन ने कुछ प्रमुख बाधाओं को उजागर किया है:

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  1. ​महंगाई की धारणा: सर्वे में शामिल 60 प्रतिशत लोगों का मानना है कि प्रोटीन युक्त आहार (जैसे गुणवत्ता वाला पनीर, अंडे, दालें या अन्य सप्लीमेंट्स) सामान्य भोजन की तुलना में काफी महंगे होते हैं, जिस कारण वे इसे अपने दैनिक बजट में नियमित रूप से शामिल नहीं कर पाते।
  2. ​सुविधाजनक विकल्पों की कमी: 57 प्रतिशत लोगों ने बताया कि आज की भागदौड़ भरी शहरी जिंदगी में ऐसे सुविधाजनक और आसानी से उपलब्ध (Ready-to-eat) खाद्य विकल्पों की भारी कमी है, जिनमें प्रोटीन और फाइबर प्रचुर मात्रा में हो।
  3. ​सही जानकारी का अभाव: जागरूकता होने के बावजूद कई लोगों को यह ही नहीं पता कि उनके शरीर को प्रतिदिन कितने ग्राम प्रोटीन की आवश्यकता है और किन स्थानीय खाद्य पदार्थों से इसकी पूर्ति की जा सकती है।

​क्या कहते हैं स्वास्थ्य विशेषज्ञ?

विशेषज्ञों का मानना है कि केवल इंटरनेट से मिली जानकारी काफी नहीं है। पेप्सिको इंडिया की स्वास्थ्य और पोषण विशेषज्ञ डॉ. अंकिता मारवाह ने इस स्थिति पर चिंता जताते हुए कहा, “केवल पोषण के प्रति जागरूकता होना ही पर्याप्त नहीं है। आज सबसे ज्यादा जरूरी यह है कि पोषण संबंधी वैज्ञानिक और विश्वसनीय जानकारी को रोजमर्रा के व्यावहारिक विकल्पों में बदला जाए, ताकि आम आदमी उसे आसानी से अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सके।”

​वहीं, यूरोमॉनिटर इंटरनेशनल के प्रतिनिधि दिलीप राधाकृष्ण ने इस विषय को विस्तार देते हुए कहा, “पोषण पर होने वाली बातचीत को अब केवल जागरूकता बढ़ाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए। हमें लोगों को उनके शरीर की वास्तविक पोषण संबंधी जरूरतें समझानी होंगी और उन्हें यह बताना होगा कि वे अपनी थाली को कैसे संतुलित कर सकते हैं।”

​इस महत्वपूर्ण अध्ययन का संदेश बिल्कुल स्पष्ट है—भारत को एक स्वस्थ राष्ट्र बनाने के लिए हमें पोषण के प्रति अपने दृष्टिकोण में व्यावहारिक बदलाव करने होंगे। बेहतर सेहत और संतुलित आहार के लिए केवल सही जानकारी ही नहीं, बल्कि ऐसे खाद्य पदार्थों की भी सख्त जरूरत है जो किफायती (Affordable), भरोसेमंद और बाजार में आसानी से उपलब्ध हों। जब तक भारतीय थाली में प्रोटीन और फाइबर का सही अनुपात सुनिश्चित नहीं होगा, तब तक संपूर्ण स्वास्थ्य का लक्ष्य हासिल करना एक बड़ी चुनौती बना रहेगा।

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