मेरठ के नीला ड्रम हत्याकांड में मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद अब महिला कैदियों को फांसी देने की व्यवस्था पर चर्चा हो रही है। 14 अक्टूबर 2026 को मेरठ की अदालत ने सौरभ राजपूत की हत्या के मामले में दोनों को मृत्युदंड सुनाया। इस फैसले के बाद सवाल उठ रहा है कि आजादी के बाद भारत में कितनी महिलाओं को फांसी दी गई, वर्तमान में कितनी महिलाएं मौत की सजा पा चुकी हैं और उन्हें फांसी देने के लिए देश में कहां व्यवस्था है।

भारत में महिला कैदी को फांसी देने के लिए उत्तर प्रदेश की मथुरा जिला जेल में विशेष फांसीघर है। इसे देश का एकमात्र महिला फांसीघर माना जाता है। आजादी के बाद अब तक केवल एक महिला रतनबाई जैन को फांसी दिए जाने का रिकॉर्ड मिलता है। दूसरी ओर, देश में 21 महिलाएं ऐसी हैं जिन्हें अदालतों ने मौत की सजा सुनाई है। इनमें उत्तर प्रदेश की नौ महिलाएं शामिल हैं। ये सभी मामले एक ही स्थिति में नहीं हैं और किसी महिला को फांसी दिए जाने से पहले निर्धारित कानूनी प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है।

1955 में रतनबाई जैन को दी गई थी फांसी

स्वतंत्र भारत में फांसी पाने वाली महिला के रूप में रतनबाई जैन का नाम दर्ज है। उन्हें 3 जनवरी 1955 को दिल्ली की तिहाड़ जेल में फांसी दी गई थी। रतनबाई पर तीन लड़कियों की हत्या करने का आरोप साबित हुआ था। मामले में आरोप था कि उन्होंने खाने-पीने की चीजों में जहर मिलाकर तीनों की जान ली।

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मामले में निचली अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई। इसके बाद मामला ऊपरी अदालतों तक पहुंचा, लेकिन उनकी सजा नहीं बदली। आखिरकार 1955 में उन्हें फांसी दे दी गई। इसके बाद स्वतंत्र भारत में किसी दूसरी महिला को फांसी दिए जाने का मामला सामने नहीं आया।

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रतनबाई जैन का मामला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में अदालतें कई महिलाओं को मौत की सजा सुना चुकी हैं, लेकिन उनकी फांसी नहीं हुई। किसी महिला को मृत्युदंड सुनाया जाना और वास्तव में उसे फांसी दिए जाने तक पहुंचना दो अलग-अलग स्थितियां हैं।

मथुरा जेल में क्यों बनाया गया महिला फांसीघर?

उत्तर प्रदेश के मथुरा जिला कारागार में महिलाओं को फांसी देने के लिए विशेष फांसीघर बना हुआ है। इसका निर्माण ब्रिटिश शासन के दौरान करीब 1870 में हुआ था। देश में महिला कैदी को फांसी देने की जरूरत पड़ने पर मथुरा जेल का नाम सामने आता है, क्योंकि यहां महिलाओं के लिए अलग व्यवस्था मौजूद है।

यह फांसीघर वर्ष 2021 में खास चर्चा में आया था। उस समय उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले की शबनम को फांसी दिए जाने की संभावना बनी थी। शबनम को अपने परिवार के सात सदस्यों की हत्या के मामले में मौत की सजा सुनाई गई थी। उनकी दया याचिका राष्ट्रपति की ओर से खारिज किए जाने के बाद मथुरा जेल में फांसी की तैयारियों की चर्चा हुई थी।

उस समय जेल के फांसीघर का निरीक्षण किया गया था। मेरठ के जल्लाद पवन ने भी वहां व्यवस्था देखी थी। हालांकि, शबनम को फांसी नहीं दी गई। इस तरह मथुरा जेल का महिला फांसीघर चर्चा में तो आया, लेकिन वहां किसी महिला को फांसी दिए जाने की कार्रवाई नहीं हुई।

मथुरा जेल का महिला फांसीघर देश की जेल व्यवस्था का एक खास हिस्सा है। यहां फांसीघर मौजूद होने का अर्थ यह नहीं है कि हर महिला मृत्युदंड के मामले में फांसी यहीं होगी या किसी दोषी की तारीख तय हो चुकी है। इसके लिए न्यायिक प्रक्रिया और संबंधित प्रशासनिक आदेश जरूरी होते हैं।

देश में 21 महिलाएं मृत्युदंड पा चुकी हैं

14 अक्टूबर 2026 तक उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, देश में 21 महिलाएं मौत की सजा पा चुकी हैं। इनमें नौ उत्तर प्रदेश की हैं। बाकी महिलाएं अलग-अलग राज्यों से हैं। इन मामलों में हत्या और अन्य गंभीर अपराध शामिल हैं।

डेथ रो उन कैदियों के लिए इस्तेमाल होने वाला शब्द है जिन्हें अदालत मौत की सजा सुना चुकी है और जिनकी सजा पर अंतिम कानूनी प्रक्रिया अभी पूरी नहीं हुई है या फांसी नहीं हुई है। इसका मतलब यह नहीं है कि इन सभी कैदियों की फांसी की तारीख तय है।

मौत की सजा सुनाए जाने के बाद संबंधित हाई कोर्ट से सजा की पुष्टि जरूरी होती है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील, समीक्षा याचिका और कानून के तहत उपलब्ध अन्य विकल्पों की प्रक्रिया हो सकती है। दोषी के पास दया याचिका का विकल्प भी रहता है। इसी कारण कुछ कैदी वर्षों तक मृत्युदंड की सजा के बावजूद जेल में रहते हैं।

महिला डेथ रो की संख्या समय के साथ बदल सकती है। नए मामलों में मौत की सजा सुनाए जाने, ऊपरी अदालत से सजा बदलने, बरी होने या दया याचिका पर फैसले से संख्या प्रभावित होती है।

उत्तर प्रदेश की नौ महिलाएं कौन हैं?

देश की महिला डेथ रो में उत्तर प्रदेश की नौ महिलाओं का नाम शामिल होने की जानकारी सामने आई है। हालांकि, सभी नौ मामलों में नाम, अपराध, सजा की तारीख और वर्तमान कानूनी स्थिति को एक साथ प्रमाणित करने वाला अद्यतन आधिकारिक विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए बिना पुष्टि के सभी नामों और अपराधों की सूची देना गलत होगा।

इन मामलों में एक नाम शबनम का है, जो अमरोहा के बावनखेड़ी हत्याकांड में दोषी ठहराई गई थीं। इस मामले में शबनम और सलीम को परिवार के सात सदस्यों की हत्या के लिए मौत की सजा सुनाई गई थी। दोनों की सजा ऊपरी अदालतों में बरकरार रही, लेकिन शबनम को अब तक फांसी नहीं दी गई।

शबनम ने परिवार के सात सदस्यों की हत्या की थी

अमरोहा जिले के बावनखेड़ी गांव में 14 अप्रैल 2008 की रात शबनम के परिवार के सात सदस्यों की हत्या हुई थी। मृतकों में उनके माता-पिता, भाई, भाभी और परिवार के अन्य सदस्य शामिल थे। शबनम और उनके साथी सलीम को इस हत्याकांड में दोषी ठहराया गया।

शबनम को 2010 में सत्र अदालत ने मौत की सजा सुनाई। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2013 में सजा बरकरार रखी और सुप्रीम कोर्ट ने भी 2015 में मृत्युदंड की पुष्टि की। बाद में उनकी समीक्षा याचिका और दया याचिका का मामला भी सामने आया। इसके बावजूद उनकी फांसी नहीं हुई।

शबनम का मामला देश में महिला मृत्युदंड की चर्चा का प्रमुख उदाहरण बन गया। यदि उन्हें फांसी दी जाती, तो स्वतंत्र भारत में रतनबाई जैन के बाद फांसी पाने वाली दूसरी महिला होतीं। लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

1998 में रामश्री की फांसी भी उम्रकैद में बदली

महिला मृत्युदंड के इतिहास में रामश्री का मामला भी महत्वपूर्ण है। उनके मामले में फांसी की तैयारी तक पहुंचने के बाद दया याचिका स्वीकार किए जाने से सजा बदल दी गई थी। उपलब्ध विवरण के अनुसार, 6 अप्रैल 1998 को उन्हें फांसी दिए जाने की तैयारी थी, लेकिन उनकी मौत की सजा को उम्रकैद में बदल दिया गया।

यह मामला भी दिखाता है कि फांसी की तैयारी हो जाने के बाद भी कानूनी प्रक्रिया में बदलाव से सजा लागू होने से रुक सकती है। इसलिए किसी महिला को मौत की सजा सुनाए जाने या फांसीघर की व्यवस्था तैयार होने को वास्तविक फांसी के बराबर नहीं माना जा सकता।

देश में महिला जल्लाद कितनी हैं?

भारत में महिला जल्लादों की कुल संख्या का कोई प्रमाणित राष्ट्रीय आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है। देश में महिला कैदी को फांसी देने के लिए विशेष फांसीघर मथुरा जेल में है, लेकिन वहां स्थायी रूप से नियुक्त महिला जल्लाद होने की पुष्टि नहीं है।

फांसी देने वाले जल्लादों में मेरठ के पवन जल्लाद का नाम चर्चित है। वह निर्भया मामले के दोषियों को फांसी देने वाली टीम में शामिल रहे थे। शबनम के मामले में भी उन्होंने मथुरा जेल के फांसीघर का निरीक्षण किया था। उस समय फांसीघर की तैयारियों और उपकरणों की स्थिति देखी गई थी।

मुस्कान को फांसी देने से पहले क्या होगा?

मेरठ की अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को 14 अक्टूबर 2026 को सौरभ राजपूत हत्याकांड में मौत की सजा सुनाई। दोनों को हत्या और सबूत मिटाने के मामले में दोषी ठहराया गया था। अदालत ने 126 सुनवाइयों और अभियोजन पक्ष के 22 गवाहों की गवाही के बाद फैसला सुनाया।

लेकिन सजा सुनाए जाने के तुरंत बाद फांसी नहीं दी जा सकती। मृत्युदंड के मामले में हाई कोर्ट से सजा की पुष्टि जरूरी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील और कानून के तहत उपलब्ध अन्य न्यायिक उपायों का रास्ता खुला रहता है। दया याचिका भी कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा हो सकती है।

इसीलिए अभी मुस्कान या साहिल को फांसी दिए जाने की तारीख तय मानना सही नहीं है। मुस्कान के मामले में महिला फांसीघर होने के कारण मथुरा जेल का नाम चर्चा में है, लेकिन उनकी सजा पर आगे की कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही फांसी को लेकर कोई अंतिम स्थिति बनेगी।

मौत की सजा और फांसी में कितना अंतर है?

भारत में मृत्युदंड सबसे कठोर आपराधिक सजा है। अदालत इसे केवल गंभीर मामलों में देती है। लेकिन मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भी दोषी के पास ऊपरी अदालतों में फैसले को चुनौती देने और कानून के तहत उपलब्ध दूसरे उपायों का अधिकार रहता है।

पहले निचली अदालत मौत की सजा सुनाती है। इसके बाद हाई कोर्ट से सजा की पुष्टि जरूरी होती है। दोषी सुप्रीम कोर्ट में अपील और समीक्षा याचिका दाखिल कर सकता है। दया याचिका पर भी फैसला हो सकता है। इन प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद ही फांसी लागू करने की स्थिति बनती है।

रतनबाई जैन को 1955 में फांसी दी गई थी। इसके बाद शबनम जैसे मामलों में मौत की सजा बरकरार रहने के बावजूद फांसी नहीं हुई। अब मुस्कान और साहिल को मौत की सजा सुनाए जाने के बाद भी आगे की कानूनी प्रक्रिया बाकी है।

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