क्या आपने कभी सोचा है कि जो चिप्स, नूडल्स या कोल्ड ड्रिंक आप बड़े चाव से पीते हैं, वही प्रोडक्ट यूरोप या अमेरिका में कैसा होता है? जवाब आपको हैरान कर देगा। दुनिया की दिग्गज बहुराष्ट्रीय फूड और बेवरेज कंपनियां (FMCG) भारत में एक ऐसा दोहरा खेल खेल रही हैं, जो सीधे 140 करोड़ भारतीयों की सेहत से जुड़ा है। विदेशों में सख्त स्वास्थ्य मानकों का पालन करने वाली ये कंपनियां भारत में पैकेटबंद खाने (Packaged Food) पर स्वास्थ्य चेतावनी (Health Warning Label) या 'लाल निशान' लगाने से जी चुरा रही हैं।READ ALSO:-यूपी कैबिनेट का ऐतिहासिक फैसला: 60 पार की महिलाओं को रोडवेज में फ्री सफर, 25 लाख युवाओं को टैबलेट; जानें 24 बड़े प्रस्तावों की पूरी डिटेल
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
हालिया रिपोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद इस बात का खुलासा हुआ है कि भारत में बिकने वाले जंक फूड में विदेशों की तुलना में चीनी (Sugar), सोडियम (नमक) और अनहेल्दी फैट की मात्रा बहुत अधिक पाई जा रही है।
\r\n\r\n

 

जंतर–मंतर गेम खेलें। पुलिस बनकर कॉकरोचों को पहचानो या आंदोलनकारी बनकर पहुंचो जंतर मंतर। खेलें ▶ \r\n\r\n

विदेशी कंपनियों का दोहरा मापदंड (Double Standards)

\r\n\r\n
लंदन और भारत में एक ही ग्लोबल ब्रांड के उत्पाद की तुलना करने पर हकीकत सामने आ जाती है:
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    शुगर का ओवरडोज़: लंदन में बिकने वाली फैंटा (Fanta) की एक कैन में लगभग 63 कैलोरी होती है, लेकिन जब आप वही फैंटा भारत में खरीदते हैं, तो उसमें तीन गुना ज्यादा चीनी होती है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    चेतावनी का तरीका: यूरोप में अगर किसी ड्रिंक या स्नैक में आर्टिफिशल कलर, हाई शुगर या फैट मिला हो, तो कंपनियों को पैकेट के फ्रंट (सामने) पर लाल, पीले और हरे रंग का 'ट्रैफिक-लाइट' (Traffic-Light Label) देना पड़ता है। कोका-कोला और नेस्ले जैसी कंपनियां यूरोप के दो दर्जन से ज्यादा देशों में खुशी-खुशी ये लेबल लगाती हैं।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    ब्रिटेन में मैगी पर लाल निशान: एक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि ब्रिटेन में बिकने वाली कई मैगी (Maggi) के पैकेट भारत में ही बनते हैं, लेकिन ब्रिटेन भेजे जाने वाले पैकेट्स के सामने उच्च नमक (High Salt) की चेतावनी देने वाला एक बड़ा 'लाल निशान' लगा होता है। वहीं, भारत में बिकने वाली मैगी में ऐसी कोई चेतावनी नहीं होती।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

'लाल निशान' (Red Label) से क्यों खौफ में हैं कंपनियां?

\r\n\r\n
मार्च महीने में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के अधिकारियों के साथ फूड इंडस्ट्री के दिग्गजों की एक गुप्त और अहम बैठक हुई थी। रॉयटर्स (Reuters) की एक विस्तृत रिपोर्ट के अनुसार, इस बैठक में कंपनियों ने पैकेट के सामने लाल या हरे रंग की चेतावनी लगाने का भारी विरोध किया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    80% प्रोडक्ट हो जाएंगे 'खतरनाक': इंडस्ट्री (जैसे IFBA, जिसमें पेप्सिको भी शामिल है) का सबसे बड़ा डर यह है कि अगर लाल निशान अनिवार्य कर दिया गया, तो भारत में बिकने वाला 80 प्रतिशत से ज्यादा पैकेटबंद खाना 'खतरनाक' या 'अनहेल्दी' की कैटेगरी में आ जाएगा। इससे इनकी अरबों की बिक्री सीधे तौर पर प्रभावित होगी।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    FSSAI का बैकफुट पर आना: कंपनियों के इस दबाव के आगे FSSAI झुक गया। अगस्त में एफएसएसएआई ने यह कहते हुए कलर-कोडेड वॉर्निंग का विचार छोड़ दिया कि "भारतीय खाने का स्वाद पश्चिमी खाने से अलग होता है।" लाल रंग की जगह, उन्होंने एक साधारण 'ब्लैक-एंड-व्हाइट' (Black-and-White) टेबल देने का प्रस्ताव रखा, जिस पर ग्राहकों की नज़र मुश्किल से ही जाती है।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

सुप्रीम कोर्ट की सख्त फटकार और 450 मिलियन भारतीयों की सेहत

\r\n\r\n
कंपनियों की मनमानी और FSSAI की इस लापरवाही का मामला अब देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) की चौखट पर है। हेल्थ एक्टिविस्ट्स द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने FSSAI के ढुलमुल रवैये पर कड़े सवाल उठाए हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अगस्त में कोर्ट ने FSSAI को फटकार लगाते हुए कहा, "पूरी दुनिया को यह स्पष्ट संदेश जाना चाहिए कि भारत अपने नागरिकों के स्वास्थ्य और सेहत को लेकर अत्यंत गंभीर है।"
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
द लांसेट (The Lancet) जर्नल में प्रकाशित एक हालिया स्टडी के अनुसार, अगर जंक फूड पर लगाम नहीं लगाई गई, तो साल 2050 तक भारत के करीब 45 करोड़ (450 Million) लोग मोटापे (Obesity) और उससे जुड़ी गंभीर बीमारियों (हार्ट अटैक, डायबिटीज) का शिकार हो जाएंगे।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

FSSAI का नया क्रैकडाउन: 150 से ज्यादा कंपनियों को नोटिस

\r\n\r\n
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और बढ़ते विवाद के बीच, FSSAI नींद से जागा है और उसने हाल ही में फूड कंपनियों पर बड़ा एक्शन लिया है। अगस्त के आखिरी सप्ताह में FSSAI ने 150 से अधिक दिग्गज कंपनियों को भ्रामक विज्ञापनों, झूठे दावों और लेबलिंग नियमों के उल्लंघन के लिए नोटिस जारी किया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n
\r\n
एक्शन का प्रकार
\r\n
\r\n
प्रभावित कंपनियां और ब्रांड्स
\r\n
\r\n
मल्टीनेशनल कंपनियों पर रडार
\r\n
\r\n
नेस्ले इंडिया, पेप्सिको, कोका-कोला इंडिया, एबट, मॉन्स्टर एनर्जी, मोंडेलेज इंडिया।
\r\n
\r\n
झूठे दावों पर रोक
\r\n
\r\n
एमवे (Amway), इमामी (Emami), और बॉन बिस्कुट को '100% शुद्ध' जैसे गुमराह करने वाले दावे वापस लेने पड़े।
\r\n
\r\n
ई-कॉमर्स और रेस्टोरेंट्स
\r\n
\r\n
अमेज़न और फ्लिपकार्ट को नोटिस; अमेज़न के एक वेयरहाउस का लाइसेंस रद्द। KFC, McDonald's, Pizza Hut और Domino's (5 लाइसेंस सस्पेंड) पर भी कार्रवाई।
\r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

सोशल मीडिया और 'फूड इन्फ्लुएंसर्स' की बढ़ती ताकत

\r\n\r\n
इस पूरे बदलाव में भारतीय ग्राहकों की बढ़ती जागरूकता का अहम रोल है। 'फूड फार्मर' (Food Farmer) के नाम से मशहूर रेवंत हिमात्सिंका जैसे सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स वायरल वीडियो बनाकर इन कंपनियों की पोल खोल रहे हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    किटकैट और मैगी की सच्चाई: उनके वीडियो ने दिखाया कि कैसे भारत में बिकने वाले किटकैट और मैगी की क्वालिटी यूरोप से खराब है (जैसे भारत में सस्ते पाम ऑयल का उपयोग)।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    50 साल बाद सेरेलैक (Cerelac) में बदलाव: इन्हीं एक्टिविस्ट्स के भारी दबाव के कारण, नेस्ले को 2024 में पहली बार भारत में 'शुगर-फ्री सेरेलैक' बेचना पड़ा। इससे पहले 50 सालों तक भारत में सिर्फ चीनी वाला सेरेलैक (Baby Food) ही बेचा जा रहा था, जबकि विदेशों में इसका शुगर-फ्री वर्जन लंबे समय से मौजूद है। इसी तरह सरकार के आदेश पर बोर्नविटा जैसे कैफीन ड्रिंक्स को 'एनर्जी ड्रिंक' का टैग हटाना पड़ा।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
यह लड़ाई सिर्फ चिप्स के पैकेट पर एक 'लाल निशान' की नहीं है, बल्कि भारत के भविष्य और 140 करोड़ नागरिकों के स्वास्थ्य के बुनियादी अधिकार की है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों को यह समझना होगा कि भारत कोई 'डंपिंग ग्राउंड' नहीं है, जहां वे पश्चिमी देशों के मुकाबले घटिया और अनहेल्दी माल खपा सकें। सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और ग्राहकों की जागरूकता ने कंपनियों की नींद उड़ा दी है। अब देखना यह है कि FSSAI इन कंपनियों के दबाव से पूरी तरह मुक्त होकर कब तक पैकेट पर 'लाल निशान' की अनिवार्यता लागू करता है।
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें