मुजफ्फरनगर: डिजिटल इंडिया के इस दौर में जहां तकनीक ने हमारी जिंदगी को आसान बनाया है, वहीं साइबर अपराधियों ने इसे ठगी का एक नया और खतरनाक हथियार बना लिया है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मुजफ्फरनगर जनपद साइबर अपराधियों के एक बड़े नेक्सस का अड्डा बनता जा रहा था, लेकिन मुजफ्फरनगर पुलिस और साइबर सेल ने एक बड़ी और सर्जिकल कार्रवाई करते हुए इस खतरनाक मंसूबे पर पानी फेर दिया है।Read also:-महा-राहत: आधार कार्ड धारकों की सबसे बड़ी टेंशन खत्म! बिना 'एड्रेस प्रूफ' के भी चुटकियों में अपडेट होगा घर का पता; UIDAI ने लागू किया नया नियम
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थाना साइबर क्राइम पुलिस ने एक ऐसे शातिर गिरोह का पर्दाफाश किया है, जो चंद रुपयों के कमीशन के लालच में अपने और अपने जानकारों के बैंक खाते (Mule Accounts) साइबर ठगों को किराए पर उपलब्ध करा रहा था। इन खातों का इस्तेमाल करोड़ों रुपये की काली कमाई को सफेद करने और पुलिस की आंखों में धूल झोंकने के लिए किया जा रहा था। पुलिस ने इस मामले में गिरोह के दो अहम गुर्गों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है।
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कौन हैं गिरफ्तार आरोपी और कैसे हुआ खुलासा?
\r\n\r\nसाइबर पुलिस के हत्थे चढ़े इन दोनों आरोपियों की पहचान तालिब (निवासी रामपुरम) और अरमान (निवासी अंबा विहार, मुजफ्फरनगर) के रूप में हुई है। पुलिस टीम ने जब इनके ठिकानों पर दबिश दी, तो इनके पास से साइबर अपराध में इस्तेमाल होने वाले तीन हाई-टेक मोबाइल फोन भी बरामद किए गए हैं।
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एसपी क्राइम इंदु सिद्धार्थ ने प्रेस को संबोधित करते हुए बताया कि ये दोनों आरोपी सीधे तौर पर अंतरराष्ट्रीय साइबर अपराधियों के संपर्क में थे। इनका मुख्य काम साइबर ठगों को 'म्यूल बैंक खाते' (किराए के बैंक खाते) उपलब्ध कराना था। जब देश के किसी भी हिस्से में कोई भोला-भाला नागरिक साइबर ठगी का शिकार होता था, तो ठगी गई रकम सीधे तालिब और अरमान द्वारा उपलब्ध कराए गए इन्हीं बैंक खातों में ट्रांसफर की जाती थी।
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गृह मंत्रालय के 'प्रतिबिम्ब' पोर्टल (Pratibimb Portal) ने कैसे किया अलर्ट?
\r\n\r\nइस करोड़ों के खेल का भंडाफोड़ तब हुआ जब भारत सरकार के गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा संचालित 'प्रतिबिम्ब' पोर्टल पर मुज़फ्फरनगर से संबंधित साइबर धोखाधड़ी की संदिग्ध गतिविधियां फ्लैश हुईं। प्रतिबिम्ब पोर्टल साइबर अपराधों को ट्रैक करने वाला एक उन्नत राष्ट्रीय डेटाबेस है।
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प्रारंभिक जांच में इंटेलिजेंस को जनपद में कुछ संदिग्ध बैंक खातों के संचालित होने की भनक लगी, जिनमें अचानक से देश के अलग-अलग हिस्सों से लाखों रुपये आ रहे थे और तुरंत निकाले जा रहे थे। इस इनपुट के आधार पर मुजफ्फरनगर थाना साइबर क्राइम में तत्काल प्रभाव से मुकदमा दर्ज किया गया और एक विशेष जांच टीम (SIT) का गठन कर आरोपियों की तलाश शुरू की गई।
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18 करोड़ की ठगी और 30 से ज्यादा शिकायतें
\r\n\r\nजब पुलिस ने गिरफ्तार तालिब और अरमान के बैंक खातों और मोबाइल फोन की फोरेंसिक जांच की, तो जो आंकड़े सामने आए उसने जांच अधिकारियों के भी होश उड़ा दिए।
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- \r\n 3 महीने में 80 लाख का ट्रांजैक्शन: पुलिस जांच में पुख्ता सबूत मिले हैं कि पिछले महज तीन महीनों के भीतर इन आरोपियों के खातों से लगभग 80 लाख रुपये का संदिग्ध लेन-देन हुआ है।\r\n \r\n
- \r\n पैन-इंडिया नेटवर्क: बात सिर्फ 80 लाख तक सीमित नहीं है। इन 'म्यूल खातों' के तार देशभर में फैले करीब 18 करोड़ रुपये की भारी-भरकम साइबर ठगी से जुड़े पाए गए हैं। देश के विभिन्न राज्यों के थानों और साइबर पोर्टल पर इन खातों के खिलाफ 30 से अधिक आधिकारिक शिकायतें दर्ज हैं।\r\n \r\n
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क्या था 'मोडस ऑपरेंडी' (अपराध का तरीका) और 5% का खेल?
\r\n\r\nपूछताछ के दौरान आरोपियों ने पुलिस के सामने कई अहम राज उगले हैं। उन्होंने बताया कि उनका संपर्क इस पूरे सिंडिकेट के 'मास्टरमाइंड' और पहले से गिरफ्तार मुख्य आरोपी मयूर अफजल राणा से था।
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कमीशन का लालच: राणा इन खातों का इस्तेमाल 'क्रिप्टोकरेंसी' (विशेष रूप से USDT ट्रेडिंग) के नाम पर करता था, ताकि पैसे की ट्रेल (Money Trail) को ब्लॉकचेन के जरिए गायब किया जा सके। तालिब और अरमान ने महज 5% के फिक्स कमीशन पर अपने और अपने रिश्तेदारों के बैंक खाते राणा को सौंप दिए थे। जैसे ही ठगी की रकम इनके खातों में आती थी, ये एटीएम या चेक के माध्यम से पैसे निकालकर अपना 5% हिस्सा (कमीशन) अपनी जेब में रख लेते थे और बाकी 95% नकद राशि मुख्य आरोपी मयूर अफजल राणा तक पहुंचा देते थे।
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क्या होते हैं 'म्यूल अकाउंट' (Mule Accounts)? खबरीलाल की विशेष जानकारी
\r\n\r\nआम जनता को जागरूक करने के लिए यह समझना जरूरी है कि 'म्यूल अकाउंट' क्या होता है। साइबर अपराधी अक्सर अपने असली बैंक खातों का इस्तेमाल नहीं करते हैं, क्योंकि इससे वे आसानी से पकड़े जा सकते हैं। इसके बजाय, वे गरीब छात्रों, मजदूरों या लालची लोगों को कुछ पैसों (कमीशन) का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाते हैं या उनके पुराने खातों की पासबुक, एटीएम और नेट बैंकिंग का पासवर्ड ले लेते हैं। इन खातों का उपयोग सिर्फ ठगी के पैसे को 'रिसीव' करने और उसे आगे ट्रांसफर करने के लिए किया जाता है। कानून की नजर में खाताधारक ही मुख्य आरोपी माना जाता है, इसलिए चंद रुपयों के लालच में आपका पूरा भविष्य बर्बाद हो सकता है।
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आगे की कार्रवाई: राडार पर हैं गिरोह के अन्य सदस्य
\r\n\r\nएसपी क्राइम इंदु सिद्धार्थ ने स्पष्ट किया है कि यह सिर्फ शुरुआत है। पुलिस ने बताया कि इस गिरोह के तार और भी गहरे जुड़े हो सकते हैं। इस रैकेट के अन्य सदस्यों और 'कमीशन एजेंटों' की सरगर्मी से तलाश जारी है। पूरे नेटवर्क को खंगालने के लिए साइबर सेल की तकनीकी टीम खातों की स्टेटमेंट की बारीक जांच कर रही है।
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गिरफ्तार किए गए दोनों आरोपियों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) और आईटी एक्ट (IT Act) की गंभीर और गैर-जमानती धाराओं के तहत कानूनी कार्रवाई करते हुए उन्हें न्यायालय में पेश किया गया, जहां से अदालत ने उन्हें न्यायिक हिरासत (जेल) में भेज दिया है।
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खबरीलाल की अपील: सावधान रहें, सुरक्षित रहें
\r\n\r\nमुजफ्फरनगर साइबर पुलिस और खबरीलाल न्यूज़ पोर्टल आम जनता से अपील करता है कि कभी भी किसी लालच, नौकरी के झांसे या कमीशन के चक्कर में अपना बैंक खाता, एटीएम कार्ड, यूपीआई पिन या आधार/पैन कार्ड किसी भी अनजान व्यक्ति या दोस्त को इस्तेमाल करने के लिए न दें। यदि आपके खाते का उपयोग किसी भी अवैध गतिविधि या साइबर ठगी के लिए होता है, तो पुलिस सबसे पहले आपको ही गिरफ्तार करेगी। सतर्क रहें और किसी भी संदिग्ध गतिविधि की सूचना तुरंत साइबर हेल्पलाइन '1930' पर दें।
Sabse pehle comment karne wale banein.