गुवाहाटी:
\r\n\r\nअसम की ब्रह्मपुत्र नदी की लहरें आज मानो थोड़ी थम सी गई हैं। जिस राज्य में संगीत हवाओं में घुलता है, वहां आज एक अजीब सी खामोशी है। भारत रत्न और 'सुधा कोंठो' डॉ. भूपेन हजारिका के परिवार से एक और दुखद खबर सामने आई है। भूपेन दा के सबसे छोटे भाई और अपने आप में एक बेहतरीन संगीतकार, समर हजारिका (Samar Hazarika) अब हमारे बीच नहीं रहे।READ ALSO:-Mission Western UP: बजट से पहले गूंजी 'पश्चिमी यूपी' की दहाड़; मेरठ में हाईकोर्ट बेंच और एम्स के लिए आर-पार की लड़ाई, सुरेश खन्ना ने केंद्र के सामने रखा 'मास्टर प्लान'
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मंगलवार की सुबह गुवाहाटी के लिए एक उदास सुबह साबित हुई। 75 वर्ष की आयु में समर हजारिका ने अपनी अंतिम सांस ली। वह पिछले कुछ समय से अस्वस्थ चल रहे थे और अस्पताल में भर्ती थे। नियति का खेल देखिए कि हाल ही में उन्हें अस्पताल से छुट्टी मिली थी और वह अपने घर लौटे थे, लेकिन शायद ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। उनके निधन से असमिया संगीत जगत के एक सुनहरे अध्याय का अंत हो गया है।
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यह खबर ऐसे समय में आई है जब पूरा असम 'माघ बिहू' (Magh Bihu) और 'उरुका' के जश्न की तैयारी कर रहा था। त्योहार की खुशियों के बीच इस खबर ने संगीत प्रेमियों के दिलों को भारी कर दिया है।
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अंतिम क्षण: निजारापार का वो घर जहाँ थमीं सांसें
\r\n\r\nपीटीआई (PTI) की रिपोर्ट और पारिवारिक सूत्रों के अनुसार, समर हजारिका का निधन गुवाहाटी के निजारापार (Nijarapar) इलाके में स्थित उनके पैतृक आवास पर हुआ। यह वही इलाका है जो 'हजारिका परिवार' का गढ़ माना जाता है। यहाँ की पहाड़ियों पर हजारिका परिवार के सभी सदस्य अलग-अलग घरों में रहते हैं, और यह स्थान असमिया संस्कृति का एक केंद्र भी रहा है।
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मंगलवार को जैसे ही उनके निधन की खबर बाहर आई, उनके आवास के बाहर प्रशंसकों और शुभचिंतकों की भीड़ जमा हो गई। परिवार ने उनकी मृत्यु की पुष्टि करते हुए बताया कि लंबी बीमारी से जूझने के बाद उनका शरीर थक चुका था। बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियों और हालिया अस्पताल के चक्करों ने उन्हें कमजोर कर दिया था।
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जीवन परिचय: 10 भाई-बहनों में सबसे छोटे 'समर'
\r\n\r\nसमर हजारिका का जन्म एक ऐसे परिवार में हुआ था, जहाँ संगीत ओढ़ना-बिछौना था। वह अपने माता-पिता के 10 संतानों में सबसे छोटे थे। सबसे बड़े भाई डॉ. भूपेन हजारिका थे, जिनकी ख्याति न केवल भारत बल्कि पूरी दुनिया में थी। एक वटवृक्ष जैसे बड़े भाई की छाया में अपनी अलग पहचान बनाना आसान नहीं होता, लेकिन समर हजारिका ने यह कर दिखाया।
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अक्सर देखा जाता है कि महान हस्तियों के भाई-बहन उनकी चमक के पीछे छिप जाते हैं, लेकिन समर हजारिका ने अपनी एक अलग शैली विकसित की। वह शांत स्वभाव के थे, लेकिन उनकी गायकी में एक गहरा ठहराव था। उन्होंने कभी भी अपने भाई की नकल करने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपनी खुद की एक संगीतमय पहचान बनाई।
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संगीत सफर: 1960 के दशक से अब तक
\r\n\r\nसमर हजारिका का संगीत करियर पांच दशकों से भी अधिक समय तक चला। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत 1960 के दशक में की थी, जो असमिया संगीत का स्वर्णिम दौर माना जाता है।
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- \r\n पहला एल्बम: उनका पहला एल्बम 'उत्तर कोंवर प्रोतिमा बरुआ देवी' (Uttar Konwar Protima Barua Devi) साल 1968 में रिलीज हुआ था। इस एल्बम ने उन्हें संगीत प्रेमियों के बीच पहचान दिलाई।\r\n \r\n
- \r\n प्लेबैक सिंगिंग: समर हजारिका ने केवल एल्बम तक खुद को सीमित नहीं रखा। उन्होंने असमिया फिल्म इंडस्ट्री में एक प्लेबैक सिंगर के रूप में भी अपनी छाप छोड़ी।\r\n\r\n
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- \r\n फिल्म 'उपोपथ'\r\n \r\n
- \r\n फिल्म 'बोवारी'\r\n \r\n
- \r\n फिल्म 'प्रवती पोखिर गान'\r\n\r\nइन फिल्मों में गाए उनके गीत आज भी पुराने असमिया गीतों के शौकीनों की प्लेलिस्ट में शामिल हैं।\r\n \r\n
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- \r\n संगीत निर्देशन: गायन के अलावा, उन्होंने कई प्रोजेक्ट्स के लिए संगीत (Music Composition) भी तैयार किया। उन्होंने रेडियो के लिए भी अनगिनत गाने गाए, जो उस दौर में मनोरंजन और सूचना का मुख्य साधन हुआ करता था।\r\n \r\n
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भूपेन हजारिका की विरासत के संवाहक
\r\n\r\nसमर हजारिका के जीवन का एक बड़ा हिस्सा अपने बड़े भाई, भारत रत्न डॉ. भूपेन हजारिका की विरासत को सहेजने और उसे आगे बढ़ाने में बीता।
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- \r\n समारोहों में भागीदारी: भूपेन दा के निधन (2011) के बाद, समर हजारिका अक्सर उन मंचों पर नजर आते थे जो भूपेन हजारिका को श्रद्धांजलि देने के लिए आयोजित किए जाते थे।\r\n \r\n
- \r\n प्रसिद्ध गीत: इन कार्यक्रमों में वह अक्सर भूपेन दा का लिखा और गाया हुआ एक विशेष गीत गाते थे - 'मोई बिसारिसु हेजार सोकुट' (Moi Bisarisu Hejar Sokut)। जब भी समर हजारिका मंच पर यह गीत गाते थे, दर्शकों की आंखें नम हो जाती थीं, क्योंकि उनकी आवाज में कहीं न कहीं भूपेन दा की झलक मिलती थी।\r\n \r\n
- \r\n शताब्दी समारोह: हाल के वर्षों में, भूपेन हजारिका के जन्म शताब्दी समारोहों (Centenary Celebrations) के आयोजन में भी समर हजारिका ने एक अभिभावक की भूमिका निभाई थी।\r\n \r\n
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राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएं: शोक में डूबा असम
\r\n\r\nसमर हजारिका के निधन पर असम के राजनीतिक गलियारों और सामाजिक क्षेत्रों से गहरी संवेदनाएं व्यक्त की गई हैं।
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1. मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का भावुक संदेश
\r\n\r\nअसम के मुख्यमंत्री डॉ. हिमंत बिस्वा सरमा ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' (पूर्व में ट्विटर) पर तुरंत प्रतिक्रिया दी। उन्होंने लिखा:
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\r\n\r\n\r\n"समर हजारिका की आवाज में वो जादू था जो हर मौके को खास बना देता था। उन्होंने न केवल असम की संस्कृति में बड़ा योगदान दिया, बल्कि भूपेन हजारिका की विरासत को भी पूरी शिद्दत से आगे बढ़ाया। उनके जाने से असम ने एक और बेहतरीन आवाज खो दी है। मेरी संवेदनाएं उनके परिवार के साथ हैं।"\r\n
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2. केंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल की श्रद्धांजलि
\r\n\r\nकेंद्रीय मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस घटना को सांस्कृतिक जगत के लिए एक बड़ी क्षति बताया। उन्होंने बिहू के त्योहार का जिक्र करते हुए कहा:
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\r\n\r\n\r\n"आज उरुका (माघ बिहू की पूर्व संध्या) है, और ऐसे पावन दिन पर उनका जाना बेहद दुखद है। उन्होंने अपनी आवाज से दशकों तक लोगों के दिलों को छू लिया। असमिया संगीत में उनके योगदान को पीढ़ियां याद रखेंगी।"\r\n
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3. अन्य कलाकारों की प्रतिक्रिया
\r\n\r\nजुबीन गर्ग, पापोन और अन्य आधुनिक असमिया कलाकारों ने भी सोशल मीडिया के जरिए अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। संगीत जगत का कहना है कि हजारिका परिवार का मार्गदर्शन अब कम हो गया है।
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कौन थे डॉ. भूपेन हजारिका?
\r\n\r\nचूंकि समर हजारिका की पहचान उनके बड़े भाई डॉ. भूपेन हजारिका से गहराई से जुड़ी है, इसलिए पाठकों के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि भूपेन दा कौन थे और उनका कद क्या था।
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'सुधा कोंठो' का सफर:
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- \r\n जन्म: 8 सितंबर 1926 को असम के सादिया में हुआ।\r\n \r\n
- \r\n बहुमुखी प्रतिभा: वह केवल गायक नहीं थे; वह एक कवि, संगीतकार, फिल्म निर्माता, लेखक और राजनेता भी थे। उन्हें 'बार्ड ऑफ ब्रह्मपुत्र' (Bard of the Brahmaputra) कहा जाता है।\r\n \r\n
- \r\n भाषाओं का सेतु: भूपेन हजारिका ने असमिया, हिंदी, बंगाली और अंग्रेजी सहित कई भाषाओं में गीत गाए। उन्होंने पूर्वोत्तर भारत की संस्कृति को मुख्य भूमि भारत (Mainland India) से जोड़ने का काम किया।\r\n \r\n
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प्रसिद्ध गीत:
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- \r\n असमिया/बंगाली: 'मोइ एति जाजाबोर' (मैं एक बंजारा), 'बिस्तीर्ण पारेरे', 'मानुहे मानुहोर बाबे' (इंसान इंसान के लिए)।\r\n \r\n
- \r\n हिंदी: फिल्म 'रुदाली' का गाना 'दिल हूम हूम करे', 'ओ गंगा बहती हो क्यों' (जो पॉल रोबसन के 'ओल मैन रिवर' से प्रेरित था)।\r\n \r\n
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सम्मान:
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- \r\n दादा साहेब फाल्के पुरस्कार: 1992\r\n \r\n
- \r\n पद्म विभूषण: 2012\r\n \r\n
- \r\n भारत रत्न: 2019 (मरणोपरांत)\r\n \r\n
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समर हजारिका इसी महान विरासत के अंतिम स्तंभों में से एक थे। उनके जाने से हजारिका परिवार की उस पीढ़ी का अंत करीब आ गया है जिसने असम को आधुनिक संगीत से परिचित कराया था।
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असमिया संगीत का एक युग समाप्त
\r\n\r\n1960 और 70 का दशक असमिया संगीत का 'रेनेसां' (Renaissance) काल था। यह वह दौर था जब भूपेन हजारिका, जयंत हजारिका (एक और भाई जिनका निधन युवावस्था में हो गया था), और खगेन महंत जैसे दिग्गज सक्रिय थे। समर हजारिका इसी दौर के गवाह और भागीदार थे।
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रेडियो गुवाहाटी (AIR Guwahati) उस समय कलाकारों का घर हुआ करता था। समर हजारिका ने रेडियो पर अनगिनत कार्यक्रम किए। उनके गीतों में असम की मिट्टी, यहाँ की नदियों और यहाँ के आम जनजीवन का दर्द और खुशी झलकती थी।
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नई पीढ़ी के लिए सीख:
\r\n\r\nआज के दौर में जब संगीत पूरी तरह डिजिटल हो गया है, समर हजारिका जैसे कलाकारों का जीवन नई पीढ़ी को धैर्य और साधना की सीख देता है। उन्होंने कभी भी व्यावसायिक सफलता के लिए अपनी कला से समझौता नहीं किया। वह ताउम्र अपनी जड़ों से जुड़े रहे और गुवाहाटी की उसी पहाड़ी पर रहे जहाँ उनका परिवार दशकों से रहता आया है।
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खालीपन जो कभी नहीं भरेगा
\r\n\r\nसमर हजारिका का जाना केवल एक गायक का जाना नहीं है, यह उस दौर का जाना है जब संगीत में सादगी होती थी। हालांकि वह अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनके गाए गीत और भूपेन हजारिका के साथ उनकी यादें हमेशा असमिया संस्कृति के इतिहास में दर्ज रहेंगी।
\r\n\r\nखबरीलाल की पूरी टीम की ओर से दिवंगत आत्मा को भावभीनी श्रद्धांजलि।
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तुलनात्मक सारणी: हजारिका बंधुओं का योगदान
\r\n\r\n| \r\n विशेषता \r\n | \r\n \r\n डॉ. भूपेन हजारिका \r\n | \r\n \r\n जयंत हजारिका \r\n | \r\n \r\n समर हजारिका \r\n | \r\n
| \r\n मुख्य भूमिका \r\n | \r\n \r\n विश्वस्तरीय गायक, गीतकार, फिल्मकार \r\n | \r\n \r\n क्रांतिकारी गायक, रॉक और फोक का मिश्रण \r\n | \r\n \r\n शास्त्रीय और सुगम संगीत, विरासत के संरक्षक \r\n | \r\n
| \r\n प्रसिद्धि का स्तर \r\n | \r\n \r\n अंतर्राष्ट्रीय (भारत रत्न) \r\n | \r\n \r\n राज्य स्तर पर 'राणा दा' के रूप में मशहूर \r\n | \r\n \r\n राज्य स्तर पर प्रतिष्ठित गायक \r\n | \r\n
| \r\n करियर की शुरुआत \r\n | \r\n \r\n 1930 का दशक \r\n | \r\n \r\n 1960 का दशक \r\n | \r\n \r\n 1960 का दशक \r\n | \r\n
| \r\n प्रमुख शैली \r\n | \r\n \r\n लोक संगीत, मानवतावादी गीत \r\n | \r\n \r\n प्रयोगधर्मी, आधुनिक असमिया संगीत \r\n | \r\n \r\n मधुर, भावपूर्ण और पारंपरिक \r\n | \r\n
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पाठकों के लिए नोट:
\r\n\r\nअगर आप असमिया संगीत के प्रेमी हैं, तो आज का दिन समर हजारिका और उनके परिवार के गीतों को सुनने का दिन है। आप उनके गीतों को यूट्यूब या अन्य स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर सुन सकते हैं और उन्हें याद कर सकते हैं।
Sabse pehle comment karne wale banein.