इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसले में केंद्र सरकार को वाहनों और सोशल मीडिया पर जातीय महिमा दर्शाने वाले प्रतीकों पर तुरंत रोक लगाने का आदेश दिया है। इसके साथ ही, कोर्ट ने स्कूलों में जातिवाद विरोधी पाठ और जागरूकता अभियान चलाने का निर्देश भी दिया है। यह आदेश जस्टिस विनोद दिवाकर की पीठ ने एक शराब तस्करी के आरोपी, प्रवीण छेत्री के मामले में सुनवाई के दौरान दिया।READ ALSO:-कल से बदल जाएंगे GST रेट, जानिए किचन से लेकर गाड़ियों तक, क्या होगा सस्ता और क्या महंगा
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पुलिस की 'जाति' वाली दलील खारिज
\r\n\r\nयह मामला तब सामने आया जब पुलिस के दस्तावेजों में आरोपी की जाति का उल्लेख पाया गया। इस पर कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के डीजीपी से जवाब मांगा था। डीजीपी ने अपने हलफनामे में तर्क दिया था कि जाति लोगों की पहचान करने में मदद करती है। कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि आधुनिक तकनीक के इस दौर में यह एक "कुतर्क" है।
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कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब पहचान के लिए फिंगरप्रिंट, आधार, मोबाइल नंबर और माता-पिता के विवरण जैसे आधुनिक साधन उपलब्ध हैं, तो जाति पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है। कोर्ट ने राज्य सरकार को तुरंत पुलिस फॉर्म से जाति और धर्म की प्रविष्टियां हटाने का निर्देश दिया, सिवाय उन मामलों के जो अनुसूचित जाति/जनजाति से संबंधित हैं। साथ ही, थानों में भी जाति महिमा वाले साइन बोर्ड नहीं दिखने चाहिए।
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क्या था पूरा मामला?
\r\n\r\nयह पूरा मामला 29 अप्रैल 2023 का है, जब इटावा में प्रवीण छेत्री और उसके साथियों की दो कारों से 300 बोतल अवैध शराब बरामद की गई थी। पुलिस ने प्रवीण को शराब तस्करी गिरोह का सरगना बताया, जिसके बाद उसने हाईकोर्ट में अपने खिलाफ चल रही कार्यवाही को चुनौती दी थी। इसी सुनवाई के दौरान पुलिस के दस्तावेजों में जाति का उल्लेख होने पर कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया और यह महत्वपूर्ण फैसला सुनाया।
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यह फैसला न केवल जाति के आधार पर पहचान को समाप्त करने की दिशा में एक बड़ा कदम है, बल्कि समाज में समानता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए भी एक मजबूत संदेश देता है।
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