भारतीय संस्कृति में एक मां और उसकी संतान के बीच का प्रेम और वात्सल्य बेहद अनूठा और गहरा होता है। इसी अटूट प्रेम और वात्सल्य का सबसे बड़ा प्रतीक 'अहोई अष्टमी' (Ahoi Ashtami) का पावन पर्व है। दीपावली से ठीक एक सप्ताह पहले मनाए जाने वाले इस त्योहार का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है। इस साल रविवार, 1 नवंबर 2026 को अहोई अष्टमी का व्रत पूरे श्रद्धाभाव के साथ रखा जाएगा। यह व्रत माताएं अपनी संतान की लंबी उम्र, उनके अच्छे स्वास्थ्य, खुशहाली और जीवन में सुख-समृद्धि की कामना के साथ रखती हैं। इस दिन महिलाएं पूरे दिन अन्न और जल का त्याग कर कठोर 'निर्जला व्रत' (Nirjala Vrat) का पालन करती हैं। शाम के समय तारों की छांव में अहोई माता (Ahoi Mata) की विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपने बच्चों के उज्ज्वल भविष्य की प्रार्थना की जाती है। बिजनौर जिले में इस पर्व को लेकर महिलाओं में भारी उत्साह देखने को मिल रहा है और बाजारों में पूजा सामग्री की खरीदारी जोरों पर है।

धामपुर के ज्योतिषाचार्य से जानें तिथि और शुभ मुहूर्त

Ahoi Ashtami 2026 की सटीक तिथि और पूजा के शुभ मुहूर्त को लेकर बिजनौर (Bijnor) जिले के धामपुर (Dhampur) नगर के विख्यात ज्योतिषाचार्य पंडित निशान्त गौड़ जी (Pandit Nishant Gaur Ji) ने विस्तृत जानकारी साझा की है।

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पंडित निशान्त गौड़ जी के अनुसार, इस वर्ष कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि का आरंभ 1 नवंबर 2026, रविवार को दोपहर 2 बजकर 51 मिनट से हो रहा है। यह अष्टमी तिथि अगले दिन यानी 2 नवंबर 2026, सोमवार को दोपहर 1 बजकर 10 मिनट तक प्रभावी रहेगी। हिंदू धर्म में उदया तिथि और तारों को अर्घ्य देने की परंपरा के अनुसार अहोई अष्टमी का मुख्य व्रत 1 नवंबर को ही मान्य होगा। पंडित जी ने बताया कि अहोई माता की पूजा-अर्चना का सबसे उत्तम और शुभ मुहूर्त (Shubh Muhurat) रविवार शाम 5 बजकर 36 मिनट से शुरू होकर शाम 6 बजकर 54 मिनट तक रहेगा। इस 1 घंटे 18 मिनट की अवधि में माताओं को अपनी पूजा और व्रत कथा संपन्न कर लेनी चाहिए। इसके बाद शाम करीब 6 बजे आसमान में तारे निकलने (Star Sighting) पर उन्हें जल अर्पित कर व्रत पूर्ण किया जाएगा।

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बेटा और बेटी, दोनों की खुशहाली के लिए रखा जाता है व्रत

अहोई अष्टमी का यह व्रत मुख्य रूप से संतान की रक्षा और उसकी लंबी आयु के लिए किया जाता है। पंडित निशान्त गौड़ जी ने इस व्रत के धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि, अहोई अष्टमी का पर्व केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि यह एक मां की सच्ची तपस्या है।

धार्मिक मान्यताओं और शास्त्रों के अनुसार, इस दिन अहोई माता की विधि-विधान से पूजा करने और सच्चे मन से व्रत कथा (Vrat Katha) सुनने से संतान पर आने वाले सभी संकट टल जाते हैं। अहोई माता की कृपा से बच्चों को जीवन में सफलता, उत्तम स्वास्थ्य और समृद्धि प्राप्त होती है। पुजारी जी ने बताया कि पहले के समय में यह व्रत मुख्य रूप से केवल पुत्रों की लंबी उम्र के लिए रखा जाता था, लेकिन बदलते समय और आधुनिक समाज की सकारात्मक सोच के साथ, अब माताएं अपने बेटों और बेटियों, दोनों की समान रूप से खुशहाली और तरक्की के लिए यह निर्जला व्रत रखती हैं।

अहोई माता की पूजा विधि और व्रत के नियम

व्रत रखने वाली माताओं को अहोई माता की पूजा पूरी श्रद्धा और तय नियमों के साथ करनी चाहिए। शास्त्रों में वर्णित पूजा विधि के अनुसार:

  • संकल्प और तैयारी: व्रत के दिन प्रातः काल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करने के बाद अहोई माता का ध्यान करते हुए निर्जला व्रत का संकल्प लें।

  • आकृति और स्थापना: पूजा की तैयारी के लिए घर की उत्तर-पूर्व दिशा (ईशान कोण) की साफ दीवार पर गेरू से अहोई माता और उनके सात बच्चों (स्याहु माता) की सुंदर आकृति बनाएं। यदि आकृति बनाना संभव न हो, तो बाजार से लाया गया अहोई माता का चित्र स्थापित करें।

  • सायंकाल की पूजा: शाम के समय तय शुभ मुहूर्त में पूजा स्थल पर दीपक (Diya) जलाएं। माता को रोली, कुमकुम, अक्षत (चावल), लाल पुष्प अर्पित करें। प्रसाद के रूप में घर में बने मालपुए, हलवा या अन्य मिठाई का भोग लगाएं।

  • व्रत कथा और स्याहु की माला: एक कलश में शुद्ध जल भरकर रखें और हाथ में गेहूं के दाने लेकर अहोई अष्टमी की पारंपरिक व्रत कथा सुनें। कई महिलाएं इस दिन चांदी की मोतियों वाली 'स्याहु की माला' भी पहनती हैं, जिसमें हर साल संतान के नाम का एक नया मोती पिरोया जाता है।

तारों को अर्घ्य देकर होता है पारण

कथा संपन्न होने के बाद जब शाम को आसमान में तारे निकल आते हैं, तब माताएं कलश के उसी शुद्ध जल से तारों को अर्घ्य (Arghya) देती हैं। तारों को अर्घ्य देते समय वे अपनी संतान के सुखी जीवन और दीर्घायु की मंगल कामना करती हैं। अर्घ्य देने के पश्चात घर के बड़े-बुजुर्गों के चरण स्पर्श कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है, जिसके बाद जल ग्रहण कर व्रत का पारण (Fast Breaking) किया जाता है। परिवार में सुख-शांति के लिए इस दिन सात्विक भोजन ही ग्रहण किया जाता है।

डिस्क्लेमर: यह लेख अहोई अष्टमी से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं, परंपराओं और उपलब्ध पंचांग संबंधी जानकारी पर आधारित है। पूजा का शुभ मुहूर्त और तिथि अलग-अलग स्थानों एवं पंचांगों के अनुसार बदल सकते हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं पूजा से पहले स्थानीय पंचांग या योग्य पंडित से समय की पुष्टि कर लें। धार्मिक मान्यताओं को आस्था के रूप में लें।

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