भारतवर्ष त्योहारों का देश है, और यहाँ हर ऋतु, हर मौसम का अपना एक अलग उल्लास होता है। जब बात फाल्गुन मास की हो, तो हवाओं में अपने आप ही अबीर और गुलाल की महक घुलने लगती है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का ऐतिहासिक नगर धामपुर (जनपद बिजनौर) अपनी अनूठी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासतों के लिए पूरे राज्य में जाना जाता है। यहाँ के त्योहार केवल रस्में नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक समरसता, भाईचारे और असीम आनंद के जीवंत प्रतीक हैं। इसी कड़ी में धामपुर नगर में 'रंग एकादशी' के पावन पर्व पर एक बेहद भव्य, ऐतिहासिक और विशाल 'गीले रंग का जुलूस' निकाला गया, जिसने पूरे शहर को होली के सतरंगी उल्लास में डुबो दिया।READ ALSO:-आगरा में गूंजी गोलियों की तड़तड़ाहट: नोएडा STF के खौफनाक एनकाउंटर में ढेर हुआ 50 हजारी कुख्यात शूटर पवन बंसल उर्फ कल्लू
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यह आयोजन केवल कुछ घंटों का एक जुलूस नहीं था; यह धामपुर की उस समृद्ध परंपरा का हिस्सा था जो सदियों से पीढ़ियों को एक-दूसरे से जोड़ती आई है। रंग एकादशी (जिसे फाल्गुन शुक्ल एकादशी या आमलकी एकादशी के रूप में भी जाना जाता है) ब्रज और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में होली के मुख्य पर्व की औपचारिक शुरुआत मानी जाती है। इसी दिन से रंगों का खुमार चरम पर पहुंच जाता है। धामपुर का यह जुलूस इस बात का प्रमाण था कि आधुनिकता के इस दौर में भी लोगों ने अपनी जड़ों और अपनी संस्कृति को कितने गहरे प्यार से संजो कर रखा है।
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1. आयोजन का उद्गम: मंदिर बजरिया ठाकुरद्वारा का प्रांगण
\r\n\r\nइस विशाल रंगारंग आयोजन का केंद्र बिंदु धामपुर का प्रसिद्ध और प्राचीन 'मंदिर बजरिया ठाकुरद्वारा' रहा। यह मंदिर न केवल आस्था का एक बड़ा केंद्र है, बल्कि शहर की सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का हृदय भी है। रंग एकादशी के दिन सुबह से ही मंदिर प्रांगण में श्रद्धालुओं और उत्साही युवाओं की भारी भीड़ उमड़नी शुरू हो गई थी। हर चेहरे पर होली का उत्साह और माथे पर चंदन-गुलाल का टीका सज़ा हुआ था।
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नेतृत्व और मार्गदर्शन की भूमिका किसी भी बड़े आयोजन को सफल बनाने के लिए एक मजबूत और अनुभवी नेतृत्व की आवश्यकता होती है। इस भव्य जुलूस का खाका तैयार करने और इसे धरातल पर उतारने का श्रेय नगर की तीन प्रमुख और सम्मानित हस्तियों को जाता है:
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- \r\n बिहू प्रकाश बंसल (महासचिव): जिनकी संगठनात्मक क्षमता ने इस जुलूस के हर छोटे-बड़े पहलू को व्यवस्थित किया।\r\n \r\n
- \r\n पवन एडवोकेट: जिन्होंने कानूनी और प्रशासनिक समन्वय स्थापित करते हुए यह सुनिश्चित किया कि आयोजन नियमों के दायरे में और पूरी भव्यता के साथ हो।\r\n \r\n
- \r\n दिनेश अग्रवाल 'नवीन' (प्रसिद्ध समाजसेवी): जिनकी सामाजिक पकड़ और लोगों से जुड़ाव ने इस जुलूस में भारी जनभागीदारी सुनिश्चित की।\r\n \r\n
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इन तीनों के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन में मंदिर बजरिया ठाकुरद्वारा से जब यह जुलूस उठा, तो शंखनाद, ढोल-नगाड़ों और "होली है!" के गगनभेदी नारों से पूरा आसमान गूंज उठा।
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2. भव्य उद्घाटन समारोह: नगर के प्रथम नागरिक और अतिथियों का सत्कार
\r\n\r\nभारतीय संस्कृति में किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत बड़ों के आशीर्वाद और गणमान्य अतिथियों के सम्मान के साथ की जाती है। जुलूस को रवाना करने से पूर्व मंदिर प्रांगण में एक अत्यंत गरिमामयी उद्घाटन समारोह का आयोजन किया गया।
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उद्घाटनकर्ताओं की सूची: इस ऐतिहासिक जुलूस का फीता काटकर और हरी झंडी दिखाकर विधिवत उद्घाटन करने का गौरव नगर की तीन प्रमुख हस्तियों को प्राप्त हुआ:
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- \r\n चौधरी देवी कुमार सिंह: धामपुर नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष (चेयरमैन) और नगर के प्रथम नागरिक। उनकी उपस्थिति ने इस आयोजन को एक आधिकारिक और मजबूत प्रशासनिक समर्थन प्रदान किया।\r\n \r\n
- \r\n दीपक अग्रवाल: धामपुर नगर मंडल भाजपा के अध्यक्ष और क्षेत्र के जाने-माने समाजसेवी।\r\n \r\n
- \r\n सुमित महेश्वरी: नगर के सक्रिय और लोकप्रिय सभासद (वार्ड पार्षद)।\r\n \r\n
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पगड़ी और बैज अलंकरण: सम्मान की अनूठी परंपरा उद्घाटन समारोह का सबसे खूबसूरत पल वह था जब आयोजन समिति द्वारा अतिथियों का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया गया। महासचिव बिहू प्रकाश बंसल और पवन एडवोकेट ने अपने हाथों से मुख्य अतिथियों—चौधरी देवी कुमार सिंह, दीपक अग्रवाल और सुमित महेश्वरी—को सम्मान स्वरूप साफा (पगड़ी) पहनाया। पश्चिमी उत्तर प्रदेश और भारतीय संस्कृति में पगड़ी को मान, सम्मान और जिम्मेदारी का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता है। इसके साथ ही सभी अतिथियों को आयोजन समिति का विशेष 'बैज' (Badge) लगाकर अलंकृत किया गया। इस सत्कार ने वहां मौजूद सैकड़ों लोगों का दिल जीत लिया और पूरे माहौल में एक सकारात्मक ऊर्जा भर दी।
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3. जुलूस का स्वरूप: झांकियां, ट्रैक्टर-ट्रालियां और रंगों का महासागर
\r\n\r\nजैसे ही जुलूस ने ठाकुरद्वारा मंदिर से शहर के मुख्य मार्गों की ओर प्रस्थान किया, धामपुर की सड़कें रंगों के महासागर में तब्दील हो गईं। यह कोई साधारण जुलूस नहीं था; इसके इंतजाम और इसका स्वरूप किसी बड़े शाही कारवां से कम नहीं था।
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मनमोहक धार्मिक और सांस्कृतिक झांकियां जुलूस के सबसे आगे मनमोहक और सजीव झांकियां (Tableaus) चल रही थीं। इन झांकियों में राधा-कृष्ण की फूलों और रंगों की होली, भगवान शिव-पार्वती का स्वरूप, और प्रहलाद-होलिका के पौराणिक आख्यानों को बेहद खूबसूरती से दर्शाया गया था। स्थानीय कलाकारों ने इन झांकियों में अपनी कला का ऐसा शानदार प्रदर्शन किया कि सड़क के दोनों ओर खड़े दर्शक मंत्रमुग्ध रह गए। लोग अपनी छतों और बालकनियों से इन झांकियों पर फूलों की वर्षा कर रहे थे।
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5 ट्रैक्टर-ट्रालियों का काफिला और रंगों के ड्रम इस 'गीले रंग के जुलूस' की सबसे बड़ी खासियत इसकी विशाल व्यवस्था थी। जुलूस के बीचों-बीच 5 बड़ी ट्रैक्टर-ट्रालियां चल रही थीं। इन ट्रालियों पर पानी और पक्के/कच्चे रंगों से भरे हुए बड़े-बड़े ड्रम रखे गए थे। युवाओं की टोलियां इन ट्रालियों पर सवार थीं और अत्याधुनिक पिचकारियों, बाल्टियों और मोटर-पंपों के जरिए चारों तरफ रंगों की बौछार कर रही थीं। लाल, हरा, पीला, गुलाबी—हर रंग हवा में उड़ रहा था। यह दृश्य ऐसा था मानो आसमान से इंद्रधनुष पिघलकर धामपुर की सड़कों पर उतर आया हो।
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हुरियारों का उल्लास और होली के गीत सैकड़ों की संख्या में नगरवासी, जिन्हें ब्रज की भाषा में 'हुरियारे' कहा जाता है, डीजे और ढोल-ताशों की धुन पर नाचते-गाते चल रहे थे। "रंग बरसे भीगे चुनरवाली", "होरी खेले रघुवीरा" और पारंपरिक फाग गीतों ने पूरे माहौल को संगीतमय बना दिया था। लोग ऊंच-नीच, अमीर-गरीब और जाति-पांति के सभी भेदभाव भूलकर एक-दूसरे को गले लगा रहे थे और प्रेम से गुलाल मल रहे थे।
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4. जनभागीदारी: धामपुर वासियों का असीम उत्साह
\r\n\r\nकिसी भी त्योहार की असली सफलता उसमें आम जनता की भागीदारी से मापी जाती है। रंग एकादशी के इस जुलूस ने यह साबित कर दिया कि धामपुर के लोगों के दिलों में अपनी संस्कृति के लिए कितना प्रेम है। जुलूस जिस भी बाजार, गली या चौराहे से गुजरा, वहां के निवासियों और दुकानदारों ने उसका भव्य स्वागत किया।
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जगह-जगह पर जुलूस में शामिल लोगों के लिए जलपान, ठंडाई, गुजिया, मिठाई और शरबत की व्यवस्था की गई थी। यह धामपुर की उस गंगा-जमुनी तहजीब और आपसी भाईचारे का परिचायक है, जहां हर व्यक्ति दूसरे की खुशी में अपनी खुशी तलाशता है। बच्चे, बुजुर्ग, महिलाएं और युवा—हर आयु वर्ग के लोगों ने इस जुलूस में अपनी सक्रिय उपस्थिति दर्ज कराई। महिलाओं ने अपने घरों की छतों से रंग और फूल बरसा कर इस जुलूस का स्वागत किया। यह जनसैलाब इस बात की गवाही दे रहा था कि तनाव और भागदौड़ भरी इस आधुनिक जिंदगी में, ऐसे आयोजन मानसिक शांति और सामाजिक जुड़ाव का एक बहुत बड़ा माध्यम हैं।
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5. पुलिस प्रशासन की भूमिका: सुरक्षा, मुस्तैदी और शांति का आधार
\r\n\r\nऐसे बड़े और भीड़भाड़ वाले आयोजनों में सबसे बड़ी चुनौती कानून-व्यवस्था (Law and Order) और यातायात नियंत्रण की होती है। रंगों के इस त्योहार में अक्सर शरारती तत्वों द्वारा हुड़दंग मचाने या किसी विवाद के उत्पन्न होने का अंदेशा रहता है। लेकिन धामपुर में रंग एकादशी का यह विशाल जुलूस जिस शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ, उसका पूरा श्रेय धामपुर पुलिस प्रशासन की उत्कृष्ट कार्यकुशलता और अचूक रणनीति को जाता है।
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पुलिस की चाक-चौबंद व्यवस्था: जुलूस निकलने से कई दिन पहले ही पुलिस प्रशासन ने आयोजकों के साथ कई दौर की बैठकें की थीं। जुलूस के पूरे मार्ग का पहले ही मुआयना कर लिया गया था। सुरक्षा व्यवस्था को कई जोन्स (Zones) और सेक्टर्स (Sectors) में बांटा गया था।
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- \r\n रूट डायवर्जन और ट्रैफिक मैनेजमेंट: जुलूस के दौरान आम नागरिकों को परेशानी न हो, इसके लिए शहर के मुख्य मार्गों पर शानदार रूट डायवर्जन किया गया था। चप्पे-चप्पे पर ट्रैफिक पुलिस के जवान तैनात थे जो यातायात को सुचारू रूप से संचालित कर रहे थे।\r\n \r\n
- \r\n भारी पुलिस बल की तैनाती: जुलूस के आगे, पीछे और दोनों किनारों पर भारी पुलिस बल मुस्तैदी से चल रहा था। महिला पुलिसकर्मियों की भी पर्याप्त तैनाती की गई थी ताकि जुलूस में शामिल महिलाओं और छतों पर खड़ी युवतियों को पूरी सुरक्षा का एहसास हो।\r\n \r\n
- \r\n ड्रोन और सीसीटीवी से निगरानी: आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हुए पुलिस ने संवेदनशील इलाकों में ड्रोन कैमरों और सीसीटीवी के माध्यम से पूरे जुलूस की पैनी निगरानी की।\r\n \r\n
- \r\n अधिकारियों का जमीनी संपर्क: थानेदार (SHO) और क्षेत्राधिकारी (CO) स्तर के अधिकारी खुद सड़क पर उतरकर व्यवस्था संभाल रहे थे और आयोजकों के साथ निरंतर संपर्क में थे।\r\n \r\n
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पुलिस की इस शानदार कार्यकुशलता, धैर्य और मित्रवत व्यवहार का ही परिणाम था कि सैकड़ों लीटर रंग उड़ने और हजारों की भीड़ होने के बावजूद कहीं कोई अप्रिय घटना नहीं हुई। संपूर्ण जुलूस एक उत्सव के माहौल में, सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण तरीके से अपने गंतव्य पर पहुंचकर संपन्न हुआ। आयोजन समिति और नगरवासियों ने प्रशासन की इस मुस्तैदी की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है।
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6. रंग एकादशी का सांस्कृतिक और आध्यात्मिक महत्व
\r\n\r\nइस खबर के विस्तार में यह समझना भी बेहद जरूरी है कि 'रंग एकादशी' केवल एक जुलूस का नाम नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक गहरा आध्यात्मिक और सांस्कृतिक दर्शन छिपा है।
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हिन्दू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को 'आमलकी एकादशी' या 'रंग एकादशी' कहा जाता है। ब्रज मंडल (मथुरा, वृंदावन, बरसाना) और उसके आसपास के जनपदों (जैसे बिजनौर, मुरादाबाद आदि) में इस दिन को भगवान श्रीकृष्ण और राधा रानी के प्रेम के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन से भगवान कृष्ण ने अपने सखाओं और गोपियों के साथ होली खेलने की शुरुआत की थी।
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यह दिन हमें यह संदेश देता है कि जिस तरह एकादशी का व्रत मन और शरीर की शुद्धि करता है, उसी तरह रंगों का यह पर्व हमारे मन में जमे हुए द्वेष, ईर्ष्या और नफरत के मेल को धो डालता है। जब हम किसी पर रंग डालते हैं, तो हम अनजाने में उसके सभी बाहरी आवरणों (अहंकार, पद, पैसा) को एक ही रंग में रंग देते हैं। रंग में रंगा हुआ हर इंसान एक जैसा दिखता है—यही समानता और यही समरसता होली का वास्तविक अर्थ है। धामपुर के जुलूस में भी यही दर्शन साफ झलकता दिखाई दिया।
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7. सामाजिक संदेश: एकता और भाईचारे की मिसाल बना धामपुर
\r\n\r\nआज के समय में जब समाज कई तरह के वैचारिक और सामाजिक वर्गों में बंटा हुआ नजर आता है, तब धामपुर का यह रंग एकादशी जुलूस एक बहुत बड़ा और सकारात्मक संदेश देता है।
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दिनेश अग्रवाल 'नवीन' जैसे समाजसेवियों, बिहू प्रकाश बंसल और पवन एडवोकेट जैसे आयोजकों, तथा चौधरी देवी कुमार सिंह व दीपक अग्रवाल जैसे जन-प्रतिनिधियों का एक साथ मंच साझा करना और सड़क पर आम जनता के साथ होली खेलना यह बताता है कि पर्व और त्योहार नेतृत्व को सीधे जनता से जोड़ते हैं।
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इस जुलूस ने यह भी साबित किया कि यदि आयोजकों की नीयत साफ हो, जनता का उत्साह सकारात्मक हो, और प्रशासन सतर्क व सहयोगी हो, तो बड़े से बड़ा आयोजन बिना किसी बाधा के, एक उत्सव और आनंद के महाकुंभ में बदला जा सकता है। धामपुर के नागरिकों ने जिस तरह से अनुशासन और उल्लास का अद्भुत संतुलन बनाए रखा, वह आस-पास के अन्य शहरों और कस्बों के लिए भी एक बेहतरीन केस स्टडी (Case Study) और प्रेरणा है।
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स्मृतियों में दर्ज हुआ एक और शानदार आयोजन
\r\n\r\nशाम ढलने के साथ जब यह रंग एकादशी का विशाल और भव्य जुलूस अपने समापन स्थल पर पहुंचा, तब तक पूरा धामपुर शहर सतरंगी छटा में नहा चुका था। लोगों के कपड़े जरूर गीले रंगों से सराबोर थे, लेकिन उनके दिल प्रेम और भाईचारे की गर्माहट से भरे हुए थे।
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आयोजक मंडल ने अंत में जुलूस में शामिल हुए सभी श्रद्धालुओं, नगरवासियों, मीडियाकर्मियों और विशेष रूप से पुलिस प्रशासन का आभार व्यक्त किया। मंदिर बजरिया ठाकुरद्वारा से उठी यह रंगों की लहर धामपुर के इतिहास में एक और शानदार अध्याय जोड़ गई। यह आयोजन न केवल धार्मिक परंपराओं का निर्वहन था, बल्कि यह धामपुर की उस साझा संस्कृति की जीत थी जो हमेशा से प्रेम, सौहार्द और एकता के रंग में रंगी रही है। आने वाले कई दिनों तक धामपुर की फिजाओं में इस ऐतिहासिक जुलूस के उल्लास की चर्चाएं गूंजती रहेंगी।

Sabse pehle comment karne wale banein.