मंगलवार को उत्तर प्रदेश के विधानमंडल का सत्र राजनीतिक तापमान बढ़ाने वाला साबित हुआ। एक तरफ जहाँ लोकतंत्र के मंदिर में कार्यपालिका (Bureaucracy) और विधायिका (Legislature) के बीच का टकराव खुलकर सामने आया, वहीं दूसरी तरफ बुनियादी सुविधाओं—शिक्षा और बिजली—को लेकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच तीखी नोकझोंक देखने को मिली।Read also:-मेरठ: आपकी रसोई में पक रहा है खाना या 'मौत'? पुलिस ने ब्रांडेड कंपनियों के नाम पर चल रही 'बारूद की फैक्ट्री' का किया पर्दाफाश
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सदन की कार्यवाही के दौरान तीन प्रमुख मुद्दे केंद्र में रहे:
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    अधिकारियों द्वारा जनप्रतिनिधियों (विधायकों) का फोन न उठाना और प्रोटोकॉल का उल्लंघन।
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    बेसिक शिक्षा विभाग द्वारा हर जिले में 25-25 करोड़ रुपये की लागत से दो 'कम्पोजिट स्कूल' बनाने की बड़ी घोषणा।
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    बिजली संकट, स्मार्ट मीटर और अघोषित कटौती को लेकर विधान परिषद में सपा का वॉकआउट।
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इस विस्तृत रिपोर्ट में हम सदन के भीतर हुई एक-एक घटना, आरोप-प्रत्यारोप और सरकार की नई योजनाओं का बारीकी से विश्लेषण करेंगे।
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"हेलो! कौन?"—जब सदन में गूंजा अफसरों की 'नाफरमानी' का दर्द

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मंगलवार को विधानसभा की कार्यवाही शुरू होते ही सबसे ज्वलंत मुद्दा 'अफसरशाही की तानाशाही' का उठा। यह मुद्दा किसी एक पार्टी का नहीं, बल्कि सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों के विधायकों का साझा दर्द बनकर उभरा।
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नेता प्रतिपक्ष का बड़ा हमला: समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और नेता प्रतिपक्ष माता प्रसाद पांडेय ने सदन में सरकार को घेरते हुए कहा कि प्रदेश में कार्यपालिका (अधिकारी), विधायिका (जनप्रतिनिधि) पर हावी हो रही है, जो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए खतरे की घंटी है।
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पांडेय ने बेहद तल्ख लहजे में कहा:
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"अधिकारी जनप्रतिनिधियों के फोन तक नहीं उठाते। वे जनता की समस्याओं को सुनने के बजाय दलाली में व्यस्त रहते हैं। जब एक चुना हुआ प्रतिनिधि अपनी जनता की बात लेकर अधिकारी को फोन करता है और उसे जवाब नहीं मिलता, तो यह केवल उस विधायक का अपमान नहीं, बल्कि उस पूरी जनता का अपमान है जिसने उसे चुना है।"
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उन्होंने विधानसभा अध्यक्ष से मांग की कि पीठ इस मामले में हस्तक्षेप करे और सदन की गरिमा की रक्षा के लिए अधिकारियों पर लगाम लगाए।
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सत्ता पक्ष के विधायकों का भी छलका दर्द: आमतौर पर विपक्ष ही सरकार को घेरता है, लेकिन इस मुद्दे पर सपा विधायक कमाल अख्तर ने एक चौंकाने वाला बयान दिया। उन्होंने कहा, "स्थिति इतनी भयावह हो चुकी है कि अब तो सत्ता पक्ष (भाजपा) के विधायकों को भी अपनी बात मनवाने के लिए अपनी ही सरकार के अधिकारियों के खिलाफ धरने पर बैठना पड़ रहा है।"
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सपा विधायक संग्राम सिंह यादव और रागिनी सोनकर ने भी सुर में सुर मिलाते हुए कहा कि अधिकारी न तो फोन उठाते हैं और न ही समस्याओं का निस्तारण करते हैं। प्रोटोकॉल का खुला उल्लंघन हो रहा है। संग्राम सिंह यादव ने स्पष्ट कहा कि विधानसभा द्वारा तय प्रोटोकॉल का पालन सुनिश्चित होना चाहिए।
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सरकार और स्पीकर का जवाब: विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना ने इस मुद्दे को गंभीरता से लिया। उन्होंने स्वीकार किया कि मामला पीठ के संज्ञान में है और उन्होंने आश्वासन दिया कि संसदीय कार्य मंत्री के साथ मिलकर इसका ठोस समाधान निकाला जाएगा।
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वहीं, संसदीय कार्य मंत्री सुरेश खन्ना ने सरकार का बचाव करते हुए कहा:
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    "कार्यपालिका के व्यवस्थापिका पर हावी होने का सवाल ही नहीं उठता।"
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    "जो अधिकारी जानबूझकर फोन नहीं उठाते, सरकार उनके साथ नहीं है। हम पुराने शासनादेशों (GOs) को कड़ाई से लागू करेंगे।"
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मंत्री असीम अरुण का सुझाव: इस समस्या के तकनीकी समाधान के लिए मंत्री असीम अरुण ने एक महत्वपूर्ण सुझाव दिया। उन्होंने कहा कि प्रदेश या जिला स्तर पर अधिकारियों के 'अधिकृत सीयूजी नंबर' (CUG Numbers) की निगरानी होनी चाहिए, जिन पर जवाब देना अनिवार्य हो। साथ ही, उन्होंने यह भी जोड़ा कि कभी-कभी अधिकारी बैठकों में व्यस्त होते हैं, इसलिए एक ऐसी व्यवस्था बने जिससे 'कॉलबैक' सुनिश्चित हो सके।
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शिक्षा में क्रांति: हर जिले में बनेंगे 'प्राइवेट' जैसी सुविधाओं वाले सरकारी स्कूल 

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हंगामे के बीच सदन में एक बड़ी और सकारात्मक खबर भी आई। प्रदेश के बेसिक शिक्षा मंत्री संदीप सिंह ने शिक्षा व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए एक महत्वाकांक्षी योजना का ऐलान किया।
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योजना के मुख्य बिंदु:

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    हर जिले में 2 स्कूल: उत्तर प्रदेश के सभी 75 जिलों में दो-दो 'कम्पोजिट स्कूल' (Composite Schools) बनाए जाएंगे।
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    लागत: एक स्कूल के निर्माण पर करीब 25 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। यह धनराशि स्कूल के इंफ्रास्ट्रक्चर और सुविधाओं को विश्वस्तरीय बनाने में उपयोग होगी।
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    सुविधाएं: मंत्री संदीप सिंह ने दावा किया कि इन स्कूलों में निजी (कॉन्वेंट) स्कूलों जैसी वर्ल्ड क्लास सुविधाएं होंगी। इसमें स्मार्ट क्लास, आधुनिक लैब, खेल का मैदान, डिजिटल लाइब्रेरी और बेहतरीन फर्नीचर शामिल होगा।
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मंत्री ने आत्मविश्वास के साथ कहा, "इन स्कूलों के बनने के बाद सरकारी स्कूलों की छवि बदल जाएगी। यहाँ सुविधाओं का स्तर इतना ऊँचा होगा कि बच्चों के एडमिशन के लिए अभिभावकों के बीच मारामारी रहेगी। गरीब का बच्चा भी अब उन सुविधाओं में पढ़ेगा जो अब तक केवल अमीर के बच्चों को मिलती थीं।"
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सरकार का यह कदम 'पीएम श्री' स्कूलों की तर्ज पर शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है।
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बिजली का 'करंट': विधान परिषद में तीखी तकरार और वॉकआउट

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निचले सदन (विधानसभा) में जहाँ नौकरशाही का मुद्दा छाया रहा, वहीं उच्च सदन (विधान परिषद) में बिजली संकट को लेकर संग्राम छिड़ गया। सपा सदस्यों ने नियम-105 के तहत बिजली कटौती और महंगे बिलों का मुद्दा उठाया।
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सपा के तीखे सवाल और आरोप: सपा एमएलसी आशुतोष सिन्हा और अन्य सदस्यों ने सरकार के दावों की पोल खोलने की कोशिश की। उनके प्रमुख आरोप थे:
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    अघोषित कटौती: ग्रामीण अंचलों, कस्बों और यहां तक कि औद्योगिक इकाइयों में भी भीषण बिजली कटौती हो रही है। सरकार का 'शहरी क्षेत्रों में 24 घंटे और ग्रामीण में 18 घंटे' की आपूर्ति का दावा जमीनी हकीकत से कोसों दूर है।
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    कनेक्शन हुआ महंगा: सपा ने आरोप लगाया कि जो बिजली कनेक्शन पहले मात्र 500 रुपये में मिल जाता था, अब उसके लिए गरीब जनता को 6000 रुपये तक चुकाने पड़ रहे हैं। दो किलोवाट का कनेक्शन अनिवार्य कर गरीबों पर आर्थिक बोझ डाला गया है।
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    बिलिंग में धांधली (आजमगढ़ केस): सपा ने सदन में एक चौंकाने वाला उदाहरण पेश किया। आजमगढ़ के हरैया ब्लॉक के रौनापार उपकेंद्र (ग्राम पंचायत देवारा खास राजा) में 12 घरों में बिना तार और खंभा लगाए ही मीटर लगा दिए गए और 2018-19 से उनसे बिल वसूला जा रहा है। यह विभागीय लापरवाही का चरम है।
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    स्मार्ट मीटर का डर: सरकार प्रीपेड/स्मार्ट मीटर लगाकर जनता से अवैध वसूली की तैयारी कर रही है। शहरी क्षेत्रों में डेवलपमेंट चार्ज के नाम पर लाखों की वसूली हो रही है।
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    जर्जर व्यवस्था: ट्रांसफार्मर ओवरलोड हैं और तार जर्जर हैं, जिससे आए दिन शॉर्ट सर्किट से जान-माल का नुकसान हो रहा है।
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ऊर्जा मंत्री का पलटवार: ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा (A.K. Sharma) ने विपक्ष के आरोपों का जवाब बेहद आक्रामक अंदाज में दिया। उन्होंने सपा के शासनकाल (2012-2017) की याद दिलाते हुए कहा:
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"आपकी (सपा) सरकार में बिजली विभाग में इतना भ्रष्टाचार था कि अयोग्य और भ्रष्ट लोगों की भर्तियां की गईं। वे आज भी सिस्टम में रहकर भ्रष्टाचार फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन हमारी 'जीरो टॉलरेंस' सरकार उन पर कार्रवाई कर रही है।"
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ऊर्जा मंत्री ने आगे तंज कसते हुए कहा, "आपको याद होना चाहिए कि आपके राज में बिजली आती ही नहीं थी, लोग बिजली के तारों पर कपड़े सुखाया करते थे। आज हम रिकॉर्ड उत्पादन और आपूर्ति कर रहे हैं।"
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वॉकआउट: ऊर्जा मंत्री के "तारों पर कपड़े सुखाने" वाले बयान और "भ्रष्टाचार" के आरोपों से सपा सदस्य भड़क गए। उन्होंने सरकार के जवाब को असंतोषजनक और अपमानजनक बताते हुए सदन से वॉकआउट (बहिर्गमन) कर दिया। इसके चलते सदन की कार्यवाही काफी देर तक बाधित रही।
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सरकारी दावे बनाम ज़मीनी सच्चाई

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मंगलवार की कार्यवाही ने उत्तर प्रदेश की प्रशासनिक और विकास से जुड़ी तस्वीर के दो पहलू दिखाए।
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    दावा: सरकार का कहना है कि बिजली उत्पादन क्षमता बढ़ी है। जवाहरपुर, ओबरा-सी और पनकी जैसे नए थर्मल पावर प्लांट शुरू किए गए हैं। साथ ही शिक्षा के क्षेत्र में नए कम्पोजिट स्कूल मील का पत्थर साबित होंगे।
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    हकीकत: विपक्षी सदस्यों द्वारा उठाए गए मुद्दे, जैसे—जर्जर तार, ट्रांसफॉर्मर का ओवरलोड होना, और बिना बिजली के बिल आना—यह दर्शाते हैं कि इंफ्रास्ट्रक्चर (Infrastructure) को अभी भी बड़े सुधार की जरूरत है।
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    अधिकारी राज: यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर पक्ष और विपक्ष एकमत दिखे। अगर सत्ता पक्ष के विधायक भी यह कह रहे हैं कि अधिकारी नहीं सुन रहे, तो यह संकेत है कि जमीनी स्तर पर 'फीडबैक सिस्टम' में कहीं न कहीं बड़ी खामी है। सीएम योगी आदित्यनाथ की सख्त छवि के बावजूद, निचले स्तर पर नौकरशाही की शिथिलता सरकार के लिए चुनौती बनी हुई है।
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समाधान की दरकार

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सत्र का यह दिन हंगामेदार जरूर रहा, लेकिन इसने लोकतंत्र की खूबसूरती को भी दिखाया। जनप्रतिनिधियों ने जनता की आवाज उठाई और सरकार को जवाबदेह बनाने की कोशिश की।
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    कम्पोजिट स्कूल: यदि 25 करोड़ रुपये प्रति स्कूल वाली योजना सही ढंग से लागू होती है, तो यह यूपी की शिक्षा व्यवस्था के लिए गेम-चेंजर साबित होगी।
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    हेल्पलाइन की जरूरत: अधिकारियों की जवाबदेही तय करने के लिए मंत्री असीम अरुण का 'विशेष नंबर' वाला सुझाव जल्द लागू होना चाहिए।
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    बिजली सुधार: आजमगढ़ जैसे मामलों की उच्च-स्तरीय जांच होनी चाहिए, ताकि 'बिना बिजली बिल' जैसी धांधली रोकी जा सके।
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अब देखना यह होगा कि सदन में मिले आश्वासनों का असर जमीनी स्तर पर कब तक दिखाई देता है। क्या अधिकारी अब विधायकों का फोन उठाएंगे? क्या गर्मियों में बिजली की कटौती कम होगी? जनता इन सवालों के जवाब का इंतजार कर रही है।
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(नोट: यह समाचार रिपोर्ट 17 फरवरी 2026 को उत्तर प्रदेश विधानसभा और विधान परिषद में हुई कार्यवाही और बयानों पर आधारित है।)
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