मेरठ। देश के राजस्व (Revenue) को करोड़ों रुपये का चूना लगाने वाले सफेदपोश अपराधियों के खिलाफ जांच एजेंसियों और न्यायालय का कड़ा रुख लगातार जारी है। उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित 'विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट न्यायालय' ने एक बेहद गंभीर आर्थिक अपराध (Economic Offence) के मामले में सख्त फैसला सुनाते हुए कर चोरों के नेटवर्क की कमर तोड़ दी है। डायरेक्टरेट जनरल ऑफ जीएसटी इंटेलिजेंस (DGGI) गाजियाबाद द्वारा पकड़े गए 133 करोड़ रुपये से अधिक के कर अपवंचन (Tax Evasion) के मामले में न्यायालय ने तीन बड़े कारोबारियों को 14 दिन की न्यायिक हिरासत (जेल) में भेज दिया है।READ ALSO:-
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यह पूरा सनसनीखेज मामला दिल्ली-एनसीआर में चल रहे एक बड़े पान मसाला और तंबाकू सिंडिकेट से जुड़ा है, जो बिना किसी सरकारी अनुमति के अवैध रूप से करोड़ों रुपये का माल तैयार कर रहा था। जांच एजेंसी की पैनी नजर, पुख्ता सबूतों और मेरठ न्यायालय की स्पष्ट कानूनी विवेचना ने इन आरोपियों के बचने के सारे पैंतरे नाकाम कर दिए। आइए विस्तार से जानते हैं कि कैसे इस 133 करोड़ के बड़े घोटाले की पटकथा लिखी गई, एजेंसी ने कैसे इन्हें रंगे हाथों पकड़ा और बचाव पक्ष की दलीलों पर न्यायालय ने क्या अहम टिप्पणियां कीं।
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क्या है 133 करोड़ की टैक्स चोरी का पूरा मामला?

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न्यायालय में पेश किए गए दस्तावेजों (वाद संख्या: 05/2026) और DGGI गाजियाबाद के विवेचक (वरिष्ठ सूचना अधिकारी) श्री जयचन्द द्वारा अदालत में दिए गए बयानों के अनुसार, यह मामला सरकारी खजाने में एक बहुत बड़ी सेंधमारी से जुड़ा है। आरोपियों पर नए और सख्त 'हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस एक्ट 2025' (Health Security se National Security Cess Act 2025) के तहत मुकदमा दर्ज किया गया है।
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अधिकारियों के मुताबिक, आरोपियों ने सुनियोजित साजिश के तहत लगभग 123.76 करोड़ रुपये का सेस (Cess) और 9.96 करोड़ रुपये की सेंट्रल एक्साइज (Central Excise) ड्यूटी की चोरी की है। एजेंसी की गहन जांच में यह सामने आया कि ये तीनों आरोपी आपस में पार्टनर हैं और 'मैसर्स डी.एन.ए. प्रोडक्ट' तथा 'मैसर्स पान सम्राट ग्रुप' (M/s Pan Samrat Group) के मुख्य नियंत्रक (Controller) हैं। ये शातिर लोग 'प्रिमियम मधु प्रिया' नामक ब्रांड से पान मसाला और तंबाकू (Chewing Tobacco) का भारी मात्रा में उत्पादन कर रहे थे, लेकिन सरकारी रिकॉर्ड में इस उत्पादन की पूरी जानकारी छिपाकर करोड़ों के टैक्स की चोरी की जा रही थी।
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आरोपियों की कुंडली और उनका अवैध साम्राज्य

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इस सिंडिकेट को चलाने वाले मुख्य आरोपियों का विवरण नीचे दिया गया है, जिन्हें न्यायालय ने सलाखों के पीछे भेजा है:
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क्रम सं.
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गिरफ्तार आरोपी का नाम
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पिता का नाम
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निवासी (पता)
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आपराधिक भूमिका
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1.
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निखिल अग्रवाल
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अवनीश अग्रवाल
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म.नं. 22, वेस्ट मुखर्जी नगर, दिल्ली
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मुख्य पार्टनर / मास्टरमाइंड
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2.
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अनिल कुमार
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लख्मीचन्द
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चन्दन विहार, बुराड़ी, नॉर्थ दिल्ली
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पार्टनर / एक्टिव कंट्रोलर
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3.
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जितेन्द्र कुमार
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लख्मीचन्द
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चन्दन विहार, बुराड़ी, नॉर्थ दिल्ली
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पार्टनर / एक्टिव कंट्रोलर
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अनाधिकृत मशीनों का मकड़जाल: करोड़ों रुपये की इस हेराफेरी को अंजाम देने के लिए आरोपियों ने दिल्ली के गढ़ी खुसरो गांव (हिरनकी) में खसरा संख्या 360, 361 एवं 375 में एक बड़ी और अवैध फैक्ट्री स्थापित कर रखी थी। यहां संबंधित विभागों को अंधेरे में रखकर 08 एफ.एफ.एस. (FFS) पैकिंग मशीनें अनाधिकृत रूप से लगाई गई थीं। इनमें 06 मशीनें मसाला पैकिंग के लिए और 02 मशीनें चीविंग टोबेको (तंबाकू) पैक करने के लिए दिन-रात चलाई जा रही थीं, ताकि काला बाजारी के लिए माल तैयार किया जा सके।
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DGGI की सर्जिकल स्ट्राइक: कैसे बिछाया गया जाल?

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खुफिया सूत्रों से मिली पक्की जानकारी के आधार पर DGGI गाजियाबाद की विशेष टीम ने 16 जुलाई 2026 को एक बड़ा और गुप्त सर्च ऑपरेशन चलाया। अधिकारियों ने एक साथ कई ठिकानों—गढ़ी खुसरो गांव के परिसरों, प्लॉट नंबर 204 मॉडल टाउन टैगोर पार्क और वेस्ट मुखर्जी नगर (दिल्ली)—पर ताबड़तोड़ छापेमारी की।
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इस छापेमारी (Raid) के दौरान एजेंसी के अधिकारियों के भी होश उड़ गए। वहां 08 अवैध मशीनों के साथ-साथ पान मसाला और तंबाकू का भारी मात्रा में कच्चा माल (Raw Material) और पैकिंग सामग्री बरामद हुई। टीम ने तुरंत मौके पर पंचनामा तैयार किया और सभी मशीनों, अवैध माल व अहम दस्तावेजों को सील कर जब्त कर लिया। इसके अगले ही दिन 17 जुलाई 2026 को सभी आरोपियों को 'धारा 13 एच.एस.एन. एक्ट' के तहत समन भेजकर DGGI कार्यालय बुलाया गया। लंबी पूछताछ और पुख्ता सबूतों के आधार पर (Reason to Believe) उसी रात को 11:12 बजे से 11:45 बजे के बीच तीनों को विधिवत गिरफ्तार कर लिया गया। कानूनी पारदर्शिता बनाए रखने के लिए इस पूरी तलाशी और जब्ती की ऑडियो और वीडियो रिकॉर्डिंग भी कराई गई।
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बचाव पक्ष की दलीलें: "हमारा कोई लेना-देना नहीं, हिरासत अवैध है"

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मेरठ की विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत में पेशी के दौरान मुख्य आरोपी निखिल अग्रवाल के विद्वान अधिवक्ता ने रिमांड का कड़ा विरोध किया। बचाव पक्ष ने न्यायालय के समक्ष दो मुख्य तर्क रखे, ताकि आरोपियों को जेल जाने से बचाया जा सके:
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  1. \r\n
    कोई संबंध नहीं होने का दावा: वकील ने कहा कि निखिल अग्रवाल का इस मामले, पार्टनरशिप या जब्त की गई मशीनों से कोई सीधा लेना-देना नहीं है। वह न तो पार्टनर है और न ही उसके पास से कोई मशीन बरामद हुई है, वह केवल अभियुक्त जितेन्द्र का परिचित है।
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  3. \r\n
    अवैध हिरासत (Illegal Detention): बचाव पक्ष ने यह भी दावा किया कि जांच एजेंसी ने निखिल को 17 जुलाई की सुबह 7:45 बजे से ही अवैध हिरासत में ले लिया था और उन्हें गिरफ्तारी का कोई आधार भी सूचित नहीं किया गया। अतः उनका न्यायिक रिमांड निरस्त किया जाना चाहिए।
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न्यायालय की फटकार: सबूतों ने खोल दी झूठ की पोल

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प्रभारी विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ की अदालत में अभियोजन (DGGI) पक्ष के विशेष लोक अभियोजक (Special PP) लक्ष्य कुमार सिंह और उनकी सहयोगी अधिवक्ता श्रीमती वंदना सिंह ने 'गिरफ्तारी के ठोस कारण' (Reason to Believe), 'अरेस्ट मेमो' (Ground of Arrest) और मौके पर तैयार किया गया विस्तृत पंचनामा प्रस्तुत किया।
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मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट ने अभियोजन और बचाव, दोनों पक्षों की दलीलों को बेहद गौर से सुना तथा पत्रावलियों (दस्तावेज़ों) का गहराई से अवलोकन किया। सभी तथ्यों और पुख्ता सबूतों को ध्यान में रखते हुए, न्यायालय ने बचाव पक्ष की दलीलों को सिरे से खारिज कर दिया।
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    बयानों ने उगला सच: न्यायालय ने अपने अवलोकन में पाया कि निखिल अग्रवाल ने खुद एजेंसी को दिए गए बयानों (प्रश्न संख्या 17 और 18) में अपनी संलिप्तता पूरी तरह से कबूल की थी। निखिल ने खुद अपने बयान में दर्ज कराया था, "I actively supervise and control the overall affairs of M/s Pan Samrat Group" (मैं सक्रिय रूप से पान सम्राट ग्रुप के काम की देखरेख और नियंत्रण करता हूँ)। इन बयानों ने प्रथम दृष्टया यह साबित कर दिया कि तीनों आरोपी सिंडिकेट के मुख्य नियंत्रक और पार्टनर हैं।
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    अवैध हिरासत का दावा झूठा साबित: न्यायालय ने कार्यालय के 'डेली विजिट पास' की जांच की, जिसमें स्पष्ट रूप से दर्ज था कि आरोपी 17 जुलाई को सुबह 11:35 बजे स्वेच्छा से पूछताछ के लिए कार्यालय में दाखिल हुए थे। इसके अलावा, अरेस्ट मेमो पर भी आरोपियों के हस्ताक्षर मौजूद थे, जिससे अवैध हिरासत की बात निराधार साबित हुई।
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न्यायालय का अंतिम आदेश: 14 दिन की जेल और CCTV फुटेज पर निर्देश
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सभी उपलब्ध तथ्यों, बयानों और लगभग 133 करोड़ रुपये के भारी-भरकम कर अपवंचन को देखते हुए, न्यायालय ने इसे एक 'गंभीर आर्थिक अपराध' (Serious Economic Offence) माना। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि समाज और देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाने वाले ऐसे मामलों में किसी भी प्रकार की नरमी नहीं बरती जा सकती।
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अंतिम फैसला: न्यायालय ने DGGI गाजियाबाद के रिमांड प्रार्थना पत्र को न्यायहित में स्वीकार करते हुए तीनों आरोपियों (निखिल, अनिल और जितेन्द्र) को हेल्थ सिक्योरिटी से नेशनल सिक्योरिटी सेस एक्ट 2025 की धारा-18(1)(a), 18(1)(b), 18(1)(c) व 19(1)(a) के तहत 14 दिनों के लिए जिला कारागार, मेरठ भेजने का सख्त आदेश दिया। न्यायालय ने यह भी निर्देश दिया है कि आगामी नियत तिथि पर इन आरोपियों की पेशी जिला कारागार मेरठ से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग (VC) के जरिए सुनिश्चित की जाए।
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CCTV फुटेज को सुरक्षित रखने का अहम निर्देश: इसी दौरान बचाव पक्ष के अधिवक्ता द्वारा दिए गए एक अन्य प्रार्थना पत्र का संज्ञान लेते हुए, न्यायालय ने न्याय में पूर्ण पारदर्शिता बनाए रखने के लिए एक विशेष आदेश भी पारित किया। न्यायालय ने संबंधित जांच अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वह 17 जुलाई सुबह 7:30 बजे से 18 जुलाई सुबह 11:00 बजे तक की CCTV कैमरे की रिकॉर्डिंग (DVDR और हार्डडिस्क) को पूरी तरह से सुरक्षित और संरक्षित रखें।
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मेरठ कोर्ट का यह कड़ा फैसला उन तमाम कर चोरों के लिए एक सख्त और स्पष्ट चेतावनी है जो फर्जी दस्तावेजों और अनाधिकृत तरीकों से देश के राजस्व को भारी नुकसान पहुंचा रहे हैं। जांच एजेंसी की आगे की विवेचना जारी है और इस मामले में अभी कई और सफेदपोशों के चेहरे बेनकाब होने की प्रबल संभावना है।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): यह समाचार न्यायालय विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ द्वारा पारित रिमांड आदेश (वाद संख्या: 05/2026) और डीजीजीआई (DGGI) गाजियाबाद द्वारा प्रस्तुत आधिकारिक दस्तावेजों तथा बयानों पर आधारित है। इस खबर का मुख्य उद्देश्य आम जनता को केवल तथ्यात्मक सूचना प्रदान करना है। यह मामला अभी पूर्ण रूप से न्यायालय के अधीन (Sub-judice) है और आरोपियों पर लगाए गए सभी आरोप अभी जांच एवं न्यायिक प्रक्रिया का विषय हैं। हमारा न्यूज़ पोर्टल या संस्थान अपनी ओर से किसी भी व्यक्ति या संस्था को दोषी ठहराने का कोई दावा नहीं करता है। मामले में अंतिम और सर्वमान्य निर्णय केवल माननीय न्यायालय का ही होगा।
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