मेरठ। सुप्रीम कोर्ट में आज सिर्फ ईंट-पत्थरों से बने एक कॉम्प्लेक्स की सुनवाई नहीं है, बल्कि यह उन सैकड़ों व्यापारियों की 35 साल की मेहनत और उनकी रोजी-रोटी की परीक्षा का दिन है, जिन्होंने सेंट्रल मार्केट को अपनी पहचान दी। एक तरफ सुप्रीम कोर्ट का ध्वस्तीकरण का आदेश है, तो दूसरी तरफ व्यापारियों के वो सवाल हैं जो सीधे तौर पर सरकारी व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करते हैं।READ ALSO:-  जयपुर का SMS अस्पताल बना 'मौत का चैंबर', ICU में जिंदा जले 8 मरीज; लापरवाही ने लील लीं जिंदगियां!
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व्यापारी नेता किशोर वाधवा के अनुसार, "आज से 30-35 साल पहले जब हमने अपनी खून-पसीने की कमाई से इस जगह को आबाद करना शुरू किया था, तब आवास-विकास परिषद ने कोई आपत्ति क्यों नहीं जताई?" व्यापारियों का सीधा आरोप है कि उस वक्त विभाग के अधिकारियों की सांठगांठ और मिलीभगत से ही यह निर्माण संभव हुआ और अब अचानक कानून का डर दिखाकर उनके परिवारों के मुंह से निवाला छीनने की कोशिश हो रही है।
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यह मानवीय संकट उस अवमानना याचिका से उपजा है, जिस पर आज सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई होनी है। 17 दिसंबर 2024 को कोर्ट ने कॉम्प्लेक्स को अवैध मानते हुए गिराने का आदेश दिया था, लेकिन आवास-विकास परिषद ने कोई ठोस कार्रवाई नहीं की।
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अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे प्रकरण में असली गुनहगार कौन है? क्या वे व्यापारी, जिन्होंने एक सुस्त सिस्टम के रहते अपनी दुकानें खड़ी कीं, या वे अधिकारी, जिन्होंने दशकों तक इस अवैध निर्माण पर अपनी आंखें मूंदे रखीं? आज की सुनवाई यह तय करेगी कि कानून का हथौड़ा सिर्फ व्यापारियों की मेहनत पर चलेगा या उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय होगी, जिनकी लापरवाही ने इस विवाद को जन्म दिया।
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