मेरठ: समाज में आज भी कई ऐसी कुप्रथाएं जीवित हैं, जो बच्चों के भविष्य और उनके मासूम बचपन को अंधकार में धकेल देती हैं। इन्हीं में से एक गंभीर सामाजिक अपराध है 'बाल विवाह' (Child Marriage)। भारत में कानूनन अपराध होने के बावजूद, अक्सर विशेष त्योहारों और शुभ मुहूर्तों पर चोरी-छिपे नाबालिगों की शादियां करा दी जाती हैं।READ ALSO:-दिल्ली-देहरादून एक्सप्रेसवे पर फर्राटा भरने से पहले रहें सावधान! बाइक, ऑटो और ट्रैक्टर की 'नो एंट्री', गलती की तो कटेगा 20,000 रुपये का भारी-भरकम चालान
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इस साल 19 अप्रैल 2026 को पड़ने वाले 'अक्षय तृतीया' (Akshaya Tritiya) के पावन पर्व से ठीक पहले, उत्तर प्रदेश के मेरठ (Meerut) जिला प्रशासन ने इस कुप्रथा को जड़ से खत्म करने के लिए कमर कस ली है। प्रशासन ने स्पष्ट कर दिया है कि जिले में किसी भी कीमत पर बाल विवाह बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। जिला प्रोबेशन अधिकारी (DPO) अनुपमा यादव ने शहर के सभी बैंक्वेट हॉल, रेस्टोरेंट, विवाह मंडपों के मालिकों और मंदिर-मस्जिदों के पुजारियों और मौलवियों के लिए बेहद सख्त और कड़े दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
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बिना 'आयु प्रमाण पत्र' नहीं होगी मंडप की बुकिंग

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मेरठ प्रशासन ने विवाह समारोहों की बुकिंग प्रक्रिया को पूरी तरह से पारदर्शी और जवाबदेह बनाने का फैसला किया है। जिला प्रोबेशन अधिकारी अनुपमा यादव ने सभी विवाह मंडप और बैंक्वेट हॉल संचालकों को कड़े निर्देश दिए हैं कि वे बिना आयु प्रमाण पत्र (Age Proof) देखे किसी भी शादी की बुकिंग न लें।
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    कानूनी उम्र: भारत के कानून के अनुसार शादी के लिए युवती (लड़की) की न्यूनतम उम्र 18 वर्ष और युवक (लड़के) की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष होना अनिवार्य है।
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    दस्तावेज अनिवार्य: शादी की बुकिंग करने वाले परिवारों से लड़के और लड़की का जन्म प्रमाण पत्र, आधार कार्ड, पैन कार्ड या 10वीं की मार्कशीट लेनी होगी, जिसमें जन्मतिथि स्पष्ट रूप से दर्ज हो।
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    रसीद के साथ अटैचमेंट: सिर्फ आयु प्रमाण पत्र देखना ही काफी नहीं होगा, बल्कि बैंक्वेट हॉल मालिकों को उस आयु प्रमाण पत्र की एक कॉपी अपनी बुकिंग रसीद (Booking Receipt) के साथ अनिवार्य रूप से नत्थी (Attach) करनी होगी।
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प्रशासन ने चेतावनी दी है कि राजस्व और पुलिस विभाग की 'फ्लाइंग स्क्वाड' (उड़नदस्ता) टीमें किसी भी वक्त विवाह मंडपों का औचक निरीक्षण (Surprise Check) कर सकती हैं। जांच के दौरान अगर किसी बुकिंग रजिस्टर में आयु प्रमाण पत्र नहीं मिला, तो संचालक के खिलाफ तुरंत कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
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अक्षय तृतीया (19 अप्रैल 2026) पर विशेष नजर

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प्रशासन का यह अलर्ट मुख्य रूप से आगामी 'अक्षय तृतीया' पर्व को लेकर है। हिन्दू पंचांग के अनुसार, अक्षय तृतीया को 'अबूझ मुहूर्त' माना जाता है। मान्यता है कि इस दिन शादी-विवाह या कोई भी शुभ कार्य करने के लिए पंचांग या मुहूर्त देखने की जरूरत नहीं होती।
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दुर्भाग्यवश, इसी शुभ दिन की आड़ में ग्रामीण और कुछ शहरी इलाकों में पुरानी रूढ़िवादी परंपराओं का पालन करते हुए मासूम बच्चों का बाल विवाह करा दिया जाता है। इस वर्ष अक्षय तृतीया 19 अप्रैल 2026 को मनाई जा रही है। जिला प्रोबेशन अधिकारी का कहना है कि यह कुप्रथा पूरी तरह से गलत, अमानवीय और गैर-कानूनी है। इसी दिन सबसे ज्यादा बाल विवाह होने की आशंका रहती है, इसलिए 19 अप्रैल से पहले और उस दिन पूरे जिले में प्रशासन और पुलिस की विशेष टीमें मुस्तैद रहेंगी।
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नियम तोड़ा तो 2 साल की जेल और 1 लाख का जुर्माना

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मेरठ प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि बाल विवाह न केवल एक सामाजिक बुराई है, बल्कि यह एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध है। यदि 19 अप्रैल (अक्षय तृतीया) या किसी भी अन्य दिन कोई व्यक्ति बाल विवाह करता या कराता हुआ पाया गया, तो उसके खिलाफ बाल विवाह प्रतिषेध अधिनियम (Prohibition of Child Marriage Act) के तहत बेहद कठोर दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी।
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इस अधिनियम के तहत दोषियों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है:

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    जेल की सजा: बाल विवाह के मामले में दोषी पाए जाने पर 2 साल के कठोर कारावास (जेल) की सजा हो सकती है।
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    आर्थिक दंड: जेल के साथ-साथ दोषियों पर 1 लाख रुपये तक का भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है।
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किस-किस पर गिरेगी गाज? प्रशासन ने साफ कर दिया है कि पुलिस की कार्रवाई केवल नाबालिग बच्चों के माता-पिता तक सीमित नहीं रहेगी। इस अपराध में शामिल हर एक व्यक्ति को सलाखों के पीछे भेजा जाएगा। इसमें शामिल हैं:
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    नाबालिग की शादी तय करने वाले माता-पिता और रिश्तेदार।
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    वह बैंक्वेट हॉल, गेस्ट हाउस या विवाह मंडप का मालिक जिसके परिसर में यह शादी हो रही है।
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    शादी के फेरे कराने वाले मंदिर के पुजारी (Pandit) या निकाह पढ़ाने वाले मस्जिद के मौलवी/काजी।
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    शादी में शामिल होने वाले बाराती और मेहमान भी इस कानूनी कार्रवाई के दायरे में आ सकते हैं।
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टेंट, बैंड-बाजे और कैटरर्स के लिए भी जारी हुआ 'अल्टीमेटम'

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बाल विवाह को रोकने की इस मुहिम में प्रशासन ने समाज के हर उस तबके को शामिल किया है जो शादियों से जुड़ा व्यवसाय करता है। जिला प्रोबेशन अधिकारी अनुपमा यादव ने वैवाहिक आयोजन कराने वाले सभी व्यवसायियों की जवाबदेही तय कर दी है।
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उन्होंने टैंट व्यवसायी (Tent House), बैंड-बाजा वाले, कैटरर्स (Caterers), हलवाई, लाइट वाले और यहां तक कि फोटोग्राफरों (Photographers) को भी स्पष्ट चेतावनी दी है। प्रशासन ने कहा है कि यदि ये लोग किसी ऐसी शादी की बुकिंग लेते हैं जहां दूल्हा या दुल्हन नाबालिग हैं, तो वे तुरंत इसकी बुकिंग रद्द करें और प्रशासन को सूचित करें। यदि कोई टेंट या बैंड वाला बाल विवाह के आयोजन में अपनी सेवाएं देता हुआ पकड़ा गया, तो उसे भी बाल विवाह कराने का सह-आरोपी (Co-accused) मानकर जेल भेजा जाएगा।
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जागरूक नागरिक बनें: यहां करें बाल विवाह की शिकायत

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प्रशासन ने आम जनता, पड़ोसियों और रिश्तेदारों से भी अपील की है कि वे बाल विवाह जैसी कुप्रथा को मूकदर्शक बनकर न देखें। यदि किसी भी व्यक्ति को अपने आसपास, पड़ोस, या किसी रिश्तेदारी में बाल विवाह होने की भनक लगती है, तो वह तुरंत एक जिम्मेदार नागरिक का फर्ज निभाते हुए इसकी सूचना प्रशासन को दे। सूचना देने वाले का नाम और पहचान पूरी तरह से गुप्त (Secret) रखी जाएगी।
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शिकायत दर्ज कराने के लिए प्रशासन ने कई आपातकालीन और हेल्प लाइन नंबर जारी किए हैं:
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    संबंधित थाना प्रभारी के CUG नंबर (मोबाइल नंबर) पर सीधे कॉल कर सकते हैं।
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    राष्ट्रीय स्तर की चाइल्ड हेल्पलाइन नंबर (Childline): 1098 पर 24 घंटे में कभी भी कॉल करें।
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    महिलाओं की सुरक्षा के लिए जारी वूमेन पावर लाइन: 1090 पर सूचना दें।
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    महिला हेल्पलाइन: 181 पर भी बाल विवाह की शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
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    इसके अलावा स्थानीय पुलिस नियंत्रण कक्ष (Dial 112) पर भी तुरंत पुलिस को बुलाया जा सकता है।
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क्यों जरूरी है बाल विवाह पर रोक? (सामाजिक परिप्रेक्ष्य)

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बाल विवाह केवल एक कानूनी अपराध नहीं है, बल्कि यह बच्चों के मानवाधिकारों का सबसे बड़ा हनन है। कम उम्र में शादी होने से बच्चों, विशेषकर लड़कियों का शारीरिक और मानसिक विकास पूरी तरह से रुक जाता है। कच्ची उम्र में गर्भधारण (Teenage Pregnancy) से जच्चा और बच्चा दोनों की जान को खतरा रहता है और इससे मातृ मृत्यु दर बढ़ती है। इसके अलावा, बाल विवाह के कारण बच्चों की शिक्षा बीच में ही छूट जाती है, जिससे वे आर्थिक रूप से कभी आत्मनिर्भर नहीं बन पाते और जीवन भर घरेलू हिंसा व गरीबी के दुष्चक्र में फंसे रहते हैं।
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मेरठ जिला प्रशासन और जिला प्रोबेशन अधिकारी अनुपमा यादव द्वारा अक्षय तृतीया से पहले उठाया गया यह कदम बेहद सराहनीय और समय की मांग है। केवल कानून बना देने से कुप्रथाएं खत्म नहीं होतीं, बल्कि उन्हें धरातल पर सख्ती से लागू करना पड़ता है। बैंक्वेट हॉल मालिकों, पुजारियों और बैंड वालों की जवाबदेही तय करके प्रशासन ने बाल विवाह के खिलाफ एक मजबूत चक्रव्यूह रच दिया है। अब यह समाज की भी जिम्मेदारी है कि वह इस मुहिम में प्रशासन का साथ दे और बच्चों को शादी के मंडप में नहीं, बल्कि स्कूलों में पहुंचाए।
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