मेरठ (पावर एंड एनर्जी डेस्क): उत्तर प्रदेश सरकार और ऊर्जा विभाग इन दिनों बिजली उपभोक्ताओं को निर्बाध (Uninterrupted) और गुणवत्तापूर्ण बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए 'मिशन मोड' में काम कर रहा है। इसी कड़ी में काम में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों के खिलाफ अब 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) की नीति अपनाई जा रही है। इसका सबसे ताजा और खौफनाक उदाहरण पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम लिमिटेड (PVVNL) के मेरठ जोन में देखने को मिला है, जहां एक बेनाम शिकायती पत्र ने पूरे बिजली विभाग में भूचाल ला दिया है।READ ALSO:-मुजफ्फरनगर में रूह कंपा देने वाला कांड: मात्र 1500 रुपये की 'ईदी' ने ली 4 जानें; हंसते-खेलते परिवार का यूं हुआ खौफनाक अंत
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उत्तर प्रदेश पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड (UPPCL) के चेयरमैन आशीष गोयल के कड़े रुख और निर्देशों के बाद, पीवीवीएनएल के प्रबंध निदेशक (MD) रवीश गुप्ता ने एक बेहद सख्त प्रशासनिक कार्रवाई करते हुए मेरठ के डिवीजन 33 केवी के एक अधिशासी अभियंता (XEN) समेत कुल 5 इंजीनियरों को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) कर दिया है। इन सभी पर ट्रांसफार्मर फुंकने के बाद उसे समय पर न बदलने और उपभोक्ताओं को जानबूझकर परेशानी में डालने का गंभीर आरोप है।
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इस विस्तृत और विश्लेषणात्मक रिपोर्ट में हम इस 'मिडनाइट ऑपरेशन' (आधी रात की कार्रवाई), निलंबित अधिकारियों के नाम, उनकी लापरवाहियों की पूरी क्रोनोलॉजी (Chronology), 33 केवी के उस महत्वपूर्ण सिस्टम जिसे वे संभाल रहे थे, और विभाग पर पड़ने वाले इसके असर की गहराई से पड़ताल करेंगे।
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बेनाम चिट्ठी और आधी रात का वह फोन कॉल: कैसे शुरू हुआ एक्शन? (The Trigger Point)

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सरकारी विभागों में अक्सर शिकायतें फाइलों में दब जाती हैं या स्थानीय स्तर पर 'मैनेज' कर ली जाती हैं। लेकिन इस बार मेरठ के त्रस्त बिजली उपभोक्ताओं ने एक अलग रास्ता चुना।
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चेयरमैन तक पहुंची सीधी शिकायत

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विभागीय सूत्रों के अनुसार, उत्तर प्रदेश पावर कारपोरेशन (UPPCL) के लखनऊ स्थित मुख्यालय में चेयरमैन आशीष गोयल को हाल ही में एक शिकायती पत्र प्राप्त हुआ था। यह पत्र 'बेनाम' (Anonymous) था। इसमें शिकायतकर्ता का नाम तो नहीं था, लेकिन इसमें जो तथ्य और आंकड़े दिए गए थे, वे पूरी तरह से सटीक और गंभीर थे। पत्र में साफ-साफ लिखा गया था कि मेरठ जिले में 33 केवी लाइनों के ट्रांसफार्मर फुंकने के बाद उन्हें कई-कई दिनों तक नहीं बदला जा रहा है, जिससे आम जनता और औद्योगिक इकाइयों (Industries) को भारी आर्थिक और मानसिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
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PVVNL MD से जताई गई सख्त नाराजगी

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चेयरमैन आशीष गोयल, जो अपनी तेज और पारदर्शी कार्यशैली के लिए जाने जाते हैं, ने इस बेनाम पत्र को कूड़ेदान में डालने के बजाय इसका कड़ा संज्ञान (Cognizance) लिया। उन्होंने अपने स्तर से क्रॉस-चेकिंग कराई तो शिकायत सच पाई गई।
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    सोमवार की रात: विभागीय सूत्र बताते हैं कि सोमवार की रात चेयरमैन आशीष गोयल ने पश्चिमांचल एमडी (PVVNL MD) रवीश गुप्ता को सीधे फोन मिलाया।
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    फोन पर चेयरमैन ने ट्रांसफार्मरों के रखरखाव और लाइन बदलने में हो रही लेटलतीफी को लेकर कड़ी नाराजगी जाहिर की और तत्काल प्रभाव से जिम्मेदार अधिकारियों की जिम्मेदारी तय कर सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया।
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रातों-रात सस्पेंशन का फरमान

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चेयरमैन के फोन के बाद मेरठ स्थित पीवीवीएनएल मुख्यालय में हड़कंप मच गया। रात में ही फाइलें खोली गईं। एमडी रवीश गुप्ता ने बिना कोई देरी किए, सोमवार देर रात ही 33 केवी डिवीजन की जिम्मेदारी संभाल रहे पूरी टीम के सस्पेंशन (Suspension Order) का फरमान जारी कर दिया। एक झटके में पांच बड़े इंजीनियरों को कुर्सी से हटा दिया गया।
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इन 5 इंजीनियरों पर गिरी गाज: दागी अधिकारियों की सूची (The Suspended Officials)

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इस बड़ी प्रशासनिक सर्जरी में पूरी की पूरी चेन (Chain of Command) को ही निलंबित कर दिया गया है। आमतौर पर केवल निचले स्तर के जेई (JE) पर कार्रवाई करके खानापूर्ति कर ली जाती है, लेकिन इस बार गाज सीधे एक्सईएन (Executive Engineer) स्तर तक गिरी है, जो यह संदेश देता है कि उच्चाधिकारी भी अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकते।
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सस्पेंड किए गए अधिकारियों के नाम और पद:

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    विपिन कुमार: अधिशासी अभियंता (XEN) - डिवीजन 33 केवी
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    विशाल सिंह: सहायक अभियंता (AE)
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    विद्यासागर: सहायक अभियंता (AE)
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  6. \r\n
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    अनुराग प्रताप सिंह: अवर अभियंता (JE)
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    सतीश चंद चौधरी: अवर अभियंता (JE)
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अटैचमेंट और विभागीय जांच (Departmental Enquiry)

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निलंबन के साथ ही इन सभी पांचों अधिकारियों को उनके वर्तमान मेरठ कार्यालय से हटाकर गजरौला (Gajraula) अटैच कर दिया गया है। सरकारी प्रक्रिया के अनुसार, सस्पेंशन अवधि के दौरान ये सभी अधिकारी गजरौला कार्यालय में अपनी हाजिरी लगाएंगे। इसके साथ ही इनके खिलाफ एक उच्च स्तरीय 'विभागीय जांच' (Departmental Enquiry) बैठा दी गई है। अगर जांच में वित्तीय अनियमितता या जानबूझकर भ्रष्टाचार का मामला सामने आता है, तो इन पर और भी कड़ी दंडात्मक कार्रवाई (जैसे डिमोशन या बर्खास्तगी) हो सकती है।
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कार्रवाई की असल वजह: उद्योगपुरम और सोफीपुर के वे दो खौफनाक मामले (The Real Incidents)

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यह निलंबन कोई हवा में की गई कार्रवाई नहीं है। इसके पीछे दो ऐसे बड़े वाकये हैं जिन्होंने मेरठ के बिजली उपभोक्ताओं को रुला कर रख दिया था। इन्हीं दो घटनाओं का जिक्र उस 'बेनाम चिट्ठी' में किया गया था।
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पहला मामला: उद्योगपुरम क्षेत्र (24 जनवरी की घटना)

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मेरठ का उद्योगपुरम क्षेत्र (Udyogpuram Industrial Area) शहर की आर्थिक रीढ़ है। यहां सैकड़ों छोटी-बड़ी फैक्ट्रियां और औद्योगिक इकाइयां चलती हैं, जो पूरी तरह से 33 केवी और 11 केवी की निर्बाध बिजली आपूर्ति पर निर्भर हैं।
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    क्या हुआ था? 24 जनवरी को इस औद्योगिक क्षेत्र को सप्लाई देने वाला मुख्य ट्रांसफार्मर अचानक फुंक गया (Burnt out)।
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    लापरवाही: नियमानुसार औद्योगिक क्षेत्रों में ट्रांसफार्मर चंद घंटों के भीतर बदला जाना चाहिए। लेकिन इस 33 केवी की टीम ने घोर लापरवाही बरती। कई दिनों तक फैक्ट्रियों में उत्पादन ठप रहा। उद्यमियों (Industrialists) को लाखों रुपये का नुकसान हुआ और उन्हें महंगे डीजल जनरेटरों का सहारा लेना पड़ा। अधिकारियों ने उनकी शिकायतों पर कोई गंभीरता नहीं दिखाई।
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दूसरा मामला: सोफीपुर का अंधेरा (15 मार्च की घटना)

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अभी उद्योगपुरम का मामला शांत भी नहीं हुआ था कि 15 मार्च को मेरठ के सोफीपुर (Sofipur) इलाके का ट्रांसफार्मर फुंक गया।
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    क्या हुआ था? यह एक रिहायशी और मिश्रित आबादी वाला क्षेत्र है। ट्रांसफार्मर फुंकने से हजारों घरों की बिजली गुल हो गई। गर्मी के मौसम की शुरुआत में लोगों के घरों में पानी का संकट गहरा गया।
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    लापरवाही: इस ट्रांसफार्मर को बदलने में विभाग के इस 'स्पेशल 33 केवी डिवीजन' को तीन से चार दिन (3-4 Days) का लंबा समय लग गया।
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UPPCL के स्पष्ट निर्देश हैं कि शहरी क्षेत्रों में फुंका हुआ ट्रांसफार्मर 24 घंटे के अंदर और ग्रामीण क्षेत्रों में 48 घंटे के अंदर हर हाल में बदल दिया जाना चाहिए। लेकिन सोफीपुर में 3-4 दिन तक ट्रांसफार्मर न बदलना, अधिकारियों की कामचोरी, संवेदनहीनता और 'सिस्टम' की पूरी नाकामी को दर्शाता था। इन्हीं दो घटनाओं के साक्ष्यों ने चेयरमैन आशीष गोयल को यह कड़ा कदम उठाने पर मजबूर किया।
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क्या है 33 केवी डिवीजन की 'सेपरेट' व्यवस्था और क्यों फेल हुई टीम? (The Failure of a Dedicated System)

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इस पूरे मामले का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि जिन इंजीनियरों को सस्पेंड किया गया है, वे कोई आम बिजली वितरण का काम नहीं देख रहे थे। वे एक विशेष और अलग (Separate) 33 केवी व्यवस्था के प्रभारी थे।
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33 केवी सिस्टम की महत्ता (Importance of 33 KV Line)

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बिजली व्यवस्था में 33 केवी (33000 वोल्ट) की लाइनें 'बैकबोन' (रीढ़ की हड्डी) होती हैं। ये लाइनें बड़े ग्रिड से निकलकर 11 केवी के सब-स्टेशनों (बिजली घरों) तक बिजली पहुंचाती हैं। अगर 11 केवी की लाइन टूटती है तो एक-दो मोहल्ले बंद होते हैं, लेकिन अगर 33 केवी का ट्रांसफार्मर या लाइन ट्रिप होती है, तो कई बिजली घर एक साथ बंद हो जाते हैं और शहर का एक बड़ा हिस्सा अंधेरे में डूब जाता है।
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सेपरेट टीम बनाने का उद्देश्य

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    पीवीवीएनएल ने इसी गंभीरता को समझते हुए मेरठ में 33 केवी लाइनों और ट्रांसफार्मरों के रखरखाव के लिए एक बिल्कुल अलग (Separate) टीम और डिवीजन का गठन किया था।
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    इस पूरी व्यवस्था के अंतर्गत 33 केवी के 60 बड़े बिजली घर (Sub-stations) और 100 से अधिक लाइनें शामिल हैं।
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    इस टीम का एकमात्र काम इन 60 बिजली घरों की मॉनिटरिंग करना, 33 केवी लाइनों में आने वाले फॉल्ट (Fault) को तुरंत अटेंड करना और ट्रांसफार्मर फुंकने पर बिना किसी देरी के ट्रॉली या क्रेन के जरिए नया ट्रांसफार्मर रखवाना था।
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फेल क्यों हुआ सिस्टम?

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इतनी स्पष्ट जिम्मेदारी और अलग मैनपावर (Manpower) होने के बावजूद, उद्योगपुरम और सोफीपुर में जो हुआ, वह अक्षम्य था। विभागीय जांच इस बात पर भी केंद्रित है कि क्या ट्रांसफार्मर समय पर इसलिए नहीं बदले गए क्योंकि ठेकेदारों (Contractors) या स्टोर से साठगांठ की जा रही थी? क्या अधिकारियों ने नया ट्रांसफार्मर जारी करने में जानबूझकर 'अड़ंगे' लगाए ताकि उपभोक्ताओं से अवैध वसूली (Corruption) की जा सके? यह सेपरेट व्यवस्था जिसके लिए बनाई गई थी, अधिकारियों ने उसी को कमाई का जरिया या आरामगाह बना लिया था।
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उच्च स्तर पर भी मांगा गया जवाब: CE और SE को नोटिस (Accountability at the Top)

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उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन आशीष गोयल की यह सर्जिकल स्ट्राइक केवल निचले स्तर (XEN, AE, JE) तक सीमित नहीं रही है। जब कोई इतना बड़ा सिस्टम फेल होता है, तो उसकी जिम्मेदारी वरिष्ठ पर्यवेक्षण अधिकारियों (Supervisory Officers) पर भी बनती है।
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विभागीय सूत्रों के अनुसार, इस पूरे प्रकरण में मेरठ जोन के चीफ इंजीनियर (Chief Engineer - CE) और अधीक्षण अभियंता (Superintending Engineer - SE) से भी सख्त लहजे में 'जवाब तलब' (Show Cause Notice) किया गया है।
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    उनसे पूछा गया है कि जब उनके अधीन काम करने वाला 33 केवी डिवीजन लगातार लापरवाही बरत रहा था, तो उन्होंने अपनी 'सुपरवाइजरी' शक्ति का इस्तेमाल क्यों नहीं किया?
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    उद्योगपुरम में उद्यमियों के हंगामे और सोफीपुर में 3-4 दिन तक बिजली न रहने की रिपोर्ट उन्होंने अपने उच्चाधिकारियों (MD और UPPCL मुख्यालय) को समय पर क्यों नहीं दी?
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चीफ इंजीनियर और एसई स्तर के अधिकारियों से स्पष्टीकरण मांगे जाने के बाद से पश्चिमांचल मुख्यालय में सन्नाटा पसरा हुआ है। बड़े अधिकारियों को अब यह डर सता रहा है कि अगर उनका जवाब संतोषजनक नहीं पाया गया, तो अगली गाज उन पर भी गिर सकती है।
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व्यवस्था पर मंडराया संकट: अब कौन संभालेगा 60 बिजली घरों का जिम्मा? (The Impending Crisis & Solutions)

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चेयरमैन की नाराजगी के बाद एमडी रवीश गुप्ता ने रात में कार्रवाई तो कर दी, लेकिन मंगलवार की सुबह जब उन्होंने अफसरों की आपातकालीन मीटिंग (Emergency Meeting) बुलाई, तो एक नई और बड़ी समस्या खड़ी हो गई। यह समस्या थी— 'मैनपावर का वैक्यूम' (Manpower Vacuum)।
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चरमरा गया 33 केवी का ढांचा

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एक साथ 5 इंजीनियरों के सस्पेंड होने से इस सेपरेट डिवीजन की कमर टूट गई है।
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    इस डिवीजन में कुल 6 जूनियर इंजीनियर (JE) तैनात थे, जिनमें से 2 सस्पेंड हो चुके हैं।
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    कुल 3 असिस्टेंट इंजीनियर (AE) थे, जिनमें से 2 सस्पेंड हो गए हैं (यानी AE स्तर का 66% स्टाफ खत्म)।
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    और पूरी व्यवस्था को लीड कर रहे एक्सईएन (XEN) भी कार्रवाई की जद में आकर बाहर हो गए हैं।
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शाम होते-होते जब इन सभी पांचों इंजीनियरों को गजरौला के लिए रिलीव (Relieve) कर दिया गया, तो विभाग के सामने चुनौती आ गई कि 60 बिजली घरों और 100 लाइनों का मेंटेनेंस अब कौन करेगा? क्योंकि गर्मी का मौसम आ चुका है और ओवरलोडिंग (Overloading) के कारण फॉल्ट बढ़ने लगे हैं।
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नई नियुक्तियां और डैमेज कंट्रोल

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इस वैक्यूम को भरने के लिए और व्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए पीवीवीएनएल एमडी ने तुरंत 'डैमेज कंट्रोल' (Damage Control) की कवायद शुरू कर दी है।
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    फिलहाल, डिवीजन 33 केवी के अधिशासी अभियंता (XEN) का अतिरिक्त चार्ज (Additional Charge) धर्मेंद्र कुमार को सौंपा गया है।
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    एक्सईएन धर्मेंद्र कुमार पूर्व में विभाग में 'अटैच' चल रहे थे। अब उनके कंधों पर इस चरमराई हुई व्यवस्था को वापस खड़ा करने और उपभोक्ताओं का विश्वास जीतने की भारी जिम्मेदारी है।
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    खाली हुए एई और जेई के पदों पर भी जल्द ही आसपास के डिवीजनों से इंजीनियरों को स्थानांतरित (Transfer/Depute) करके तैनात किए जाने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।
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यूपी पावर सेक्टर रिफॉर्म्स: इस एक्शन के क्या मायने हैं? (The Bigger Picture)

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मेरठ का यह सस्पेंशन कांड उत्तर प्रदेश के ऊर्जा विभाग में चल रहे एक बड़े 'सिस्टमैटिक रिफॉर्म' (Systematic Reform) का हिस्सा है। यूपी सरकार ने पूरे प्रदेश में निर्बाध 24x7 बिजली आपूर्ति का संकल्प लिया है।
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1. जवाबदेही तय करना (Fixing Accountability): पहले ट्रांसफार्मर फुंकने को एक 'तकनीकी खराबी' मानकर छोड़ दिया जाता था। लेकिन अब सरकार इसे 'प्रशासनिक विफलता' मान रही है। अगर लोड ज्यादा था, तो एक्सईएन ने पहले से क्षमता वृद्धि (Capacity Enhancement) का प्रस्ताव क्यों नहीं भेजा? अगर ट्रांसफार्मर फुंक गया, तो वर्कशॉप से नया ट्रांसफार्मर अलॉट कराने में देरी क्यों हुई? हर कदम पर अब मॉनिटरिंग हो रही है।
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2. रिवैम्प्ड डिस्ट्रीब्यूशन सेक्टर स्कीम (RDSS): केंद्र सरकार की RDSS योजना के तहत यूपी में हजारों करोड़ रुपये का इंफ्रास्ट्रक्चर अपग्रेड हो रहा है। जब सरकार इतना पैसा खर्च कर रही है, तो अधिकारियों से आउटपुट की उम्मीद भी बढ़ गई है। कामचोरी अब किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जा रही है।
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3. 'कंज्यूमर इज किंग' (Consumer is King): आशीष गोयल जैसे तेज-तर्रार आईएएस अधिकारियों का नेतृत्व यह सुनिश्चित कर रहा है कि बिजली विभाग अब 'सरकारी बाबूगिरी' से बाहर निकलकर एक 'सेवा प्रदाता' (Service Provider) की तरह व्यवहार करे। बेनाम चिट्ठी पर आधी रात को एक्शन लेना इस बात का प्रमाण है कि उपभोक्ता की आवाज अब सीधे सत्ता के शीर्ष तक पहुंच रही है।
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पश्चिमांचल विद्युत वितरण निगम (PVVNL) के मेरठ जोन में हुई यह 'सर्जिकल स्ट्राइक' पूरे उत्तर प्रदेश के बिजली इंजीनियरों और अधिकारियों के लिए एक खुली चेतावनी है। एक एक्सईएन, दो एई और दो जेई का एक साथ निलंबन यह स्पष्ट संदेश देता है कि कुर्सी कितनी भी बड़ी क्यों न हो, अगर आम जनता और उद्योगपतियों को आपकी लापरवाही के कारण परेशानी उठानी पड़ेगी, तो आप सुरक्षित नहीं हैं।
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उद्योगपुरम के उद्यमियों का नुकसान और सोफीपुर के निवासियों का तीन दिन का अंधेरा, उन पांच अधिकारियों के करियर पर एक ऐसा दाग लगा गया है जिसकी विभागीय जांच अब लंबे समय तक चलेगी। नए एक्सईएन धर्मेंद्र कुमार के लिए यह कांटों भरा ताज है, लेकिन विभाग के इस कड़े रुख से आम उपभोक्ताओं में यह विश्वास जरूर जागा है कि उनकी शिकायतों को सुनने वाला और उस पर 'हंटर' चलाने वाला कोई सिस्टम में मौजूद है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि इस 'शॉक ट्रीटमेंट' (Shock Treatment) के बाद मेरठ की 33 केवी व्यवस्था में कितना सुधार देखने को मिलता है।
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