खबरीलाल विशेष रिपोर्ट | नई दिल्ली/मेरठ: विचारों की क्रांति कभी सीमाओं में नहीं बंधती। इसका एक उत्कृष्ट उदाहरण तब देखने को मिला जब देश की राजधानी स्थित दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी (Delhi Public Library), चांदनी चौक में आयोजित एक भव्य वैचारिक सम्मेलन में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ की सशक्त आवाज गूंजी। भारत रत्न डॉ. बी.आर. अंबेडकर की जयंती के पावन उपलक्ष्य में 'अंबेडकरी साहित्य और आंदोलन के रिश्ते' विषय पर एक राष्ट्रीय स्तर का सेमिनार आयोजित किया गया।READ ALSIO:-मवाना: कस्तूरबा गांधी आवासीय बालिका विद्यालय की सुरक्षा पर मंडराया खतरा, स्टेडियम निर्माण से बढ़ा डर, सभासद ने SDM से की बड़ी मांग
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इस गरिमामयी कार्यक्रम में मेरठ से विशेष रूप से आमंत्रित शोषित क्रांति दल (SKD) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकांत ने प्रमुख वक्ता (Keynote Speaker) के रूप में हिस्सा लिया। उनके ओजस्वी विचारों और अंबेडकरी दर्शन की गहरी समझ ने वहां मौजूद श्रोताओं और देश के जाने-माने साहित्यकारों को मंत्रमुग्ध कर दिया। आइए, खबरीलाल (Khabreelal) की इस विस्तृत रिपोर्ट में जानते हैं कि इस महत्वपूर्ण सम्मेलन में क्या-क्या चर्चाएं हुईं और साहित्य व समाज के दिग्गजों ने मंच से क्या संदेश दिया।
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\r\n\r\n'अंबेडकरी साहित्य: दबे-कुचलों की कहानी और अधिकारों की लड़ाई'
\r\n\r\nसम्मेलन को संबोधित करते हुए शोषित क्रांति दल (SKD) के राष्ट्रीय अध्यक्ष रविकांत ने साहित्य और सामाजिक जमीन के गहरे संबंध पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि बाबा साहेब का साहित्य महज़ किताबों की अलमारियों में सजाने की वस्तु नहीं है।
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रविकांत ने अपने संबोधन में पुरजोर तरीके से कहा, "अंबेडकरी साहित्य केवल शब्दों का एक निर्जीव संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक जीवंत आंदोलन की आवाज है। यह साहित्य उन करोड़ों लोगों की पीड़ा, संघर्ष और विजय की प्रामाणिक कहानी कहता है, जिन्हें सदियों तक समाज के हाशिए पर रखा गया और दबाया गया।" उन्होंने आगे कहा कि आज के परिदृश्य में अंबेडकरी साहित्य की प्रासंगिकता और भी बढ़ जाती है। यह हमें सिखाता है कि हमें अपने संवैधानिक और मानवीय अधिकारों के लिए निरंतर जागरूक रहना चाहिए। जहां भी अन्याय हो, उसके खिलाफ पूरी दृढ़ता के साथ खड़ा होना ही अंबेडकरवाद का सच्चा पालन है।
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शोषित क्रांति दल (SKD) के आंदोलनों की दी जानकारी
\r\n\r\nअपने संबोधन के दौरान रविकांत ने केवल सैद्धांतिक बातें ही नहीं कीं, बल्कि जमीन पर हो रहे संघर्षों का भी ब्योरा दिया। उन्होंने मंच से शोषित क्रांति दल (SKD) द्वारा मेरठ और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में हाशिए के समाज को मुख्यधारा से जोड़ने और उनके अधिकारों के लिए चलाए जा रहे विभिन्न आंदोलनों के बारे में विस्तार से बताया।
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रविकांत ने स्पष्ट किया कि साहित्य से जो वैचारिक ऊर्जा मिलती है, संगठन उसी ऊर्जा को धरातल पर उतार कर शोषितों के हक की लड़ाई लड़ रहा है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अंबेडकर के विचारों को पढ़ें और उन्हें अपने आचरण में उतारें।
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नैकडोर (NACDOR) के नेतृत्व में हुआ सफल आयोजन
\r\n\r\nइस विशाल वैचारिक सम्मेलन का आयोजन और संचालन बेहद सुव्यवस्थित तरीके से किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता नैकडोर (NACDOR - National Confederation of Dalit Organisations) के राष्ट्रीय अध्यक्ष अशोक भारती ने की। अशोक भारती ने अपने अध्यक्षीय भाषण में अंबेडकरवादी साहित्यकारों के सामाजिक दायित्वों पर बल दिया।
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वहीं, मंच का कुशल संचालन नैकडोर की महिला महासचिव सुमेधा बोध ने किया। सुमेधा बोध ने कार्यक्रम को एक वैचारिक धागे में पिरोते हुए वक्ताओं और श्रोताओं के बीच एक शानदार संवाद स्थापित किया।
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देश के प्रख्यात साहित्यकारों और विचारकों का लगा जमावड़ा
\r\n\r\nदिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी का यह मंच इस बात का गवाह बना कि जब देश के मूर्धन्य विचारक एक साथ आते हैं, तो समाज को एक नई दिशा मिलती है। एसकेडी अध्यक्ष रविकांत के अलावा, इस सम्मेलन में साहित्य, शिक्षा और सामाजिक न्याय के क्षेत्र की कई जानी-मानी हस्तियों ने अपने सारगर्भित विचार रखे।
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सम्मेलन को मुख्य रूप से संबोधित करने वाले प्रमुख वक्ताओं में शामिल रहे:
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- \r\n डॉ. गीता सहारे: दिल्ली महिला आयोग की पूर्व सदस्य, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों पर अंबेडकर के दृष्टिकोण को रेखांकित किया।\r\n \r\n
- \r\n मोहनदास नैमिशराय: हिंदी दलित साहित्य के शिखर पुरुष और प्रसिद्ध लेखक, जिन्होंने अपने अनुभवों से साहित्य और समाज के दर्द को साझा किया।\r\n \r\n
- \r\n डॉ. जयप्रकाश कर्दम: देश के जाने-माने अंबेडकरवादी साहित्यकार और लेखक, जिन्होंने अंबेडकरी साहित्य की विकास यात्रा पर गहराई से प्रकाश डाला।\r\n \r\n
- \r\n सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. राहुल बाली और डॉ. के.पी. सिंह, जिन्होंने वर्तमान समय में सामाजिक आंदोलनों की चुनौतियों पर चर्चा की।\r\n \r\n
- \r\n डॉ. माया जॉन और साहित्यकार डॉ. पूरन सिंह, जिन्होंने शिक्षा और साहित्य के माध्यम से समाज में आ रहे बदलावों को रेखांकित किया।\r\n \r\n
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इसके साथ ही, मेरठ से एसकेडी महानगर अध्यक्ष वरुण कुमार ने भी इस मंच से अपने विचार साझा किए और संगठन द्वारा किए जा रहे कार्यों को दिल्ली के पटल पर रखा।
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वैचारिक चेतना का एक नया संचार
\r\n\r\nचांदनी चौक की दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में आयोजित यह सम्मेलन केवल एक कार्यक्रम भर नहीं था, बल्कि यह वैचारिक चेतना का एक ऐसा मंच था जहां से उठी आवाजें लंबे समय तक समाज का मार्गदर्शन करेंगी। मेरठ से जाकर दिल्ली के इस प्रतिष्ठित मंच पर रविकांत द्वारा अंबेडकरी साहित्य और ज़मीनी संघर्ष का जो ताना-बाना पेश किया गया, उसने इस बात को पुख्ता कर दिया है कि वैचारिक आंदोलन अब केवल बड़े शहरों तक सीमित नहीं है, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश के हर जिले में यह मजबूती से जड़ें जमा चुका है।
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देश और प्रदेश की तमाम बड़ी सामाजिक, राजनीतिक और साहित्यिक गतिविधियों की सबसे तेज और विश्वसनीय रिपोर्टिंग के लिए पढ़ते रहें खबरीलाल (Khabreelal)।
Sabse pehle comment karne wale banein.