मेरठ के शास्त्रीनगर में अपने मकानों पर मंडराते बुलडोजर के खौफ से सड़क पर उतरीं महिलाओं के आंदोलन में रविवार शाम एक बड़ा और नाटकीय मोड़ आ गया। पुलिस-प्रशासन की सख्ती, 42 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी और 'अपनों' की ही बगावत (शिकायतों) से आहत होकर सेक्टर-2 की महिलाओं ने अपने धरने को समाप्त करने की घोषणा कर दी। महिलाओं ने रुंधे गले से कहा- "आज 13वें दिन प्रशासन और अपनों ने मिलकर हमारे धरने की तेरहवीं कर दी है।" वहीं, सेक्टर-4 में अब भी महिलाओं का संघर्ष जारी है।READ ALSO: मेरठ में इंसानियत शर्मसार: एग्जाम देने निकली BA की छात्रा का अपहरण कर दरिंदगी; गन्ने के खेत में मिला निर्वस्त्र शव, 2 साल पहले भी हुई थी छेड़छाड़
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उत्तर प्रदेश के मेरठ में आवास विकास परिषद (Awas Vikas Parishad) के 'सेटबैक' (Setback) नियम के खिलाफ पिछले कई महीनों से सुलग रही चिंगारी रविवार को एक अहम पड़ाव पर आकर शांत हो गई। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के खौफ और अपने जीवन भर की कमाई से बने आशियानों को बचाने के लिए शास्त्रीनगर सेक्टर-2 की महिलाएं पिछले 13 दिनों से लगातार सेंट्रल मार्केट क्षेत्र में धरने पर बैठी थीं। लेकिन पुलिस की एक बड़ी कार्रवाई और स्थानीय व्यापारियों की शिकायतों ने इस उग्र आंदोलन की कमर तोड़ कर रख दी। आइए, जानते हैं कि कैसे 108 बार हनुमान चालीसा पढ़ने और सरकार को खुली चेतावनी देने वाली महिलाओं को अचानक अपना धरना क्यों खत्म करना पड़ा?
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42 डिग्री का टॉर्चर और पुलिस का 'हंटर': बीच सड़क से उखड़ा टेंट

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रविवार की दोपहर शास्त्रीनगर सेक्टर-2 के धरना स्थल पर उस वक्त भारी गहमागहमी मच गई, जब सीओ (CO) सिविल लाइन शुचिता सिंह भारी पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंच गईं। पुलिस ने यातायात बाधित होने और बाजार के व्यापारियों की शिकायतों का हवाला देते हुए महिलाओं द्वारा सड़क पर लगाया गया टेंट जबरन हटवा दिया।
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टेंट हटने के बाद महिलाएं 42 डिग्री सेल्सियस के जानलेवा तापमान और चिलचिलाती धूप में खुले आसमान के नीचे आ गईं। प्रशासन की इस कार्रवाई से महिलाओं का मनोबल बुरी तरह टूट गया। दोपहर से लेकर शाम तक भीषण गर्मी में बैठने के बाद, अंततः रविवार शाम को खुद महिलाओं ने ही सर्वसम्मति से इस धरने को समाप्त करने की औपचारिक घोषणा कर दी।
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दर्द और आक्रोश: "प्रशासन ने कर दी हमारे धरने की तेरहवीं"

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धरना खत्म करते हुए महिलाओं का दर्द और आक्रोश छलक पड़ा। यह गुस्सा केवल प्रशासन के खिलाफ नहीं था, बल्कि उन स्थानीय लोगों और नेताओं के खिलाफ भी था, जिनके लिए ये महिलाएं सड़क पर लड़ रही थीं।
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धरने पर बैठीं शालू शर्मा ने एक बेहद भावुक और तीखा बयान देते हुए कहा- "यह कोई इत्तेफाक नहीं है। पहली बार जब हमारा धरना चला था, तब हमने 13वें दिन सरकार पर अपने भरोसे की 'तेरहवीं' (मृत्यु के 13वें दिन का कर्मकांड) की थी। और आज भी 13वां ही दिन है, जिसके चलते आज प्रशासन ने हमारे धरने की ही तेरहवीं कर दी।"
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शालू ने आगे कहा, "हम यहां चिलचिलाती धूप में अपने लिए नहीं, बल्कि इस पूरे सेक्टर के सभी लोगों के घरों और व्यापारियों के व्यापार को बचाने के लिए लड़ाई लड़ रहे थे। लेकिन रामायण में जिस प्रकार लंका में विभीषण था, उसी प्रकार हमारे बीच भी कई 'विभीषण' बैठे हैं। हमारे ही बीच के कुछ लोगों ने इस धरने से परेशान होकर प्रशासन से हमारी शिकायतें कीं। जब अपने ही साथ नहीं हैं, तो हम किसके लिए लड़ें? इसलिए आज हम अपना यह धरना खत्म कर रहे हैं।"
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"इसी दिन के लिए दिया था भाजपा को वोट?"

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धरना स्थल पर मौजूद एक अन्य प्रदर्शनकारी महिला, राधा गुप्ता ने राजनीतिक दलों और व्यापारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए। राधा गुप्ता ने कहा, "तिरंगा चौक के आगे के कुछ व्यापारियों और कुछ बड़े रसूखदार नेताओं की शिकायत पर हमारा टेंट हटवाया गया है। आज सरकार और प्रशासन ने गरीब व मध्यमवर्गीय जनता को 42 डिग्री तापमान के बीच धूप में तड़पने के लिए मजबूर कर दिया है। क्या हमने इसीलिए भाजपा को वोट दिया था कि संकट के समय हमें सड़क पर अकेला छोड़ दिया जाए?"
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गौरतलब है कि टेंट उखड़ने से ठीक एक दिन पहले (शनिवार को), इसी सेक्टर-2 के धरना स्थल पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से हनुमान चालीसा का जाप किया था और सत्ताधारी दल के खिलाफ "हमारी भूल, कमल का फूल" के जोरदार नारे लगाए थे। इस राजनीतिक विरोध के बाद ही प्रशासन हरकत में आया था।
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वादों और तारीखों का खेल: सांसद अरुण गोविल का वो आश्वासन

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आपको बता दें कि यह कोई पहला मौका नहीं था जब महिलाएं धरने पर बैठी थीं। इससे पहले भी आवास विकास की कार्रवाई के विरोध में महिलाओं ने 15 दिनों तक लंबा धरना दिया था। उस समय, हाल ही में नवनिर्वाचित सांसद अरुण गोविल (Arun Govil) (जिन्होंने रामायण सीरियल में राम की भूमिका निभाई थी) ने धरना स्थल पर आकर महिलाओं को आश्वासन दिया था कि उनके घरों को टूटने नहीं दिया जाएगा। सांसद के इसी आश्वासन पर महिलाओं ने तब अपना धरना खत्म कर दिया था।
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लेकिन कुछ ही दिनों बाद, जब आवास विकास परिषद द्वारा मकानों पर दोबारा 'नोटिस' चस्पा कर दिए गए, तो खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए ये महिलाएं 13 दिन पहले फिर से सड़क पर उतर आई थीं। लेकिन इस बार उन्हें न तो किसी बड़े नेता का साथ मिला और न ही स्थानीय व्यापारियों का।
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सेक्टर-4 में अब भी जारी है 'नारी शक्ति' का संग्राम

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भले ही सेक्टर-2 की महिलाओं ने गुटबाजी और प्रशासन की सख्ती से तंग आकर अपना धरना खत्म कर दिया हो, लेकिन शास्त्रीनगर के सेक्टर-4 में अभी भी महिलाओं का धरना प्रदर्शन पूरी मजबूती के साथ जारी है।
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पुलिस ने वहां क्यों नहीं की कार्रवाई? सेक्टर-4 में भी महिलाएं लगातार कई दिनों से धरने पर हैं, लेकिन वहां पुलिस द्वारा कोई टेंट नहीं हटवाया गया। इसका मुख्य कारण महिलाओं की 'रणनीति' है। सेक्टर-4 की महिलाओं ने अपना धरना मुख्य सड़क से हटकर एक सुरक्षित किनारे पर स्थापित किया है। चूंकि उनके टेंट से सड़क का ट्रैफिक बाधित नहीं हो रहा है और न ही व्यापारियों की कोई दुकान छिप रही है, इसलिए प्रशासन को वहां कार्रवाई करने का कोई ठोस आधार (Ground) नहीं मिल पाया है।
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सुप्रीम कोर्ट के आदेश और 'सेटबैक' (मकान के चारों तरफ खाली जगह छोड़ने का नियम) के पेच में फंसी शास्त्रीनगर की 860 संपत्तियों का भविष्य अभी भी अधर में लटका हुआ है। सेक्टर-2 का धरना भले ही अपनों की 'विभीषण' नीति और पुलिस की सख्ती के आगे घुटने टेक चुका हो, लेकिन यह आंदोलन अभी पूरी तरह से खत्म नहीं हुआ है। सेक्टर-4 की महिलाएं अब भी डटी हुई हैं। अब देखना यह है कि क्या प्रदेश के मुख्यमंत्री या शासन स्तर से इन हजारों परिवारों को कोई कानूनी या प्रशासनिक राहत मिलती है, या फिर आने वाले दिनों में इन घरों पर बुलडोजर की गड़गड़ाहट सुनाई देगी।
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