मेरठ (Meerut): उत्तर प्रदेश के मेरठ शहर का दिल कहे जाने वाले 'सेंट्रल मार्केट' (Central Market) में इन दिनों अजीब सी खामोशी और खौफ का माहौल है। ग्राहकों की भीड़ से गुलजार रहने वाले इस बाजार में अब दुकानों के शटर गिरे हुए हैं और सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन का शोर गूंज रहा है। सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) के सीलिंग अभियान और 859 आवासीय भूखंडों में 'सेटबैक' (Setback) छोड़ने के सख्त आदेश के खिलाफ स्थानीय व्यापारियों और निवासियों का गुस्सा अब चरम पर पहुंच गया है।READ ALSO:-नूरपुर का 'खौफनाक अध्याय': साजिश के तहत नाबालिग से हैवानियत; परिवार को नशीली गोलियां खिलाकर घर में की लाखों की डकैती, 24 घंटे में 3 दरिंदे सलाखों के पीछे
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शुक्रवार को शुरू हुआ यह विरोध प्रदर्शन रविवार को अपने तीसरे दिन में प्रवेश कर गया। प्रशासन की कार्रवाई के खौफ से सहमे व्यापारी और उनके परिवार अब सड़क पर ही टेंट लगाकर धरने पर बैठ गए हैं। प्रदर्शनकारियों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि जब तक इस ध्वस्तीकरण और सीलिंग के आदेश में कोई राहत या संशोधन नहीं होता, वे अपना धरना खत्म नहीं करेंगे। इस पूरे आंदोलन में सबसे ज्यादा ध्यान महिलाओं के उस आक्रोश ने खींचा है, जो 'पलायन' (Exodus) की चेतावनी दे रही हैं।
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धरने पर बैठे व्यापारी, टेंट लगाकर किया सड़क पर कब्जा

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मेरठ के शास्त्री नगर स्थित सेंट्रल मार्केट में पिछले तीन दिनों से कामकाज पूरी तरह ठप है। 44 दुकानों की सीलिंग के बाद से ही यहां के 859 संपत्तियों के मालिकों की रातों की नींद उड़ी हुई है। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि जिन लोगों ने इमारतों के आगे अनिवार्य खाली जगह (सेटबैक) पर पक्का निर्माण कर लिया है, उसे दो महीने के भीतर तोड़ा जाए।
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इस आदेश के बाद अब व्यापारी अपनी दुकानें बचाने के लिए सड़क पर आ गए हैं। मार्केट के बीचों-बीच एक बड़ा टेंट लगा दिया गया है, जहां सुबह से लेकर रात तक स्थानीय लोग, दुकानदार और उनके परिवार धरने पर बैठे रहते हैं। लोगों का कहना है कि यह लड़ाई अब सिर्फ रोजगार की नहीं, बल्कि उनके अस्तित्व और जीवनभर की पूंजी को बचाने की है।
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महिलाओं का आक्रोश: हाथों में 'पलायन' के पोस्टर और जुबां पर नारे

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इस विरोध प्रदर्शन की सबसे मार्मिक और खौफनाक तस्वीर वह है, जिसमें घर की महिलाएं सड़क पर उतर आई हैं। जिन महिलाओं के कंधों पर घर चलाने की जिम्मेदारी होती है, वे आज अपने आशियाने को टूटने से बचाने के लिए तपती धूप में नारे लगा रही हैं।
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प्रदर्शनकारी महिलाओं के हाथों में बड़े-बड़े पोस्टर और बैनर हैं, जिन पर साफ अक्षरों में "पलायन" लिखा हुआ है। इन महिलाओं का कहना है कि अगर प्रशासन उनके घरों और दुकानों पर बुलडोजर चलाता है, तो उनके पास यह शहर छोड़कर जाने या फिर सामूहिक रूप से जान देने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचेगा।
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धरना स्थल पर गूंज रहे प्रमुख नारे:

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    "जन-जन की यही पुकार, बचा लो हमारा घर-परिवार।"
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    "योगी-मोदी इंसाफ दो, हमें उजड़ने से रोक लो।"
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    "आवास विकास मुर्दाबाद, हमारी रोजी-रोटी वापस दो।"
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महिलाओं ने रुंधे गले से बताया कि पहले सीलिंग के कारण उनके बच्चों के स्कूल बंद हो गए, फिर पतियों की दुकानें सील कर दी गईं और अब सेटबैक के नाम पर उनके सिर से छत छीनने की तैयारी की जा रही है।
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क्यों उठ रही है 'पलायन' की बात? (दोहरी मार का संकट)

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सेंट्रल मार्केट का यह इलाका मूल रूप से एक आवासीय योजना (Residential Scheme) का हिस्सा था, जो समय के साथ-साथ एक बड़े कमर्शियल हब में तब्दील हो गया। यहां के ज्यादतर मकानों का ग्राउंड फ्लोर (निचला हिस्सा) दुकानों में बदल चुका है और ऊपर के फ्लोर पर व्यापारी अपने परिवारों के साथ रहते हैं।
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पलायन की चेतावनी के पीछे के मुख्य कारण:

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    रोजगार छिनना: अगर दुकानें टूटती हैं या सील होती हैं, तो परिवारों की आय का एकमात्र साधन हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
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    आशियाना छिनना: सेटबैक (सामने की खाली जगह) तोड़ने का मतलब है इमारत के मुख्य ढांचे (Front Structure) को तोड़ना। अगर नीचे की दुकान का आगे का हिस्सा तोड़ा जाएगा, तो ऊपर बना मकान भी क्षतिग्रस्त हो जाएगा और रहने लायक नहीं बचेगा।
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    कर्ज का बोझ: कई छोटे दुकानदारों ने बैंकों से लोन लेकर अपना व्यापार खड़ा किया था। दुकान बंद होने से वे कर्ज के जाल में फंस जाएंगे।
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30 साल पुराने मकानों पर मंडरा रहा 'मौत और मलबे' का साया

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इस पूरे विवाद में एक बहुत बड़ा तकनीकी और इंजीनियरिंग का पेंच भी फंसा हुआ है। स्थानीय लोगों और सिविल इंजीनियर्स के अनुसार, इस मार्केट के अधिकांश मकान और दुकानें आज से करीब 30 से 35 साल पहले बनी थीं।
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उस दौर में निर्माण तकनीक आज जैसी आधुनिक नहीं थी। इमारतें आरसीसी (RCC) पिलर्स या फ्रेम स्ट्रक्चर पर कम, बल्कि 'लोड-बियरिंग दीवारों' (Load-bearing walls) पर ज्यादा टिकी होती थीं।
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    हादसे की आशंका: प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि अगर 30 साल पुरानी इन इमारतों में सेटबैक के नाम पर आगे से 3 या 4 मीटर का हिस्सा तोड़ा जाता है, तो पूरी इमारत का संतुलन बिगड़ जाएगा।
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    मशीनों (बुलडोजर या ड्रिल) की कंपन (Vibration) से पुरानी इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढह सकती हैं, जिससे बड़े जानलेवा हादसे हो सकते हैं। यह सिर्फ निर्माण का टूटना नहीं, बल्कि एक सुरक्षित रिहायशी इलाके को मलबे के ढेर में बदलने जैसा है।
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छोटे दुकानदारों और मकान मालिकों की व्यथा

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इस मार्केट में हर कोई कोई बड़ा या रसूखदार व्यापारी नहीं है। यहां सैकड़ों ऐसे छोटे मकान और दुकानदार हैं जो रोज कुआं खोदकर पानी पीते हैं। एक छोटी परचून की दुकान चलाने वाले बुजुर्ग व्यापारी ने बताया, "मेरी दुकान कुल जमा 15 फुट की है। अगर इसमें से 10 फुट जगह सेटबैक के नाम पर आवास विकास वाले तोड़ देंगे, तो मेरे पास दुकान के नाम पर क्या बचेगा? क्या मैं 5 फुट की जगह में अपना परिवार पाल सकता हूं? सरकार को यह समझना चाहिए कि यह कानून हम जैसे गरीबों की मौत का फरमान है।"
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छोटे मकान मालिकों का दर्द भी कुछ ऐसा ही है। जीवन भर की पाई-पाई जोड़कर बनाए गए इन घरों को आंखों के सामने टूटते देखने के डर ने उन्हें डिप्रेशन (Depression) में डाल दिया है। उनका कहना है कि जब 30 सालों से यह निर्माण हो रहा था, तब आवास विकास परिषद और नगर निगम के अधिकारी आंखें क्यों मूंदे बैठे थे? अब अपनी गलती की सजा वे आम जनता को क्यों दे रहे हैं?
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एक नजर में: क्या है पूरा विवाद?

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विवाद का बिंदु
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विवरण
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मुख्य मुद्दा
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859 संपत्तियों में अवैध सेटबैक (सामने की खाली जगह का अतिक्रमण) को तोड़ने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश।
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तत्काल कार्रवाई
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आवास विकास द्वारा 44 संपत्तियों (क्लीनिक, स्कूल, बैंक आदि) की सीलिंग।
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जनता की मांग
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आदेश में संशोधन किया जाए, पुरानी इमारतों को मानवीय आधार पर राहत दी जाए, और ध्वस्तीकरण रोका जाए।
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खतरा
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30 साल पुरानी इमारतों के ढहने का डर और हजारों लोगों के बेरोजगार व बेघर होने का संकट।
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प्रदर्शन का स्वरूप
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मार्केट में अनिश्चितकालीन धरना, टेंट लगाकर विरोध और 'पलायन' की चेतावनी।
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आगे क्या? (सरकार से हस्तक्षेप की उम्मीद)

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तीसरे दिन भी धरने पर बैठे लोगों की नजरें अब सीधे लखनऊ (मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ) और दिल्ली (प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी) की ओर टिकी हैं। व्यापारियों का एक प्रतिनिधिमंडल जल्द ही शासन के उच्चाधिकारियों और राजनीतिक जनप्रतिनिधियों से मिलने की तैयारी कर रहा है।
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व्यापारियों की मांग है कि राज्य सरकार इस मामले में हस्तक्षेप करे और सुप्रीम कोर्ट के समक्ष एक नई और यथार्थवादी रिपोर्ट पेश करे, जिसमें मानवीय पहलू और 30 साल पुराने निर्माण के ढहने के खतरे को स्पष्ट रूप से बताया गया हो। लोगों को उम्मीद है कि सरकार कोई न कोई अध्यादेश या बीच का रास्ता (जैसे कंपाउडिंग फीस लेकर नियमितीकरण) जरूर निकालेगी, अन्यथा मेरठ का यह ऐतिहासिक बाजार हमेशा के लिए खंडहर में तब्दील हो जाएगा। फिलहाल, सेंट्रल मार्केट में तनावपूर्ण शांति है और हर किसी के मन में बस एक ही सवाल है- क्या हमारा घर बच पाएगा?
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