मेरठ। उत्तर प्रदेश के मेरठ स्थित शास्त्रीनगर के सेंट्रल मार्केट में सीलिंग और अतिक्रमण का विवाद अब एक बड़े प्रशासनिक, कानूनी और भावनात्मक महासंग्राम में तब्दील हो चुका है। सुप्रीम कोर्ट की सख्ती के बाद आवास एवं विकास परिषद एक्शन मोड में है। शुक्रवार को जैसे ही प्रशासन की टीम ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत बाजार में 'सेटबैक' नियमों के उल्लंघन के नोटिस चस्पा करने शुरू किए, वैसे ही पूरे बाजार में हड़कंप मच गया।READ ALSO:-प्रचंड गर्मी और लू का कहर: बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूलों के समय में हुआ बड़ा बदलाव, जानें नई गाइडलाइंस
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व्यापारियों और स्थानीय निवासियों में भारी रोष है। पिछले 15 दिनों से धरने पर बैठी महिलाओं का विरोध उस वक्त एक अलग ही धार्मिक और भावुक रंग में रंग गया, जब मौके पर मेरठ के सांसद और रामायण फेम अरुण गोविल पहुंचे। महिलाओं ने हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए सांसद का स्वागत भजन— "मेरे घर राम आए हैं..." गाकर किया।
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आइए, इस पूरी रिपोर्ट में विस्तार से समझते हैं कि आखिर यह पूरा विवाद क्या है, इसमें 70 करोड़ और 14 लाख का क्या खेल है, क्यों लग रहे हैं भेदभाव के आरोप और क्या होते हैं भवन निर्माण के 'सेटबैक' नियम।
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भक्ति, भावुकता और सांसद का आश्वासन
\r\n\r\nसेंट्रल मार्केट (सेक्टर-2) में चल रही सीलिंग की कार्रवाई के खिलाफ व्यापारी और महिलाएं अनिश्चितकालीन धरने पर बैठे थे। शुक्रवार दोपहर का माहौल तब तनावपूर्ण हो गया जब नोटिस चस्पा होने लगे। इसी बीच, सांसद अरुण गोविल वहां पहुंचे। व्यापारियों ने उनका जोरदार स्वागत किया।
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धरने पर बैठी महिलाएं, जो प्रशासन के खिलाफ नारेबाजी कर रही थीं और हनुमान चालीसा का पाठ कर रही थीं, गोविल को देखते ही भावुक हो गईं। उन्होंने न्याय की गुहार लगाते हुए उनके सामने "मेरे घर राम आए हैं" भजन गाना शुरू कर दिया। इस दृश्य ने पूरे बाजार के तनावपूर्ण माहौल को चंद पलों के लिए शांत कर दिया।
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सांसद ने व्यापारियों और महिलाओं की समस्याओं को ध्यान से सुना। उन्होंने आश्वासन दिया कि इस मामले में जो भी कथित अनियमितताएं हो रही हैं, उनकी उच्च स्तर पर जांच कराई जाएगी और व्यापारियों के हितों की रक्षा के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। सांसद के इस ठोस आश्वासन के बाद महिलाओं ने अपना 15 दिन पुराना धरना फिलहाल स्थगित कर दिया है।
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सेटबैक का नोटिस: 15 दिन की मोहलत, 16वें दिन होगा एक्शन
\r\n\r\nआवास विकास परिषद की ओर से कार्रवाई की तलवार लटक चुकी है। उप आवास आयुक्त अनिल कुमार सिंह ने स्पष्ट किया है कि सुप्रीम कोर्ट के सख्त और स्पष्ट निर्देशों के तहत ही यह कार्रवाई हो रही है।
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- \r\n क्या है नियम: जिन संपत्तियों पर नोटिस चस्पा किए जा रहे हैं, उन संपत्ति स्वामियों को 15 दिन के भीतर अपने भवनों के नक्शे तय मानकों (सेटबैक नियमों) के अनुसार तैयार करके प्रस्तुत करने होंगे।\r\n \r\n
- \r\n कार्रवाई का अल्टीमेटम: उप आवास आयुक्त ने साफ कहा कि 15 दिन की तय समयसीमा पूरी होने के बाद, 16वें दिन से परिषद द्वारा बिना किसी अतिरिक्त मोहलत के नियमानुसार ध्वस्तीकरण/सीलिंग की कार्रवाई शुरू कर दी जाएगी।\r\n \r\n
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भेदभाव के गंभीर आरोप: 56 की लिस्ट में 44 पर ही कार्रवाई क्यों?
\r\n\r\nइस पूरे मामले में आवास एवं विकास परिषद के अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। व्यापारियों का आरोप है कि सुप्रीम कोर्ट में पेश होने वाली लिस्ट लीक हो गई थी और अधिकारियों ने दोहरी नीति अपनाई है।
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- \r\n गायब हुए 12 नाम: व्यापारियों का दावा है कि असल सूची में 56 भवनों के नाम थे, लेकिन अचानक 12 नाम हटा दिए गए और केवल 44 भवनों पर ही कार्रवाई की जा रही है।\r\n \r\n
- \r\n कैलाश डेरी और बैंकों का मामला: सूची से बाहर किए गए नामों में 'कैलाश डेरी' का नाम प्रमुख है, जहां व्यावसायिक गतिविधियां जोरों पर थीं, फिर भी उसे बचा लिया गया। इसके अलावा, IDBI बैंक की बिल्डिंग को सील कर दिया गया, लेकिन ठीक पास स्थित SBI बैंक की बिल्डिंग पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। व्यापारियों का सीधा आरोप है कि अधिकारियों ने कोर्ट और सरकार दोनों को गुमराह किया है।\r\n \r\n
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पैसों का महा-विवाद: 70 करोड़ का शमन शुल्क और 14 लाख का 'चंदा'
\r\n\r\nयह विवाद अब केवल अतिक्रमण का नहीं, बल्कि भारी वित्तीय अनियमितताओं और पारदर्शिता का भी बन गया है। इसमें दो बड़े आर्थिक पेंच फंसे हैं:
\r\n\r\n1. 70 करोड़ रुपए का 'सरकारी' विवाद
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27 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि 6 हफ्ते के अंदर आवासीय जमीन पर चल रही कमर्शियल गतिविधियों को ध्वस्त किया जाए। इसका विरोध होने पर आवास विकास ने एक बीच का रास्ता निकाला:
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- \r\n आवास विकास ने आदेश जारी किया कि 36,000 रुपए प्रति वर्ग मीटर के हिसाब से शमन शुल्क (Compounding Fee) जमा करके आवासीय प्लॉट को कमर्शियल में बदला जा सकता है।\r\n \r\n
- \r\n व्यापारियों ने अपने प्रतिष्ठानों को बचाने के लिए कुल मिलाकर लगभग 70 करोड़ रुपए आवास विकास के खाते में जमा कर दिए।\r\n \r\n
- \r\n व्यापारियों का सवाल: जब सोमवार (6 अप्रैल) को सुप्रीम कोर्ट ने 44 संपत्तियों को सील करने का फिर आदेश दिया, तो व्यापारी भड़क गए। उनका सवाल है कि जब पैसे ले लिए गए, तो सीलिंग क्यों? और आवास विकास ने सुप्रीम कोर्ट को 70 करोड़ रुपए वसूलने की बात क्यों नहीं बताई?\r\n \r\n
- \r\n प्रशासन का जवाब: एडीएम सिटी बृजेश कुमार सिंह ने स्पष्ट किया कि भू-उपयोग बदलने के लिए पैसा जमा करना और सुप्रीम कोर्ट का सीलिंग आदेश, दोनों अलग-अलग प्रक्रियाएं हैं। जो व्यापारी अपनी पैरवी खत्म करना चाहते हैं, प्रशासन उन्हें उनका पैसा वापस दिलाने में मदद करेगा।\r\n \r\n
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2. 14 लाख रुपए के 'चंदे' का निजी विवाद
\r\n\r\nइस आंदोलन की आड़ में एक नया विवाद फूट पड़ा है। सेंट्रल मार्केट के व्यापारियों से विरोध प्रदर्शन और कानूनी लड़ाई के नाम पर लगभग 14 लाख रुपये का चंदा जुटाया गया था।
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अब व्यापारियों के व्हाट्सएप ग्रुप्स में बवाल मचा है क्योंकि इस रकम का कोई हिसाब-किताब नहीं दिया जा रहा है। व्यापारी अब उन 'सफेदपोश' नेताओं और लोगों के नाम सार्वजनिक करने की मांग कर रहे हैं जिन्होंने यह चंदा डकार लिया है।
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इतिहास के पन्नों से: एक थप्पड़, जिसने 35 साल बाद करवाया ध्वस्तीकरण
\r\n\r\nसेंट्रल मार्केट पर हो रहे इस एक्शन की जड़ें आज की नहीं, बल्कि साल 1990 की हैं। यह जानना बेहद दिलचस्प है कि यह पूरा मामला शुरू कैसे हुआ:
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- \r\n 1990 की घटना: आवास-विकास को सूचना मिली थी कि सेंट्रल मार्केट के आवासीय भूखंड (661/6) पर एक कमर्शियल कॉम्प्लेक्स बन रहा है। तत्कालीन अधीक्षण अभियंता अरविंद कुमार लेंटर का काम रुकवाने पहुंचे। व्यापारियों ने हंगामा किया और बात इतनी बढ़ी कि उन्होंने अधीक्षण अभियंता को थप्पड़ मार दिया।\r\n \r\n
- \r\n कानूनी लड़ाई: नौचंदी थाने में FIR दर्ज हुई। आवास विकास ने इस अवैध इमारत को गिराना चाहा, लेकिन व्यापारी कोर्ट चले गए।\r\n \r\n
- \r\n 2014 का आदेश: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने 2 महीने के भीतर इमारत गिराने का आदेश दिया। व्यापारी सुप्रीम कोर्ट पहुंच गए।\r\n \r\n
- \r\n 2025 का ऐतिहासिक फैसला: करीब 10 साल बाद सुप्रीम कोर्ट ने 17 सितंबर 2025 को कॉम्प्लेक्स सहित सभी अवैध निर्माण ध्वस्त करने का आदेश दिया। 25 अक्टूबर 2025 को 22 दुकानों वाले उस कॉम्प्लेक्स को अंततः ढहा दिया गया था। उसी आदेश की आंच अब बाकी बाजार पर आ रही है।\r\n \r\n
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क्या हैं 'सेटबैक' (Setback) के नियम? आसान भाषा में समझें
\r\n\r\nप्रशासन द्वारा दिए जा रहे 'सेटबैक नोटिस' को लेकर लोगों में भ्रम है कि छोटे मकानों पर यह लागू नहीं होता। लेकिन विभागीय सूत्र स्पष्ट करते हैं कि नियम सबके लिए बराबर हैं।
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सेटबैक का अर्थ क्या है?
\r\n\r\nभवन निर्माण के दौरान घर और प्लॉट की सीमा के बीच खाली छोड़ी जाने वाली जगह को सेटबैक कहते हैं।
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- \r\n Front Setback (F): घर के सामने, सड़क और भवन के बीच की दूरी।\r\n \r\n
- \r\n Rear Setback (R): घर के पीछे, प्लॉट की पिछली सीमा और भवन के बीच की दूरी।\r\n \r\n
- \r\n Side Setback (S1): घर के दाएं और बाएं किनारों पर छोड़ी जाने वाली जगह।\r\n \r\n
- \r\n Street Setback (S2): कॉर्नर प्लॉट के मामले में, दूसरी सड़क की ओर छोड़ी गई जगह।\r\n \r\n
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आवासीय (Residential) भवनों के लिए सेटबैक नियम
\r\n\r\n| \r\n प्लॉट का क्षेत्रफल (वर्ग मीटर में) \r\n | \r\n \r\n फ्रंट सेटबैक (Front) \r\n | \r\n \r\n रियर सेटबैक (Rear) \r\n | \r\n \r\n साइड (Side) \r\n | \r\n \r\n स्ट्रीट (Street) \r\n | \r\n
| \r\n 150 वर्ग मीटर तक \r\n | \r\n \r\n 1 मीटर \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n
| \r\n 151 से 300 वर्ग मीटर तक \r\n | \r\n \r\n 3 मीटर \r\n | \r\n \r\n 1.5 मीटर \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n
| \r\n 301 से 500 वर्ग मीटर तक \r\n | \r\n \r\n 3 मीटर \r\n | \r\n \r\n 3 मीटर \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n
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व्यावसायिक (Commercial) भवनों के लिए सेटबैक नियम
\r\n\r\n| \r\n प्लॉट का क्षेत्रफल (वर्ग मीटर में) \r\n | \r\n \r\n फ्रंट सेटबैक (Front) \r\n | \r\n \r\n रियर सेटबैक (Rear) \r\n | \r\n \r\n साइड (Side) \r\n | \r\n \r\n स्ट्रीट (Street) \r\n | \r\n
| \r\n 100 वर्ग मीटर तक \r\n | \r\n \r\n 1.5 मीटर \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n
| \r\n 101 से 300 वर्ग मीटर तक \r\n | \r\n \r\n 3 मीटर \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n
| \r\n 301 से 1000 वर्ग मीटर तक \r\n | \r\n \r\n 4.5 मीटर \r\n | \r\n \r\n 3 मीटर \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n \r\n 0 \r\n | \r\n
(नोट: तय मानकों से कम जगह छोड़ने पर भवन को अवैध माना जाता है और ध्वस्तीकरण की कार्रवाई की जाती है।)
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मेरठ का सेंट्रल मार्केट सीलिंग प्रकरण अब न्याय, भ्रष्टाचार और प्रशासन की निष्पक्षता का परीक्षण बन गया है। व्यापारियों की सांसें अटकी हुई हैं। देखना यह होगा कि 15 दिन का समय बीतने के बाद बुलडोजर चलता है या सांसद अरुण गोविल का आश्वासन व्यापारियों के लिए संजीवनी बूटी साबित होता है।
Sabse pehle comment karne wale banein.