मेरठ (मवाना)। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार प्रदेश भर में महिलाओं और बेटियों की सुरक्षा को लेकर 'मिशन शक्ति' और अपराधियों के खिलाफ 'जीरो टॉलरेंस' (Zero Tolerance) जैसी नीतियों का डंका पीटती है। सरकार का स्पष्ट निर्देश है कि महिला अपराधों में पुलिस तुरंत और कठोरतम कार्रवाई करे। लेकिन, जमीनी हकीकत इन बड़े-बड़े दावों से कोसों दूर नजर आती है। मेरठ (Meerut) जिले के मवाना (Mawana) थाना क्षेत्र से एक ऐसा दिल दहला देने वाला और पुलिस महकमे को शर्मसार कर देने वाला मामला सामने आया है, जिसने पूरी न्याय व्यवस्था और 'खाकी' की नीयत पर गंभीर सवालिया निशान लगा दिए हैं।READ ALSO:-दुनिया का सबसे बड़ा महा-अभियान: भारत की पहली 100% डिजिटल और जातिगत जनगणना 2027 शुरू, मोबाइल ऐप पर पूछे जाएंगे 33 अहम सवाल; पढ़ें पूरी लिस्ट
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मवाना थाना क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम मीवा में एक 50 वर्षीय दरिंदे ने अपनी इंसानियत को ताक पर रखते हुए एक बेबस, असहाय और शारीरिक रूप से दिव्यांग युवती के साथ उसके ही घर में घुसकर दुष्कर्म (Rape) की खौफनाक वारदात को अंजाम दिया। लेकिन इस पूरी घटना में सबसे ज्यादा खौफनाक और शर्मनाक पहलू आरोपी का कृत्य नहीं, बल्कि रक्षक कहलाने वाली 'मवाना पुलिस' की भूमिका रही। आरोप है कि पुलिस ने इस संगीन अपराध की लीपापोती करने, आरोपी को बचाने और मामले को रफा-दफा करने के लिए अपने अधिकारों का घोर दुरुपयोग किया। पुलिस की इस मिलीभगत का नतीजा यह हुआ कि आरोपी को आसानी से जमानत मिल गई और न्याय के लिए तड़पती उस गरीब पीड़िता का 4 दिन बाद तब मेडिकल परीक्षण हुआ, जब मामला जिले के तेजतर्रार पुलिस कप्तान (SSP) की चौखट तक जा पहुंचा। न्यूज़ पोर्टल 'खबरीलाल' (Khabreelal) की इस विस्तृत और ग्राउंड रिपोर्ट में पढ़िए, कैसे एक बेबस परिवार को दरिंदों के साथ-साथ पुलिस के भ्रष्ट 'सिस्टम' से भी लड़ना पड़ा।
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17 अप्रैल का वो काला दिन: जब घर में घुस आया एक हैवान

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यह पूरी अमानवीय और खौफनाक घटना 17 अप्रैल 2026 की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, मवाना थाना क्षेत्र के ग्राम मीवा में एक गरीब और सीधा-सादा परिवार निवास करता है। इस परिवार की एक बेटी शारीरिक रूप से दिव्यांग (Physically Challenged) है, जो अपनी रक्षा स्वयं करने में पूरी तरह से असमर्थ है। 17 अप्रैल के दिन युवती के माता-पिता और परिवार के अन्य सदस्य किसी जरूरी काम से घर के बाहर गए हुए थे। घर में केवल वह दिव्यांग युवती ही अकेली मौजूद थी।
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उसी गांव का रहने वाला लगभग 50 वर्षीय व्यक्ति, जिसका नाम फखरुद्दीन बताया गया है, काफी समय से इस परिवार और युवती की गतिविधियों पर नजर रखे हुए था। जैसे ही उसने देखा कि घर में कोई नहीं है और युवती अकेली है, उसकी नीयत खराब हो गई। वह दबे पांव जबरन घर के अंदर घुस गया। आरोपी फखरुद्दीन ने इंसानियत, उम्र और नैतिकता की सारी हदें पार करते हुए उस बेबस दिव्यांग युवती के साथ जबरन दुष्कर्म की खौफनाक वारदात को अंजाम दिया। जब युवती ने अपनी पूरी शारीरिक ताकत लगाकर अपनी आबरू बचाने की कोशिश की और चीखने-चिल्लाने का प्रयास किया, तो हैवान फखरुद्दीन ने उसके साथ बेरहमी से मारपीट की। उसने युवती के कपड़े फाड़ दिए और उसे बुरी तरह लहूलुहान कर दिया।
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चीखें सुनकर दौड़े पड़ोसी, दरिंदे को रंगे हाथों किया काबू

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दरिंदगी और अमानवीयता की इस घटना को अंजाम देने के बाद, आरोपी फखरुद्दीन जैसे ही घर से भागने की फिराक में था, तभी युवती की दर्दनाक चीख-पुकार सुनकर पड़ोस के कुछ युवक और महिलाएं मौके की तरफ दौड़ पड़े। उन्होंने आरोपी फखरुद्दीन को बेहद संदिग्ध, घबराई हुई और हड़बड़ाहट की स्थिति में घर से बाहर निकलते हुए देख लिया।
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जब अनहोनी की आशंका के चलते पड़ोसियों ने घर के अंदर जाकर देखा, तो वहां का मंजर देखकर उनकी रूह कांप गई और उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। अंदर वह दिव्यांग युवती अर्धनग्न अवस्था में, खून से लथपथ और बेहद गंभीर हालत में जमीन पर पड़ी हुई थी। वह दहशत और खौफ से बुरी तरह कांप रही थी और रो-रोकर ग्रामीणों को अपने साथ हुई हैवानियत की दास्तां बयां कर रही थी। इसके बाद आक्रोशित ग्रामीणों और पड़ोसियों ने एकजुट होकर भाग रहे आरोपी फखरुद्दीन का पीछा किया और उसे दबोच लिया। आरोपी की जमकर धुनाई करने के बाद ग्रामीणों ने तुरंत मवाना पुलिस को घटना की सूचना दी। सूचना मिलते ही स्थानीय पुलिस मौके पर पहुंची और ग्रामीणों ने आरोपी को पुलिस के सुपुर्द कर दिया।
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अब यहां से शुरू होता है मवाना पुलिस (Mawana Police) की कार्यशैली का वह काला अध्याय, जिसने आम जनता के मन में पुलिस के प्रति विश्वास को पूरी तरह से चकनाचूर कर दिया है। जब पीड़िता के पिता को घटना की जानकारी मिली तो वे बदहवास हालत में घर पहुंचे। अपनी बेटी की यह दुर्दशा देखकर एक पिता का दिल छलनी हो गया। वे भारी मन और आंखों में आंसू लिए तुरंत मवाना थाने पहुंचे और आरोपी फखरुद्दीन के खिलाफ एक विस्तृत नामजद तहरीर (Written Complaint) दी।
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पीड़ित पिता ने अपनी शिकायत में बहुत ही स्पष्ट और साफ शब्दों में लिखा था कि आरोपी ने घर में घुसकर उनकी बेबस दिव्यांग बेटी के साथ 'दुष्कर्म' (Rape) किया है। उन्होंने हाथ जोड़कर पुलिस अधिकारियों से गुहार लगाई कि तुरंत दुष्कर्म की सख्त धाराओं (भारतीय न्याय संहिता/IPC की सुसंगत धाराओं) के तहत मुकदमा दर्ज कर उनकी बेटी का चिकित्सीय परीक्षण (Medical Examination) कराया जाए, ताकि उसे न्याय मिल सके।
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लेकिन, पीड़ित परिवार का आरोप है कि मवाना थाने में बैठे जिम्मेदार पुलिस अधिकारियों ने उनके साथ एक बहुत बड़ा 'खेल' कर दिया। पुलिस ने पिता की तहरीर को दरकिनार करते हुए, मनमाने ढंग से केवल कपड़े फाड़ने, छेड़छाड़ और मारपीट (IPC 354, 323 जैसी) की हल्की और जमानती धाराओं में मुकदमा दर्ज कर लिया। पुलिस ने 'दुष्कर्म' (Rape) जैसी संगीन और गैर-जमानती धारा को एफआईआर (FIR) से पूरी तरह से गायब कर दिया। यह सीधे तौर पर आरोपी को बचाने और मामले को हल्का करने की एक सोची-समझी साजिश थी।
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कानून के जानकारों और सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार, दुष्कर्म या यौन उत्पीड़न जैसे जघन्य अपराधों में पीड़िता का तुरंत (संभवतः 24 घंटे के भीतर) मेडिकल परीक्षण कराना कानूनी रूप से अनिवार्य होता है। यह इसलिए जरूरी है ताकि फोरेंसिक साक्ष्य (Forensic Evidence) और डीएनए सैंपल जुटाए जा सकें। लेकिन मवाना पुलिस ने संवेदनहीनता की सारी हदें पार करते हुए उस दिव्यांग पीड़िता का कोई मेडिकल नहीं कराया। उसे उसी हालत में उसके हाल पर छोड़ दिया गया।
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बल्कि, इसके उलट, पुलिस ने बड़ी ही फुर्ती और दिलचस्पी दिखाते हुए उन हल्की धाराओं में आरोपी फखरुद्दीन का चालान कर उसे न्यायालय (Court) में पेश कर दिया। चूंकि पुलिस द्वारा लगाई गई धाराएं मामूली मारपीट और छेड़छाड़ की थीं, और पुलिस डायरी (Case Diary) में कोई भी मेडिकल रिपोर्ट या गंभीर साक्ष्य संलग्न नहीं था, इसलिए आरोपी फखरुद्दीन को न्यायालय से तुरंत जमानत (Bail) मिल गई। वह दरिंदा, जिसने कुछ ही घंटों पहले एक बेबस दिव्यांग की पूरी जिंदगी बर्बाद कर दी थी, वह पुलिस की इसी 'कृपा' और साठगांठ के चलते चंद घंटों में ही सीना तानकर जेल से बाहर आ गया।
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न्याय के लिए भटकता रहा गरीब परिवार: 'संपूर्ण समाधान दिवस' में भी मिली निराशा

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आरोपी के इतनी आसानी से जेल से बाहर आते ही पीड़ित परिवार पर दुखों का एक और पहाड़ टूट पड़ा। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि आखिर पुलिस ने उनके साथ इतना बड़ा धोखा क्यों किया और किसके दबाव में किया। 18 अप्रैल को मवाना तहसील में उत्तर प्रदेश शासन के निर्देश पर 'संपूर्ण समाधान दिवस' (Tehsil Diwas) का आयोजन किया गया था। इस दिन जिले के कई आला प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी जनता की फरियाद सुनने के लिए वहां मौजूद थे।
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पीड़ित पिता अपनी दिव्यांग बेटी को लेकर न्याय की आस में उस समाधान दिवस में भी पहुंचा। उसने वहां मौजूद बड़े अधिकारियों के सामने हाथ जोड़कर, फूट-फूटकर रोते हुए मवाना पुलिस की यह सारी काली करतूत बताई और न्याय की भीख मांगी। लेकिन हमारे सिस्टम की विडंबना देखिए कि उस समाधान दिवस में भी उनकी चीखें केवल कोरी प्रशासनिक फाइलों और आश्वासनों में दबकर रह गईं। स्थानीय पुलिस महकमे के कान पर जूं तक नहीं रेंगी और मौके पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
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स्थानीय स्तर पर (मवाना थाने और तहसील में) हर तरफ से भारी निराशा और हताशा हाथ लगने के बाद भी, पीड़ित परिवार ने हार नहीं मानी। 20 अप्रैल को वे किसी तरह हिम्मत जुटाकर मेरठ जिला मुख्यालय पहुंचे और वहां के कड़क और तेजतर्रार वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (SSP) अविनाश पांडेय के कार्यालय में जाकर पेश हुए।
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एसएसपी अविनाश पांडेय महिलाओं, दलितों और कमजोर वर्गों के खिलाफ होने वाले अपराधों पर अपने बेहद सख्त और 'नो नॉनसेंस' रुख के लिए पूरे जिले में जाने जाते हैं। जब पीड़ित परिवार ने रोते हुए एसएसपी को इस पूरे प्रकरण की हकीकत बताई और मवाना पुलिस की इस 'कारिस्तानी' का कच्चा चिट्ठा खोला, तो कप्तान का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने एक झटके में मामले की गंभीरता और पुलिस स्तर पर हुई भारी चूक (या मिलीभगत) को भांप लिया।
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एसएसपी पांडेय ने उसी वक्त अपने कार्यालय से मवाना थाने के एसएचओ (Station House Officer) और संबंधित जांच अधिकारियों को फोन पर कड़ी फटकार लगाई। उन्होंने तत्काल प्रभाव से इस पूरे मामले की नए सिरे से निष्पक्ष जांच (Impartial Investigation) करने, मुकदमे में पीड़िता के बयानों के आधार पर दुष्कर्म की धाराएं बढ़ाने और पीड़िता का तुरंत मेडिकल परीक्षण कराने के सख्त निर्देश दिए। एसएसपी के इस 'चाबुक' के चलते मवाना थाने में हड़कंप मच गया। जो पुलिसकर्मी कल तक पीड़ित परिवार को दुत्कार रहे थे और आरोपी को संरक्षण दे रहे थे, वे एसएसपी के खौफ से तुरंत हरकत में आ गए।
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4 दिन बाद हुआ मेडिकल: फोरेंसिक सबूतों के नष्ट होने की साजिश?
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एसएसपी के सीधे हस्तक्षेप और कड़े आदेशों के बाद, पुलिस की कार्यप्रणाली में जो तेजी आई, वह भी अपने आप में कई सवाल खड़े करती है। घटना (17 अप्रैल) के पूरे चार दिन बाद (20 अप्रैल की देर शाम), मवाना पुलिस आनन-फानन में पीड़िता को लेकर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) मवाना पहुंची और वहां महिला चिकित्सकों के पैनल द्वारा उसका मेडिकल परीक्षण कराया गया।
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लेकिन यहां देश के कानून और न्याय प्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि घटना के 4 दिन बाद मेडिकल कराने का वैज्ञानिक और कानूनी औचित्य क्या रह जाता है? फोरेंसिक साइंस (Forensic Science) और क्रिमिनल जूरिस्प्रूडेंस के अनुसार, दुष्कर्म के मामलों में शुरुआती 24 से 48 घंटे साक्ष्य संकलन के लिए बेहद अहम होते हैं। इस दौरान पीड़िता के शरीर, नाखूनों और कपड़ों से आरोपी के फिंगरप्रिंट, डीएनए (DNA), बाल, त्वचा के अंश, खरोंच के निशान और सीमन (Semen) जैसे अत्यंत महत्वपूर्ण फोरेंसिक साक्ष्य जुटाए जाते हैं। यही साक्ष्य अंततः कोर्ट में आरोपी को फांसी या उम्रकैद की सजा दिलाने का सबसे पुख्ता वैज्ञानिक आधार बनते हैं।
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चार दिन की इस आपराधिक देरी के बाद इन सभी अहम सुरागों के धुल जाने या नष्ट होने की पूरी-पूरी आशंका है। पीड़ित परिवार और स्थानीय वकीलों का सीधा आरोप है कि मवाना पुलिस ने जानबूझकर मेडिकल कराने में यह देरी की, ताकि फोरेंसिक जांच में दुष्कर्म की वैज्ञानिक पुष्टि न हो सके और कोर्ट में सबूतों के अभाव (Lack of evidence) का पूरा फायदा आरोपी फखरुद्दीन को मिल सके। यह एक सोची-समझी साजिश का हिस्सा प्रतीत होता है।
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इस पूरे सनसनीखेज मामले में पुलिस की भूमिका सिर्फ प्रशासनिक लापरवाही तक ही सीमित नहीं है। पीड़ित परिवार ने मवाना थाने में तैनात एक उप निरीक्षक (Sub-Inspector/दरोगा) पर बेहद गंभीर और संगीन आरोप लगाए हैं। पीड़ित पिता का कहना है कि जब वे अपनी शिकायत लेकर थाने जा रहे थे और न्याय मांग रहे थे, तो उक्त दरोगा ने उन्हें बुरी तरह डराया-धमकाया।
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आरोप है कि दरोगा ने परिवार पर मानसिक दबाव बनाया कि वे इस मामले को ज्यादा तूल न दें और आरोपी पक्ष के साथ 'समझौता' (Compromise/फैसला) करने के लिए राजी हो जाएं। दरोगा ने कथित तौर पर यह भी कहा कि आरोपी पक्ष प्रभावशाली है और आगे चलकर परिवार को परेशानी हो सकती है। खाकी वर्दी का यह खौफनाक और भ्रष्ट चेहरा आम जनता के मन में पुलिस के प्रति बचे-खुचे विश्वास को भी पूरी तरह से चकनाचूर कर देता है। रक्षक ही जब समझौते का दलाल बन जाए, तो न्याय की गुहार किससे लगाई जाए?
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दो समुदायों का मामला: क्षेत्र में भारी सांप्रदायिक तनाव और हिंदू संगठनों का आक्रोश

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यह वीभत्स घटना केवल एक आपराधिक कृत्य तक सीमित नहीं रह गई है, बल्कि मवाना पुलिस की इस नाकामी ने इलाके में एक बड़ा सांप्रदायिक और सामाजिक तनाव (Communal Tension) भी पैदा कर दिया है। चूंकि पीड़िता (हिंदू) और आरोपी फखरुद्दीन (मुस्लिम) दो अलग-अलग समुदायों से ताल्लुक रखते हैं, इसलिए इस घटना ने अब एक बड़ा राजनीतिक और सामाजिक तूल पकड़ लिया है।
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जैसे ही पूरे मवाना क्षेत्र में यह खबर आग की तरह फैली कि स्थानीय पुलिस ने एक मुस्लिम आरोपी को बचाने के लिए एक बेबस हिंदू दिव्यांग युवती के रेप केस को जानबूझकर कमजोर कर दिया, तो क्षेत्र के विभिन्न हिंदू संगठनों (Hindu Organizations) में भारी आक्रोश फूट पड़ा। बजरंग दल, विश्व हिंदू परिषद (VHP) और अन्य स्थानीय हिंदूवादी नेताओं ने मवाना थाने के बाहर और स्थानीय स्तर पर कड़ा रोष व्यक्त किया है।
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हिंदू संगठनों के नेताओं और कार्यकर्ताओं का सीधा आरोप है कि मवाना पुलिस ने 'तुष्टिकरण की राजनीति', 'स्थानीय दबाव' और 'भ्रष्टाचार' के चलते इस अति गंभीर अपराध को दबाने का कुत्सित प्रयास किया। उन्होंने प्रशासन को खुली चेतावनी दी है कि यदि आरोपी फखरुद्दीन को दुष्कर्म (IPC 376) और यदि लागू हो तो एससी/एसटी एक्ट (SC/ST Act) जैसी सख्त से सख्त धाराओं में दोबारा गिरफ्तार कर जेल नहीं भेजा गया, और दोषी पुलिसकर्मियों (विशेषकर उस दरोगा) को तत्काल प्रभाव से निलंबित (Suspend) नहीं किया गया, तो वे सड़कों पर उतरकर उग्र आंदोलन और चक्का जाम करने के लिए बाध्य होंगे। इसकी पूरी जिम्मेदारी जिला प्रशासन की होगी।
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मवाना के मीवा गांव की यह घटना हमारे 'सभ्य' समाज और हमारी कानून-व्यवस्था के मुंह पर एक बहुत ही करारा और शर्मनाक तमाचा है। यह पूरी घटना व्यवस्था से जुड़े कई ऐसे अनुत्तरित सवाल छोड़ जाती है, जिनका जवाब सत्ता और प्रशासन दोनों को देना होगा:
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    क्या गरीबों और दिव्यांगों के लिए इस देश में कोई न्याय नहीं है? अगर एक दिव्यांग बच्ची अपने ही घर की चारदीवारी में सुरक्षित नहीं है, तो 'महिला सशक्तिकरण' और 'बेटी बचाओ' के बड़े-बड़े दावे धरातल पर कहां खड़े हैं?
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    थाना स्तर पर यह बेलगाम मनमानी क्यों? जब राज्य के मुखिया (मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ) के स्पष्ट निर्देश हैं कि महिलाओं के खिलाफ अपराध पर 'जीरो टॉलरेंस' रहेगा, तो मवाना पुलिस ने किसके राजनीतिक दबाव या किस भारी आर्थिक लालच में दुष्कर्म जैसी गैर-जमानती धारा को एफआईआर (FIR) से हटा दिया?
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  4. \r\n
  5. \r\n
    क्या बिना एसएसपी के कोई काम नहीं होगा? क्या इस प्रदेश में हर गरीब पीड़ित को न्याय पाने और एक बेसिक एफआईआर सही धाराओं में दर्ज कराने के लिए अपने गांव से जिला मुख्यालय जाकर एसएसपी के सामने ही गिड़गिड़ाना पड़ेगा? स्थानीय थानों के प्रभारियों (SHO) की जवाबदेही सरकार कब और कैसे तय करेगी?
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  6. \r\n
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फिलहाल, कप्तान एसएसपी अविनाश पांडेय के कड़े रुख के बाद मवाना पुलिस अब बैकफुट पर है और 'मामले की पारदर्शी व निष्पक्ष जांच' का राग अलाप रही है। पीड़िता का मेडिकल परीक्षण हो चुका है और उसकी रिपोर्ट का बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है। पुलिस के उच्चाधिकारियों का कहना है कि मेडिकल रिपोर्ट के तथ्यों और न्यायालय में मजिस्ट्रेट के समक्ष होने वाले पीड़िता के धारा 164 के बयानों (Section 164 CrPC statements) के आधार पर मुकदमे में अनिवार्य रूप से 'दुष्कर्म' (Rape Section) की धाराएं बढ़ाई जाएंगी। इसके पश्चात आरोपी की वह पुरानी जमानत कोर्ट से खारिज कराकर उसे दोबारा गिरफ्तार किया जाएगा और जेल की सलाखों के पीछे भेजा जाएगा।
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लेकिन, इस पूरे शर्मनाक प्रकरण ने मवाना पुलिस की संवेदनशीलता, उसकी कार्यप्रणाली और खाकी की निष्ठा को हमेशा के लिए आम जनता के कटघरे में खड़ा कर दिया है। अब यह देखना सबसे महत्वपूर्ण होगा कि क्या उच्चाधिकारी उन लापरवाह और भ्रष्ट पुलिसकर्मियों (विशेषकर उस एसआई) के खिलाफ कोई दंडात्मक या विभागीय कार्रवाई करते हैं, जिन्होंने चंद रुपयों या दबाव के लिए एक हैवान को बचाने की खातिर एक बेबस दिव्यांग बेटी की चीखों को अनसुना कर दिया? 'खबरीलाल' (Khabreelal) न्यूज़ नेटवर्क की स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम इस अति संवेदनशील मामले पर लगातार अपनी पैनी नजर बनाए रखेगी और पल-पल का हर अपडेट, हर सच आप तक बेबाकी से पहुंचाती रहेगी।
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