देहरादून/मेरठ: शिक्षा के मंदिर में जब भ्रष्टाचार की दीमक लग जाए, तो उसका सीधा असर समाज के सबसे कमजोर और जरूरतमंद तबके पर पड़ता है। उत्तराखंड (Uttarakhand) के बहुचर्चित और अति-संवेदनशील अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति (SC/ST) छात्रवृत्ति घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने एक बार फिर अपना सख्त रुख दिखाया है। धन शोधन निवारण अधिनियम (PMLA), 2002 के कड़े प्रावधानों के तहत कार्रवाई करते हुए, ईडी के देहरादून सब-जोनल कार्यालय ने लगभग 13.83 करोड़ रुपये की चल और अचल संपत्तियों को अस्थायी रूप से कुर्क (Attach) कर लिया है।READ ALSO:-Ghaziabad Crime News: शादी टूटने की ऐसी खौफनाक सजा! सिरफिरे आशिक ने घर में घुसकर 2 सगी बहनों को गोलियों से भूना, गाड़ी में Video बनाकर दी खौफनाक दलील
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जांच एजेंसियों के अनुसार, जिन तीन प्रमुख शिक्षण संस्थानों पर यह भारी-भरकम कार्रवाई की गई है, वे उत्तर प्रदेश के मेरठ से निर्वाचित भारतीय जनता पार्टी (BJP) के विधान परिषद सदस्य (MLC) धर्मेंद्र भारद्वाज से जुड़े हुए बताए जा रहे हैं। हालांकि, विधायक ने इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए खुद को इस पूरे विवाद से अलग बताया है। आइए इस करोड़ों रुपये के महाघोटाले की पूरी परतें खोलते हैं और समझते हैं कि कैसे गरीब छात्रों के हक का पैसा सफेदपोशों की तिजोरियों तक पहुंच गया।
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क्या है पूरा मामला और कब शुरू हुआ था खेल?
\r\n\r\nयह पूरा मामला वर्ष 2011-12 से लेकर 2016-17 के बीच का है। केंद्र और राज्य सरकार द्वारा समाज के कमजोर वर्ग (एससी/एसटी) के छात्रों को उच्च शिक्षा प्राप्त करने में मदद के लिए 'पोस्ट-मैट्रिक छात्रवृत्ति योजना' (Post-Matric Scholarship Scheme) चलाई जा रही थी। इस योजना का मुख्य उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों की फीस का बोझ कम करना था।
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लेकिन, उत्तराखंड पुलिस और बाद में ईडी की जांच में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ कि कुछ निजी शिक्षण संस्थानों (Private Educational Institutions) और उनसे जुड़ी सोसायटियों एवं ट्रस्टों ने समाज कल्याण विभाग की आंखों में धूल झोंककर करोड़ों रुपये डकार लिए। इन संस्थानों ने सरकारी खजाने से छात्रवृत्ति राशि ऐंठने के लिए पूरी तरह से अयोग्य, गैर-प्रमाणित और फर्जी (Fake) छात्रों को लाभार्थी के रूप में पेश किया।
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जांच के घेरे में आए तीन प्रमुख शिक्षण संस्थान
\r\n\r\nईडी की इस बड़ी कार्रवाई का केंद्र मेरठ और उत्तराखंड के तीन बड़े शिक्षण संस्थान बने हैं। कुर्क की गई 13.83 करोड़ रुपये की संपत्तियों में फिक्स्ड डिपॉजिट (FD), कीमती जमीन के टुकड़े और हरिद्वार व रुड़की स्थित विशाल शैक्षणिक और संस्थागत भवन शामिल हैं। इन संस्थाओं का विवरण इस प्रकार है:
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- \r\n महावीर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मेरठ): यह संस्थान 'न्यू टपल्स एजुकेशन सोसायटी' द्वारा संचालित किया जाता है। ईडी ने इस संस्थान से जुड़ी लगभग 2.44 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की है।\r\n \r\n
- \r\n मदरहुड इंस्टीट्यूट (हरिद्वार/रुड़की): 'मदरहुड इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी सोसायटी' द्वारा संचालित इस संस्थान की करीब 3.95 करोड़ रुपये की संपत्ति अटैच की गई है।\r\n \r\n
- \r\n आरआईएमएस - RIMS (रुड़की): यह संस्थान 'मॉडर्न इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट एंड टेक्नोलॉजी सोसायटी' के अधीन है। ईडी ने इस संस्था से जुड़ी सबसे अधिक, करीब 7.44 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क की है।\r\n \r\n
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घोटाले का 'आंकड़ा': 2,895 दावों में निकला 100% फर्जीवाड़ा
\r\n\r\nईडी की बारीक और गहन जांच ने इस घोटाले की जो तस्वीर पेश की है, वह हैरान करने वाली है। संबंधित संस्थानों द्वारा कुल 6,208 छात्रवृत्ति दावों को प्रोसेस कराया गया था। इसके एवज में समाज कल्याण विभाग ने लगभग 27.98 करोड़ रुपये की भारी-भरकम छात्रवृत्ति राशि वितरित की।
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- \r\n इनमें से करीब 19.74 करोड़ रुपये सीधे शिक्षण संस्थानों के बैंक खातों में भेजे गए।\r\n \r\n
- \r\n लगभग 8.24 करोड़ रुपये छात्रों के नाम पर संचालित खातों में जमा किए गए।\r\n \r\n
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जब ईडी ने इन दावों की 'माइक्रो-स्क्रूटनी' (Micro-scrutiny) की, तो पाया कि इनमें से 2,895 छात्रवृत्ति दावे पूरी तरह से फर्जी थे। 13.83 करोड़ रुपये की कुर्क की गई संपत्ति इन्हीं फर्जी दावों से अर्जित 'काली कमाई' (Proceeds of Crime) का हिस्सा है।
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फर्जी दावों का रोंगटे खड़े कर देने वाला विवरण:
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- \r\n विश्वविद्यालय में नामांकन न होने वाले छात्र: 1,662 मामले (छात्रों का कभी एडमिशन ही नहीं हुआ)।\r\n \r\n
- \r\n अनुपस्थित छात्र: 668 मामले (छात्र कॉलेज आए ही नहीं)।\r\n \r\n
- \r\n कॉलेज रिकॉर्ड में न मिलने वाले/डुप्लीकेट छात्र: 434 मामले (कागजों पर फर्जी नाम गढ़े गए)।\r\n \r\n
- \r\n असफल/परीक्षा फॉर्म न भरने वाले छात्र: 84 मामले।\r\n \r\n
- \r\n विश्वविद्यालय से संबद्धता न रखने वाले पाठ्यक्रम: 47 मामले (जिन कोर्स की मान्यता नहीं थी, उनके नाम पर भी पैसे लिए गए)।\r\n \r\n
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मनी लॉन्ड्रिंग का जाल: कैसे सफेद किया गया काला धन?
\r\n\r\nप्रवर्तन निदेशालय (ED) ने बैंक खातों का जो तकनीकी विश्लेषण (Bank Account Analysis) किया है, उसने मनी लॉन्ड्रिंग (Money Laundering) के एक बेहद शातिर नेटवर्क का पर्दाफाश कर दिया है।
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संस्थानों ने छात्रों के नाम पर बैंक खाते खुलवाए, लेकिन इन खातों के एटीएम, पासबुक और चेकबुक का पूरा नियंत्रण (Control) कॉलेज प्रबंधन और उनके कर्मचारियों के पास ही था। जैसे ही समाज कल्याण विभाग से छात्रवृत्ति की राशि इन खातों में जमा होती थी, उसे तुरंत संस्थानों के मुख्य खातों में वापस ट्रांसफर (Transfer) कर दिया जाता था या फिर नकद (Cash) निकाल लिया जाता था।
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इसके बाद, जांच एजेंसियों की नजरों से बचने के लिए, इस पैसे को विभिन्न शैक्षणिक सोसायटियों, ट्रस्टों और संबद्ध संस्थाओं के खातों में कई स्तरों (Layers) पर घुमाया गया। इसी 'लॉन्डर्ड' पैसे से बाद में महंगी संपत्तियां और फिक्स्ड डिपॉजिट खरीदे गए। जांच में मनिका शर्मा नामक एक महिला की भूमिका भी सामने आई है, जो इन संस्थानों के संचालन और छात्रवृत्ति राशि के डायवर्जन (Diversion) में एक बेहद प्रभावी भूमिका निभा रही थीं।
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एमएलसी धर्मेंद्र भारद्वाज की सफाई और राजनीतिक कद
\r\n\r\nइस पूरे प्रकरण में जिस नाम ने सबसे ज्यादा राजनीतिक सुर्खियां बटोरी हैं, वह हैं मेरठ-गाजियाबाद सीट से भाजपा के निर्वाचित एमएलसी (MLC) धर्मेंद्र भारद्वाज।
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एमएलसी का स्पष्टीकरण: अपने ऊपर लग रहे आरोपों पर सफाई देते हुए एमएलसी धर्मेंद्र भारद्वाज ने स्पष्ट रूप से कहा है कि, "इन शिक्षण संस्थानों से मेरा कोई ताल्लुक या सरोकार नहीं है। मैं न तो इन संस्थाओं की किसी समिति में सदस्य हूं और न ही इनके किसी लाभ या हानि (Profit & Loss) में मेरी कोई भागीदारी है। मेरा नाम राजनीतिक द्वेष या गलतफहमी के कारण इस मामले में घसीटा और फैलाया जा रहा है।"
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कौन हैं धर्मेंद्र भारद्वाज? धर्मेंद्र भारद्वाज एक मजबूत राजनीतिक और शैक्षणिक पृष्ठभूमि वाले नेता हैं। उन्होंने विज्ञान में एमएससी (M.Sc), एमफिल (M.Phil) और शिक्षा के क्षेत्र में बीएड (B.Ed) जैसी उच्च डिग्रियां हासिल की हैं। आधिकारिक तौर पर बताया जाता है कि वे रुड़की स्थित प्रतिष्ठित 'मदरहुड विवि' (Motherhood University) के चांसलर और 'महावीर आयुर्वेदिक मेडिकल कॉलेज एवं हॉस्पिटल', मेरठ के साथ-साथ कई अन्य शिक्षण संस्थाओं के चेयरमैन भी हैं। राजनीतिक मोर्चे पर, मेरठ-गाजियाबाद स्थानीय प्राधिकारी एमएलसी चुनाव में भाजपा समर्थित प्रत्याशी के रूप में उन्होंने एकतरफा और बड़ी जीत दर्ज की थी। 9 अप्रैल को हुए उस चुनाव में कुल 4140 वोट पड़े थे, जिनमें से अकेले धर्मेंद्र भारद्वाज ने 3710 वोट हासिल कर अपने विरोधियों को करारी शिकस्त दी थी।
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ईडी की कार्रवाई का आगे का रास्ता
\r\n\r\nउत्तराखंड के इस कुख्यात एससी/एसटी छात्रवृत्ति घोटाले की सघन जांच वर्ष 2020 से लगातार जारी है। प्रवर्तन निदेशालय (ED) इस मामले में अब तक कोई ढिलाई बरतने के मूड में नहीं है।
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- \r\n अब तक ईडी इस मामले में पांच अभियोजन शिकायतें (Prosecution Complaints) या चार्जशीट विशेष पीएमएलए (PMLA) अदालत, देहरादून में दाखिल कर चुकी है।\r\n \r\n
- \r\n इससे पहले पांच अस्थायी कुर्की आदेश जारी किए जा चुके थे, और यह मौजूदा कार्रवाई इस मामले का छठा प्रोविजनल अटैचमेंट आर्डर है।\r\n \r\n
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ईडी के शीर्ष अधिकारियों ने स्पष्ट कर दिया है कि मामले में आगे की जांच अभी जोरों पर है। मनी लॉन्ड्रिंग के इस नेक्सस में शामिल अन्य आरोपितों और उनके द्वारा अर्जित की गई बेनामी संपत्तियों की भी बारीकी से पड़ताल की जा रही है।
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गरीब और वंचित वर्ग के उत्थान के लिए बने सरकारी धन का ऐसा संस्थागत दुरुपयोग (Institutional Misuse) न केवल एक गंभीर आर्थिक अपराध है, बल्कि यह देश के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ है। भाजपा एमएलसी से जुड़े संस्थानों पर ईडी का यह 'बड़ा एक्शन' इस बात का स्पष्ट प्रमाण है कि भ्रष्टाचार के खिलाफ केंद्रीय जांच एजेंसियों की मुहिम में किसी भी रसूखदार को बख्शा नहीं जाएगा। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि विशेष पीएमएलए अदालत में ईडी के इन पुख्ता सबूतों के आधार पर आगे क्या कानूनी कार्रवाई होती है।
Sabse pehle comment karne wale banein.