मेरठ (23 जुलाई 2026): भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास उन असंख्य वीर सपूतों के खून से लिखा गया है, जिन्होंने हंसते-हंसते अपने प्राणों की आहुति दे दी। क्रांतिधरा मेरठ (Meerut), जिसने 1857 में आजादी की पहली चिंगारी को जन्म दिया था, आज एक बार फिर देशभक्ति के नारों से गूंज उठी। अवसर था— भारत माता के वीर सपूत और युवाओं के प्रेरणास्रोत अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद जी की 120वीं जयंती का।READ ALSO:-मेरठ कैंट में सेना के होनहार बच्चों ने गाड़े झंडे! मेजर जनरल सुमित राणा ने किया भव्य सम्मान, रॉकेट साइंस से लेकर बोर्ड परीक्षाओं तक गूंजा नाम
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जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद (Zila Swatantrata Sangram Senani Parishad), मेरठ के तत्वावधान में आज इस पावन अवसर पर एक भव्य और गरिमामय श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत महान क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद जी के चित्र पर माल्यार्पण और पुष्पांजलि अर्पित करने के साथ हुई। इस दौरान उपस्थित सभी लोगों ने 'भारत माता की जय' और 'चंद्रशेखर आजाद अमर रहें' के गगनभेदी नारे लगाकर संपूर्ण वातावरण को देशभक्ति के रस से सराबोर कर दिया।
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इतिहासकार डॉ. किरण सिंह ने सुनाई 'आजाद' के शौर्य और बलिदान की अमर गाथा
\r\n\r\nसमारोह में मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित जानी-मानी इतिहासकार और प्रख्यात कवयित्री डॉ. किरण सिंह जी ने चंद्रशेखर आजाद के जीवन, उनके आदर्शों और उनके अदम्य साहस पर विस्तार से प्रकाश डाला।
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डॉ. किरण सिंह ने अपने ओजस्वी संबोधन में बताया कि कैसे 23 जुलाई 1906 को मध्य प्रदेश के भावरा गांव में जन्मे एक साधारण से बालक 'चंद्रशेखर तिवारी' ने अंग्रेजी हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। उन्होंने 1921 के असहयोग आंदोलन का जिक्र करते हुए कहा कि जब 15 साल के उस बालक को पारसी मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया, तो उसकी आंखों में खौफ के बजाय एक दहकती हुई आग थी। जब मजिस्ट्रेट ने उनका नाम पूछा, तो उन्होंने तपाक से जवाब दिया— "मेरा नाम आजाद है, मेरे पिता का नाम स्वाधीनता है और मेरा निवास स्थान जेल है।" इसी घटना के बाद से वे हमेशा के लिए 'आजाद' हो गए।
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डॉ. किरण सिंह ने आगे कहा, "चंद्रशेखर आजाद जी ने हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन (HSRA) का पुनर्गठन किया और काकोरी ट्रेन एक्शन से लेकर सांडर्स वध तक में अपनी अहम भूमिका निभाई। उन्होंने कसम खाई थी कि वे जीते जी कभी अंग्रेजों के हाथ नहीं आएंगे और 27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में जब वे अंग्रेजों से घिर गए, तो अपनी पिस्तौल की आखिरी गोली खुद को मारकर उन्होंने अपना वह संकल्प पूरा किया। ऐसे वीर सपूत का बलिदान आज भी हमारे देश के युवाओं के लिए ऊर्जा का सबसे बड़ा स्रोत है।"
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गणमान्य व्यक्तियों और समाजसेवियों की रही अहम भूमिका
\r\n\r\nइस भव्य और सफल आयोजन में मेरठ शहर के कई गणमान्य व्यक्तियों, समाजसेवियों और व्यापार मंडल के प्रतिनिधियों ने अपनी सक्रिय भागीदारी दर्ज कराई। कार्यक्रम को सफल बनाने में मुख्य रूप से इन हस्तियों का विशेष सहयोग रहा:
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- \r\n श्री केपी सिंह जी: परिषद के महासचिव, जिन्होंने पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की।\r\n \r\n
- \r\n पुनीत शर्मा जी: महामंत्री, बेगमपुल व्यापार संघ, जिन्होंने व्यापारियों और युवाओं को इस पुनीत कार्य से जोड़ा।\r\n \r\n
- \r\n सौरभ दिवाकर शर्मा जी: प्रमुख समाजसेवी, जिनका सामाजिक जुड़ाव और अथक प्रयास कार्यक्रम की सफलता का मुख्य कारण बना।\r\n \r\n
- \r\n इसके अलावा श्री राम रतन रस्तोगी और रमेश चंद्र जैसे वरिष्ठ सदस्यों ने भी अपनी गरिमामयी उपस्थिति से कार्यक्रम की शोभा बढ़ाई और नई पीढ़ी को देशप्रेम का संदेश दिया।\r\n \r\n
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युवा पीढ़ी को आजाद के विचारों से जोड़ने का संकल्प
\r\n\r\nकार्यक्रम के दौरान मंच से इस बात पर विशेष जोर दिया गया कि आज के आधुनिक दौर में युवाओं को चंद्रशेखर आजाद, भगत सिंह और राजगुरु जैसे क्रांतिकारियों के जीवन दर्शन को पढ़ने और समझने की नितांत आवश्यकता है।
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पुनीत शर्मा (महामंत्री, बेगमपुल व्यापार संघ) और समाजसेवी सौरभ दिवाकर शर्मा ने अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि सच्ची आजादी केवल राजनीतिक आजादी नहीं है, बल्कि एक ऐसा समाज बनाना है जहां हर व्यक्ति का सम्मान हो। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आजाद जी के 'कभी हार न मानने वाले जज्बे' को अपने जीवन और करियर में उतारें।
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महासचिव श्री केपी सिंह ने ज्ञापित किया आभार
\r\n\r\nसमारोह के अंतिम चरण में, जिला स्वतंत्रता संग्राम सेनानी परिषद के महासचिव श्री केपी सिंह जी ने मंच से सभी अतिथियों का धन्यवाद ज्ञापन किया।
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श्री केपी सिंह जी ने कहा, "परिषद का यह हमेशा से उद्देश्य रहा है कि हम अपने उन गुमनाम और महान नायकों की स्मृतियों को जीवित रखें, जिनकी बदौलत आज हम खुली हवा में सांस ले रहे हैं। आज इस 120वीं जयंती के अवसर पर आप सभी गणमान्य लोगों, समाजसेवियों, इतिहासकारों और मीडिया बंधुओं ने जो समय निकाला है, उसके लिए परिषद आपका हृदय से आभार प्रकट करती है।"
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समारोह का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ, जिसके बाद सभी अतिथियों को प्रसाद वितरित किया गया। यह आयोजन सिर्फ एक जयंती समारोह नहीं था, बल्कि यह एक संकल्प था— आजाद के सपनों का भारत बनाने का
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