भारत में जीएसटी (Goods and Services Tax) लागू होने के बाद से कर प्रणाली में पारदर्शिता लाने के बड़े दावे किए गए थे, लेकिन टैक्स चोरों ने व्यवस्था की खामियों का फायदा उठाकर करोड़ों-अरबों रुपये के वारे-न्यारे करने के नए-नए तरीके ईजाद कर लिए हैं। इसी कड़ी में उत्तर प्रदेश के मेरठ से एक ऐसा सनसनीखेज मामला सामने आया है, जिसने पूरे व्यापारिक और प्रशासनिक महकमे में भूचाल ला दिया है। मामला कोई 10-20 लाख का नहीं, बल्कि पूरे 727 करोड़ रुपये की सीधी कर चोरी (Tax Evasion) का है।READ ALSO:-मौत का 'अंधा मोड़': बिजनौर NH-734 पर भीषण हादसा; 20 फीट नीचे खेत में पलटी अर्टिगा कार, मची चीख-पुकार, 7 लोगों की हालत गंभीर
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दिनांक 03 अप्रैल 2026 को मेरठ के विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (Special Chief Judicial Magistrate) की अदालत में इस हाई-प्रोफाइल मामले की सुनवाई हुई। अदालत कक्ष का माहौल उस वक्त बेहद गर्म हो गया, जब देश की प्रतिष्ठित जांच एजेंसी डी०जी०जी०आई० (DGGI) और दिल्ली के रसूखदार कारोबारी के बड़े वकीलों की फौज आमने-सामने आ गई। इस विस्तृत रिपोर्ट में हम इस 727 करोड़ रुपये के महाघोटाले की पूरी इनसाइड स्टोरी, कोर्ट रूम का लाइव ड्रामा और कानूनी दांवपेचों का गहराई से विश्लेषण करेंगे।
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केस की मुख्य प्रोफाइल (Case Profile)

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इससे पहले कि हम इस महाघोटाले की गहराई में उतरें, एक नजर इस मुकदमे के आधिकारिक विवरण पर डाल लेना आवश्यक है:
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    न्यायालय: न्यायालय विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मेरठ (पीठासीन अधिकारी: श्रीमती दुर्गेश नंदिनी)
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    वाद संख्या: 189/2026
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    मुकदमे का नाम: यूनियन ऑफ इण्डिया बनाम योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव
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    जांच एजेंसी/विभाग: डी०जी०जी०आई० (Directorate General of GST Intelligence), मेरठ जोनल यूनिट
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    विवेचक (Investigating Officer): कुमार अमित खोखर
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    गिरफ्तार अभियुक्त: योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव पुत्र प्रेम शंकर श्रीवास्तव
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    अभियुक्त का पता: बीईएस-43, प्रथम तल, हरिनगर दक्षिण पश्चिम दिल्ली, थाना मायापुरी।
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    संबंधित धाराएं: CGST Act, 2017 की धारा- 132(1)(a) और 132(1)(i)
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    आदेश दिनांक: 03 अप्रैल 2026
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727 करोड़ का महाघोटाला - कैसे बुना गया यह मायाजाल?

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अभियोजन पक्ष (DGGI) की जांच और अदालत में पेश किए गए दस्तावेजों के अनुसार, यह कोई साधारण टैक्स चोरी नहीं थी, बल्कि एक बेहद सुनियोजित (Organized) तरीके से चलाया जा रहा 'सिंडिकेट' था। इस पूरे खेल के केंद्र में थी 'सुपारी' (Areca nuts) और 'पान मसाला' इंडस्ट्री।
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घोटाले का 'मोडस ऑपरेंडी' (Modus Operandi): जांच एजेंसी के अनुसार, अभियुक्त योगेंद्र कुमार श्रीवास्तव और उनके सिंडिकेट ने देश के विभिन्न हिस्सों से टैक्स की चोरी करके कच्चा माल (मुख्य रूप से सुपारी) इकट्ठा करना शुरू किया।
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    असम और कर्नाटक से तस्करी: सुपारी का सबसे बड़ा उत्पादन असम और कर्नाटक में होता है। यहां से ट्रकों में भरकर अवैध रूप से (बिना ई-वे बिल और पक्के बिल के) भारी मात्रा में सुपारी मंगवाई गई।
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    'फेक रिटेल सेल' (फर्जी बिक्री) का खेल: इस अवैध रूप से मंगवाई गई सुपारी को कागजों पर सफेद (White) करने के लिए 'फेक रिटेल सेल' यानी फर्जी खुदरा बिक्री का सहारा लिया गया। कागजों में यह दिखाया गया कि माल आम जनता या छोटे फुटकर विक्रेताओं को बेचा गया है, जबकि असल में ऐसा कुछ नहीं था।
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    पान मसाला कंपनियों को सप्लाई: इस नंबर-दो की सुपारी को बिना कोई बिल काटे (Without Invoice) सीधे पान मसाला बनाने वाली कंपनियों को सप्लाई कर दिया गया।
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    शामिल फर्म और ब्रांड: इस पूरे काले खेल में अभियुक्त योगेंद्र श्रीवास्तव की मुख्य फर्में M/s Ambey Flavours और M/s Mahalaxmidevi Flavours शामिल पाई गईं। आम जनता के बीच ये फर्में 'Ashiqi' (आशिकी) और 'Cash Gold' (कैश गोल्ड) जैसे लोकप्रिय और भारी मांग वाले पान मसाला ब्रांड्स का उत्पादन करती हैं।
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आंकड़े जो होश उड़ा दें: डीजीजीआई मेरठ की गहन जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि इस नेटवर्क के माध्यम से लगभग 1.43 करोड़ किलोग्राम (14,300 मीट्रिक टन) सुपारी की अवैध और अघोषित सप्लाई की गई है। जीएसटी की दरों और इस भारी-भरकम मात्रा की गणना करने पर पता चला कि इस सिंडिकेट ने भारत सरकार के खजाने को लगभग 727 करोड़ रुपये के जीएसटी राजस्व (GST Revenue) का सीधा चूना लगाया है।
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रेड और सबूत (The Raid & Evidence): जब डीजीजीआई की टीमों ने अभियुक्त के परिसरों पर अचानक छापेमारी की, तो वहां से भारी मात्रा में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य (डिजिटल डिवाइस, लैपटॉप, पेन ड्राइव) और हाथ से लिखे हुए 'कच्चे' रिकॉर्ड (Kaccha Records) बरामद हुए। इन कच्चे पर्चों में असम और कर्नाटक से आए माल की एंट्री और बिना बिल के की गई सप्लाई का पूरा हिसाब-किताब दर्ज था। एजेंसी का दावा है कि अभियुक्त ने पूछताछ के दौरान अपने बयानों में इस अवैध खरीद-बिक्री की बात को स्वीकार भी किया है।
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अदालत में महासंग्राम - बचाव पक्ष के धारदार कानूनी तीर
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इतने बड़े घोटाले में जब गिरफ्तारी हुई, तो अभियुक्त योगेंद्र श्रीवास्तव की ओर से देश के नामी-गिरामी वकीलों की फौज अदालत में उतरी। बचाव पक्ष के अधिवक्ता राजेन्द्र सिंह राणा, जतिन यादव, पारस अनेजा और उनके सहयोगियों ने डीजीजीआई की पूरी कार्यप्रणाली और गिरफ्तारी की वैधानिकता पर ही जबरदस्त सवाल खड़े कर दिए। उन्होंने न्यायालय से मांग की कि अभियुक्त का रिमांड तुरंत नामंजूर किया जाए और उन्हें रिहा किया जाए।
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बचाव पक्ष द्वारा दी गई मुख्य दलीलें (Defense Arguments):

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    अवैध हिरासत और 24 घंटे का नियम (Illegal Detention): बचाव पक्ष के वकीलों ने सबसे बड़ा हमला पुलिसिया कार्रवाई के समय पर किया। उन्होंने दावा किया कि डीजीजीआई ने कागजों में गिरफ्तारी 02.04.2026 को दिखाई है, जबकि असलियत में अभियुक्त योगेंद्र श्रीवास्तव को एक दिन पहले यानी 01.04.2026 की शाम को ही दिल्ली से उठा लिया गया था। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 और संविधान के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। वकीलों ने तर्क दिया कि 24 घंटे से अधिक समय तक की गई यह हिरासत पूरी तरह अवैध है।
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    अरेस्ट मेमो (Arrest Memo) में भारी खामियां: बचाव पक्ष ने अरेस्ट मेमो के 'फॉर्मेट' पर तकनीकी आपत्ति जताई। उनका कहना था कि कानूनन एक वैध अरेस्ट मेमो में 16 कॉलम होने चाहिए, जिसमें गिरफ्तारी की जगह, समय, कारण, गवाहों के हस्ताक्षर और अधिकारों की जानकारी स्पष्ट रूप से होनी चाहिए। लेकिन डीजीजीआई मेरठ द्वारा बनाए गए मेमो में केवल 4 कॉलम हैं, जो इसे असंवैधानिक बनाता है।
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    अनुच्छेद 21 और 22 का सीधा उल्लंघन: संविधान के अनुच्छेद 22 का हवाला देते हुए वकीलों ने कहा कि किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय उसे गिरफ्तारी के 'ठोस कारण' (Grounds of Arrest) बताना अनिवार्य है। अभियुक्त का आरोप था कि उन्हें गिरफ्तारी का कोई आधार नहीं बताया गया, जो उनकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता (अनुच्छेद 21) का गंभीर हनन है।
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    सुप्रीम कोर्ट के 'अंतिल' दिशा-निर्देशों की अनदेखी: वकीलों ने माननीय सर्वोच्च न्यायालय के बहुचर्चित फैसले 'सतेंद्र कुमार अंतिल बनाम सीबीआई' (Satender Kumar Antil vs CBI) का प्रमुखता से जिक्र किया। उन्होंने तर्क दिया कि CGST एक्ट की धारा 132(1)(a) के तहत अधिकतम 5 साल की सजा का प्रावधान है, और 132(1)(f) में केवल 6 माह की सजा है, जो इसे जमानतीय (Bailable) और कम गंभीर अपराध बनाता है। ऐसे मामलों में सीधे गिरफ्तारी करने के बजाय पहले धारा 35(3) बी०एन०एस०एस० (पूर्व में सीआरपीसी 41ए) के तहत 'नोटिस' देना अनिवार्य था, जिसका पालन नहीं किया गया।
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    बयानों से मुकरना और क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का मुद्दा: बचाव पक्ष ने एक अहम तर्क यह भी दिया कि अभियुक्त की फर्म दिल्ली में पंजीकृत है और उसका व्यापार वहीं से संचालित होता है, ऐसे में मेरठ न्यायालय का कोई प्रादेशिक क्षेत्राधिकार (Territorial Jurisdiction) ही नहीं बनता। साथ ही, धारा 10 सीजीएसटी एक्ट के तहत दिए गए तथाकथित बयानों को भी अदालत में नकार दिया गया और कहा गया कि डीजीजीआई ने दबाव डालकर फर्जी बयान तैयार किए हैं।
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अदालत की तीखी टिप्पणी - साक्ष्यों के आधार पर दलीलों की चीर-फाड़

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बचाव पक्ष की इन भारी-भरकम दलीलों और कानूनी चक्रव्यूह के बाद, विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट श्रीमती दुर्गेश नंदिनी ने अभियोजन (DGGI) पक्ष के विशेष लोक अभियोजक (Special PP) लक्ष्य कुमार सिंह और उनकी सहयोगी अधिवक्ता श्रीमती वंदना सिंह ने द्वारा प्रस्तुत किए गए दस्तावेजों, पत्रावलियों और डायरियों का बेहद सूक्ष्मता से (Microscopic) अवलोकन किया। न्यायालय ने अपने आदेश में बचाव पक्ष की एक-एक दलील की कानूनी रूप से चीर-फाड़ की और तथ्यों के आधार पर उन्हें सिरे से खारिज कर दिया।
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1. 24 घंटे की अवैध हिरासत का सच (The Truth of 24-hour rule)

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न्यायालय ने पत्रावली पर मौजूद डीजीजीआई मेरठ जोनल यूनिट कार्यालय के 'विजिटर रजिस्टर' (आगंतुक पंजिका) की छायाप्रति का बारीकी से अध्ययन किया।
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    रजिस्टर के अनुसार, अभियुक्त योगेंद्र श्रीवास्तव दिनांक 01.04.2026 को दोपहर 01:30 बजे (1:30 PM) स्वेच्छा से पूछताछ के लिए कार्यालय आए थे।
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    पूछताछ के बाद रात 01:30 बजे (1:30 AM) वे कार्यालय से चले गए (इस पर उनके हस्ताक्षर मौजूद थे)।
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    अगले दिन 02.04.2026 को वे पुनः दोपहर 12:15 बजे (12:15 PM) कार्यालय आए।
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    पर्याप्त सबूत (Reason to Believe) मिलने के बाद, एडीजी (ADG) द्वारा 02.04.2026 को शाम 05:03 बजे गिरफ्तारी के आदेश दिए गए।
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    अंततः शाम 06:55 बजे (6:55 PM) उन्हें आधिकारिक तौर पर गिरफ्तार किया गया। न्यायालय का निष्कर्ष: इस स्पष्ट टाइमलाइन से साबित होता है कि अभियुक्त को गिरफ्तार करने के 24 घंटे के भीतर ही पूरी कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए न्यायालय में प्रस्तुत किया गया है। अवैध हिरासत की बात पूरी तरह बेबुनियाद है।
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2. अरेस्ट मेमो और 'डिन' नंबर (Arrest Memo & DIN)

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अरेस्ट मेमो के फॉर्मेट वाली आपत्ति पर न्यायालय ने पाया कि डीजीजीआई ने बाकायदा कम्प्यूटर जनरेटेड DIN NO (Document Identification Number) CBIC-DIN202604DNN40000667906 के साथ अरेस्ट मेमो जारी किया था।
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    इस मेमो पर विवेचक अमित खोखर और गवाहों के हस्ताक्षर मौजूद हैं।
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    सबसे अहम बात यह है कि अभियुक्त योगेंद्र ने अपने ही हाथों (हस्तलेख) से मेमो पर दिनांक 02.04.2026 को शाम 07:09 बजे लिखा है कि उन्हें गिरफ्तारी का कारण समझा दिया गया है।
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    उन्होंने यह भी लिखा है कि शाम 06:44 पर विवेचक के मोबाइल से उनके बेटे 'शुभम' को गिरफ्तारी की सूचना दे दी गई थी। न्यायालय का निष्कर्ष: अरेस्ट मेमो भारत सरकार के वित्त मंत्रालय (सीबीआईसी) के सर्कुलर नंबर 128/47/2019-GST द्वारा जारी आधिकारिक 'फॉर्मेट' पर ही बना है। इसमें कोई विधिक त्रुटि नहीं है।
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3. गिरफ्तारी के आधार (Grounds of Arrest)

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माननीय उच्च न्यायालय के 'उमंग रस्तौगी' मामले के दिशा-निर्देशों का हवाला देते हुए न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अभियुक्त को गिरफ्तारी के आधार बाकायदा 'हिन्दी' भाषा में लिखित रूप से दिए गए थे। DIN202604DNN4000000BA25 वाले इस दस्तावेज को अभियुक्त ने पढ़ा और उसकी प्रति प्राप्त कर अपने हस्ताक्षर किए। अतः अनुच्छेद 21 और 22 का कोई उल्लंघन नहीं हुआ है।
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4. क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) का समाधान

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बचाव पक्ष के सबसे बड़े हथियार यानी 'क्षेत्राधिकार' को कुंद करते हुए न्यायालय ने 'गवर्नमेंट ऑफ इण्डिया मिनिस्ट्री ऑफ फाइनेंस' के नोटिफिकेशन संख्या 14/2017-सेन्ट्रल टैक्स (दिनांक 01.07.2017) का हवाला दिया। न्यायालय का निष्कर्ष: इस अधिसूचना के तहत CGST (सेन्ट्रल टैक्स) अधिकारियों को सम्पूर्ण भारत में कहीं भी विवेचना और कार्रवाई करने का असीमित क्षेत्राधिकार प्राप्त है। चूंकि इस टैक्स इवेजन (कर चोरी) की गुप्त सूचना मेरठ डी०जी०जी०आई० को मिली थी और वही इसकी विवेचना कर रही है, इसलिए मेरठ न्यायालय का इस मामले की सुनवाई का पूरा और वैध अधिकार है।
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5. 'अंतिल' जजमेंट और आर्थिक अपराध की गंभीरता

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बचाव पक्ष की आखिरी उम्मीद 'सतेंद्र कुमार अंतिल' मामले पर न्यायालय ने बेहद सख्त रुख अपनाया। न्यायालय ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से लिखा कि "माननीय उच्चतम न्यायालय की विधि व्यवस्था सतेन्द्र कुमार अंतिल आर्थिक अपराधों (Economic Offences) पर सामान्य रूप से लागू नहीं होती है।" यहां आरोप 1-2 लाख का नहीं, बल्कि 727 करोड़ रुपये की विशालकाय कर चोरी का है। यह देश की अर्थव्यवस्था के खिलाफ एक बेहद 'गंभीर प्रकृति का आर्थिक अपराध' है। ऐसे मामलों में जांच अभी शुरुआती स्तर पर है, साक्ष्यों से छेड़छाड़ की आशंका रहती है और बिना गिरफ्तारी के इतनी बड़ी साजिश की तह तक जाना असंभव है।
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न्यायालय का अंतिम आदेश और आगे की राह

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दोनों पक्षों की लंबी और मैराथन बहस सुनने के बाद, पत्रावलियों पर मौजूद ठोस सबूतों और जीएसटी कानून की बारीकियों का अध्ययन करने के बाद, विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत ने अपना अंतिम फैसला सुनाया।
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न्यायालय ने माना कि डीजीजीआई (DGGI) की ओर से पेश किए गए सबूत प्रथम दृष्टया (Prima facie) अभियुक्त के खिलाफ एक मजबूत और गंभीर आपराधिक मामला बनाते हैं। विवेचना अभी जारी है और हिरासत में पूछताछ से कई नए तथ्य, अन्य कंपनियों के नाम और इस सिंडिकेट में शामिल अन्य सफेदपोश अपराधियों के नाम सामने आ सकते हैं।
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अंतिम आदेश (The Final Order):

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    "तदनुसार विवेचक की ओर से वाद संख्या 189/2026, धारा 132(1)(a), 132(1)(i) CGST ACT, 2017, विभाग डी०जी०जी०आई०, मेरठ में प्रस्तुत रिमाण्ड आवेदन स्वीकार किया जाता है।"
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    "अभियुक्त योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव का रिमाण्ड दिनांक 15.04.2026 तक स्वीकार किया जाता है।"
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    "अभियुक्त को जरिये वी.सी. (Video Conferencing) दिनांक 15.04.2026 को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाये।"
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'आशिकी' और 'कैश गोल्ड' का काला सच

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मेरठ के विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट का यह 4 पन्नों का विस्तृत और तार्किक आदेश सिर्फ एक कारोबारी की जेल यात्रा का दस्तावेज नहीं है, बल्कि यह देश के उन तमाम टैक्स डिफाल्टर्स और सिंडिकेट्स के लिए एक 'रेड अलर्ट' (Red Alert) है जो यह मानते हैं कि वे बड़े वकीलों और कानूनी खामियों की आड़ में देश का खजाना लूटकर बच निकलेंगे।
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'आशिकी' और 'कैश गोल्ड' जैसे पान मसालों की आड़ में जो 727 करोड़ रुपये का काला कारोबार चल रहा था, वह इस बात का सुबूत है कि पान मसाला उद्योग में 'सुपारी' की खरीद-फरोख्त आज भी टैक्स चोरी का सबसे बड़ा हॉटस्पॉट बनी हुई है। डीजीजीआई की यह बड़ी कार्रवाई यह सुनिश्चित करती है कि 'रीजन टू बिलीव' (Reason to Believe) और मजबूत डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर किसी भी रसूखदार को बख्शा नहीं जाएगा। अब सबकी निगाहें 15 अप्रैल 2026 पर टिकी हैं, जब अभियुक्त की रिमांड अवधि खत्म होगी और जांच एजेंसी अदालत के सामने इस घोटाले के नए अध्याय और पर्दाफाश पेश करेगी।
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अस्वीकरण: यह समाचार रिपोर्ट उपलब्ध प्रेस विज्ञप्तियों, विशेष अभियोजन अधिकारी और आरोपी के वकील द्वारा प्रस्तुत तर्कों, तथा वैध न्यायालय आदेशों पर आधारित है।
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