नई दिल्ली (Khabreelal Mega Coverage): दुनिया इस समय एक अभूतपूर्व भू-राजनीतिक संकट (Geopolitical Crisis) के मुहाने पर खड़ी है। पश्चिम एशिया (West Asia) में अमेरिका-इजराइल और ईरान के बीच छिड़ी जंग ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले 'कच्चे तेल' (Crude Oil) के बाजार में आग लगा दी है। कच्चे तेल के दाम 70 डॉलर प्रति बैरल से छलांग लगाकर 100 डॉलर के खतरनाक स्तर को पार कर गए हैं। इस खौफनाक तेजी का सीधा असर भारत की तेल कंपनियों पर पड़ा, जिन्हें पेट्रोल और डीजल बेचने पर प्रति लीटर 30 रुपये तक का भारी भरकम घाटा उठाना पड़ रहा था।Read also:-यूपी में पेट्रोल-डीजल खत्म होने की अफवाह से हाहाकार: पंपों पर लगीं किलोमीटर लंबी लाइनें, गोंडा में चले लात-घूंसे; योगी सरकार का सख्त अलर्ट- 'ईंधन की कोई कमी नहीं'
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देश में पेट्रोल-डीजल के दाम ₹15 से ₹20 प्रति लीटर तक बढ़ने की पूरी आशंका पैदा हो गई थी। लेकिन, महंगाई के इस 'सुनामी' को भारतीय उपभोक्ताओं तक पहुंचने से रोकने के लिए केंद्र सरकार ने एक बड़ा ढाल (Shield) तैयार किया है। सरकार ने ऐतिहासिक कदम उठाते हुए पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली केंद्रीय एक्साइज ड्यूटी (Central Excise Duty) में 10-10 रुपये की भारी कटौती कर दी है।
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इस कटौती के बाद अब पेट्रोल पर एक्साइज ड्यूटी ₹13 से घटकर मात्र ₹3 प्रति लीटर रह गई है, जबकि डीजल पर यह ड्यूटी ₹10 से घटाकर पूरी तरह से 'शून्य' (Zero) कर दी गई है। यह फैसला सिर्फ एक आर्थिक घोषणा नहीं है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था को महंगाई के दलदल में धंसने से बचाने का एक बड़ा 'मास्टरस्ट्रोक' है।
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आइए, 'खबरीलाल' की इस विस्तृत रिपोर्ट में समझते हैं कि आखिर इस फैसले की टाइमिंग क्या है, इसका अर्थशास्त्र क्या है और सबसे अहम बात—आपकी जेब पर इसका क्या असर होगा?
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युद्ध का साया: क्यों 100 डॉलर के पार पहुंचा कच्चा तेल? (H2)

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यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर अचानक कच्चे तेल की कीमतों में यह आग क्यों लगी।
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अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पूरी तरह से 'सप्लाई और डिमांड' (Supply and Demand) पर काम करता है। ईरान दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक देशों में से एक है। इसके अलावा, दुनिया का लगभग 20% से 30% तेल 'होर्मुज जलडमरूमध्य' (Strait of Hormuz) के संकरे समुद्री रास्ते से होकर गुजरता है, जिस पर ईरान का कड़ा नियंत्रण है।
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अमेरिका और इजराइल के साथ ईरान के सीधे सैन्य टकराव के कारण इस अहम सप्लाई रूट के ब्लॉक होने का खतरा पैदा हो गया है। बाजार में यह खौफ बैठ गया है कि अगर ईरान ने तेल की सप्लाई रोक दी या खाड़ी देशों के तेल कुंओं पर हमले हुए, तो दुनिया में तेल का अकाल पड़ जाएगा। इसी 'पैनिक' (Panic) और अनिश्चितता के कारण सट्टेबाजों और निवेशकों ने कच्चे तेल की कीमतों को 70 डॉलर से उठाकर 100 डॉलर के पार पहुंचा दिया है। भारत, जो अपनी जरूरत का 85% कच्चा तेल आयात (Import) करता है, इस वैश्विक झटके का सबसे बड़ा शिकार बन सकता था।
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कुछ अहम सवालों के विस्तृत जवाब: समझिए तेल की पूरी अर्थनीति (H2):-

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सवाल 1: सरकार ने एक्साइज ड्यूटी में कितनी कटौती की है और इसका गणित क्या है?

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जवाब: सरकार ने पेट्रोल और डीजल दोनों पर एक्साइज ड्यूटी में स्पष्ट रूप से ₹10-₹10 की कमी की है। अब पेट्रोल पर सिर्फ ₹3 प्रति लीटर और डीजल पर 0 रुपये (जीरो) ड्यूटी लगेगी। इस फैसले से आम जनता को तो फौरी तौर पर अप्रत्यक्ष राहत मिलेगी, लेकिन सरकारी खजाने (Exchequer) को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी।
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एक अनुमान और पेट्रोलियम मंत्रालय के शुरुआती आंकड़ों (FY 2025-26) के मुताबिक, एक्साइज ड्यूटी घटने से केंद्र सरकार को हर दिन करीब 416 करोड़ रुपए के राजस्व (Revenue) का नुकसान उठाना पड़ेगा।
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विस्तृत तालिका: हर दिन का राजस्व नुकसान

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फ्यूल का प्रकार
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हर दिन की औसत खपत (करोड़ लीटर में)
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हर दिन का राजस्व नुकसान (करोड़ रुपए में)
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पेट्रोल
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13.82
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₹ 138.20
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डीजल
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27.79
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₹ 277.90
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कुल योग
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41.61 करोड़ लीटर
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₹ 416.10 करोड़ प्रतिदिन
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अगर यह स्थिति एक महीने (30 दिन) तक रहती है, तो सरकार को करीब 12,483 करोड़ रुपये का नुकसान होगा।
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सवाल 2: तो क्या कल सुबह से पेट्रोल-डीजल पंप पर ₹10 सस्ता मिलेगा?

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जवाब: नहीं, इसकी संभावना न के बराबर है। यह इस पूरी खबर का सबसे अहम पहलू है जिसे समझना जरूरी है। भले ही सरकार ने अपना टैक्स कम कर दिया है, लेकिन पेट्रोल-डीजल के रिटेल रेट (Retail Rate) सरकार सीधे तय नहीं करती। भारत में तेल की कीमतें 'डी-रेगुलेटेड' (De-regulated) हैं।
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इंडियन ऑयल (IOCL), भारत पेट्रोलियम (BPCL) और हिंदुस्तान पेट्रोलियम (HPCL) जैसी सरकारी तेल विपणन कंपनियां कच्चे तेल की कीमत और अपने मुनाफे/घाटे के आधार पर रेट तय करती हैं। चूंकि पिछले कुछ हफ्तों से क्रूड महंगा होने के कारण ये कंपनियां भारी घाटा सह रही थीं, इसलिए वे सरकार द्वारा दी गई इस ₹10 की छूट का इस्तेमाल अपने उस पिछले और मौजूदा घाटे की भरपाई के लिए करेंगी। सरल शब्दों में कहें तो—दाम घटेंगे नहीं, बल्कि वे जो ₹15-₹20 बढ़ने वाले थे, वो अब बढ़ेंगे नहीं। कीमतें 'स्थिर' (Stable) रहेंगी।
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सवाल 3: तेल कंपनियां आखिर दाम क्यों नहीं घटाना चाहतीं? उनका क्या तर्क है?

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जवाब: तेल कंपनियों का तर्क विशुद्ध रूप से व्यावसायिक गणित पर आधारित है। पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने स्थिति साफ करते हुए बताया है कि तेल कंपनियां फिलहाल पेट्रोल पर 24 रुपए प्रति लीटर और डीजल पर 30 रुपए प्रति लीटर का 'अंडर-रिकवरी' (घाटा) सह रही हैं। वेस्ट एशिया के तनाव के कारण कंपनियां महंगा क्रूड खरीद रही थीं, लेकिन उन्होंने घरेलू बाजार में दाम नहीं बढ़ाए थे।
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तेल कंपनियों के मुनाफे का जटिल गणित:

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इन कंपनियों के मुनाफे को समझने के लिए 'ग्रॉस मार्केटिंग मार्जिन' (Gross Marketing Margin) देखा जाता है।
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(टोटल प्राइस = कॉस्ट प्राइस + रिफाइनरी मार्जिन + सेंट्रल टैक्स + स्टेट टैक्स + डीलर कमीशन + कंपनी प्रॉफिट)
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आमतौर पर एक थंब-रूल (Thumb Rule) है: अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल 1 डॉलर प्रति बैरल महंगा होता है, तो भारत में पेट्रोल/डीजल की लागत लगभग 50 से 60 पैसे प्रति लीटर बढ़ जाती है। अब चूँकि तेल 70 डॉलर से बढ़कर 100 डॉलर हो गया (यानी 30 डॉलर की बढ़ोतरी), तो लागत करीब ₹15 से ₹18 प्रति लीटर बढ़ गई।
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क्रिसिल (CRISIL) की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब क्रूड 65-70 डॉलर था, तो वित्त वर्ष 2026 में तेल कंपनियों को एक लीटर पेट्रोल पर करीब ₹8 का मार्जिन मिल रहा था। इसी मुनाफे के चलते H1 25-26 (अप्रैल 25 से सितंबर 25) में इंडियन ऑयल को ₹13,299 करोड़ का बंपर फायदा हुआ था (जो पिछले साल के ₹2,823 करोड़ से 370% अधिक था)। लेकिन अब 100 डॉलर के क्रूड ने उस पूरे 'बंपर मुनाफे' को निगल लिया है। ₹10 की एक्साइज छूट के बाद भी कंपनियां अभी भी भारी दबाव में हैं।
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सवाल 4: सरकारी कंपनियों का तो समझ आ गया, प्राइवेट कंपनियां क्या रुख अपना रही हैं?

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जवाब: रिलायंस (Reliance) और नायरा एनर्जी (Nayara Energy) जैसी प्राइवेट तेल कंपनियां इस वक्त सबसे ज्यादा त्राहिमाम कर रही हैं। उन्हें सरकारी कंपनियों की तरह कोई 'हिडन सपोर्ट' नहीं मिलता।
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सरकार के इस फैसले से ठीक एक दिन पहले ही नायरा एनर्जी ने मजबूरन पेट्रोल ₹5 प्रति लीटर और डीजल ₹3 महंगा कर दिया था। उदाहरण के तौर पर, मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में इस कंपनी का पेट्रोल 111.72 रुपए और डीजल 94.88 रुपए पर पहुंच गया है। इससे बिल्कुल साफ है कि प्राइवेट प्लेयर्स के लिए मौजूदा 'आर्टिफिशियल' रेट पर तेल बेचना व्यावसायिक रूप से असंभव हो गया है।
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सवाल 5: क्या भविष्य में दाम और बढ़ सकते हैं?

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जवाब: यह पूरी तरह से ग्लोबल मार्केट के मूड और युद्ध की दिशा पर निर्भर है। ब्रेंट क्रूड फिलहाल 100 डॉलर प्रति बैरल के ऊपर मंडरा रहा है। अगर वेस्ट एशिया में तनाव और बढ़ता है, इजराइल ईरान के तेल ठिकानों पर बमबारी करता है और सप्लाई चेन पूरी तरह बाधित होती है, तो कच्चे तेल की कीमतें 120 या 150 डॉलर तक भी जा सकती हैं।
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ऐसी भयानक स्थिति में एक्साइज ड्यूटी में की गई यह ₹10 की कटौती केवल एक 'कुशन' (शॉक एब्जॉर्बर) का काम करेगी। अगर क्रूड और महंगा हुआ, तो अंततः तेल कंपनियों को मजबूरन पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ाने ही पड़ेंगे, क्योंकि सरकार इससे ज्यादा टैक्स शायद ही काट सके।
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सवाल 6: इस ₹10 की कटौती से सरकार को खुद क्या नुकसान होगा?

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जवाब: जैसा कि पहले बताया गया, केंद्र सरकार के खजाने (राजस्व) में हर दिन 400 करोड़ से अधिक की सेंध लगेगी। यह पैसा सरकार इन्फ्रास्ट्रक्चर (सड़क, रेलवे), स्वास्थ्य, रक्षा और कल्याणकारी योजनाओं में खर्च करती है।
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पेट्रोलियम मंत्री और वित्त मंत्री के अनुसार, सरकार ने यह फैसला इसलिए लिया ताकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आए इस 'भू-राजनीतिक शॉक' (Geopolitical Shock) का सीधा और पूरा असर भारतीय उपभोक्ताओं पर न पड़े। अगर ट्रांसपोर्टेशन कॉस्ट बढ़ती, तो आटा, दाल, चावल से लेकर साबुन तक सब कुछ महंगा हो जाता।
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सवाल 7: केंद्र ने तो ड्यूटी घटा दी, क्या राज्य सरकारें भी अब अपना वैट (VAT) कम करेंगी?

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जवाब: भारत के संघीय ढांचे में तेल पर केंद्र 'एक्साइज ड्यूटी' लगाता है और राज्य 'वैट' (Value Added Tax) लगाते हैं। आमतौर पर जब केंद्र बड़ा कदम उठाता है, तो राज्यों पर भी वैट कम करने का भारी राजनीतिक और नैतिक दबाव आ जाता है।
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खासकर उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों पर अब निगाहें होंगी। अगर राज्य सरकारें अपने हिस्से का टैक्स (VAT) 2 या 3 रुपये भी कम करती हैं, तभी जाकर उपभोक्ताओं को पेट्रोल पंप पर मीटर में ₹2 से ₹5 तक की वास्तविक (Real) गिरावट देखने को मिल सकती है। अगर राज्य वैट नहीं घटाते हैं, तो पंप पर कीमत वैसी ही रहेगी।
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सवाल 8: आम जनता की सबसे बड़ी शिकायत- क्या कच्चा तेल महंगा होने पर कंपनियां दाम बढ़ा देती हैं, लेकिन सस्ता होने पर नहीं घटातीं?

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जवाब: आम आदमी की यह शिकायत काफी हद तक सही और तार्किक है। इसके पीछे मुख्य रूप से 'अंडर-रिकवरी' (Under-recovery) का जटिल गणित काम करता है।
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असल में, जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल अचानक बहुत महंगा होता है (जैसे आज 100 डॉलर हो गया), तो सरकार के अघोषित दबाव, जन आक्रोश के डर या चुनावों के कारण तेल कंपनियां रातों-रात कीमतें नहीं बढ़ातीं। वे महीनों तक भारी घाटा सहती हैं।
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बाद में जब कच्चा तेल गिरकर 60 या 70 डॉलर पर आता है, तो वे कंपनियां आम जनता को दाम घटाकर फायदा देने के बजाय, अपने उन पुराने महीनों के घाटे की भरपाई (Balance sheet repair) करने लगती हैं। इसके अलावा, अक्सर कच्चे तेल की कीमतें गिरने पर केंद्र सरकार अपनी एक्साइज ड्यूटी बढ़ा देती है या राज्य सरकारें अपना वैट बढ़ा देती हैं, जिससे अंतरराष्ट्रीय गिरावट का पूरा फायदा सीधे ग्राहकों की जेब में जाने के बजाय सरकारी खजाने में चला जाता है। डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये (INR) की कमजोरी भी एक बड़ा फैक्टर है जो तेल को सस्ता नहीं होने देता।
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निर्मला सीतारमण का बयान: 'जनता को महंगाई से बचाना पहली प्राथमिकता' (H2)

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केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में कटौती के इस ऐतिहासिक फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। उन्होंने मीडिया से बात करते हुए स्पष्ट किया कि इस कदम का मुख्य और एकमात्र उद्देश्य पश्चिम एशिया में जारी विनाशकारी तनाव के कारण बढ़ती कच्चे तेल की कीमतों के 'स्पिलओवर इफेक्ट' (Spillover effect) से भारतीय उपभोक्ताओं को बचाना है।
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वित्त मंत्री ने कहा, "प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी की सर्वोच्च प्राथमिकता यह सुनिश्चित करना है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में चाहे जितनी भी उथल-पुथल मचे, उसका सीधा आर्थिक बोझ भारत के आम नागरिक, किसान और मध्यम वर्ग के कंधों पर न पड़े। यह ड्यूटी कटौती उसी संकल्प का प्रमाण है।"
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ईरान जंग और तेल संकट पर PM मोदी का एक्शन: आज मुख्यमंत्रियों के साथ महा-मंथन (H2)

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इस वैश्विक संकट की गंभीरता को भांपते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आज (27 मार्च 2026) एक बेहद अहम वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग करने जा रहे हैं। पीएम मोदी देश के सभी राज्यों के मुख्यमंत्रियों (चुनावी राज्यों को छोड़कर) के साथ एक हाई-लेवल मीटिंग करेंगे।
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सूत्रों के मुताबिक, इस बैठक का मुख्य एजेंडा ईरान जंग के बाद पैदा हुए वैश्विक आर्थिक हालात, भारत की ऊर्जा सुरक्षा (Energy Security) और राज्यों द्वारा वैट घटाने पर चर्चा करना है।
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याद रहे कि पीएम मोदी ने हाल ही में 24 मार्च को राज्यसभा में देश को संबोधित करते हुए एक कड़ी चेतावनी दी थी। उन्होंने कहा था, "अगर मध्य पूर्व में यह ईरान जंग यूं ही जारी रही, तो इसके नतीजे पूरी दुनिया के लिए बहुत गंभीर होंगे। आने वाला समय हमारे लिए कोरोनाकाल (Covid-19) जैसी एक बड़ी आर्थिक परीक्षा वाला हो सकता है। इस महा-संकट से निपटने के लिए केंद्र और सभी राज्य सरकारों को अपने राजनीतिक मतभेद भुलाकर एकजुट होकर काम करना होगा।" #### फैक्ट चेक: क्या भारत में खत्म हो रहा है पेट्रोल-डीजल? (H3)
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बीते कुछ दिनों से उत्तर प्रदेश (जैसे गोंडा, लखनऊ) समेत देश के कई हिस्सों में पेट्रोल पंपों पर भारी भीड़ देखने को मिल रही है। लोग पैनिक बाइंग (Panic Buying) कर रहे हैं और ड्रमों में तेल भर रहे हैं।
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इस पर भारत सरकार के पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय ने एक बेहद सख्त बयान जारी किया है। मंत्रालय ने देश में पेट्रोल, डीजल और रसोई गैस (LPG) की कमी की सभी अफवाहों को पूरी तरह से खारिज कर दिया है। मंत्रालय ने देश को आश्वस्त करते हुए कहा है, "दुनिया में कुछ भी हो जाए, चाहे कोई भी युद्ध छिड़ जाए, भारत की ऊर्जा सुरक्षा पूरी तरह अभेद्य है। हमारे 'स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व' (Strategic Petroleum Reserve) और तेल कंपनियों के पास अगले 60 दिनों का पेट्रोल-डीजल का फुल-प्रूफ स्टॉक मौजूद है। देशवासियों से अपील है कि अफवाहों पर ध्यान न दें और अनावश्यक भंडारण न करें।"
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Khabreelal नॉलेज बॉक्स: क्या होती है 'इनडायरेक्ट टैक्स' और एक्साइज ड्यूटी? (H2)

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अर्थशास्त्र की भाषा में, एक्साइज ड्यूटी (उत्पाद शुल्क) एक प्रकार का 'इनडायरेक्ट टैक्स' (Indirect Tax) है। यह टैक्स सीधे जनता से नहीं लिया जाता, बल्कि देश के भीतर मैन्युफैक्चर (उत्पादित) होने वाले सामान पर लगाया जाता है।
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पेट्रोल-डीजल के मामले में, जब भारत की रिफाइनरियों (जैसे जामनगर या पानीपत रिफाइनरी) में कच्चा तेल साफ होकर पेट्रोल या डीजल के रूप में बाहर निकलता है, तब केंद्र सरकार उस पर प्रति लीटर के हिसाब से एक 'फिक्स्ड' एक्साइज ड्यूटी वसूलती है। (जैसे कल तक पेट्रोल पर ₹13 था, अब ₹3 है)।
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चूँकि यह एक्साइज ड्यूटी प्रतिशत (%) में न होकर एक फिक्स अमाउंट (Fixed Amount) में होती है, इसलिए सरकार जब चाहे इसमें कटौती करके आम जनता को सीधा फायदा/राहत दे सकती है या इसे बढ़ाकर अपना रेवेन्यू बढ़ा सकती है। मौजूदा कटौती सरकार के खजाने को जरूर कम करेगी, लेकिन इससे तेल कंपनियों को बर्बाद होने से बचाने और देश को भयंकर महंगाई से बचाने में बड़ी मदद मिलेगी।
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