जीवन और मृत्यु के बीच का फासला कभी-कभी इतना लंबा और दर्दनाक हो जाता है कि मौत एक वरदान लगने लगती है। गाजियाबाद के राज नगर स्थित राज एंपायर सोसायटी में रहने वाले राणा परिवार के लिए पिछले 13 साल किसी अंतहीन दुःस्वप्न (Nightmare) से कम नहीं रहे हैं। उनका जवान बेटा, हरीश राणा, 13 सालों से कोमा में है। वह न कुछ बोल सकता है, न महसूस कर सकता है, और न ही अपना दर्द बयां कर सकता है।READ ALSO:-यूपी मौसम महा-अलर्ट: 19 मार्च से फिर कहर बरपाएगा मौसम! 4 दिन भारी बारिश, ओले और 50kmph की आंधी; किसानों की धड़कनें तेज
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लंबे संघर्ष, आंसुओं और कानूनी लड़ाई के बाद, अब हरीश की 'इच्छामृत्यु' (Passive Euthanasia) की प्रक्रिया दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में शुरू हो गई है। यह सिर्फ एक मेडिकल प्रक्रिया नहीं है, बल्कि एक माता-पिता के अपने कलेजे के टुकड़े को उस दर्द से मुक्त करने की बेबस कोशिश है, जिसे वे 13 सालों से अपनी आंखों के सामने घुटते हुए देख रहे थे।
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एम्स में शुरू हुई जीवन समेटने की प्रक्रिया: अन्न-जल और ऑक्सीजन बंद
\r\n\r\n14 मार्च को जब हरीश राणा को गाजियाबाद से दिल्ली एम्स शिफ्ट किया गया, तो परिवार जानता था कि अब वापसी नहीं होगी। एम्स के आईआरसीएच (IRCH) के पैलिएटिव केयर वार्ड में हरीश को भर्ती किया गया है। यह वह वार्ड है जहां उन मरीजों को रखा जाता है जिनका इलाज अब संभव नहीं होता और उन्हें केवल जीवन के अंतिम दिनों में दर्द से राहत दी जाती है।
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सोमवार को एम्स में अलग-अलग विभागों के वरिष्ठ डॉक्टरों की एक उच्च स्तरीय मेडिकल बोर्ड की बैठक हुई। इच्छामृत्यु (पैसिव यूथेनेशिया) के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय किए गए सख्त प्रोटोकॉल के तहत:
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- \r\n सोमवार की शाम: ट्यूब (फीडिंग पाइप) के जरिए दिया जाने वाला कृत्रिम भोजन पूरी तरह से रोक दिया गया।\r\n \r\n
- \r\n मंगलवार की सुबह: आज से हरीश को ट्यूब के जरिए दिया जाने वाला पानी भी पूरी तरह से बंद कर दिया जाएगा।\r\n \r\n
- \r\n ऑक्सीजन सपोर्ट: उनका जीवन रक्षक ऑक्सीजन सपोर्ट पहले ही हटा लिया गया है।\r\n \r\n
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मेडिकल साइंस के जानकारों और डॉक्टरों के अनुसार, जब किसी इंसान का अन्न और जल पूरी तरह से बंद कर दिया जाता है, तो शरीर धीरे-धीरे अपने काम करना बंद कर देता है। इस स्थिति में एक इंसान औसतन एक सप्ताह तक ही जीवित रह पाता है। पूरी प्रक्रिया पर डॉक्टरों की टीम बारीकी से नजर रखे हुए है। वार्ड में किसी भी बाहरी व्यक्ति या परिवार के अन्य सदस्यों के मिलने पर सख्त पाबंदी लगा दी गई है। एम्स प्रशासन ने मरीज की निजता और सम्मान को बनाए रखने के लिए वार्ड में फोटो खींचने या वीडियो बनाने पर पूर्ण प्रतिबंध लगा दिया है।
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वह मनहूस दिन: कैसे कोमा में पहुंचा था हरीश?
\r\n\r\nहरीश की कहानी सिर्फ एक मेडिकल केस नहीं है, बल्कि एक होनहार युवा के सपनों के चकनाचूर होने की दास्तां है। दिल्ली में जन्मे हरीश राणा पढ़ाई में बेहद होशियार थे। वह चंडीगढ़ स्थित पंजाब यूनिवर्सिटी (Punjab University) से इंजीनियरिंग (B.Tech) की पढ़ाई कर रहे थे।
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साल 2013 का वह मनहूस दिन राणा परिवार की जिंदगी में अंधेरा लेकर आया। हरीश अपने बीटेक के आखिरी सेमेस्टर में थे। भविष्य के सपने उनकी आंखों में थे। लेकिन तभी एक दर्दनाक हादसा हुआ। हॉस्टल की चौथी मंजिल से हरीश अचानक नीचे गिर गए। यह कोई सामान्य चोट नहीं थी। इस हादसे ने हरीश के शरीर को पूरी तरह से तोड़ कर रख दिया।
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अस्पताल ले जाने पर डॉक्टरों ने बताया कि उनके पूरे शरीर में लकवा (Paralysis) मार गया है और वह गहरे कोमा में चले गए हैं। मेडिकल भाषा में इस गंभीर स्थिति को क्वाड्रिप्लेजिया (Quadriplegia) कहा जाता है। इस बीमारी में गर्दन के नीचे का पूरा शरीर सुन्न हो जाता है। मरीज न तो अपने हाथ-पैर हिला सकता है, न कुछ निगल सकता है और न ही अपनी भावनाएं व्यक्त कर सकता है। हरीश का जीवन केवल एक फीडिंग ट्यूब (खाने-पीने की नली) और वेंटिलेटर के सहारे सिमट कर रह गया।
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डॉक्टरों ने उसी वक्त साफ कर दिया था कि इस स्थिति से बाहर आने और पूरी तरह से ठीक होने की संभावना लगभग शून्य (Zero) है।
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13 साल का नरक: बिस्तर पर पड़े-पड़े शरीर में हो गए गहरे घाव
\r\n\r\nजरा कल्पना कीजिए, 13 साल तक एक ही बिस्तर पर, एक ही करवट, छत को निहारते हुए पड़े रहना। हरीश राणा के लिए यह नरक से कम नहीं था। 13 सालों तक लगातार बिस्तर पर पड़े रहने के कारण हरीश के शरीर पर बेडसोर्स (Bedsores) यानी दबाव के कारण होने वाले गहरे घाव हो गए थे। यह घाव इतने गहरे और तकलीफदेह होते हैं कि स्वस्थ इंसान इन्हें देखकर सिहर उठे।
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समय के साथ उनकी हालत सुधरने के बजाय और ज्यादा बिगड़ती जा रही थी। वे अपना दर्द बता नहीं सकते थे, बस उनकी आंखें उस अंतहीन पीड़ा की गवाही देती थीं। माता-पिता के लिए अपने होनहार बेटे को इस तरह तिल-तिल कर मरते देखना मानसिक रूप से असहनीय हो चुका था।
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मां की ममता और वो अनकही बातें
\r\n\r\nहरीश के एम्स में शिफ्ट होने के बाद गाजियाबाद की राज एंपायर सोसायटी के फ्लैट में एक अजीब सी खामोशी छा गई है। जिस घर में पिछले 13 सालों से बेटे की देखभाल का सिलसिला चल रहा था, वहां अब एक सूनापन है। पिता अशोक राणा भावुक हैं और किसी से बात करने की स्थिति में नहीं हैं। बहन और मां दिल्ली के एम्स से लौटकर फूट-फूट कर रो रही हैं।
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मां का दर्द शब्दों में पिरोया नहीं जा सकता। वह कहती हैं, "जिसे जन्म दिया, अपनी उंगली पकड़कर चलना सिखाया, पाल-पोसकर बड़ा किया और जब वह अपने पैरों पर खड़ा होने वाला था, तब उसे फिर से एक नवजात शिशु (अबोध) की तरह पालना पड़ा। इसमें मुझे कोई कष्ट नहीं था, वह मेरा बेटा है। लेकिन दुख सिर्फ इस बात का रहा कि मेरा बच्चा अपनी पीड़ा भी नहीं बता सका।"
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हरीश की मां हर सुबह-शाम अपने बेटे की मालिश करती थीं। मालिश के दौरान वह उससे घर भर की बातें करतीं, उसे किस्से सुनातीं कि आज घर में क्या-क्या हुआ। मां कई-कई घंटों तक बस हरीश के चेहरे को इस उम्मीद में देखती रहतीं कि शायद उसका बेटा एक बार पलक झपका दे, ताकि मां को तसल्ली हो जाए कि बेटे ने उसकी बातें सुन ली हैं। जब हरीश कभी उबासी लेता, उसे छींक आ जाती या उसकी आंखों के आसपास की त्वचा हल्की सी फड़कती, तो पूरे परिवार को उसी में उसके जिंदा होने का सुकून मिल जाता था।
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कानूनी लड़ाई: जब हाईकोर्ट ने किया निराश, तो सुप्रीम कोर्ट ने दिया 'उपकार'
\r\n\r\nभारत में इच्छामृत्यु (Euthanasia) का कानून बेहद जटिल है। राणा परिवार ने जब देखा कि उनके बेटे की पीड़ा अब सहन नहीं होती, तो उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट (Delhi High Court) में याचिका दायर की, लेकिन कानूनी अड़चनों के कारण उनकी याचिका खारिज कर दी गई।
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इसके बाद परिवार ने देश की सबसे बड़ी अदालत, सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court of India) का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने हरीश की मेडिकल रिपोर्ट और परिवार की मार्मिक अपील को समझा। कई बैठकों और मेडिकल बोर्ड की समीक्षा के बाद, अंततः सुप्रीम कोर्ट ने हरीश राणा के लिए पैसिव यूथेनेशिया को मंजूरी दे दी।
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पिता अशोक राणा रुंधे गले से कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट ने मंजूरी देकर हमारे बेटे हरीश पर बहुत बड़ा उपकार किया है। हमसे उसकी पीड़ा देखी नहीं जा रही थी। सबसे बड़ी बेबसी यह थी कि वह हमें यह भी नहीं बता पाता था कि उसे कहां दर्द हो रहा है। हम उसे ऐसे अनुभवी डॉक्टरों के पास छोड़ रहे हैं जो उसे कोई घातक इंजेक्शन देकर नहीं मारेंगे, बल्कि प्राकृतिक रूप से शरीर छोड़ने का रास्ता सुगम करेंगे। जब हरीश अपने प्राण त्याग देगा, तो हम बहुत सम्मान के साथ उसे घर लाएंगे और अंतिम विदाई देंगे।"
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आध्यात्मिक विदाई: ब्रह्मकुमारी संस्था का मिला साथ
\r\n\r\nइस कठिन समय में राणा परिवार को आध्यात्मिक संस्था 'ब्रह्मकुमारीज' (Brahma Kumaris) का बड़ा सहारा मिला। हरीश का परिवार पिछले 18 सालों से इस संस्था से जुड़ा हुआ है। 13 साल तक दिल्ली में संघर्ष करने के बाद, लगभग 6 साल पहले पूरा परिवार गाजियाबाद शिफ्ट हो गया था।
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करीब 2-3 साल पहले, जब दर्द बर्दाश्त के बाहर हो गया, तब परिवार ने ब्रह्मकुमारी बहन लवली से अपना दर्द साझा किया। उन्होंने कहा कि "अब हम पर इतना दर्द नहीं देखा जाता। घर में भाई, बहन, मां और पिता हर रोज घुट-घुट कर रोते हैं।" बहन लवली ने ही परिवार को कानूनी लड़ाई के लिए एक वकील मुहैया कराया।
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14 मार्च को जब हरीश को गाजियाबाद के घर से आखिरी बार ले जाया जा रहा था, तो ब्रह्मकुमारी लवली ने हरीश के सिर पर प्यार से हाथ फेरा और उसके माथे पर चंदन का टीका लगाया। इसके बाद हरीश अपने अंतिम सफर पर एंबुलेंस में निकल पड़ा। यह दृश्य इतना मार्मिक था कि वहां मौजूद हर शख्स की आंखें छलक पड़ीं। पिता अशोक राणा ने हाथ जोड़कर परिवार के सभी सदस्यों से माफी मांगी और कहा, "न चाहते हुए भी मुझे अपने बेटे के लिए यह कठोर कदम उठाना पड़ा है।"
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क्या है पैसिव यूथेनेशिया (Passive Euthanasia)?
\r\n\r\nहरीश राणा के मामले ने देश में एक बार फिर इच्छामृत्यु (Euthanasia) की बहस को जिंदा कर दिया है। आपको बता दें कि भारत में 'एक्टिव यूथेनेशिया' (यानी जहर का इंजेक्शन देकर मारना) पूरी तरह से गैर-कानूनी है। भारत में सुप्रीम कोर्ट ने केवल 'पैसिव यूथेनेशिया' (Passive Euthanasia) की अनुमति दी है।
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पैसिव यूथेनेशिया का मतलब है:
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- \r\n जब मरीज के ठीक होने की कोई उम्मीद न बचे (टर्मिनल इलनेस) या वह परमानेंट वेजिटेटिव स्टेट (PVS) में हो।\r\n \r\n
- \r\n ऐसी स्थिति में मरीज का लाइफ सपोर्ट सिस्टम (वेंटिलेटर, कृत्रिम ऑक्सीजन) हटा लिया जाता है।\r\n \r\n
- \r\n मरीज को दिया जाने वाला कृत्रिम भोजन और पानी (फीडिंग ट्यूब) बंद कर दिया जाता है।\r\n \r\n
- \r\n मरीज को मरने के लिए कोई दवा नहीं दी जाती, बल्कि बीमारी को अपना काम करने दिया जाता है और प्राकृतिक रूप से मृत्यु होने दी जाती है।\r\n \r\n
- \r\n परिवार हरीश के मामले में इसे 'भगवान की गोद में छोड़ना' कह रहा है, ठीक उसी तरह जैसे कोई निर्जला व्रत रखता है और शरीर त्याग देता है।\r\n \r\n
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हरीश राणा का 13 साल का संघर्ष एक ऐसा दर्दनाक अध्याय है जो हमें जीवन की अनिश्चितता और मेडिकल साइंस की सीमाओं का एहसास कराता है। गाजियाबाद के राज नगर की वह बालकनी अब शायद ही कभी उस बेटे की वापसी देखेगी जो 13 साल पहले इंजीनियरिंग का एक सुनहरा सपना लेकर घर से निकला था। एम्स के एक बंद कमरे में चल रही यह प्रक्रिया सिर्फ एक मेडिकल इवेंट नहीं है, बल्कि एक परिवार के 13 सालों के आंसुओं, प्रार्थनाओं और एक ऐसे प्यार की कहानी है, जिसने अपने बच्चे को दर्द से बचाने के लिए सबसे कठोर फैसला लिया।
Sabse pehle comment karne wale banein.