भारतीय सिनेमा और संगीत जगत के आसमान का एक बेहद रोशन और चुलबुला सितारा आज हमेशा के लिए टूट गया। अपनी खनकती, जादुई और शोख आवाज से पिछले सात दशकों से भी ज्यादा समय तक करोड़ों संगीत प्रेमियों के दिलों पर राज करने वालीं, 'सुरों की मल्लिका' आशा भोसले का रविवार दोपहर 92 साल की उम्र में निधन हो गया है। उन्होंने मुंबई के ब्रीच कैंडी अस्पताल में अपनी अंतिम सांस ली।READ ALSO:-मेरठ सेंट्रल मार्केट विवाद: व्यापारियों की गुटबाजी पर सांसद डॉ. लक्ष्मीकांत बाजपेयी की दो टूक, कहा- 'दुख की घड़ी में राजनीति नहीं'
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स्वर कोकिला भारत रत्न लता मंगेशकर की छोटी बहन आशा भोसले के निधन की खबर आते ही पूरे देश और वैश्विक संगीत बिरादरी में शोक की गहरी लहर दौड़ गई है। सोशल मीडिया से लेकर न्यूज़ चैनल्स तक, हर जगह लोग नम आंखों से अपनी इस चहेती गायिका को श्रद्धांजलि दे रहे हैं। आशा भोसले का जाना महज़ एक गायिका का जाना नहीं है, बल्कि यह भारतीय संगीत के एक उस सुनहरे युग का अंत है, जिसने हमें रोना, हंसना, प्यार करना और जिंदगी को बिंदास तरीके से जीना सिखाया।
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 आशा भोसले की 3 बहनें और एक भाई था।

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आइए, इस दुखद मौके पर आशा ताई के अंतिम क्षणों से लेकर उनके बचपन के कड़े संघर्ष, अपमान, प्यार, दर्द और कामयाबी के उस ऐतिहासिक सफर पर विस्तार से नज़र डालते हैं, जो किसी भी फिल्मी कहानी से ज्यादा नाटकीय और प्रेरणादायक है।
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अंतिम क्षण: ब्रीच कैंडी अस्पताल का वो दुखद रविवार

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प्राप्त आधिकारिक जानकारी और अस्पताल के सूत्रों के अनुसार, वयोवृद्ध गायिका आशा भोसले को उम्र संबंधी कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं घेर रही थीं। शनिवार की रात को जब उन्हें अचानक छाती में भारी इन्फेक्शन (Chest Infection) और सांस लेने में अत्यधिक तकलीफ की शिकायत हुई, तो परिवार वालों ने आनन-फानन में उन्हें मुंबई के प्रसिद्ध ब्रीच कैंडी अस्पताल में भर्ती कराया।
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ब्रीच कैंडी हॉस्पिटल के वरिष्ठ चिकित्सक डॉ. प्रतीत समदानी, जिनकी देखरेख में उनका इलाज चल रहा था, ने समाचार एजेंसी को जानकारी देते हुए बताया कि भर्ती होने के समय आशा जी की स्थिति काफी नाजुक थी। उनके शरीर में अत्यधिक थकान (Extreme Exhaustion) थी। मेडिकल टीम ने उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की और उन्हें तत्काल आईसीयू (ICU) में शिफ्ट कर दिया गया था। लेकिन, बढ़ती उम्र और पहले से मौजूद कई मेडिकल जटिलताओं के कारण उनके शरीर ने प्रतिक्रिया देना बंद कर दिया।
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रविवार दोपहर को उन्हें कार्डियक अरेस्ट (दिल का दौरा) पड़ा, जिसके परिणामस्वरूप 'मल्टी-ऑर्गन फेल्योर' (शरीर के कई महत्वपूर्ण अंगों का एक साथ काम करना बंद कर देना) हो गया। यही उनके निधन की मुख्य वजह बनी। जैसे ही डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित किया, अस्पताल के बाहर और पूरे देश में सन्नाटा छा गया।
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अंतिम दर्शन और विदाई की तैयारियां: शिवाजी पार्क में होगा अंतिम संस्कार

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मां के निधन की इस अपूरणीय क्षति से टूट चुके उनके छोटे बेटे आनंद भोसले ने अस्पताल के बाहर मीडिया कर्मियों और प्रशंसकों को यह दुखद खबर कन्फर्म की। रुंधे हुए गले से आनंद भोसले ने बताया, "मेरी मां अब हमारे बीच नहीं रहीं। उनका आशीर्वाद हमेशा हमारे साथ रहेगा।"
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उन्होंने जानकारी दी कि जो भी शुभचिंतक, प्रशंसक और बॉलीवुड हस्तियां आशा ताई के अंतिम दर्शन करना चाहते हैं और अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करना चाहते हैं, वे सोमवार सुबह 11 बजे उनके मुंबई स्थित आवास पर आ सकते हैं। इसके बाद सोमवार शाम 4 बजे उनका पार्थिव शरीर पूरे विधि-विधान और राजकीय सम्मान के साथ मुंबई के ऐतिहासिक शिवाजी पार्क ले जाया जाएगा, जहां उनका अंतिम संस्कार संपन्न होगा। गौरतलब है कि उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर का अंतिम संस्कार भी इसी शिवाजी पार्क में हुआ था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री समेत देश-विदेश की कई जानी-मानी हस्तियों ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त किया है।
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12,000 से ज्यादा गानों का बेमिसाल और ऐतिहासिक सफर

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आशा भोसले का संगीत करियर किसी चमत्कार से कम नहीं है। उन्होंने अपने 7 दशकों से अधिक लंबे करियर में 20 से भी अधिक भारतीय और विदेशी भाषाओं में रिकॉर्ड 12,000 से ज्यादा गाने गाए हैं। 'गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स' (Guinness Book of World Records) में भी सबसे ज्यादा स्टूडियो रिकॉर्डिंग करने वाली गायिका के रूप में उनका नाम दर्ज हो चुका है।
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जहां उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर की आवाज को पूजा, सादगी और आध्यात्म का प्रतीक माना जाता था, वहीं आशा भोसले की आवाज में एक गजब की कशिश, शोखी, मादकता और चुलबुलापन था। वह भारत की पहली ऐसी गायिका थीं जिन्होंने प्लेबैक सिंगिंग में पश्चिमी धुनों, कैबरे और जैज (Jazz) का सफलतापूर्वक तड़का लगाया।
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    कैबरे और पॉप की क्वीन: जब पर्दे पर हेलेन (Helen) और जीनत अमान (Zeenat Aman) थिरकती थीं, तो उन्हें आवाज आशा भोसले ही देती थीं। 'पिया तू अब तो आजा' (कारवां), 'दम मारो दम' (हरे रामा हरे कृष्णा), 'ये मेरा दिल प्यार का दीवाना' (डॉन) जैसे गानों ने उन्हें कैबरे क्वीन बना दिया।
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    क्लासिकल और गज़ल का जादू: जो लोग सोचते थे कि आशा केवल पाश्चात्य संगीत गा सकती हैं, उन्हें उन्होंने मुज़फ्फर अली की फिल्म 'उमराव जान' से करारा जवाब दिया। 'इन आंखों की मस्ती के', 'दिल चीज़ क्या है', और 'जुस्तजू जिसकी थी' जैसी गज़लों ने साबित कर दिया कि खय्याम साहब के संगीत में आशा ताई की शास्त्रीय पकड़ कितनी मजबूत थी।
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    रोमांटिक मेलोडी: 'चुरा लिया है तुमने जो दिल को', 'ओ मेरे सोना रे सोना रे', 'अभी ना जाओ छोड़कर' जैसे अनगिनत रोमांटिक गानों से उन्होंने पीढ़ियों को प्यार करना सिखाया।
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वे एक ऐसी गायिका थीं जिनके बिना हिंदी सिनेमा के संगीत का इतिहास कभी पूरा नहीं लिखा जा सकता। उन्हें दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार, कई बार फिल्मफेयर पुरस्कार, 2000 में दादा साहब फाल्के पुरस्कार और 2008 में भारत सरकार द्वारा देश के दूसरे सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'पद्म विभूषण' से सम्मानित किया गया था।
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बचपन की कड़वी यादें: गरीबी की मार और स्कूल से निकाले जाने का दर्द

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आज भले ही आशा भोसले दुनिया भर में फैले 'आशाज' (Asha's) रेस्तरां की मशहूर चेन की मालकिन थीं, अरबों की संपत्ति की मालकिन थीं और दुनिया के सबसे महंगे होटलों में ठहरती थीं, लेकिन उनका बचपन भयानक गरीबी, तंगहाली और आंसुओं में डूबा हुआ था।
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8 सितंबर 1933 को ब्रिटिश इंडिया के सांगली (महाराष्ट्र) में जन्मीं आशा, मशहूर शास्त्रीय गायक और रंगमंच कलाकार पंडित दीनानाथ मंगेशकर की बेटी थीं। जब वे महज़ 9 साल की थीं, तब उनके पिता का साया उनके सिर से उठ गया। पिता के निधन के बाद इस विशाल मंगेशकर परिवार पर मुसीबतों का पहाड़ टूट पड़ा।
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आर्थिक तंगी का वो खौफनाक आलम था कि पिता के पास अपनी बेटियों के स्कूल की फीस भरने तक के पैसे नहीं हुआ करते थे। एक बेहद भावुक किस्सा जो आशा जी अक्सर सुनाया करती थीं, वह उनके स्कूल से जुड़ा है। जब बड़ी बहन लता मंगेशकर का स्कूल में दाखिला करवाया गया, तो फीस न होने के कारण लता अपनी छोटी बहन आशा को चोरी-छिपे अपने साथ स्कूल ले जाने लगीं। मास्टरजी की नजरों से बचाकर लता, आशा को अपने साथ डेस्क पर बिठा लेती थीं।
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लेकिन यह सिलसिला ज्यादा दिन नहीं चला। महज दो दिन ही बीते थे कि एक रोज मास्टरजी ने दोनों बहनों की यह चोरी पकड़ ली। मास्टरजी ने बेहद कड़क लहजे में दोनों को भरी क्लासरूम से बाहर निकाल दिया और कहा कि "एक फीस में एक ही बच्चा स्कूल आ सकता है, दोनों नहीं।" इस घटना ने दोनों बहनों के बाल मन पर गहरा असर डाला। दोनों रोते हुए घर लौट आईं। अगले दिन लता मंगेशकर ने एक बड़ा फैसला लिया। उन्होंने पिता से बात करके स्कूल से अपना नाम कटवा लिया और अपनी जगह छोटी बहन आशा का एडमिशन करवा दिया।
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10 साल की उम्र में शुरू किया गाना: जब मजबूरी बनी किस्मत
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पिता के निधन के बाद परिवार भुखमरी की कगार पर आ गया। ऐसे में पूरे परिवार की जिम्मेदारी बड़ी बहन लता मंगेशकर के कंधों पर आ गई। परिवार सांगली छोड़कर पहले पुणे और फिर किस्मत आजमाने सपनो के शहर मुंबई आ बसा।
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लगातार संघर्ष कर रहे परिवार को आर्थिक रूप से सहारा देने के लिए आशा भोसले ने भी महज 10 साल की उम्र में गायकी की दुनिया में कदम रख दिया। उन्हें पहला ब्रेक साल 1943 में आई मराठी फिल्म 'माझा बल' में मिला, जिसका गाना 'चला चला नाव बला' था। हिंदी सिनेमा में उनकी एंट्री 15 साल की उम्र में 1948 में आई फिल्म 'चुनरिया' के गाने 'सावन आया' से हुई।
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पहचान बनाने की जद्दोजहद: वह दौर ऐसा था जब इंडस्ट्री में नूर जहां, शमशाद बेगम और गीता दत्त जैसी दिग्गज गायिकाओं का राज चलता था। धीरे-धीरे लता मंगेशकर भी अपनी जादुई आवाज से एकछत्र राज स्थापित कर रही थीं। ऐसे में आशा भोसले के लिए कोई जगह नहीं थी। उन्हें केवल वही गाने गाने को मिलते थे जिन्हें या तो बड़ी गायिकाएं (खासकर उनकी बहन लता) गाने से मना कर देती थीं, या फिर उन सी ग्रेड फिल्मों के गाने जिनके निर्माता बड़े गायकों की भारी भरकम फीस चुकाने में असमर्थ होते थे। लेकिन आशा ने हार नहीं मानी। वे हर उस गाने को गाती रहीं जो उन्हें मिलता रहा।
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16 की उम्र में बगावत: प्यार, भागकर शादी और फिर बेइंतहा दर्द

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एक तरफ आशा स्टूडियो दर स्टूडियो काम के लिए भटक रही थीं, तो दूसरी तरफ उनकी निजी जिंदगी में एक ऐसा तूफान आया जिसने उन्हें उनके परिवार से ही दूर कर दिया। 10 साल की उम्र से काम कर रहीं आशा को महज 16 साल की उम्र में अपने सेक्रेटरी गणपत राव भोसले से बेइंतहा प्यार हो गया।
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गणपत राव उम्र में आशा से 15 साल बड़े थे। आशा जानती थीं कि मंगेशकर परिवार, खासकर लता मंगेशकर, इस बेमेल रिश्ते को कभी स्वीकार नहीं करेंगी। प्यार में अंधी हो चुकीं आशा ने परिवार से बगावत कर दी और 16 की उम्र में घर से भागकर गणपत राव भोसले से शादी कर ली। इस कदम से लता मंगेशकर इतनी नाराज हुईं कि दोनों बहनों के बीच कई सालों तक बातचीत बंद रही।
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लेकिन, आशा का यह फैसला उनके जीवन की सबसे बड़ी भूल साबित हुआ। यह शादी खुशियों से ज्यादा उनके लिए तकलीफें लेकर आई। शादी के कुछ समय बाद ही गणपत राव का व्यवहार बदलने लगा। उन्हें आशा की कामयाबी से जलन होने लगी और ससुराल वालों ने भी उन्हें कभी बेटी का दर्जा नहीं दिया।
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शादी से आशा को तीन बच्चे हुए। वक्त बीतने के साथ रिश्ते में शक, तनाव और कड़वाहट इतनी बढ़ गई कि गणपत राव ने उन्हें घर से निकाल दिया। उस दर्दनाक वक्त में आशा के साथ उनके दो छोटे बच्चे थे और वे तीसरे बच्चे (आनंद) की मां बनने वाली थीं। लाचार और बेबस आशा को मजबूरन अपने बच्चों को लेकर वापस अपने मायके (लता मंगेशकर के घर) लौटना पड़ा। साल 1960 में गणपत राव और आशा हमेशा के लिए अलग हो गए। 1966 में गणपत राव का निधन हो गया।
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अपमान की वो सर्द रात: जब खराब आवाज का ताना देकर स्टूडियो से निकाला गया
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आशा भोसले के संघर्ष के दिनों का एक किस्सा इतना दर्दनाक है कि वह आज भी बॉलीवुड के गलियारों में गूंजता है। यह बात साल 1947 की है। आशा भोसले और किशोर कुमार दोनों ही उस वक्त इंडस्ट्री में संघर्ष कर रहे थे और दोनों को बड़े ब्रेक की तलाश थी।
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आशा और किशोर कुमार को राज कपूर और नर्गिस स्टारर फिल्म ‘जान पहचान’ के लिए एक डुएट गाना रिकॉर्ड करने का मौका मिला। फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर खेमचंद प्रकाश थे। दोनों युवा गायक बेहद उत्साहित होकर मुंबई के एक फेमस स्टूडियो पहुंचे। उस दौर में आज की तरह आधुनिक तकनीक या अलग-अलग केबिन नहीं होते थे। पूरे स्टूडियो के बीच में सिर्फ एक बड़ा माइक होता था और सभी गायकों को उसी माइक के सामने खड़े होकर लाइव गाना पड़ता था।
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आशा और किशोर दा ने धड़कते दिल के साथ जैसे ही माइक के सामने गाना शुरू किया, वहां मौजूद साउंड रिकॉर्डिस्ट रॉबिन चटर्जी ने बीच में ही उन्हें टोक दिया। रॉबिन ने म्यूजिक डायरेक्टर खेमचंद्र प्रकाश से बंगाली भाषा में कहा- "इन दोनों की आवाज माइक में बिल्कुल अच्छी नहीं लग रही है, इनमें कोई दम नहीं है, इनकी जगह कोई और दूसरे सिंगर ले आओ।" पास ही खड़े किशोर कुमार बंगाली समझते थे। वे तुरंत बात की गंभीरता को समझ गए और उन्होंने धीमी आवाज में आशा से कहा कि "यहां कुछ गड़बड़ है, ये लोग हमें बाहर निकालने वाले हैं।" उनका गाना बीच में ही रोक दिया गया और थोड़ी देर में ही स्टूडियो प्रबंधन ने उन्हें वहां से निकल जाने को कह दिया।
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रात के 2 बज चुके थे। मुंबई की उस सर्द रात में खराब आवाज का ताना सुनकर दोनों का दिल बुरी तरह टूट गया था। वे स्टूडियो से बाहर निकले और उदास कदमों से चलते हुए महालक्ष्मी स्टेशन के पास आकर बैठ गए। दोनों घंटों वहां बैठे रहे और रोते हुए इस बात पर चर्चा करते रहे कि आखिर उनकी आवाज में क्या कमी है और उनसे कहां चूक हुई।
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सालों बाद किशोर दा ने लिया था उसी अपमान का बदला: मेहनत और लगन से इंसान अपनी किस्मत बदल सकता है। 1957 आते-आते आशा भोसले फिल्म 'नया दौर' के गानों (उड़ें जब-जब जुल्फें तेरी) से रातों-रात स्टार बन चुकी थीं। किशोर कुमार भी अपनी अदायगी और गायकी का लोहा मनवा चुके थे।
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कामयाबी के शिखर पर पहुंचने के बाद एक रोज संयोग से दोनों को फिर उसी पुराने स्टूडियो में एक गाना रिकॉर्ड करने का मौका मिला। किस्मत का खेल देखिए, वहां वही रिकॉर्डिस्ट रॉबिन चटर्जी भी मौजूद था, जिसने सालों पहले उन्हें धक्के मारकर बाहर निकाला था। आशा ताई तो स्वभाव से शर्मीली थीं, वे कुछ नहीं बोलीं। लेकिन किशोर कुमार इस मौके को कैसे छोड़ते? उन्होंने अपनी चिर-परिचित शैली में रॉबिन चटर्जी की तरफ देखा और तंज कसते हुए कहा- "क्यों दादा? आपने तो कहा था कि हम दोनों गा नहीं सकते। अब आप खुद देख लीजिए कि आज हम कहां हैं और दुनिया हमें कितना सुन रही है।" रॉबिन चटर्जी के पास उस दिन शर्मिंदगी से सिर झुकाने के अलावा कोई चारा नहीं था।
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आरडी बर्मन के साथ मखमली सफर: "आशा लानी है, तो मेरी लाश के ऊपर से गुजरना होगा"

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गणपत राव से मिले धोखे और तलाक के बाद आशा भोसले की जिंदगी सिर्फ उनके बच्चों और उनके गानों तक सिमट गई थी। लेकिन कहते हैं न कि किस्मत को कुछ और ही मंजूर था। उनके जीवन में एक नया सवेरा बनकर आए भारतीय सिनेमा के सबसे महान संगीतकारों में से एक—राहुल देव बर्मन (आरडी बर्मन), जिन्हें दुनिया प्यार से 'पंचम दा' कहती थी।
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दोनों की पहली बड़ी और ऐतिहासिक मुलाकात साल 1966 में फिल्म 'तीसरी मंजिल' के दौरान हुई थी। पंचम दा अपने पिता एसडी बर्मन के क्लासिकल संगीत की विरासत से हटकर कुछ नया, कुछ विद्रोही करना चाहते थे। उन्हें अपनी धुन के लिए एक ऐसी आवाज की तलाश थी जिसमें पाश्चात्य संगीत का बेधड़कपन हो। उन्हें यह खूबी आशा भोसले की आवाज में मिली। दोनों ने मिलकर 'ओ हसीना जुल्फों वाली' और 'ओ मेरे सोना रे सोना रे' जैसे गानों से तहलका मचा दिया।
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संगीत के इस जादुई सफर के दौरान दोनों के बीच प्रोफेशनल रिश्ता कब प्यार में बदल गया, उन्हें खुद पता नहीं चला। पंचम दा उम्र में आशा ताई से 6 साल छोटे थे। 1971 में पंचम दा का उनकी पहली पत्नी रीटा पटेल से तलाक हो चुका था। पारिवारिक कलह के चलते वे अक्सर होटल में रहा करते थे। इस दौरान आशा ने उनका बहुत साथ दिया।
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करीब 9 साल एक-दूसरे को डेट करने के बाद जब आरडी बर्मन ने आशा से शादी करने का फैसला किया, तो उनके परिवार में भूचाल आ गया। जब पंचम दा ने अपनी मां (मीरा देव बर्मन) को बताया कि वे आशा भोसले से शादी करना चाहते हैं, तो उनकी मां आगबबूला हो गईं।
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आरडी बर्मन की मां दोनों के रिश्ते से इस कदर खफा थीं कि उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी देते हुए कहा, "जब तक मेरे शरीर में जान है, तुम दोनों की शादी नहीं हो सकती। और अगर तुम आशा को इस घर की बहू बनाकर लाना चाहते हो, तो तुम्हें पहले मेरी लाश के ऊपर से गुजरना होगा।" अपनी मां की यह खौफनाक शर्त सुनकर आरडी बर्मन सन्न रह गए और बिना कुछ कहे वहां से चले गए। दोनों एक-दूसरे से बेइंतहा प्यार करते थे, लेकिन मां की इस भारी नाराजगी के चलते उन्होंने अपनी शादी टाल दी। किस्मत का खेल देखिए, कुछ सालों के बाद आरडी बर्मन की मां गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं और उनकी याददाश्त पूरी तरह से चली गई। उन्होंने लोगों को पहचानना बंद कर दिया। इस परिस्थिति के बाद, साल 1980 में आरडी बर्मन और आशा भोसले ने सादे समारोह में एक-दूसरे को अपना जीवनसाथी चुन लिया।
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हालांकि, उनकी यह खुशियां भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाईं। शादी के महज 14 सालों बाद ही 4 जनवरी 1994 को आरडी बर्मन का 54 वर्ष की उम्र में हार्ट अटैक से निधन हो गया। आशा ताई एक बार फिर जिंदगी के सफर में अकेली रह गईं।
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जिंदगी के सबसे गहरे जख्म: जब अपने ही बच्चों ने छोड़ा साथ

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बाहर से हमेशा मुस्कुराने वालीं और अपनी खनकती आवाज से दुनिया को नचाने वालीं आशा भोसले ने अपनी निजी जिंदगी में वो दर्द झेले हैं, जो किसी भी इंसान को तोड़ कर रख दें। उन्होंने आरडी बर्मन को खोया, लेकिन इसके बाद नियति ने उनके बच्चों को भी उनसे छीन लिया।
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आशा भोसले और पहले पति गणपत राव के तीन बच्चे थे—हेमंत, वर्षा और आनंद।

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    बेटी वर्षा की दर्दनाक आत्महत्या: आशा की इकलौती बेटी वर्षा भोसले एक बेहद प्रतिभाशाली और जानी-मानी राजनीतिक कॉलमनिस्ट (स्तंभकार) थीं। लेकिन अपनी निजी जिंदगी में वे बहुत परेशान थीं। पति से तलाक के बाद वर्षा गंभीर डिप्रेशन (अवसाद) का शिकार हो गई थीं। 8 अक्टूबर 2012 को, जब आशा ताई किसी कार्यक्रम के सिलसिले में सिंगापुर में थीं, तब 55 वर्षीय वर्षा ने मुंबई के पेडर रोड स्थित अपने आवास पर खुद को लाइसेंसी रिवॉल्वर से गोली मारकर आत्महत्या कर ली। इस घटना ने आशा भोसले को अंदर तक झकझोर कर रख दिया था। एक मां के लिए अपनी जवान बेटी का यूं लहूलुहान शव देखना किसी कयामत से कम नहीं था।
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    बड़े बेटे हेमंत की कैंसर से मौत: बेटी की मौत के गम से आशा ताई उबर भी नहीं पाई थीं कि 2015 में नियति ने उन्हें दूसरा बड़ा झटका दिया। उनके बड़े बेटे हेमंत भोसले, जिन्होंने शुरुआत में पायलट के रूप में काम किया और बाद में संगीत निर्देशन में भी हाथ आजमाया था, उनका स्कॉटलैंड में कैंसर के कारण निधन हो गया।
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इन दोनों भयानक त्रासदियों के बाद उनके सबसे छोटे बेटे आनंद भोसले ही उनके जीने का एकमात्र सहारा बने। आनंद ने ही अपनी मां के संगीत करियर, उनके रेस्टोरेंट बिजनेस और उनकी पूरी देखभाल का जिम्मा उठाया। अंत समय में ब्रीच कैंडी अस्पताल में भी आनंद अपनी मां के साथ साए की तरह मौजूद रहे।
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एक युग का अंत, जो अपनी आवाज में हमेशा अमर रहेगा

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आशा भोसले का जाना सिर्फ एक गायिका का दुनिया से चले जाना नहीं है। यह भारत के उस स्वर्णिम कला-युग का अस्त होना है जहां संगीत सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि रूह की खुराक हुआ करता था। लता दीदी के बाद आशा ताई ही वह आखिरी मजबूत स्तंभ थीं, जो हमें उस सुनहरे दौर से जोड़े हुए थीं। अब वह स्तंभ भी गिर गया है।
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उन्होंने गरीबी देखी, तिरस्कार झेला, प्यार में धोखा खाया, अपने पति और जवान बच्चों की चिताओं को आग लगते देखा, लेकिन उनके गले से निकलने वाले सुरों में कभी कोई कड़वाहट नहीं आई। उनके दर्द ने उनके संगीत को और भी गहरा और रूहानी बना दिया।
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आज भले ही ब्रीच कैंडी अस्पताल के उस कमरे में आशा भोसले की सांसें हमेशा के लिए खामोश हो गई हों, लेकिन जब भी कहीं कोई दिल टूटेगा तो 'मेरा कुछ सामान तुम्हारे पास पड़ा है' गूंजेगा, जब कोई महफिल जमेगी तो 'पिया तू अब तो आजा' पर कदम थिरकेंगे, और जब भी कोई मुड़कर जवानी के दिनों को याद करेगा तो 'ये मेरा दिल यार का दीवाना' की धुन हवाओं में तैर जाएगी।
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आशा भोसले कल भी एक अहसास थीं, आज भी एक जादू हैं और आने वाले कल में भी एक किंवदंती (Legend) बनकर हमेशा अमर रहेंगी। सुरों की इस महान साधिका को नम आंखों से भावभीनी श्रद्धांजलि! ओम शांति!
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