लखनऊ (UP News Special Feature): उत्तर प्रदेश की नौकरशाही और विशेष रूप से ऊर्जा विभाग (Energy Department) में इन दिनों एक भूचाल सा आया हुआ है। यह भूचाल किसी प्राकृतिक आपदा का नहीं, बल्कि 'स्मार्ट प्रीपेड मीटर' (Smart Prepaid Meter) नाम की उस योजना का है, जिसने राज्य के लाखों बिजली उपभोक्ताओं की रातों की नींद हराम कर दी थी। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ (Yogi Adityanath) की सख्त नाराजगी के बाद सोमवार को पावर कारपोरेशन (UPPCL) ने इस जन-विरोधी प्रीपेड व्यवस्था को समाप्त करने का ऐलान तो कर दिया, लेकिन कारपोरेशन का अड़ियल और तानाशाही रवैया अब भी बरकरार है।READ ALSO:-धामपुर में भव्य कार्यक्रम: पूर्व विधायक डॉ. इंद्रदेव सिंह बने 'पीएम उज्ज्वला योजना' के बिजनौर जिलाध्यक्ष, राष्ट्रीय अध्यक्ष राकेश प्रजापति ने सौंपी कमान
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस तानाशाही का सबसे बड़ा सबूत यह है कि उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC)—जो कि राज्य में बिजली से जुड़े मामलों की सर्वोच्च क्वासी-ज्यूडिशियल (Quasi-Judicial) संस्था है—के नोटिस का जवाब देने की जहमत भी कारपोरेशन के आला अधिकारियों ने नहीं उठाई। इस प्रशासनिक हठधर्मिता ने अब एक बड़े संवैधानिक और कानूनी टकराव का रूप ले लिया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

नियामक आयोग का गुस्सा: 10 दिन की मोहलत, 20 दिन का इंतजार और अब 24 घंटे का अल्टीमेटम

\r\n\r\n
लोकतंत्र में कोई भी संस्था कानून और जनता से ऊपर नहीं हो सकती, लेकिन यूपी पावर कारपोरेशन की कार्यप्रणाली को देखकर लगता है कि उन्होंने खुद को नियमों से परे मान लिया था। स्मार्ट प्रीपेड मीटरों से जुड़ी धांधली, अनाप-शनाप बिलिंग, रात के अंधेरे में बिजली कटने और बिना अनुमति मीटर बदलने की हजारों शिकायतों के बाद, राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद (State Power Consumer Council) ने पिछले महीने नियामक आयोग का दरवाजा खटखटाया था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
उपभोक्ता परिषद की मजबूत जनहित याचिका (PIL) पर संज्ञान लेते हुए, उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग ने 16 अप्रैल को पावर कारपोरेशन प्रबंधन को एक सख्त लीगल नोटिस जारी किया था। इस नोटिस में आयोग ने कारपोरेशन से 10 बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगते हुए 10 दिन के भीतर (यानी 26 अप्रैल तक) विस्तृत जवाब दाखिल करने का आदेश दिया था।
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n
कारपोरेशन की 'चुप्पी' बनी गले की फांस: आश्चर्य की बात यह रही कि 26 अप्रैल की डेडलाइन बीत जाने के बाद भी पावर कारपोरेशन प्रबंधन ने आयोग के नोटिस का कोई जवाब नहीं दिया। 10 दिन के बजाय 20 दिन बीत गए, लेकिन कारपोरेशन के प्रबंध निदेशक (MD) और अध्यक्ष (Chairman) के कार्यालय से एक पन्ने का जवाब भी आयोग तक नहीं पहुंचा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इस घोर लापरवाही और आदेशों की अवमानना (Contempt) को देखते हुए आयोग का धैर्य अंततः जवाब दे गया। मंगलवार को आयोग ने एक बेहद तल्ख और सख्त आदेश जारी करते हुए पावर कारपोरेशन के शीर्ष प्रबंधन को कटघरे में खड़ा कर दिया। आयोग ने साफ शब्दों में कहा है कि यदि अगले 24 घंटे के भीतर कारपोरेशन पूरे मामले पर अपना जवाब दाखिल नहीं करता है, तो आयोग प्रबंधन के खिलाफ सीधे तौर पर दंडात्मक कार्रवाई (Punitive Action) करने के लिए पूरी तरह से स्वतंत्र और बाध्य होगा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

कारपोरेशन पर लटकी 'दंडात्मक कार्रवाई' की तलवार का मतलब क्या है?

\r\n\r\n
जब कोई नियामक आयोग 'दंडात्मक कार्रवाई' की चेतावनी देता है, तो इसका मतलब केवल कागजी फटकार नहीं होता। विद्युत अधिनियम 2003 (Electricity Act 2003) की धारा 142 के तहत आयोग के पास असीमित अधिकार हैं। यदि यूपीपीसीएल (UPPCL) 24 घंटे के इस अल्टीमेटम को पार कर जाता है, तो आयोग निम्नलिखित कदम उठा सकता है:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    भारी आर्थिक जुर्माना: कारपोरेशन के शीर्ष अधिकारियों (चेयरमैन और एमडी) पर व्यक्तिगत रूप से भारी आर्थिक जुर्माना (Penalty) लगाया जा सकता है, जिसकी भरपाई उन्हें अपनी जेब से करनी होगी।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    विभागीय कार्रवाई की सिफारिश: आयोग राज्य सरकार और मुख्यमंत्री कार्यालय को इन लापरवाह अधिकारियों के निलंबन (Suspension) या विभागीय जांच की आधिकारिक सिफारिश भेज सकता है।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    योजनाओं पर रोक: कारपोरेशन की किसी भी नई टेंडर प्रक्रिया या टैरिफ बढ़ोतरी की मांग पर आयोग पूरी तरह से रोक लगा सकता है, जिससे विभाग का पूरा वित्तीय ढांचा चरमरा सकता है।
    \r\n
  6. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

उपभोक्ता परिषद का तीखा प्रहार: "कानून की उड़ाई गईं धज्जियां"

\r\n\r\n
इस पूरे आंदोलन की अगुवाई कर रहे राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष अवधेश कुमार वर्मा (Avdhesh Kumar Verma) ने पावर कारपोरेशन के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है। उन्होंने मीडिया और जनता के सामने उन तमाम काले कारनामों और कानूनी उल्लंघनों का पर्दाफाश किया है, जिन्हें स्मार्ट मीटर की आड़ में अंजाम दिया जा रहा था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अवधेश वर्मा ने दो टूक शब्दों में कहा है कि मुख्यमंत्री के निर्देश पर पावर कारपोरेशन ने अपनी साख बचाने के लिए मौखिक रूप से प्रीपेड सिस्टम को बंद करने की बात तो कह दी है, लेकिन उनकी नीयत में अब भी खोट है। उन्होंने सीधे तौर पर आरोप लगाया कि यूपीपीसीएल ने विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) और भारत सरकार के ऊर्जा मंत्रालय तथा केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण (CEA) के स्पष्ट दिशा-निर्देशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

क्या है विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) और कैसे हुआ इसका उल्लंघन?

\r\n\r\n
आम जनता के लिए यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर कानून क्या कहता है और कारपोरेशन ने कैसे उस कानून को तोड़ा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    कानूनी प्रावधान (The Law): विद्युत अधिनियम 2003 की धारा 47(5) और नियामक आयोग द्वारा जारी 'कास्ट डाटा बुक' (Cost Data Book) स्पष्ट रूप से कहती है कि बिजली आपूर्ति एक आवश्यक सेवा है। किसी भी उपभोक्ता की बिलिंग प्रणाली को बदलने से पहले एक निर्धारित पारदर्शी प्रक्रिया अपनानी होती है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    सहमति के बिना बदलाव (Change Without Consent): सबसे बड़ा अपराध जो कारपोरेशन ने किया, वह यह था कि राज्य में मौजूद लाखों पोस्टपेड (Postpaid) कनेक्शनों को रातों-रात उपभोक्ताओं की सहमति (Consent) के बिना जबरन प्रीपेड मोड (Prepaid Mode) में बदल दिया गया।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    कानून का उल्लंघन: कानून स्पष्ट कहता है कि यदि कोई उपभोक्ता पहले से पोस्टपेड सेवा का लाभ ले रहा है, तो उसकी लिखित सहमति के बिना आप उसे प्रीपेड में धकेल नहीं सकते। इसके अलावा, नए कनेक्शन चाहने वाले उपभोक्ताओं के सामने भी कोई विकल्प (Option) नहीं रखा गया; उन्हें तानाशाही पूर्ण तरीके से केवल प्रीपेड मीटर ही थमाए गए।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
उपभोक्ता परिषद अध्यक्ष ने आयोग से पुरजोर मांग की है कि नियमों के इस जघन्य उल्लंघन के लिए कारपोरेशन प्रबंधन के विरुद्ध सख्त से सख्त दंडात्मक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए, ताकि भविष्य में कोई भी ब्यूरोक्रेट जनता को इस तरह प्रताड़ित करने की हिम्मत न जुटा सके।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

"लिखित कार्यालय आदेश जारी करे कारपोरेशन": संशय बरकरार

\r\n\r\n
भले ही अखबारों और टीवी चैनलों पर यह खबर चल रही हो कि 'यूपी में स्मार्ट प्रीपेड मीटर खत्म हो गए', लेकिन आम उपभोक्ताओं और उपभोक्ता परिषद के मन में अब भी एक बड़ा संशय (Doubt) बरकरार है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अवधेश वर्मा ने एक बेहद तार्किक सवाल उठाया है— अगर कारपोरेशन ने प्रीपेड सिस्टम खत्म करने का फैसला ले लिया है, तो उसका आधिकारिक 'कार्यालय आदेश' (Official Office Order) या राजपत्र (Gazette) अभी तक जारी क्यों नहीं किया गया?
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
अक्सर देखा गया है कि जनता का आक्रोश शांत करने के लिए विभाग मौखिक बयान जारी कर देते हैं और मामला ठंडे बस्ते में जाते ही 'बैक-डोर' (Back-door) से फिर उन्हीं जन-विरोधी नीतियों को लागू कर देते हैं। उपभोक्ता परिषद ने मांग की है कि कारपोरेशन प्रबंधन अविलंब एक लिखित सर्कुलर जारी करे, जिसमें स्पष्ट रूप से यह लिखा हो कि:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    अब प्रदेश में कोई भी नया स्मार्ट मीटर 'प्रीपेड' मोड पर नहीं लगाया जाएगा।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    जो मीटर पहले से प्रीपेड मोड में चल रहे हैं, उन्हें तत्काल प्रभाव से 'पोस्टपेड' मोड में बदला जाएगा।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    बिलिंग के लिए पुरानी और सुविधाजनक 15-दिन की ग्रेस पीरियड वाली व्यवस्था फिर से पूरी तरह बहाल होगी।
    \r\n
  6. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
जब तक यह लिखित आदेश जारी नहीं होता, तब तक प्रदेश का उपभोक्ता खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर सकता।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कड़ा रुख और प्रशासनिक 'डैमेज कंट्रोल'

\r\n\r\n
इस पूरे घटनाक्रम में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की भूमिका सबसे अहम रही है। जब प्रदेश के कोने-कोने (मुरादाबाद, मेरठ, गोरखपुर, वाराणसी आदि) से मीटर उखाड़ने, बिजली घरों का घेराव करने और भारी पुलिस बल की तैनाती की खबरें मुख्यमंत्री कार्यालय (CMO) तक पहुंचीं, तो सीएम योगी ने तुरंत इस मामले का संज्ञान लिया।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
आगामी चुनावों और जनता की नाराजगी के राजनीतिक परिणामों को देखते हुए, मुख्यमंत्री ने ऊर्जा विभाग के शीर्ष अधिकारियों को कड़ी फटकार लगाई। सरकार का स्पष्ट मानना है कि तकनीकी सुधारों के नाम पर आम जनता, विशेषकर ग्रामीण और निम्न-मध्यम वर्गीय परिवारों का उत्पीड़न किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सीएम के इसी कड़े रुख के बाद ही पावर कारपोरेशन बैकफुट पर आया और उसे अपनी इस फ्लॉप 'प्रीपेड' योजना को वापस लेना पड़ा।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

प्रीपेड मीटर के वे 'दर्द', जिन्हें यूपी की जनता कभी नहीं भूलेगी

\r\n\r\n
भले ही यह व्यवस्था अब खत्म होने के कगार पर हो, लेकिन पिछले कुछ महीनों में यूपी की जनता ने स्मार्ट प्रीपेड मीटर के नाम पर जो दर्द झेला है, वह सरकारी फाइलों में हमेशा दर्ज रहेगा:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    माइनस बैलेंस का आतंक: मोबाइल फोन की तरह, बैलेंस माइनस (-) में जाते ही ऑटोमैटिक तरीके से घर की बत्ती गुल हो जाती थी। सिस्टम यह नहीं देखता था कि घर में कोई बीमार है, बच्चे की परीक्षा है या बाहर रात के 2 बज रहे हैं।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    रिचार्ज का लंबा 'वनवास': सबसे बड़ी प्रताड़ना तब होती थी जब उपभोक्ता तुरंत ऑनलाइन रिचार्ज कर लेता था। बैंक के खाते से पैसे कट जाते थे, लेकिन कारपोरेशन के सर्वर की सुस्ती के कारण मीटर अपडेट नहीं होता था। लोगों को 24 से 72 घंटे तक चिलचिलाती गर्मी में बिना पंखे के बैठना पड़ा है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    गरीबों पर एकमुश्त आर्थिक प्रहार: जो दिहाड़ी मजदूर महीने भर का 500 रुपये का बिल आराम से भर देता था, स्मार्ट मीटर लगने के बाद उसे हर हफ्ते 300 रुपये का रिचार्ज करवाना पड़ रहा था। मीटर इतनी तेजी से भागते थे कि जनता की गाढ़ी कमाई पानी की तरह बह रही थी।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आगे का रास्ता क्या है? (The Road Ahead)

\r\n\r\n
उत्तर प्रदेश में स्मार्ट मीटर का यह प्रकरण इस बात का क्लासिक उदाहरण है कि कैसे एसी कमरों (AC Rooms) में बैठकर बनाई गई नीतियां जब बिना जमीनी हकीकत जाने थोपी जाती हैं, तो वे कितनी बड़ी विफलता का कारण बनती हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
विद्युत नियामक आयोग का 24 घंटे का अल्टीमेटम केवल पावर कारपोरेशन के लिए ही नहीं, बल्कि पूरे नौकरशाही तंत्र के लिए एक सख्त चेतावनी है। अब पूरी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या पावर कारपोरेशन अपनी गलती मानते हुए कोई संतोषजनक जवाब आयोग को सौंपता है, या फिर अपने अहंकार में एक बार फिर कानून से टकराने की हिमाकत करता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
दूसरी ओर, प्रदेश के लाखों उपभोक्ता उस पल का इंतजार कर रहे हैं जब कारपोरेशन आधिकारिक तौर पर 'कार्यालय आदेश' जारी कर इस प्रीपेड के भूत को हमेशा के लिए दफन कर देगा। उपभोक्ता परिषद की यह जीत इस बात को प्रमाणित करती है कि यदि जनता और संगठन मिलकर किसी अन्याय के खिलाफ आवाज उठाएं, तो बड़े से बड़े सिस्टम को भी घुटने टेकने पड़ते हैं। यूपीपीसीएल के अधिकारियों के लिए अब 'टिक-टॉक' (Tick-Tock) शुरू हो चुका है, और अगले 24 घंटे उत्तर प्रदेश के ऊर्जा विभाग का भविष्य तय करने वाले हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
[अतिरिक्त जानकारी: उपभोक्ताओं के लिए महत्वपूर्ण] यदि आपके घर में भी स्मार्ट मीटर लगा है और आप प्रीपेड से पोस्टपेड में बदलाव की आधिकारिक जानकारी चाहते हैं, तो कृपया अपने नजदीकी उपखंड अधिकारी (SDO) कार्यालय से संपर्क करें या UPPCL के टोल-फ्री नंबर 1912 पर कॉल करके अपने अधिकारों की जानकारी लें।
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें