उत्तर प्रदेश में हर दिन करोड़ों अंडों की खपत होती है। स्वास्थ्य और खाद्य सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए हाल ही में यह चर्चा जोरों पर थी कि 1 अप्रैल 2026 से यूपी में बिकने वाले हर अंडे पर प्रोडक्शन और एक्सपायरी डेट की स्टैंपिंग (मुहर) अनिवार्य होगी। लेकिन, अब इस फैसले पर ब्रेक लगता दिख रहा है। खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग (FSDA) ने फिलहाल इस नियम को लागू करने से अपने हाथ खड़े कर दिए हैं। FSDA का स्पष्ट कहना है कि यदि यूपी में अंडों पर एक्सपायरी डेट का नियम सख्ती से लागू किया जाता है, तो राज्य में अंडों की भारी शॉर्टेज (कमी) आ जाएगी और इसके दाम आसमान छूने लगेंगे।Read also:-मेरठ में स्मार्ट प्रीपेड मीटरों पर बवाल: बिल भरने के बाद भी नहीं आ रही बत्ती, गुस्साए व्यापारियों ने किया चीफ इंजीनियर कार्यालय का घेराव
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दूसरी तरफ, इस मामले ने अब तूल पकड़ लिया है। यूपी कुक्कुट विकास समिति के अध्यक्ष वीपी सिंह ने सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि विभाग बड़े व्यापारियों और नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) के दबाव में काम कर रहा है। ऐसे में आम जनता और उपभोक्ताओं के मन में कई सवाल उठ रहे हैं। आखिर यूपी सरकार के इस आदेश को लागू करने में असली अड़चन क्या है? इससे किसे नुकसान है? यूपी में अंडा किन राज्यों से आता है और वहां क्या नियम लागू हैं? इस विस्तृत रिपोर्ट में हम इन्हीं सभी सवालों की गहराई से पड़ताल करेंगे।
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पहली वजह: दूसरे राज्यों से नहीं आ पाएंगे अंडे

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यूपी में अंडों पर एक्सपायरी डेट लागू न हो पाने की सबसे बड़ी और व्यावहारिक वजह सप्लाई चेन से जुड़ी है। आंकड़ों पर गौर करें तो उत्तर प्रदेश में अंडों की मांग बहुत ज्यादा है:
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    दैनिक खपत: यूपी में हर दिन लोग करीब 3.35 करोड़ अंडे खा जाते हैं। यह विशाल आंकड़ा उत्तर प्रदेश को देश का सबसे ज्यादा अंडा खपत वाला राज्य बनाता है।
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    स्थानीय उत्पादन: यूपी के अपने पोल्ट्री फार्मों में हर दिन केवल 1.80 करोड़ अंडों का प्रोडक्शन होता है।
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    बाहरी राज्यों पर निर्भरता: बाकी बचे अंडों की आपूर्ति के लिए यूपी पूरी तरह से अन्य राज्यों पर निर्भर है। मुख्य रूप से हरियाणा, पंजाब, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु से अंडे आते हैं।
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    आयात का आंकड़ा: इन 5 राज्यों से यूपी में रोज करीब 1.55 करोड़ अंडों की सप्लाई होती है, जो कुल खपत का लगभग 46% हिस्सा है।
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समस्या कहां है? दरअसल, जिन 5 राज्यों से यूपी में अंडे आते हैं, वहां अंडों पर स्टैंपिंग सिर्फ उन्हीं अंडों पर की जाती है जिन्हें विदेश में एक्सपोर्ट (निर्यात) करना होता है। घरेलू बाजार या यूपी में सप्लाई होने वाले अंडों पर प्रोडक्शन या एक्सपायरी डेट की कोई मुहर नहीं होती। ऐसे में जैसे ही यूपी में अंडों पर एक्सपायरी डेट लिखने का नियम लागू होगा, दूसरे राज्यों से आने वाले बिना स्टैंप के अंडे यूपी के मार्केट में बिक नहीं पाएंगे। दूसरे राज्यों के सप्लायर अचानक से यूपी के लिए अलग से स्टैंपिंग शुरू नहीं कर सकते। इसका सीधा असर यह होगा कि यूपी में रोज आने वाले 1.55 करोड़ अंडों की सप्लाई रुक जाएगी, जिससे बाजार में हाहाकार मचेगा और अंडे की भयानक शॉर्टेज हो जाएगी।
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दूसरी वजह: मार्केट और कोल्ड स्टोरेज में रखे अंडों का कंफ्यूजन

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अंडों की शेल्फ लाइफ (खराब होने की अवधि) पूरी तरह से उसके रखरखाव के तापमान पर निर्भर करती है।
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    कोल्ड स्टोरेज: अगर अंडे को 5 डिग्री सेल्सियस के नियंत्रित तापमान पर रखा जाए, तो इसे 35 से 45 दिनों तक सुरक्षित रूप से इस्तेमाल किया जा सकता है।
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    सामान्य तापमान: यदि उन्हीं अंडों को 25 से 35 डिग्री सेल्सियस के सामान्य तापमान (खुले बाजार) में रखा जाए, तो वे केवल 14 दिनों तक ही इस्तेमाल के लायक रहते हैं।
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अब नियम यह कहता है कि प्रोडक्शन और एक्सपायरी डेट मुर्गी के अंडा देने के तुरंत बाद लिखनी होगी। लेकिन पोल्ट्री फार्म से निकलते वक्त यह तय करना लगभग असंभव होता है कि कौन-सा अंडा सीधे खुले मार्केट में (14 दिन की एक्सपायरी के साथ) जाएगा और कौन-सा अंडा कोल्ड स्टोरेज में (45 दिन की एक्सपायरी के साथ) रखा जाएगा। अगर 14 दिन की एक्सपायरी लिख दी गई और अंडा कोल्ड स्टोर में गया, तो वह समय से पहले 'एक्सपायर' माना जाएगा। अगर 45 दिन की लिख दी गई और अंडा खुले बाजार में बिका, तो वह सड़ने के बावजूद 'वैध' माना जाएगा। इसी तकनीकी और व्यावहारिक उलझन के कारण FSDA इस नियम को लागू करने में झिझक रहा है।
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5 राज्यों को लिखा जाएगा लेटर: FSDA का अगला कदम

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स्थितियों को संभालने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग (FSDA) ने एक बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की है। FSDA के एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार, यूपी में जिन 5 राज्यों से अंडों की सप्लाई होती है (जिनमें हरियाणा सबसे बड़ा सप्लायर है), उनसे संपर्क साधा जाएगा।
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यूपी में अंडों पर स्टैंपिंग के नियम लागू करने से पहले पंजाब, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, हरियाणा और तमिलनाडु के शासन को आधिकारिक लेटर लिखे जाएंगे। इन पत्रों के माध्यम से:
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    बेस्ट प्रैक्टिस की जानकारी: इन राज्यों से पूछा जाएगा कि वहां अंडों की एक्सपायरी और गुणवत्ता को लेकर क्या नियम और 'बेस्ट प्रैक्टिस' अपनाई जा रही हैं।
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    नियमों में एकरूपता का अनुरोध: इन राज्यों से अनुरोध किया जाएगा कि वे भी अपने यहां से सप्लाई होने वाले अंडों पर स्टैंपिंग के नियम बनाएं, ताकि यूपी में अंडों की डिमांड और सप्लाई में कोई अचानक अड़चन न आए।
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आरोप: बड़े व्यापारियों के दबाव में नहीं लागू हो पा रहा आदेश

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इस पूरे मामले में सबसे बड़ा मोड़ यूपी कुक्कुट विकास समिति के अध्यक्ष वीपी सिंह के बयानों से आया है। उनका सीधा आरोप है कि विभाग केवल बहानेबाजी कर रहा है और यूपी के बड़े अंडा व्यापारियों व सिंडिकेट के दबाव में काम कर रहा है।
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आंकड़ों का खेल: वीपी सिंह के मुताबिक, पशुपालन विभाग सप्लाई और उत्पादन के जो आंकड़े पेश कर रहा है (1.80 करोड़ और 1.55 करोड़ वाले), वे असल में 2012 के पुराने आंकड़े हैं। उनका दावा है कि बीते एक दशक में यूपी में अंडों का अपना उत्पादन काफी बढ़ चुका है और राज्य उतनी बुरी तरह से बाहरी सप्लाई पर निर्भर नहीं है जितना बताया जा रहा है।
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केंद्र सरकार का नियम: वीपी सिंह याद दिलाते हैं कि केंद्र सरकार ने फरवरी, 2023 में ही अंडों की गुणवत्ता को लेकर नियम बनाए थे। उनका कहना है, "अगर विभाग की मंशा सच में इसे लागू करने की होती, तो वे पहले ही संबंधित राज्यों से कह सकते थे कि जिस तरह एक्सपोर्ट किए जा रहे अंडों पर स्टैंपिंग की जाती है, उसी तरह यूपी में सप्लाई होने वाले अंडों पर भी स्टैंपिंग की जाए। लेकिन इच्छाशक्ति की कमी है।"
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रंगों की कोडिंग का सुझाव: जहां तक खुले बाजार में बिकने वाले अंडों और कोल्ड स्टोरेज के अंडों की पहचान के कंफ्यूजन का सवाल है, यूपी कुक्कुट विकास समिति ने एक बहुत ही व्यावहारिक सुझाव दिया था। सुझाव यह था कि दोनों प्रकार के अंडों के लिए अलग-अलग रंग की इंक (स्याही) का इस्तेमाल किया जाए:
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    जो अंडे कोल्ड स्टोर में जाने वाले हैं, उन पर ग्रे (Grey) स्याही से स्टैंपिंग की जाए।
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    जो अंडे सीधे खुले बाजार में जा रहे हैं, उन पर पिंक (Pink) स्याही से स्टैंपिंग की जाए। इससे न केवल उपभोक्ता को अंडे की स्थिति पता चलेगी, बल्कि शेल्फ लाइफ का विवाद भी सुलझ जाएगा।
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बड़े व्यापारी और NECC को क्या फायदा है?

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वीपी सिंह ने नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) और बड़े व्यापारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनके अनुसार, ये बड़े खिलाड़ी अंडों की कालाबाजारी और रेट मैनिपुलेशन (कीमतों में हेरफेर) करने के लिए जानबूझकर एक्सपायरी डेट का आदेश लागू नहीं होने दे रहे हैं।
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बाजार का गणित और कालाबाजारी: आरोप है कि ये व्यापारी अपने हिसाब से बाजार में अंडों का रेट गिराते और उठाते हैं। जब अंडे का उत्पादन ज्यादा होता है, तो ये रेट डाउन करके सस्ते दाम पर बाजार से अंडे खरीद लेते हैं और उन्हें कोल्ड स्टोर में डंप कर देते हैं। बाद में जब बाजार में अंडों की कृत्रिम शॉर्टेज (कमी) पैदा होती है, तो यही व्यापारी उन स्टोर किए गए पुराने अंडों को महंगे दामों पर निकाल कर बेच देते हैं। अगर यूपी में अंडों पर एक्सपायरी डेट लागू हो गई, तो वे महीनों तक अंडों को होर्ड (जमा) करके नहीं रख पाएंगे और उनकी कालाबाजारी बंद हो जाएगी।
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बरवाला का रेट और मुनाफे का खेल: यूपी में आमतौर पर बरवाला (पंजाब) मंडी के रेट को फॉलो किया जाता है। वीपी सिंह उदाहरण देते हुए बताते हैं कि बीते एक सप्ताह में ही अंडे के रेट में 30 रुपए प्रति 100 अंडे का बड़ा अंतर आ गया है।
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    23 मार्च को अंडे का रेट 385 रुपए प्रति 100 अंडा था।
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    30 मार्च को यह रेट बढ़कर 415 रुपए प्रति 100 अंडा हो गया।
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अगर यूपी में होने वाली 3.35 करोड़ की डेली सप्लाई के हिसाब से इस 30 रुपये के अंतर का गणित लगाया जाए, तो यह हेरफेर एक दिन में करीब एक करोड़ रुपए के अतिरिक्त मुनाफे का बैठता है। बिना एक्सपायरी डेट के, व्यापारी आसानी से पुराना स्टॉक नए और महंगे रेट पर खपा देते हैं।
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NECC का पक्ष: छोटे व्यापारियों को दिक्कत होनी तय है

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इन सभी आरोपों के बीच, नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) ने अपना पक्ष मजबूती से रखा है। NECC के सीईओ अजीत सिंह स्पष्ट करते हैं कि उन्हें अंडों पर स्टैंपिंग से सैद्धांतिक रूप से कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन व्यावहारिक धरातल पर यह फिलहाल संभव नहीं है।
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उन्होंने अधिकारियों के सामने सवाल उठाया है कि क्या हमारे पास इस पूरी व्यवस्था को लागू करने के लिए पर्याप्त संसाधन और इंफ्रास्ट्रक्चर मौजूद हैं?
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NECC के प्रमुख तर्क:

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    एकरूपता का अभाव: यूपी में जो अंडे बाहर से आते हैं, उन पर दूसरे राज्यों में स्टैंपिंग कैसे होगी? व्यापार राष्ट्रीय स्तर पर होता है। अगर यूपी में नियम लागू होता है और अन्य राज्यों में नहीं, तो एकरूपता नहीं आ पाएगी।
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    फल-सब्जियों का उदाहरण: अजीत सिंह तर्क देते हैं कि जिस तरह ताजे फलों और सब्जियों पर स्टैंपिंग नहीं की जा सकती, उसी तरह अंडे जैसे कृषि उत्पाद पर भी यह व्यावहारिक नहीं है।
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    कोल्ड चेन इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी: अगर कोल्ड स्टोरेज में रखे अंडे को 45 दिन की एक्सपायरी के साथ बेचना है, तो इसके लिए रिटेलर तक एक अखंडित 'कोल्ड चेन' होनी चाहिए। यानी कोल्ड स्टोरेज से अंडा रेफ्रिजरेटर वैन (AC गाड़ी) से रिटेलर की दुकान तक पहुंचे। रिटेलर भी इसे फ्रिज में रखे। फ्रिज से बाहर (सामान्य तापमान पर) आने के बाद इसका अधिकतम 48 घंटे में इस्तेमाल होना चाहिए। भारत में फिलहाल छोटे दुकानदारों के पास ऐसा इंफ्रास्ट्रक्चर नहीं है।
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    लागत और महंगाई: सबसे बड़ी चिंता यह है कि स्टैंपिंग मशीनरी, अलग इंक और अतिरिक्त छंटाई के कारण उत्पादन लागत बढ़ जाएगी। इसका सीधा असर छोटे पोल्ट्री किसानों और व्यापारियों पर पड़ेगा, जिससे अंततः आम आदमी के लिए अंडे की कीमत महंगी हो जाएगी।
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असली पहचान का देसी तरीका: अजीत सिंह कहते हैं कि अंडे की ताजगी परखने के लिए आज भी सबसे आसान और प्रमाणित विधि वही है जो घरों में महिलाएं इस्तेमाल करती हैं। एक बर्तन में पानी लें और उसमें अंडा डाल दें। अगर अंडा पानी में डूब कर तली में बैठ जाता है तो वह बिल्कुल ताजा और सही है। लेकिन अगर अंडा पानी की सतह पर तैरने लगता है, तो इसका मतलब है कि उसके अंदर हवा भर गई है और वह खराब हो चुका है।
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कमिश्नर ने कहा- यह आसान मामला नहीं है

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इस पूरी रस्साकशी और विवाद के बीच FSDA की कमिश्नर रौशन जैकब ने बहुत ही नपे-तुले शब्दों में विभाग का रुख स्पष्ट किया है। उनका मानना है कि यूपी में अंडों पर एक्सपायरी डेट लागू करना कोई सीधा और सरल मामला नहीं है।
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रौशन जैकब कहती हैं, "यह एक आसान मामला नहीं है। हमारे सामने कई अहम पॉइन्ट्स (बिंदु) हैं जिन पर विचार करना जरूरी है। मांग और आपूर्ति (डिमांड और सप्लाई) के बीच का बड़ा अंतर, लोकल और छोटे पैमाने के अंडा उत्पादकों के आर्थिक हित, और सबसे महत्वपूर्ण कि इस नियम को जमीन पर कैसे लागू किया जाएगा? इन सभी संवेदनशील पहलुओं को ध्यान में रखते हुए ही कोई भी अंतिम आदेश जारी किया जाना चाहिए।"
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उन्होंने स्पष्ट किया है कि जल्दबाजी में कोई कदम नहीं उठाया जाएगा। अंडों पर स्टैंपिंग के इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर वह पहले कृषि उत्पादन आयुक्त (APC) और पशुपालन विभाग के शीर्ष अधिकारियों के साथ विस्तृत चर्चा करेंगी। सभी स्टेकहोल्डर्स (हितधारकों) से बात करने और संभावित समाधान निकालने के बाद ही आधिकारिक तौर पर कोई नया आदेश जारी किया जाएगा।
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अंततः, यूपी में अंडों पर एक्सपायरी डेट (UP Egg Expiry Date) का मुद्दा सिर्फ एक नियम लागू करने का नहीं, बल्कि पूरे पोल्ट्री उद्योग के अर्थशास्त्र और आम आदमी की रसोई से जुड़ा मामला है। एक तरफ जहां उपभोक्ताओं को ताजा और सुरक्षित अंडा मिलने का अधिकार है, वहीं दूसरी ओर सप्लाई चेन के टूटने से अंडों के दाम बढ़ने का खतरा भी वास्तविक है। FSDA की चिंता अपनी जगह जायज है कि रातों-रात नियम लागू करने से दूसरे राज्यों से सप्लाई रुक सकती है। हालांकि, यूपी कुक्कुट विकास समिति के आरोप भी इस ओर इशारा करते हैं कि बाजार में पारदर्शिता लाने के लिए दीर्घकालिक सुधारों की सख्त जरूरत है। सरकार को अब एक ऐसा बीच का रास्ता खोजना होगा जिससे छोटे किसानों का नुकसान न हो, बड़े व्यापारियों की मनमानी पर रोक लगे, और उपभोक्ताओं को सही जानकारी के साथ स्वस्थ आहार मिल सके। तब तक के लिए, यूपी में अंडे पर स्टैंपिंग का मामला फाइलों और बैठकों में ही सिमटा रहेगा।
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