उत्तर प्रदेश के करोड़ों बिजली उपभोक्ताओं के लिए नया साल और फरवरी का महीना आर्थिक रूप से भारी पड़ने वाला है। उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन लिमिटेड (UPPCL) ने उपभोक्ताओं की जेब ढीली करने के लिए अब तक का सबसे बड़ा 'फ्यूल सरचार्ज' (Fuel Surcharge) बम फोड़ने की तैयारी कर ली है। यदि नियामक आयोग ने हस्तक्षेप नहीं किया, तो फरवरी 2026 में आने वाले बिजली के बिल आपके घर के बजट को पूरी तरह बिगाड़ सकते हैं।Read also:-यूपी में मौसम का 'डरावना' यू-टर्न: ओले और बारिश के बाद लौटी हाड़ कंपाने वाली ठंड, 15 जिलों में 'विजिबिलिटी जीरो' की ओर
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इस प्रस्ताव के तहत उपभोक्ताओं से 10 प्रतिशत फ्यूल सरचार्ज वसूलने की योजना है। यह खबर सामने आते ही उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने मोर्चा खोल दिया है और बिजली खरीद की प्रक्रिया में बड़े "घोटाले" या "गड़बड़ी" की आशंका जताई है।
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खबर का सार: क्या है पूरा मामला?

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उत्तर प्रदेश पावर कॉरपोरेशन (UPPCL) ने विद्युत नियामक आयोग (UPERC) में एक प्रस्ताव रखा है। इस प्रस्ताव के मुताबिक, नवंबर 2025 में बिजली बनाने और खरीदने में ईंधन (कोयला/गैस) की लागत तय सीमा से बहुत ज्यादा आई है।
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बिजली विभाग के नियमों के अनुसार, यदि बिजली उत्पादन की लागत (Fuel Cost) बढ़ जाती है, तो विभाग 'फ्यूल सरचार्ज कॉस्ट एडजस्टमेंट' (FPPCA) के तहत उस अतिरिक्त खर्च की भरपाई उपभोक्ताओं से कर सकता है। इसी नियम का हवाला देते हुए UPPCL ने उपभोक्ताओं के बिल में अतिरिक्त शुल्क जोड़ने का निर्णय लिया है।
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मुख्य बिंदु:

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    वसूली का प्रकार: फ्यूल सरचार्ज (ईंधन अधिभार)।
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    प्रस्तावित दर: कुल बिल का लगभग 10% (अनुमानित)।
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    प्रभाव: फरवरी महीने के बिल में यह जुड़कर आएगा।
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    UPPCL का दावा: नवंबर 2025 में बिजली खरीद दर ₹5.79 प्रति यूनिट रही।
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आंकड़ों का खेल: ₹4.94 बनाम ₹5.79 की पहेली

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इस पूरे विवाद की जड़ में वह गणित है जो UPPCL ने नियामक आयोग के सामने पेश किया है। इसे समझना हर उपभोक्ता के लिए जरूरी है।
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विद्युत नियामक आयोग ने चालू वित्तीय वर्ष के लिए बिजली खरीद की एक औसत दर तय कर रखी है। यह वह दर है जिस पर पावर कॉरपोरेशन को बिजली खरीदनी चाहिए।
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    आयोग द्वारा स्वीकृत दर: ₹4.94 प्रति यूनिट।
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    UPPCL द्वारा बताई गई वास्तविक लागत (नवंबर 2025): ₹5.79 प्रति यूनिट।
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सीधे शब्दों में कहें तो, UPPCL का दावा है कि उसने नवंबर महीने में आयोग द्वारा तय की गई कीमत से 85 पैसे प्रति यूनिट (लगभग) अधिक कीमत चुकाई है। अब विभाग इसी अंतर को उपभोक्ताओं से वसूलना चाहता है।
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उपभोक्ता परिषद का विस्फोटक दावा: "यह आर्थिक छल है"

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उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद के अध्यक्ष, अवधेश कुमार वर्मा, जो लंबे समय से बिजली उपभोक्ताओं के हकों की लड़ाई लड़ रहे हैं, ने UPPCL के इन आंकड़ों को सिरे से खारिज कर दिया है। उन्होंने इसे प्रदेश की जनता के साथ एक बड़ा "आर्थिक छल" बताया है।
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अवधेश वर्मा ने एक बेहद तार्किक और गंभीर सवाल उठाया है जिसने पावर कॉरपोरेशन के दावों की हवा निकाल दी है।
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गर्मी बनाम सर्दी का तर्क:

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अवधेश वर्मा ने आंकड़ों की तुलना करते हुए बताया:
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    मई 2025: इस महीने में यूपी में भीषण गर्मी थी। एसी और कूलर 24 घंटे चल रहे थे। बिजली की मांग रिकॉर्ड स्तर पर थी। 'पिक ऑवर' डिमांड को पूरा करने के लिए महंगी बिजली खरीदनी पड़ती है। इसके बावजूद, मई में बिजली खरीद की दर ₹4.76 प्रति यूनिट थी।
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    नवंबर 2025: यह महीना सर्दियों की शुरुआत का था। एसी बंद हो चुके थे, पंखों की जरूरत कम थी। बिजली की मांग (Load) सामान्य या कम थी। ऐसे में बिजली बाजार (Power Exchange) में कीमतें गिरनी चाहिए थीं। लेकिन UPPCL का दावा है कि उसने ₹5.79 प्रति यूनिट बिजली खरीदी।
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सवाल: जब भयंकर मांग (मई) में बिजली सस्ती मिली, तो कम मांग (नवंबर) वाले महीने में बिजली इतनी महंगी कैसे हो गई?
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अवधेश वर्मा का कहना है, "नवंबर जैसे सामान्य महीने में इतनी महंगी बिजली खरीद पूरी तरह से संदेहास्पद है। यह या तो बिजली खरीद प्रबंधन में घोर लापरवाही है या फिर आंकड़ों में जानबूझकर की गई हेराफेरी, जिसका बोझ जनता पर डाला जा रहा है।"
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आपकी जेब पर असर: कितना बढ़ेगा बिल? (Impact Analysis)

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अगर यह 10% सरचार्ज लागू होता है, तो इसका सीधा असर हर वर्ग के उपभोक्ता पर पड़ेगा। चाहे वह घरेलू हो, किसान हो या व्यापारी। आइए एक अनुमानित गणना (Calculation) से समझते हैं:
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घरेलू उपभोक्ता (शहरी) - उदाहरण:

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मान लीजिए आपका औसत मासिक बिल ₹2000 आता है।
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    वर्तमान बिल: ₹2000
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    प्रस्तावित सरचार्ज (10%): ₹200
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    नया बिल: ₹2200 + टैक्स
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यह बढ़ोतरी देखने में छोटी लग सकती है, लेकिन बड़े उपभोक्ताओं और कमर्शियल कनेक्शनों के लिए यह बहुत बड़ी रकम होगी।
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मासिक खपत (यूनिट)
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औसत वर्तमान बिल (अनुमानित)
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सरचार्ज के बाद बढ़ोतरी (अनुमानित)
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150 यूनिट
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₹900 - ₹1000
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₹90 - ₹100
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300 यूनिट
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₹2000 - ₹2200
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₹200 - ₹220
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500 यूनिट
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₹3800 - ₹4000
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₹380 - ₹400
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कमर्शियल (Shop)
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₹5000
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₹500
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लघु उद्योग
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₹50,000
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₹5,000
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(नोट: यह गणना अनुमानित है और इसमें फिक्स चार्ज व अन्य कर शामिल हो सकते हैं।)
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बिजली खरीद प्रक्रिया और एक्सचेंज का गणित (Technical Deep Dive)

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इस मुद्दे की गहराई को समझने के लिए हमें यह जानना होगा कि बिजली खरीदी कैसे जाती है।
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पावर कॉरपोरेशन अपनी बिजली दो तरीकों से प्राप्त करता है:
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  1. \r\n
    दीर्घकालिक समझौते (PPA - Power Purchase Agreements): सरकारी और निजी कंपनियों से पहले से तय रेट पर बिजली मिलती है।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    पावर एक्सचेंज (Energy Exchange): जब मांग अचानक बढ़ती है, तो 'शेयर बाजार' की तरह बिजली भी 'इंडियन एनर्जी एक्सचेंज' (IEX) से खरीदी जाती है।
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नवंबर में क्या हुआ होगा?

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आमतौर पर सर्दियों में IEX पर बिजली के रेट कम होते हैं क्योंकि पूरे उत्तर भारत में मांग कम होती है। अगर UPPCL ने नवंबर में ₹5.79/यूनिट बिजली खरीदी है, तो इसके दो ही कारण हो सकते हैं:
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  1. \r\n
    कोयले का संकट: क्या नवंबर में कोयले की कीमतें अचानक बढ़ गई थीं? लेकिन ऐसी कोई बड़ी अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय रिपोर्ट नहीं थी।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    कुप्रबंधन (Mismanagement): क्या UPPCL ने अपने सस्ते पावर प्लांट्स (State Generation) को बंद करके निजी घरानों से महंगी बिजली खरीदी? यही वह बिंदु है जिस पर उपभोक्ता परिषद ने जांच की मांग की है।
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इसे तकनीकी भाषा में "Merit Order Dispatch" का उल्लंघन कहा जा सकता है, जहाँ नियम यह है कि सबसे पहले सबसे सस्ती बिजली खरीदी जानी चाहिए। क्या नवंबर में इस नियम को तोड़ा गया?
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उपभोक्ता परिषद की 4 सूत्रीय मांगें

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मामले की गंभीरता को देखते हुए उपभोक्ता परिषद ने विद्युत नियामक आयोग के चेयरमैन के सामने चार प्रमुख मांगें रखी हैं। ये मांगें सीधे तौर पर उपभोक्ताओं के संरक्षण के लिए हैं:
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  1. \r\n
    स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच: नवंबर 2025 की बिजली खरीद प्रक्रिया की जांच किसी स्वतंत्र एजेंसी या विशेष समिति से कराई जाए। यह पता लगाया जाए कि ₹5.79 का रेट आया कहां से।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    वसूली पर तत्काल रोक (Stay Order): जब तक जांच पूरी न हो और दूध का दूध, पानी का पानी न हो जाए, तब तक ईंधन अधिभार (Fuel Surcharge) की वसूली पर रोक लगाई जाए।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    जिम्मेदारी तय हो: अगर जांच में पाया जाता है कि बिजली जानबूझकर महंगी खरीदी गई या अधिकारियों ने लापरवाही बरती, तो उन अधिकारियों पर कार्रवाई हो और उनसे ही नुकसान की भरपाई की जाए, न कि जनता से।
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  6. \r\n
  7. \r\n
    पारदर्शिता: UPPCL को निर्देश दिया जाए कि वह भविष्य में बिजली खरीद का डेटा हर महीने सार्वजनिक करे ताकि पारदर्शिता बनी रहे।
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नियामक आयोग (UPERC) की भूमिका: क्या राहत मिलेगी?

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अब गेंद उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) के पाले में है। आयोग एक अर्ध-न्यायिक संस्था है जिसका काम उपभोक्ताओं के हितों की रक्षा करना और बिजली कंपनियों की मनमानी पर लगाम लगाना है।
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    अतीत के उदाहरण: पहले भी कई बार जब UPPCL ने मनमाने ढंग से दरें बढ़ाने का प्रस्ताव दिया है, तो उपभोक्ता परिषद के तर्कों के आधार पर आयोग ने उसे खारिज किया है।
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  • \r\n
    मौजूदा स्थिति: अवधेश वर्मा ने जो "मई बनाम नवंबर" का तर्क दिया है, वह आयोग के लिए नजरअंदाज करना मुश्किल होगा। नियामक आयोग UPPCL से पूछ सकता है कि उसने सस्ती बिजली (Low Cost Generation) का उपयोग क्यों नहीं किया?
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यदि आयोग उपभोक्ता परिषद की दलीलों से सहमत होता है, तो वह इस सरचार्ज को या तो पूरी तरह रद्द कर सकता है या इसे घटाकर बहुत कम (जैसे 2% या 3%) कर सकता है।
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राजनीतिक और सामाजिक मायने

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उत्तर प्रदेश में बिजली हमेशा से एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा रही है।
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    सरकार पर दबाव: प्रदेश सरकार लगातार दावा करती रही है कि वह सस्ती और निर्बाध बिजली दे रही है। लेकिन अगर चुपचाप 'बैकडोर' से सरचार्ज लगाकर बिल बढ़ाया जाता है, तो इससे सरकार की छवि पर असर पड़ सकता है।
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  • \r\n
    ग्रामीण आक्रोश: ग्रामीण क्षेत्रों में, जहां आय सीमित है, 10% की बढ़ोतरी बड़ा असंतोष पैदा कर सकती है। किसानों के लिए यह अतिरिक्त बोझ होगा, खासकर सिंचाई के सीजन में।
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    विपक्ष को मौका: महंगी बिजली का मुद्दा विपक्ष के हाथों में एक बड़ा हथियार साबित हो सकता है।
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उपभोक्ताओं को क्या करना चाहिए?

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फिलहाल, यह प्रस्ताव है और उपभोक्ता परिषद ने इस पर आपत्ति (Objection) दाखिल कर दी है। अंतिम निर्णय नियामक आयोग को लेना है।
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उपभोक्ताओं के लिए सलाह:

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  1. \r\n
    बिल पर नजर रखें: अपने पिछले महीने के बिल और आने वाले बिल (फरवरी) की तुलना करें। देखें कि 'Fuel Surcharge' के कॉलम में कितनी राशि जुड़ी है।
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  2. \r\n
  3. \r\n
    जागरूक बनें: उपभोक्ता परिषद की मुहिम का समर्थन करें। सोशल मीडिया और अन्य मंचों पर अपनी आवाज उठाएं।
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  4. \r\n
  5. \r\n
    स्मार्ट मीटर की निगरानी: जिन घरों में स्मार्ट मीटर लगे हैं, वे अपने प्रीपेड बैलेंस पर नजर रखें, क्योंकि सरचार्ज जुड़ते ही बैलेंस तेजी से खत्म हो सकता है।
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नवंबर की ठंड में UPPCL को बिजली खरीद में पसीना क्यों आया और वह पसीना अब उपभोक्ताओं की जेब से क्यों पोंछा जा रहा है, यह एक रहस्य है। अवधेश कुमार वर्मा और उपभोक्ता परिषद की सक्रियता ने फिलहाल UPPCL की राह मुश्किल कर दी है। अब देखना होगा कि नियामक आयोग करोड़ों उपभोक्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाता है या पावर कॉरपोरेशन के तर्क को सही मानता है।
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महत्वपूर्ण सवाल (FAQ)

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Q1: फ्यूल सरचार्ज (Fuel Surcharge) क्या है?
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Ans: बिजली बनाने में कोयला या तेल लगता है। अगर अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले या तेल की कीमत बढ़ जाती है, तो बिजली बनाने की लागत बढ़ जाती है। इस बढ़ी हुई लागत को उपभोक्ताओं से वसूलने के लिए जो टैक्स लगता है, उसे फ्यूल सरचार्ज कहते हैं।
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Q2: क्या यह बढ़ोतरी स्थायी (Permanent) है?
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Ans: नहीं, फ्यूल सरचार्ज आमतौर पर एक निश्चित अवधि के लिए लगाया जाता है। यह बिजली के बेस रेट (टैरिफ) में बढ़ोतरी नहीं है, बल्कि एक अस्थायी वसूली है।
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Q3: मई और नवंबर की दरों में क्या अंतर था?
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Ans: मई 2025 में भीषण गर्मी के बावजूद बिजली ₹4.76/यूनिट खरीदी गई, जबकि नवंबर 2025 में सामान्य मौसम में ₹5.79/यूनिट खरीदी गई। यही विवाद का मुख्य कारण है।
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Q4: अगर आयोग रोक नहीं लगाता तो बिल कब से बढ़ेंगे?
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Ans: अगर UPPCL के प्रस्ताव को मंजूरी मिलती है, तो यह फरवरी 2026 में जारी होने वाले बिलों में जुड़कर आएगा।
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