लखनऊ/खबरीलाल डेस्क: उत्तर प्रदेश की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनावों (UP Assembly Election 2027) को लेकर अभी से बिसात बिछनी शुरू हो गई है। राजनीतिक दलों की रणनीतियों के बीच राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा उठाए गए एक बेहद बड़े कदम ने यूपी की सियासत में भूचाल ला दिया है। चुनाव आयोग द्वारा चलाए गए विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (Special Summary Revision - SIR) अभियान के बाद जारी हुई नई मतदाता सूची ने सभी विपक्षी दलों की नींद उड़ा दी है।READ ALSO:-खुशियों पर फिरा मौत का साया: ग्वालियर में भीषण सड़क हादसे में मेरठ के परिवार समेत 5 की मौत, घर से चंद कदमों की दूरी पर खत्म हुई जिंदगी
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
\r\n
इस वृहद संशोधन और सत्यापन प्रक्रिया के बाद राज्य की वोटर लिस्ट से लगभग 2.18 करोड़ मतदाताओं के नाम काट दिए गए हैं। यह कोई छोटी-मोटी संख्या नहीं है; यह एक ऐसा आंकड़ा है जो चुनावी नतीजों को पूरी तरह से पलटने का माद्दा रखता है। अब प्रदेश में कुल मतदाताओं की संख्या घटकर 13.25 करोड़ रह गई है। इतनी बड़ी संख्या में नामों का कटना महज एक सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं मानी जा रही है, बल्कि राजनीतिक गलियारों में इसे 2027 के चुनावों का सबसे बड़ा ‘गेमचेंजर’ (Gamechanger) माना जा रहा है। इस भारी-भरकम कटौती के बाद यूपी में अब आरोप-प्रत्यारोप, दावों और सियासी हमलों का दौर शुरू हो गया है।
\r\n\r\n


\r\n 

\r\n\r\n

वोटर लिस्ट का 'चुनावी गणित'— आखिर कैसे कम हुए करोड़ों नाम?

\r\n\r\n
इस पूरे सियासी बवाल को समझने के लिए उत्तर प्रदेश मुख्य राज्य निर्वाचन विभाग के ताजा और चौंकाने वाले आंकड़ों की गहराई में जाना आवश्यक है। चुनाव आयोग ने मतदाता सूची को पारदर्शी और त्रुटिहीन बनाने के लिए यह विशेष अभियान चलाया था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

आंकड़ों की जुबानी, पुनरीक्षण की पूरी कहानी:

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    पुनरीक्षण से पहले की स्थिति: विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण (SIR) अभियान शुरू होने से पहले उत्तर प्रदेश में कुल पंजीकृत मतदाताओं की संख्या लगभग 15.44 करोड़ थी।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    पहला चरण (बड़ी छंटनी): चुनाव आयोग ने जब पुनरीक्षण के पहले चरण की शुरुआत की, तो इसमें एक बेहद बड़ी कार्रवाई करते हुए एकमुश्त 2.89 करोड़ नाम हटा दिए गए। इस भारी कटौती के बाद जो ड्राफ्ट सूची (Draft List) तैयार हुई, उसमें मतदाताओं की संख्या लुढ़ककर 12.55 करोड़ रह गई थी।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

विज्ञापन
विज्ञापन
\r\n\r\n

जांच में हुए सबसे बड़े और चौंकाने वाले खुलासे

\r\n\r\n
ड्राफ्ट सूची जारी होने के बाद असली और सबसे जटिल सत्यापन प्रक्रिया शुरू हुई। इस दौरान जो तथ्य सामने आए, उसने प्रशासनिक अमले को भी हैरान कर दिया:
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  1. \r\n
    करोड़ों को नोटिस: निर्वाचन आयोग ने संदिग्ध मतदाताओं की पहचान करते हुए करीब 3.26 करोड़ मतदाताओं को नोटिस भेजकर सुनवाई (Hearing) की।
    \r\n
  2. \r\n
  3. \r\n
    2003 की सूची से मिलान (सबसे बड़ा खुलासा): जांच के दौरान एक बेहद चौंकाने वाला तथ्य सामने आया। चुनाव आयोग ने जब पुराने रिकॉर्ड खंगाले, तो पाया कि करीब 1.04 करोड़ नामों का मिलान वर्ष 2003 की मूल मतदाता सूची से हो ही नहीं पाया। यानी ये वोटर कहां से आए और कैसे जुड़े, इसका कोई स्पष्ट रिकॉर्ड नहीं मिला, जिसके चलते इन पर सबसे बड़ी गाज गिरी।
    \r\n
  4. \r\n
  5. \r\n
    नए आवेदन और कटौतियां: इस पूरी प्रक्रिया के दौरान, राज्य भर से नए नाम जोड़ने के लिए 86.69 लाख आवेदन प्राप्त हुए, जबकि नाम हटाने के लिए स्वेच्छा से केवल 3.18 लाख आवेदन आए थे।
    \r\n
  6. \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
इन सभी जटिल प्रक्रियाओं, दावों और आपत्तियों को निपटाने के बाद जो अंतिम आंकड़ा सामने आया है, उसके अनुसार अब राज्य में कुल 13.25 करोड़ मतदाता बचे हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

एक नज़र में: मतदाता सूची में बदलाव के प्रमुख आंकड़े

\r\n\r\n\r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n \r\n
\r\n
विवरण (Description)
\r\n
\r\n
मतदाताओं की संख्या
\r\n
\r\n
पुनरीक्षण से पूर्व कुल मतदाता
\r\n
\r\n
15.44 करोड़
\r\n
\r\n
पहले चरण में काटे गए नाम
\r\n
\r\n
2.89 करोड़
\r\n
\r\n
ड्राफ्ट सूची में बचे मतदाता
\r\n
\r\n
12.55 करोड़
\r\n
\r\n
जांच के लिए भेजे गए नोटिस
\r\n
\r\n
3.26 करोड़
\r\n
\r\n
2003 की सूची से बेमेल नाम
\r\n
\r\n
1.04 करोड़
\r\n
\r\n
नए नाम जोड़ने हेतु आए आवेदन
\r\n
\r\n
86.69 लाख
\r\n
\r\n
वर्तमान में अंतिम कुल मतदाता
\r\n
\r\n
13.25 करोड़
\r\n
\r\n\r\n
 
\r\n\r\n

विपक्ष का हल्लाबोल— 'लोकतंत्र की हत्या और वोट चोरी' का आरोप

\r\n\r\n
मतदाता सूची से 2 करोड़ से ज्यादा नामों के गायब होने पर विपक्षी दल— मुख्य रूप से समाजवादी पार्टी (SP) और कांग्रेस (Congress)— पूरी तरह से हमलावर हो गए हैं।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

समाजवादी पार्टी (SP) का कड़ा रुख:

\r\n\r\n
समाजवादी पार्टी के नेताओं ने इस पूरी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। सपा का आरोप है कि सत्ताधारी दल (भाजपा) के इशारे पर एक सुनियोजित तरीके से विपक्षी मतदाताओं (खासकर एक विशेष वर्ग, दलित और पिछड़े वर्ग के वोटरों) को निशाना बनाया गया है। सपा का कहना है कि 2003 की सूची का हवाला देकर एकतरफा कार्रवाई की गई है। सपा इसे 'वोट चोरी' और 'प्रशासनिक धांधली' का नाम दे रही है, जिसका मकसद 2027 के चुनावों से पहले विपक्ष को कमजोर करना है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

कांग्रेस का वार:

\r\n\r\n
वहीं, कांग्रेस पार्टी ने भी इस प्रक्रिया की पारदर्शिता पर कड़ा ऐतराज जताया है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि जिस राज्य की आबादी लगातार बढ़ रही है, वहां मतदाताओं की संख्या में 2 करोड़ की गिरावट कैसे आ सकती है? उन्होंने चुनाव आयोग से मांग की है कि काटे गए नामों का बूथ स्तर पर श्वेत पत्र (White Paper) जारी किया जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि ये 2.18 करोड़ लोग कौन हैं और किन आधारों पर इन्हें मतदाता सूची से बाहर किया गया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

भाजपा का पलटवार— "फर्जी वोटरों पर हुई सर्जिकल स्ट्राइक"

\r\n\r\n
विपक्ष के इन गंभीर आरोपों के बीच, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने चुनाव आयोग की इस कार्रवाई का पुरजोर बचाव किया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

पारदर्शिता और निष्पक्षता का दावा:

\r\n\r\n
भाजपा नेताओं और प्रवक्ताओं का स्पष्ट कहना है कि यह कटौती किसी दल के खिलाफ नहीं, बल्कि 'फर्जीवाड़े' के खिलाफ है। उनका तर्क है कि पिछली सरकारों के समय में राजनीतिक लाभ लेने के लिए बड़े पैमाने पर फर्जी वोटर बनाए गए थे। एक ही व्यक्ति का नाम कई-कई बूथों और जिलों में दर्ज था।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
भाजपा के अनुसार, 1.04 करोड़ नामों का 2003 की सूची से मिलान न होना इस बात का सबसे बड़ा सबूत है कि सालों से यूपी के चुनावों में 'फर्जी वोटिंग' (Bogus Voting) का एक बड़ा खेल चल रहा था। सत्ता पक्ष का कहना है कि चुनाव आयोग ने आधार कार्ड लिंकिंग और डोर-टू-डोर चेकिंग के जरिए इन 'फर्जी और दोहरे वोटरों' पर पारदर्शी सर्जिकल स्ट्राइक की है, जिससे विपक्ष बौखला गया है क्योंकि उनका 'फर्जी वोट बैंक' अब खत्म हो गया है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

2027 के चुनावों पर इसका संभावित 'गेमचेंजर' प्रभाव

\r\n\r\n
2.18 करोड़ वोटों का कटना उत्तर प्रदेश की राजनीति की दिशा तय करने वाला है। यूपी की 403 विधानसभा सीटों पर कई बार हार-जीत का अंतर महज 1,000 से 5,000 वोटों का होता है।
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n
    \r\n
  • \r\n
    सीटों का समीकरण: इस कटौती का सीधा मतलब है कि हर विधानसभा सीट से औसतन 50,000 से 54,000 मतदाता कम हो गए हैं। यह किसी भी सीट के जातीय और सियासी समीकरण को रातों-रात पलट सकता है।
    \r\n
  • \r\n
  • \r\n
    नई रणनीतियों की दरकार: अब सभी राजनीतिक दलों को अपने चुनावी बूथों का नए सिरे से आकलन (Micro-level Election Engineering) करना होगा। विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपने बचे हुए वोटरों को सहेजने और जो वैध नाम कट गए हैं, उन्हें वापस जुड़वाने की होगी।
    \r\n
  • \r\n
\r\n\r\n

 

\r\n\r\n

लोकतंत्र की नींव और पारदर्शी चुनाव

\r\n\r\n
उत्तर प्रदेश में मतदाता सूची से 2.18 करोड़ नामों का कटना आने वाले कई महीनों तक राजनीतिक विमर्श का सबसे बड़ा केंद्र बिंदु बना रहेगा। एक तरफ चुनाव आयोग की जिम्मेदारी एक निष्पक्ष, पारदर्शी और त्रुटिहीन सूची तैयार करने की है, ताकि कोई फर्जी मतदान न हो सके। वहीं दूसरी तरफ, यह सुनिश्चित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण है कि किसी भी वास्तविक और वैध नागरिक का संवैधानिक मतदान अधिकार न छीना जाए। 2027 का यूपी चुनाव अब केवल रैलियों और जनसभाओं तक सीमित नहीं रहेगा; यह महासंग्राम अब हर गांव और शहर के बूथ स्तर की मतदाता सूचियों पर लड़ा जाएगा।
\r\n
विज्ञापन
विज्ञापन
पढ़िए फटाफट खबरेंस्वाइप करके पढ़ें